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भारत में डिजिटल जनगणना और “छिपे हुए एजेंडों” का डर

मुरली कृष्णन
१० अप्रैल २०२६

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में पूरी तरह से डिजिटल जनगणना शुरू हो गई है. लाखों कर्मचारी घर-घर जाकर डेटा जुटा रहे हैं. यह पहली बार है जब लोगों को खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने की सुविधा भी दी गई है.

Indien Srinagar 2026 | Beginn der weltweit größten Volkszählung
तस्वीर: Firdous Nazir/NurPhoto/picture alliance

भारत में 1 अप्रैल से पूरी तरह से डिजिटल जनगणना का काम शुरू हो गया है. इसके लिए, 30 लाख से भी ज्यादा कर्मचारियों को काम पर लगाया गया है. साथ ही, सरकार ने लोगों को यह सुविधा भी दी है कि वे खुद एक ऑनलाइन पोर्टल (सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल) पर जाकर अपनी जानकारी भर सकें.

पहले चरण में, अधिकारी घरों की सूची बनाने और घरों की स्थिति पर ध्यान देंगे. इस दौरान 33 पैमानों पर डेटा इकट्ठा किया जाएगा. इसमें घर बनाने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री, बिजली और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच, और स्मार्टफोन और गाड़ियों जैसी चीजों का मालिकाना हक शामिल है.

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इस बार जनगणना में हर इमारत की जियो-टैगिंग भी की जाएगी. इसका मतलब है कि हर घर और बिल्डिंग की सही भौगोलिक स्थिति रिकॉर्ड की जाएगी. इससे यह पक्का हो सकेगा कि देश का कोई भी इलाका या मकान गिनती से छूट न जाए और हमें देश के बुनियादी ढांचे की एकदम सही जानकारी मिल सके.

अगले साल की शुरुआत में होने वाला दूसरा चरण पूरी तरह से आबादी पर केंद्रित होगा. इसमें विस्तृत जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक डेटा इकट्ठा किया जाएगा. जैसे, हर व्यक्ति की उम्र, पढ़ाई और वह क्या काम करता है, इसकी पूरी जानकारी ली जाएगी. डिजिटल तकनीक की मदद से सरकार यह समझने की कोशिश करेगी कि लोग एक शहर से दूसरे शहर क्यों जा रहे हैं और बच्चों के जन्म की दर क्या है. अधिकारियों का मानना है कि इस डेटा से भारत की बदलती आबादी की विस्तृत प्रोफाइल तैयार करने में मदद मिलेगी.

हालांकि, सबसे खास बात यह है कि इस जनगणना में सभी समुदायों की जातियों की विस्तृत गिनती भी शामिल होगी. 1931 के बाद पहली बार ऐसा किया जा रहा है.

पढ़ें रिपोर्ट: क्या है ‘परिसीमन’ जिसे लेकर चिंता में हैं दक्षिण भारत के राज्य

भारत की जनगणना के पीछे छिपे एजेंडों का डर

1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच, भारतीय नागरिकों के पास अपना सारा जरूरी डेटा खुद बताने का विकल्प है. सरकार की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, "खुद जानकारी देने की यह प्रक्रिया सुरक्षित और वेब-आधारित सुविधा है, जो 16 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है. पहली बार, लोग जनगणना कर्मचारियों के आने से पहले, अपनी सुविधा के अनुसार अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं.”

इसमें आगे कहा गया है, "जनगणना शासन चलाने का एक बहुत जरूरी जरिया है. इसी आधार पर अगले दस सालों के लिए भारत के विकास की योजनाएं तैयार की जाएंगी.”

हालांकि, जिन लोगों को तकनीक से जुड़ी ज्यादा जानकारी नहीं है, उनके लिए ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल करना मुश्किल होगा. खासकर ऐसे लोग जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. ऐसे में उनका डेटा इकट्ठा करने के लिए जनगणना कर्मचारियों को ही उनके घर जाना होगा. लेकिन इस पुराने तरीके की भी अपनी अलग चुनौतियां हैं, जैसे डेटा दर्ज करने में होने वाली देरी या गलतियां.

जनगणना शुरू होने से पहले ही आलोचकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या लाखों कर्मचारियों को इतने कम समय में इतनी बड़ी आबादी का डेटा संभालने की सही ट्रेनिंग मिल पाएगी? क्या वे इतनी बड़ी संख्या में मौजूद घरों की सही से गिनती कर पाएंगे? कुछ लोगों को यह भी डर है कि घर के मालिकों को बिना किसी उचित मदद के खुद ही अपनी गिनती करने के लिए या फिर किसी अनौपचारिक बिचौलिए के जरिए अपना डेटा भेजने के लिए बढ़ावा दिया जा सकता है.

