तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दिसंबर 1988 के अंत में हुई चीन यात्रा के बाद भारत और चीन के रिश्तों पर 26 साल से छाई बर्फ पिघली थी और दोनों देशों ने तय किया था कि सीमा विवाद को हल करने के लिए सतत प्रयत्न जारी रखने के साथ-साथ आर्थिक एवं अन्य क्षेत्रों में संबंध सुधारने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए और सीमा विवाद के कारण इसमें बाधा न आने दी जाए. तब से अब तक दोनों देश इसी रास्ते पर आगे बढ़ते आ रहे हैं.
नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने के लिए बहुत जोशोखरोश के साथ सक्रिय कूटनीतिक कदम उठाए लेकिन उनका वांछित परिणाम नहीं निकला. चीन के साथ संबंध भी पिछले तीन सालों में आगे नहीं बढ़े हैं बल्कि उन्हें कुछ सीमा तक धक्का ही लगा है. हालांकि अहमदाबाद में साबरमती के किनारे मोदी के साथ झूला झूलते चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीरों और दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी ने कुछ और ही उम्मीद जगाई थी.
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम में देश के सबसे लंबे पुल का उद्घाटन किया जो राज्य के सुदूर पूर्व के क्षेत्र को अरुणाचल प्रदेश से जोड़ता है. इस पुल के कारण अब इस ओर से उस ओर जाने में पांच घंटे कम समय लगेगा. दूसरे, इस पुल पर से टैंक तथा अन्य रक्षा उपकरण भी आसानी से गुजर सकते हैं. इस पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया यह दर्शाने के लिए काफी है कि दोनों महादेशों के बीच सब कुछ पहले जैसा नहीं रह गया है.
पूरी दुनिया में चीन का रुतबा बढ़ रहा है. वह आर्थिक और सैन्य तौर पर महाशक्ति बनने की तरफ अग्रसर है. लेकिन कई अंदरूनी संकट उसे लगातार परेशान करते रहे हैं.
तस्वीर: Reuters/M. Shemetovचीन का पश्चिमी प्रांत शिनचियांग अक्सर सुर्खियों में रहता है. चीन पर आरोप लगते हैं कि वह इस इलाके में रहने वाले अल्पसंख्यक उइगुर मुसलमानों पर कई तरह की पाबंदियां लगता है. इन लोगों का कहना है कि चीन उन्हें धार्मिक और राजनीतिक तौर पर प्रताड़ित करता है. हालांकि चीन ऐसे आरोपों से इनकार करता है.
तस्वीर: Getty Imagesचीन का कहना है कि इस इलाके पर सदियों से उसकी संप्रभुता रही है. लेकिन इस इलाके में रहने वाले बहुत से लोग निर्वासित तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को अपना नेता मानते हैं. दलाई लामा को उनके अनुयायी जीवित भगवान का दर्जा देते हैं. लेकिन चीन उन्हें एक अलगाववादी मानता है.
तस्वीर: picture-alliance/ZUMAPRESSचीन का सिछुआन प्रांत हाल के सालों में कई बार तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं के आत्मदाहों को लेकर सुर्खियों में रहा है. चीनी शासन के विरोध में 2011 के बाद से वहां 100 से ज्यादा लोग आत्मदाह कर चुके हैं. ऐसे लोग अधिक धार्मिक आजादी के साथ साथ दलाई लामा की वापसी की भी मांग करते हैं. दलाई लामा अपने लाखों समर्थकों के साथ भारत में शरण लिए हुए हैं.
तस्वीर: dapdलोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के कारण हांगकांग अकसर सुर्खियों में रहता है. 1997 तक ब्रिटेन के अधीन रहने वाले हांगकांग में "एक देश एक व्यवस्था" के तहत शासन हो रहा है. लेकिन अक्सर इसके खिलाफ आवाजें उठती रहती हैं. 1997 में ब्रिटेन से हुए समझौते के तहत चीन इस बात पर सहमत हुआ था कि वह 50 साल तक हांगकांग के सामाजिक और आर्थिक ताने बाने में बदलाव नहीं करेगा. हांगकांग की अपनी अलग मुद्रा और अलग झंडा है.
