ईरान युद्ध का भारत पर असर, लाखों की संख्या में फंसे भारतीय
समीरात्मज मिश्र
१३ मार्च २०२६
मध्य पूर्व में पिछले दो हफ्ते से जारी युद्ध का असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है. भारत के लाखों लोग मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों में रहते हैं. उड़ानें बंद होने के कारण लोग लौट नहीं पा रहे हैं.
नवीन और उनके साथी दुबई में नौकरी करते हैंतस्वीर: Navin Nishad
विज्ञापन
ईरान के खिलाफ इस्राएल और अमेरिका के युद्ध के चलते भारत के लाखों लोग खाड़ी के देशों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की है. इधर भारत में बैठे उनके परिजन दिन-रात हालात जानने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी सुरक्षित वापसी की दुआ कर रहे हैं. हालांकि भारत सरकार की तरफ से यहां फंसे हजारों यात्रियों की अब तक सकुशल वापसी कराई गई है लेकिन बड़ी संख्या में अभी भी लोग वापस आने के लिए परेशान हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 28 फरवरी को युद्ध छिड़ने के बाद 1 से 7 मार्च के बीच खाड़ी क्षेत्र से 52 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है. इनमें से 32 हजार लोगों ने भारतीय विमानों से यात्रा की जबकि बाकी लोग विदेशी एअरलाइंस से वापस आए.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस कान्फ्रेंस में बताया, "भारत सरकार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रही है, खासकर उन पर जो ट्रांजिट के दौरान या फिर अल्पकालिक यात्राओं के दौरान वहां फंस गए हैं. क्षेत्र में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय अधिकारियों के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ अपने स्थान पर स्थित भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास द्वारा जारी की जा रही एडवाइजरी का पालन करें.”
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राएल की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के बाद इस क्षेत्र में हालात तेजी से बदले हैं. कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे अस्थायी रूप से बंद हैं और उड़ानें रद्द कर दी गई हैं. इसका सीधा असर इन देशों में रह रहे लोगों पर पड़ रहा है जो वहां कामकाज या फिर पढ़ाई और पर्यटन के लिए जाते हैं. खाड़ी के अलग-अलग देशों में भारत के करीब एक करोड़ लोग रहते हैं.
90 लाख से ज्यादा भारतीय हैं खाड़ी के देशों में
खाड़ी देशों यानी फारस की खाड़ी में बसे छह देशों में भारतीयों की एक बड़ी आबादी रोजगार के लिए जाती है. विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. रोजगार की उपलब्धता और बेहतर वेतन वहां जाने के लिए लोगों को आकर्षित करता है. अकेले उत्तर प्रदेश से करीब पचीस लाख लोग इन देशों में हैं, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के. हालांकि अन्य इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग इन देशों में रह रहे हैं. बड़ी संख्या में घूमने के लिए भी लोग इन देशों का रुख करते हैं. लेकिन अब हवाई सेवाएं ठप होने से बहुत से लोगों को वहीं रुकना पड़ा है और यहां उनके घरों में बेचैनी का माहौल है.
जर्मनी में क्यों "दुबई चॉकलेट" के दीवाने हैं लोग
एक चॉकलेट में ऐसी क्या खास बात हो सकती है कि मामला कोर्ट तक पहुंच जाए. कस्टम विभाग एयरपोर्ट पर इसकी जांच करे. जर्मनी में "दुबई चॉकलेट" को लेकर कुछ ऐसी ही दीवानगी नजर आ रही है.
तस्वीर: Wolfgang Maria Weber/IMAGO
"सिर्फ दुबई से आ सकती है दुबई की चॉकलेट"
दुबई चॉकलेट का मामला जर्मनी के शहर कोलोन की एक अदालत में पहुंचा. दरअसल, जर्मन सुपरमार्केट आल्डी ने "आल्यान दुबई" नाम की चॉकलेट बेचनी शुरू की. ये चॉकलेट बिक रही थी जर्मन सुपरमार्केट में लेकिन इसे बनाया तुर्की में जा रहा था. आल्डी के खिलाफ मामला जर्मन कैंडी के आयातक आंद्रियाज विल्मर ने दर्ज कराया था.
