भारत में बढ़ती मानव तस्करी की घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए एक नया कानून तैयार किया गया है. नई दिल्ली में इस विधेयक के मसौदे को महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सार्वजनिक परामर्श के लिए पेश किया.
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इस मौके पर मेनका गांधी का कहना था कि मानव तस्करी से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं हैं. इसके चलते इस कानून को खासतौर पर मानव तस्करी से निपटने के लिए तैयार किया गया है. उनका कहना था, ''कई बार तस्करों और पीड़ितों दोनों को जल भेज दिया जाता है. लेकिन यह विधेयक इससे काफी अलग है और इन दोनों के बीच में अंतर करता है.'' मेनका गांधी ने बताया कि देश में सालाना लाखों लोगों की तस्करी हो रही है जिनमें से अधिकतर बच्चे हैं.
इस साल के अंत में मानव तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक-2016 को संसद में रखा जाना है. इसके मुताबिक मानव तस्करी के अपराधियों की सजा को दोगुना करने का प्रावधान है और ऐसे मामलों की तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान है. इस कानून के मुताबिक पीड़ितों की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जा सकेगा.
मेनका गांधी का कहना था कि मौजूदा कानूनों में मानव तस्करी के साथ ही होने वाले कई दूसरे अपराधों की अनदेखी होती है. उनका कहना था, ''प्रस्तावित विधेयक में भारतीय दंड संहिता की उन कमियों को पाटने की कोशिश की गई जिससे इससे जुड़े कई और भी अपराधों को पहचाना जा सके.''
इस कानून के मुताबिक ऐसे तस्करों को जेल की सजा होगी जो पीड़ितों के शोषण के लिए ड्रग और शराब का इस्तेमाल करते हैं या बच्चों की यौन परिपक्वता को बढ़ाने के लिए रसायनों या हारमोन्स का इस्तेमाल करते हैं.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2013 में तकरीबन साढ़े छह करोड़ लोगों की तस्करी की गई. इनमें से अधिकतर बच्चे हैं जिन्हें देह व्यापार, बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के काम में लगाया गया.
वॉक फ्री फाउंडेशन के 2014 के ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के मुताबिक भारत में एक करोड़ चार लाख से अधिक लोग आधुनिक गुलामी में जकड़े हुए हैं. यह संख्या दुनिया भर में सबसे अधिक है. प्रस्तावित कानून में पड़ोसी देशों, मसलन नेपाल या बांग्लादेश के साथ मानव तस्करी की रोकथाम के लिए साझे तौर पर काम करने का प्रावधान भी शामिल है. हालांकि भारत के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मानव तस्करी की समस्या को बेहद कम करके आंका गया है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो में 2014 में महज 5,466 मामले ही दर्ज हुए हैं.
आरजे/वीके (एएफपी, टीआरएफ)
यौनकर्म की अंधेरी दुनिया में नाबालिग
सामाजिक संस्थाओं का अनुमान है कि जर्मनी में चार लाख यौनकर्मियों में से 10 फीसदी नाबालिग हैं. कई बार अंजाने में तो कई बार जिद में वे अंधेरी दुनिया में प्रवेश कर जाती हैं.
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यौनकर्मियों की संख्या
जर्मनी में यौनकर्मियों की सही संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है. यौनकर्मियों के लिए काम करने वाली बर्लिन की हाइड्रा संस्था के मुताबिक करीब चार लाख महिलाएं यौनकर्म से रोजी रोटी कमा रही हैं.
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उत्पत्ति
जर्मनी में पूर्वी यूरोप और अफ्रीका से आई कई महिलाएं इस काम में लिप्त हैं. लेकिन यौनकर्म में शामिल नाबालिग लड़कियां ज्यादातर जर्मन ही हैं. डॉर्टमुंड की राहत संस्था मिडनाइट मिशन के मुताबिक यौनकर्म करने वाली दो तिहाई नाबालिग लड़कियां जर्मन मूल की हैं.
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नशे की लत
इन लड़कियों में कई स्कूली छात्राएं हैं. ये नशे की लती हैं. नशे की जरूरत को पूरा करने के लिए ही ज्यादातर वे यह रास्ता अपनाती हैं. इनमें से ज्यादातर अपने घरों से भागी हुई हैं और उनके पास रहने का ठिकाना नहीं है.
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अंधेरी दुनिया
यौनकर्म को कमाई के लिए अपनाने के कई कारण हैं. कभी वे दोस्तों या रिश्तेदारों के बहकावे में आकर यह काम करने लगती हैं तो कभी वे धोखे का शिकार हो जाती हैं. कई बार पुरुष उनके बॉयफ्रेंड बनकर उन्हें इस काम में बहला फुसलाकर घसीट लेते हैं.
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सख्त सजा
जर्मनी में लड़कियों को जबरन वैश्यावृति में धकेले जाने को रोकने के लिए कानून में सख्ती लाई जा रही है. भविष्य में लड़कियों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें सेक्स वर्क में धकेलने वालों को 10 साल तक कैद की सजा होगी.
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बचाने की कोशिश
बंधुआ सेक्स वर्करों से सेवा लेने वाले लोगों को भी भविष्य में जर्मनी में तीन महीने से पांच साल तक कैद हो सकती है. सजा से बचने के लिए जरूरी होगा कि वह बंधुआ सेक्स वर्करों के बारे में अधिकारियों को फौरन सूचना दे.
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छोड़ना मुश्किल
यौनकर्म की दुनिया में प्रवेश के बाद इनका बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. अक्सर वे यह समझ ही नहीं पाती हैं कि वे अपने साथ क्या कर रही हैं. कम उम्र में उनमें लोगों के खिलाफ जाने की प्रवृत्ति होती है. वे यौनकर्म को सामाजिक मान्यताओं को तोड़ने के कदम की नजर से देखती हैं.