सबसे अहम बात यह है कि आलोचकों को इस बात की चिंता है कि राजनीतिक फायदे के लिए डेटा में हेर-फेर किया जा सकता है. इस जनगणना का डेटा 2027 में जारी होने की संभावना है. यह डेटा, भारत के सामने आने वाले राजनीतिक रूप से कुछ सबसे ज्यादा संवेदनशील फैसलों में अहम भूमिका निभाएगा. जैसे, जाति जनगणना से लेकर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करने तक.

पिछली जनगणना 2011 में हुई थी और उस दौरान अधिकारी घर-घर जाकर डेटा इकट्ठा किए थे.तस्वीर: Anupam Nath/AP Photo/picture alliance

भरोसे का सवाल

पिछली जनगणना 2011 में हुई थी. पुराने तरीके से डेटा इकट्ठा करने का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि उस वक्त भी फर्जी कर्मचारियों या स्थानीय स्तर पर आंकड़ों में हेराफेरी का डर रहता था, लेकिन तब कम नुकसान की आशंका होती थी. इसकी वजह यह थी कि सारा डेटा कागजों पर दर्ज किया जाता था और उसे प्रोसेस करने में काफी समय लगता था.

आज जब भारत कागज से डिजिटल की ओर बढ़ रहा है, तो सारा डेटा लगभग तुरंत ही सेंट्रल सिस्टम में पहुंच जाएगा. इस बार की जनगणना में जाति, धर्म, कमाई और पलायन जैसी बहुत ही निजी और संवेदनशील जानकारी भी ली जा रही है. इससे जोखिम और बढ़ जाता है. खासकर तब, जब इस डेटा को दूसरे सरकारी डेटाबेस (जैसे आधार या वोटर आईडी) के साथ जोड़कर देखा जाए.

करोड़ों भारतीयों की डिजिटल आई़डेंटिटी पर खतरा

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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने डीडब्ल्यू को बताया, "ये नए जोखिम नहीं हैं, लेकिन डिजिटलीकरण से इनका दायरा बढ़ जाता है. जो चीज पहले स्थानीय और सीमित स्तर पर थी, वह अब पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर सुरक्षा के उपाय नाकाम हो जाएं.”

कुरैशी ने आगे कहा, "डिजिटल की ओर यह बदलाव मायने रखता है, लेकिन असली मुद्दा भरोसे का है, न कि तकनीक का.” उन्होंने ‘उच्च राजनीतिक दांव' की ओर इशारा किया, जैसे परिसीमन— यानी किसी राज्य या निर्वाचन क्षेत्र के लिए प्रतिनिधियों की संख्या तय करने की प्रक्रिया और लैंगिक कोटा.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि जनगणना की सफलता "ऐप्लिकेशन पर कम, बल्कि पारदर्शिता, ऑडिट और इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि इसे कितना निष्पक्ष और समावेशी माना जाता है.”

कुरैशी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जाति-आधारित जनगणना से आरक्षण के कोटे का स्वरूप बदल सकता है और तनाव पैदा हो सकता है. वहीं, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई ज्यादा बढ़ने का खतरा है.

वह बताते हैं, "इसमें निजता से जुड़ी चिंताओं और डेटा के दुरुपयोग के डर को भी जोड़ दें, तो असली चुनौती केवल जनगणना को पूरा करना नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा, संघीय संतुलन और राजनीतिक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना है.”

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इंटरनेट से जुड़े अनुभव की कमी से धोखाधड़ी का खतरा

रीतिका खेड़ा, दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्री हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "असली मुद्दा यह नहीं है कि जनगणना को डिजिटल बनाया जा रहा है. असली बात तो यह है कि क्या हमारे पास इस डेटा को सुरक्षित रखने के लिए कड़े नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही का कोई सिस्टम है?”

खेड़ा के पिछले शोध में यह जांच की गई थी कि भारत की राष्ट्रीय बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली किस तरह निजता के अधिकारों और सबसे गरीब नागरिकों तक सामाजिक कल्याण योजनाओं की पहुंच को प्रभावित करती है.

हाल के सरकारी सर्वे के डेटा का हवाला देते हुए, खेड़ा बताती हैं कि डिजिटल तैयारी काफी कमजोर है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया, "ग्रामीण इलाकों में रहने वाली 15 साल से ज्यादा उम्र की आधी से भी कम महिलाओं के पास मोबाइल फोन हैं. हालांकि, कई महिलाएं पेमेंट ऐप्लिकेशन इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन बहुत कम महिलाएं ही दूसरे ऑनलाइन काम करने में सहज हैं. एक फीसदी से भी कम महिलाओं ने कहा कि वे नेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर सकती हैं.”

खेड़ा का कहना है कि इससे यह सवाल उठता है कि असल में ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन' (खुद से गिनती करने की प्रक्रिया) में कौन हिस्सा ले सकता है. वह इस बात का भी जिक्र करती हैं कि इसमें बिचौलियों के दखल का खतरा है. यह बात दूसरी ऐसी सरकारी योजनाओं में भी देखने को मिली है जिनमें डिजिटल भागीदारी जरूरी थी. उन योजनाओं में बिचौलियों ने कई बार धोखाधड़ी को बढ़ावा दिया है.