तस्वीर: TOBIAS SCHWARZ/AFP
चॉकलेट कंपनी लिंट और सुपरमार्केट लिडल के खिलाफ भी केस
ऐसा ही मामला विल्मर ने एक और जर्मन सुपरमार्केट चेन लिडल और स्विस ब्रैंड लिंट के खिलाफ दर्ज करवाया था. हालांकि, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दुबई चॉकलेट सिर्फ दुबई से ही आनी चाहिए. लेकिन जर्मन सुरमार्केट का कहना है कि उन्होंने सिर्फ नाम इस्तेमाल किया है, चॉकलेट की रेसिपी उनकी अपनी है.
तस्वीर: TOBIAS SCHWARZ/AFP
ये दुबई चॉकलेट क्या बला है
2021 में दुबई की कंपनी फिक्स ने इसे एक लग्जरी चॉकलेट की तरह लॉन्च किया. इसे बनाया कंपनी की मालिक सारा हमूदा ने. इसके अंदर पिस्ता का पेस्ट भरा होता है. इसके बाद यह चॉकलेट बेहद वायरल हो गई. इसकी लोकप्रियता देखते हुए कंपनी ने इसके अलग अलग फ्लेवर लॉन्च किए. कई लोगों ने इसे घर पर बनाने की कोशिश की तो कई कंपनियों ने इसकी नकल करने की.
तस्वीर: ABBfoto/picture alliance
सोशल मीडिया ने दुबई चॉकलेट को किया मशहूर
पिछले साल सोशल मीडिया पर लगभग हर इनफ्लुएंसर की फीड पर दुबई चॉकलेट का एक रिव्यू जरूर मौजूद था. इस चॉकलेट का रिव्यू करना एक ट्रेंड बन गया. देखा जाए तो सोशल मीडिया ट्रेंड से ही यह चॉकलेट दुनिया के अलग अलग कोनों में पहुंची.
तस्वीर: Daniel Niemann/AP Photo/picture alliance
क्रिसमस मार्केट में दिखी दुबई चॉकलेट की धाक
जर्मनी अपने क्रिसमस मार्केट के लिए जाना जाता है. लेकिन इस बार के क्रिसमस मार्केट में भी दुबई चॉकलेट की एंट्री हुई. कई दुकानदारों ने बताया कि क्रिसमस मार्केट में उनकी सबसे ज्यादा बिकने वाली चीजों में ये चॉकलेट ही थी.
तस्वीर: DW
चॉकलेट की "तस्करी"
पिछले साल दिसंबर में जर्मनी के हैमबर्ग एयरपोर्ट पर कस्टम अधिकारियों ने एक महिला के पास से 90 किलो दुबई चॉकलेट जब्त की थी. महिला तीन सूटकेसों में ये चॉकलेट भरकर लाई थी लेकिन उसने इन पर टैक्स नहीं चुकाया था. अधिकारियों के मुताबिक महिला को गिरफ्तार नहीं किया गया लेकिन उस पर टैक्स चोरी का मामला जरूर दर्ज किया गया. चॉकलेट की तस्करी का यह मामला बताता है कि जर्मनी में लोग इसे कितना पसंद कर रहे हैं.
तस्वीर: DW
ट्रेंड की कीमत चुका रहे लोग?
अमूमन जर्मनों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक माना जाता है. लेकिन इस महंगे चॉकलेट की लोकप्रियता अपने आप में एक अजूबा है. असली दुबई चॉकलेट की कीमत करीब 69 यूरो है. लेकिन इसके चाहने वालों की तादाद देखते हुए ही इसके सस्ते वर्जन अलग अलग जर्मन सुपरमार्केट और चॉकलेट कंपनियां लॉन्च करने की होड़ में जुटी हुई हैं और अदालतों के चक्कर काट रही हैं.