तस्वीर: picture alliance/dpa/Kyodoताइवान 1950 से पूरी तरह एक स्वतंत्र द्वीपीय देश बना हुआ है, लेकिन चीन उसे अपना एक अलग हुआ हिस्सा मानता है और उसके मुताबिक ताइवान को एक दिन चीन का हिस्सा बन जाना है. चीन इसके लिए ताकत का इस्तेमाल करने की बात कहने से भी नहीं हिचकता है. लेकिन अमेरिका ताइवान का अहम दोस्त और रक्षक है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/H.Lin पुल के उद्घाटन के बाद चीन ने भारत को आगाह करते हुए अरुणाचल प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करने में "सावधानी” और "संयम” बरतने की सलाह दी है और कहा है कि जब तक सीमा विवाद हल नहीं हो जाता, तब तक दोनों देशों को संयुक्त रूप से सीमावर्ती क्षेत्र में विवादों को नियंत्रित करने और अमन-चैन बरकरार रखने का काम करते रहना चाहिए.
चीन अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है और उसे दक्षिण तिब्बत के नाम से पुकारता है. वह अक्साई चिन पर भी दावा करता है. हाल ही तक उसका प्रस्ताव था कि यदि भारत अक्साई चिन के पठार पर अपना दावा छोड़ दे तो वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ देगा. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. अब वह अपनी ओर से कोई रियायत नहीं देना चाहता और भारत से उम्मीद करता है कि वह अपने सभी दावे छोड़ दे.
दरअसल शी जिनपिंग के कार्यकाल में चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं. हाल ही में घोषित ओबोर परियोजना से इसकी एक झलक मिलती है. अब वह केवल एशियाई महाशक्ति की भूमिका से संतुष्ट नहीं है बल्कि अमेरिका की तरह विश्व की एकमात्र महाशक्ति बनने के ख्वाब देख रहा है. ओबोर उसकी ओर से एकतरफा ढंग से घोषित परियोजना है जिसके भूमंडलयीय, भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक निहितार्थ स्पष्ट हैं.
जब अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ मतभेद हों और भारत तथा चीन के प्रधानमंत्री दो दिन के अंदर जर्मनी में हों तो नये संबंधों की बात स्वाभाविक है. जी20 सम्मेलन से पहले चांसलर अंगेला मैर्केल वैश्विक मुद्दों पर सहमति ढूंढती दिखीं.
तस्वीर: weibo.comप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण सुरक्षा के मुद्दे पर कहा कि अगली पीढ़ी के लिए पर्यावरण को नष्ट करने का हमें अधिकार नहीं है. नैतिक रूप से यह अपराध है.
तस्वीर: Reuters/H. Hanschkeचीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग ने चांसलर को भरोसा दिलाया कि चीन पेरिस जलवायु समझौते पर कायम रहेगा. उन्होंने कहा कि टिकाऊ विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना हमारे भी हित में है.
तस्वीर: Reuters/F. Benschमोदी के साथ भेंट के बाद मैर्केल ने इस पर जोर दिया कि भारत या चीन के साथ संबंध ट्रांस अटलांटिक सहयोग की कीमत पर नहीं होंगे. इसके पहले मैर्केल ने यूरोप की अपनी जिम्मेदारी पर जोर दिया था.
तस्वीर: Reuters/F. Benschपर्यावरण संधि पर अमेरिकी संशय के बाद चीन ने नेतृत्व की भूमिका स्वीकार ली है और यूरोप के साथ समझौते को कामयाब बनाने के लिए तैयार है. संधि होने से पहले वह अमेरिकी हिस्सेदारी की शर्त रख रहा था.