बतौर खेड़ा, "अगर ऐसे लोग ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन की सेवाएं' देना शुरू कर देते हैं, तो जनगणना अधिनियम के तहत मौजूद कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद, वे इस पूरी प्रक्रिया की एक कमजोर कड़ी बन सकते हैं.”

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यह खतरा केवल डेटा की सुरक्षा या जवाबदेही तक ही सीमित नहीं है. भारत का डिजिटल जनगणना की ओर बढ़ना सिर्फ तकनीक की दिशा में आगे बढ़ने भर नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा संरचनात्मक बदलाव है. इससे यह बदलाव होगा कि सरकार अपनी जनता की गिनती कैसे करती है और उनके साथ कैसे जुड़ती है.

यामिनी अय्यर, ब्राउन यूनिवर्सिटी की विजिटिंग सीनियर फेलो हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "डिजिटल फॉर्मेट का इस्तेमाल करने से भले ही काम करने की क्षमता बढ़ सकती है, लेकिन इससे यह संभावना भी बढ़ जाती है कि डेटा को ज्यादा तेजी से प्रोसेस और इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही, उस पर लोगों की नजर भी कम रहेगी. इससे भविष्य में होने वाले परिसीमन (सीमा तय करने) के काम का समय भी तय हो सकता है.”

वह बताती हैं, "2021 से अब तक महामारी की वजह से हुई लंबी देरी और साथ ही 2027 तक नतीजे तैयार करने की जल्दबाजी, इन दोनों बातों की पूरी तरह से कोई साफ वजह नहीं बताई गई है. इससे सरकार के इरादों और काम के तरीकों को लेकर कई सवाल उठने की गुंजाइश बनी हुई है.”

अय्यर की मानें, तो असली मुद्दा यह नहीं है कि ऐसा नतीजा पहले से तय है. बल्कि यह है कि समय, प्रक्रिया और डेटा के इस्तेमाल को लेकर जो अस्पष्टता है, उससे यह चिंता गहराने का खतरा है कि जनगणना का अंतिम डेटा भारत के निर्वाचन क्षेत्रों और चुनावी भूगोल को किस प्रकार प्रभावित करेगा.

वह कहती हैं, "यह घबराहट खासकर दक्षिण भारत के राज्यों में बहुत ज्यादा है. उन्हें डर है कि अगर नई आबादी के हिसाब से चुनाव क्षेत्रों का दोबारा बंटवारा हुआ, तो राजनीतिक ताकत उत्तर भारत की तरफ झुक जाएगी. इससे देश के संघीय संतुलन पर बुरा असर पड़ेगा और दक्षिण के राज्यों का महत्व कम हो सकता है.”

इस बार की जनगणना में जाति, धर्म, कमाई और पलायन जैसी बहुत ही निजी और संवेदनशील जानकारी भी ली जा रही है.तस्वीर: Divyakant Solanki/dpa/picture alliance

बड़ी चुनौती है जनगणना

दीपा सिन्हा, आर्थिक और सामाजिक नीति में विशेषज्ञता रखने वाली अर्थशास्त्री हैं. वह बताती हैं कि यह पहली बार पूरी तरह से डिजिटल जनगणना है, लेकिन भारत के लिए डिजिटल डेटा संग्रह कोई नई बात नहीं है.

नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) जैसे सर्वे, देश में लंबे समय से चल रहे बड़े स्तर के घरेलू सर्वे हैं. इसके तहत, नीति बनाने व योजना के लिए सामाजिक-आर्थिक डेटा इकट्ठा किया जाता है. एनएसएस ने पहले भी ऐसे ही तरीकों का इस्तेमाल किया है.

सिन्हा ने डीडब्ल्यू को बताया, "सैद्धांतिक रूप से, यह बदलाव कोई समस्या पैदा करने वाला नहीं है. लेकिन, इस बार जनगणना का पैमाना इतना बड़ा है जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. साथ ही, यह जनगणना बहुत लंबे इंतजार के बाद हो रही है, जिससे नई तरह की चिंताएं और डर पैदा हो रहे हैं.”

सिन्हा ने कहा कि यह साफ नहीं है कि इतने बड़े, तकनीक-आधारित काम में डेटा सुरक्षा, निजता और गलतियों को ठीक करने के लिए क्या व्यवस्थाएं हैं. बतौर सिन्हा, "इस जनगणना में लोगों की बहुत ही निजी और संवेदनशील जानकारी ली जा रही है. अगर इस तरह की जनगणना को लेकर स्पष्ट नियम-कायदे न हों, तो लोगों का भरोसा कम होने का खतरा रहता है.”

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