तस्वीर: Nikolai Kislichko/Horrmann Kislichko GbR/IMAGO
क्या ट्रेंड के साथ खत्म हो जाएगी दुबई चॉकलेट की लोकप्रियता
दुबई चॉकलेट की लोकप्रियता के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका अहम रही है. लेकिन सोशल मीडिया ट्रेंड हर दिन बदलते हैं. इसलिए दुबई चॉकलेट के चाहने वाले शायद सोशल मीडिया के साथ कम हो जाएं. जर्मनी के इंस्टिट्यूट फॉर जेनरेशन रिसर्च के मुताबिक 95 फीसदी से अधिक लोग अब मानते हैं कि इस चॉकलेट की कीमत बहुत ज्यादा है. वहीं, 60 फीसदी ने लोगों ने कहा कि इसे खरीदने की उनकी कोई योजना नहीं है.
तस्वीर: - /ABBfoto/picture alliance
8 तस्वीरें1 | 8
बनारस के रहने वाले दुर्गेश कुमार दुबई में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "रोजगार की तलाश और ज्यादा पैसे कमाने के लिए अभी दो महीने पहले ही यहां आए थे लेकिन यहां तो युद्ध छिड़ गया है. हालांकि आम लोगों को बहुत खतरा तो नहीं है, लेकिन फिर भी हम लोग डरे हुए हैं. काम करने के बाद चुपचाप अपने-अपने कमरों में रहने चले जाते हैं. हर समय इस बात का खतरा बना रहता है कि कहीं कोई मिसाइल आकर न गिर जाए.”
हालांकि कई लोगों का ये भी कहना है कि रिहायशी इलाकों में किसी तरह का कोई डर नहीं है. नीरज निषाद गोरखपुर के रहने वाले हैं. दुबई के अलकूज में रहते हैं और पेंटिंग के ठेकेदार हैं. उनका कहना है कि शुरुआत में थोड़ा डर का माहौल था, लेकिन अब स्थिति सामान्य है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में नीरज निषाद कहते हैं, "यहां तो सब कुछ ठीक है. हां, बाहरी इलाकों में जरूर थोड़ा डर का माहौल है. पर हम लोग जहां हैं, वहां कोई डर नहीं है. हालांकि यहां से कुछ दूरी पर एक हफ्ते पहले एक मिसाइल गिरी थी लेकिन उसके बाद से कोई ऐसी घटना नहीं हुई. रिहायशी इलाकों में मिसाइल या बम नहीं गर रहे हैं.”
विज्ञापन
सुरक्षित लेकिन खौफ बरकरार
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के भी सैकड़ों लोग सऊदी अरब और यूएई सहित कई खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. युद्ध के बाद बने तनाव से उनके परिवार की चिंताएं बढ़ गई हैं. मुरादाबाद के जमील कहते हैं कि उनका बेटा सऊदी अरब में नाई का काम करता है. उनके मुताबिक, "बेटा जहां रहता है उस बिल्डिंग को युद्ध शुरू होने के बाद खाली करा लिया गया था. बेटे और उसके साथी सुरक्षित जगह पर तो हैं, फिर भी हम लोगों को हर समय उनकी फ्रिक बनी रहती है. कई बार बात भी नहीं हो पाती, इसलिए चिंता बढ़ जाती है.”
यूपी से बड़ी संख्या में लोग पढ़ाई के लिए ईरान का रुख करते हैं लेकिन लड़ाई के बाद से वहां भी अफरा-तफरी मची हुई है. संभल के मौलाना गुफरान नकवी पिछले दो साल से ईरान में पढ़ाई कर रहे हैं. उनके भाई मोहम्मद फहमान नकवी बताते हैं कि जहां वे रह रहे है, वहां स्थिति सामान्य है लेकिन खौफ बना रहता है.