तस्वीर: Reuters/H. Hanschkeमैर्केल ने कहा कि उन्होंने बर्लिन में प्रधानमंत्री मोदी के साथ खुले बाजारों और मुक्त तथा न्यायोचित कारोबार के बारे में बातचीत की. भारत ईयू मुक्त व्यापार का मामला सालों से लटका है.
तस्वीर: Reuters/H. Hanschkeचीन और जर्मनी जल्द ही एक पूंजी निवेश सुरक्षा संधि पर दस्तखत चाहते हैं. चीन के प्रधानमंत्री ली केचियांग का कहना है कि यह मुक्त व्यापार समझौते का पूर्व चरण होगा.
तस्वीर: Reuters/F. Benschमैर्केल मोदी मुलाकात में दोनों देशों के बीच संबंधों को बढ़ाने पर सहमति हुई. स्मार्ट सिटी, अक्षय ऊर्जा और सौर ऊर्जा पर सहयोग के लिए एक विकास कोष भी बनाया गया है.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/M. Schreiberजर्मनी और चीन के सरकार प्रमुखों ने अपनी बैठक में बढ़ती अनिश्तिता वाले वैश्विक माहौल में रिश्तों को बढ़ाने पर जोर दिया. ली ने कहा कि हम दोनों ही विश्व की स्थिरता में योगदान देने को तैयार हैं.
तस्वीर: Getty Images/S.Gallupभारत के साथ पिछले साल जर्मनी का सालाना कारोबार करीब साढ़े 17 अरब यूरो का है. इसमें करीब साढ़े 7 अरब का निर्यात भारत ने जर्मनी को किया. जर्मनी के वैश्विक कारोबार में भारत का स्थान 24वां है.
तस्वीर: Reuters/F. Benschचीन यूरोप से बाहर जर्मनी का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है. दोनों देशों के बीच 2016 में 170 अरब यूरो का कारोबार हुआ. जर्मनी के वैश्विक सहयोगियों में उसका पांचवां स्थान है.
तस्वीर: Getty Images/S.Gallup अब चीन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात भी नहीं करता क्योंकि उसका असली उद्देश्य आने वाले दशकों में अमेरिका की जगह लेना है. पर्यावरण जैसे मुद्दों पर भी अब वह अन्य देशों के साथ सलाह-मशविरा करके रुख तय करने के बजाय सीधे अमेरिका के साथ वार्ता करता है. भारत के प्रति भी उसका दृष्टिकोण इसी प्रक्रिया में बदला है और वह इस बात पर बहुत गर्वित है कि उसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भारत के सकल घरेलू उत्पाद का पांच गुना है. इसलिए अब भारत के प्रति उसका रवैया समझौतावादी होने के बजाय वर्चस्ववादी होता जा रहा है.
समस्या यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह समझते हैं कि शीर्ष नेताओं के बीच मधुर व्यक्तिगत संबंध देशों के बीच संबंधों को भी मधुर बना सकते हैं, जबकि वस्तुस्थिति इसके ठीक उलटी है. पुरानी कहावत है कि देशों के स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं. पिछले तीन वर्षों के दौरान मोदी सरकार चीन या पाकिस्तान जैसे देशों के प्रति ही नहीं, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे मित्र देशों के प्रति भी विदेश नीति का कोई वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत नहीं कर पायी है, बल्कि इन मित्र देशों के साथ भी संबंध पहले की अपेक्षा कुछ खराब ही हुए हैं.
मोदी सरकार के सामने चीन जैसी महाशक्ति से निपटने की चुनौती है. इस चुनौती का सामना सीमा पर तनाव बढ़ाकर या आर्थिक क्षेत्र में असहयोग करके नहीं, बल्कि यथार्थपरक विदेश नीति पर चल कर ही किया जा सकता है. भारत भी कोई छोटा-मोटा देश नहीं है जिसे नजरंदाज किया जा सके.