बाराबंकी जिले के दर्जनों लोग ईरान के कुम शहर और अन्य इलाकों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो धार्मिक शिक्षा या फिर जियारत के लिए वहां गए थे. कई परिवारों का संपर्क वहां रह रहे अपने परिजनों से टूट चुका है.
इस्राएल जाने पर रोक!
इस बीच, उत्तर प्रदेश के 300 कामगारों के इस्राएल जाने पर 21 मार्च तक रोक लगा दी गई है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रूप से यह फैसला लिया है. उत्तर प्रदेश श्रम एवं सेवायोजन विभाग और एनएसडीसी के साथ इस्राइल की टीम ने पिछले महीने कानपुर में इन कामगारों का चयन किया था. इस्राइल में शटरिंग कारपेंटर, आयरन वेल्डिंग, प्लास्टरिंग और सिरेमिक टाइलिंग के काम के लिए इन श्रमिकों का चयन हुआ है.
अब खाड़ी के देशों में कम जा रहे हैं केरल के लोग
केरल प्रवासन सर्वे 2023 की रिपोर्ट दिखा रही है कि जहां राज्य से प्रवासन करने वालों की संख्या में मामूली इजाफा हुआ है, वहीं घर वापस लौटने वालों की संख्या भी बढ़ी है. इसके अलावा खाड़ी के देशों का आकर्षण भी कम हुआ है.
तस्वीर: P.P. Afthab/AP
थोड़ा कम हुआ है प्रवासन
केरल प्रवासन सर्वे 2023 के मुताबिक, पिछले साल केरल से 22 लाख लोगों ने प्रवासन किया. यह संख्या 2018 में 21 लाख थी. 1998 में जब यह सर्वे शुरू हुआ था, तब केरल से 14 लाख लोगों ने प्रवासन किया था. 2013 में यह संख्या बढ़ कर 24 लाख हो गई थी, लेकिन उसके बाद से यह धीरे-धीरे घट रही है. अनुमान है कि करीब 50 लाख मलयालम-भाषी लोग भारत से बाहर रहते हैं.
दिलचस्प यह है कि रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में जहां 12 लाख मलयालम-भाषी भारत लौटे थे, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 18 लाख हो गई. बीते पांच सालों में वापस लौट आने वाले केरल के लोगों की संख्या 38.3 प्रतिशत बढ़ी है. वापस आने वालों में करीब 18.4 प्रतिशत लोगों ने लौटने का कारण नौकरी छूट जाना, 13.8 प्रतिशत ने कम वेतन, 11.2 प्रतिशत ने बीमारी या हादसा, 16.1 प्रतिशत ने केरल में काम करने की इच्छा को वजह बताया.
तस्वीर: UNI
खाड़ी के देशों का आकर्षण गिरा
मलयालम-भाषी प्रवासियों के बीच बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई का आकर्षण घटा है और इनके मुकाबले दूसरे देशों का चाव 19.5 प्रतिशत बढ़ा है. यानी 80.5 प्रतिशत मलयाली प्रवासी आज भी खाड़ी देश जाना ही पसंद करते हैं, लेकिन 1998 में यह आंकड़ा 93.8 प्रतिशत था. 2023 में खाड़ी देशों के बाद मलयालम-भाषी प्रवासियों ने ब्रिटेन (छह प्रतिशत), कनाडा (2.5 प्रतिशत), अमेरिका (2.2 प्रतिशत) और ऑस्ट्रेलिया को चुना.
तस्वीर: Jon Gambrell/AP/picture alliance
प्रवासी छात्रों की संख्या बढ़ी
प्रवासन करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है. 2023 में प्रवासन करने वाले सभी मलयालम-भाषियों में से 11.3 प्रतिशत छात्र थे. यह 2018 के मुकाबले दोगुनी संख्या है. छात्र खाड़ी देश जाना पसंद नहीं करते हैं.
तस्वीर: NurPhoto/picture alliance
महिलाओं की संख्या ज्यादा
महिला प्रवासियों की संख्या भी बढ़ी है. 2018 में जहां महिला प्रवासियों की हिस्सेदारी 15.8 थी, वहीं यह 2023 में बढ़कर 19.1 हो गई. इनमें 71.5 महिलाएं स्नातक थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 34.7 प्रतिशत है. प्रवासी मलयाली महिलाओं में से 51.6 प्रतिशत बतौर नर्स काम करती हैं. करीब 40.5 प्रतिशत प्रवासी मलयाली महिलाएं पश्चिमी देशों में हैं.
तस्वीर: Manish Swarup/AP Photo/picture alliance
हिंदुओं से ज्यादा मुसलमान प्रवासी
प्रवासी मलयालम-भाषियों में 41.9 प्रतिशत मुसलमान हैं और 35.2 प्रतिशत हिंदू. केरल की आबादी में 26 प्रतिशत मुसलमान हैं और 54 प्रतिशत हिंदू. आबादी में 18 प्रतिशत ईसाई हैं, जबकि प्रवासियों में ईसाईयों की हिस्सेदारी 22.3 प्रतिशत है.
तस्वीर: R S Iyer/AP/picture alliance
विदेश से भेज रहे धन
रेमिटेंस (विदेश से अपने देश भेजा हुआ धन) में भी काफी बढ़ोतरी आई है. जहां 2018 में 85,092 करोड़ रुपए भेजे गए थे, वहीं 2023 में 2,16,893 करोड़ रुपए वापस भेजे गए, यानी 154.9 प्रतिशत ज्यादा. प्रति प्रवासी परिवार को 2023 में औसत 2.24 रुपए रेमिटेंस मिले. प्रवासी परिवारों ने इसमें से 15.8 प्रतिशत धन मकानों या दुकानों की मरम्मत पर, 14 प्रतिशत बैंक लोन चुकाने पर और 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया.
तस्वीर: PETA India
1998 से हो रहा है सर्वे
केरल सरकार द्वारा जारी किए गए इस सर्वे को इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट और गुलाटी इंस्टिट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड टैक्सेशन ने करवाया था. यह हर पांच साल पर करवाया जाता है. इस बार सर्वे में केरल के सभी 14 जिलों में से 20,000 परिवारों ने हिस्सा लिया है.
तस्वीर: Creative Touch Imaging Ltd/NurPhoto/IMAGO
8 तस्वीरें1 | 8
लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत उन लोगों को हो रही है जो खाड़ी के देशों से आना चाहते हैं. कई लोग पहले से ही योजना बनाए थे आने की लेकिन हवाई मार्ग बंद होने और फ्लाइट रद्द होने के कारण नहीं आ पा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, युद्ध की स्थितियों के बावजूद भारत से खाड़ी देशों की ओर जाने वालों की कमी नहीं दिख रही है. गौरव दुबे गोरखपुर में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं. उनके पास हर साल हजारों लोग थाईलैंड, इंडोनेशिया और खाड़ी देशों में जाने के लिए हवाई टिकट लेते हैं. उनका कहना है कि ट्रैवल एजेंसियों का व्यापार भी ठप सा हो गया है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में गौरव दुबे कहते हैं कि पिछले 12 दिन से गिनती के टिकट बिके हैं. उनके मुताबिक, "यहां से ज्यादातर लोग रोजी-रोजगार के लिए जाते हैं. यदि फ्लाइट सामान्य रूप से जाएं तो जाने वालों की कमी नहीं और यहां उनके परिजन भी परेशान नहीं हैं. लेकिन सामान्य फ्लाइट को स्पेशल फ्लाइट का नाम दे दिया गया है और किराया ज्यादा वसूला जा रहा है. बनारस से दुबई और शरजाह के लिए 17-18 हजार रुपये में सामान्य तौर पर टिकट मिल जाता है लेकिन अब यही टिकट 25-30 तीस हजार रुपये में मिल रहा है.”