पश्चिमी दबाव के बीच रूस से तेल का आयात बंद करने वाली मुकेश अंबानी की रिलायंस, अमेरिका के जरिए वेनेजुएला से तेल खरीद सकती है. सूत्रों के मुताबिक, इसके लिए अमेरिकी सरकार से इजाजत मांगी जा रही है.
गुजरात के जामनगर में मौजूद रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी, दुनिया में सबसे बड़ी हैतस्वीर: Sonu Mehta/Hindustan Times/IMAGO
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भारतीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दिग्गज कंपनी रिलायंस, वेनेजुएला के कच्चे तेल की खरीद फिर से शुरू करने के लिए अमेरिकी मंजूरी चाह रही है. मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को शुक्रवार (9 जनवरी) को यह जानकारी दी. पश्चिमी दबावों के बीच रूसी तेल का आयात रोकने वाली रिलायंस, अब अमेरिका के जरिए वेनेजुएला से तेल आपूर्ति सुरक्षित करना चाहती है.
सूत्रों के मुताबिक, रिलायंस के प्रतिनिधि मंजूरी हासिल करने के लिए अमेरिका के विदेश और वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा कर रहे हैं. राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका द्वारा पकड़े जाने के बाद वॉशिंगटन और कराकस के बीच, 5 करोड़ बैरल तेल को शिप किए जाने पर बातचीत जारी है.
इससे पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज के एक प्रवक्ता ने गुरुवार को रॉयटर्स के सवालों का ईमेल के जरिए जवाब दिया था और बताया, "हम गैर-अमेरिकी खरीदारों की वेनेजुएला के तेल तक पहुंच पर स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं और नियमों के मुताबिक तेल खरीदने पर विचार करेंगे." हालांकि कंपनी ने अमेरिकी मंजूरी के अनुरोध पर टिप्पणी मांगने वाले रॉयटर्स के ईमेल का तत्काल जवाब नहीं दिया है.
वेनुजुएला के तेल पर मची होड़
कंपनी को पिछले साल, अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद वेनेजुएला से कच्चा तेल आयात करने के लिए लाइसेंस मिले थे. वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए के आंतरिक रिकॉर्डों के मुताबिक, उन अनुमतियों के तहत 2025 के पहले चार महीनों में कंपनी ने रिलायंस को लगभग 63,000 बैरल कच्चा तेल हर दिन पहुंचाया. अमेरिका ने मार्च और अप्रैल के बीच पीडीवीएसए के व्यापारिक साझेदारों के ज्यादातर लाइसेंस निलंबित कर दिए और वेनेजुएला के तेल खरीदारों को टैरिफ की धमकी दी, ताकि मादुरो पर दबाव बढ़े. रिलायंस का वेनेजुएला के तेल का आखिरी कार्गो मई 2025 में भारत पहुंचा था.
अमेरिकी वित्त मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि वे खास लाइसेंसों या अनुरोधों पर टिप्पणी नहीं करेंगे. और साथ ही जोड़ा कि वे "वेनेजुएला के लोगों की ओर से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कोशिशों का समर्थन करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है." शेवरॉन, विटोल, ट्रैफिगुरा और दूसरी बड़ी तेल कंपनियां लाइसेंस और वेनेजुएला के तेल निर्यात पर नियंत्रण पाने की होड़ में हैं.
भारत पर दबाव
इस वक्त वेनेजुएला का लाखों बैरल कच्चा तेल समुद्री टैंकों और जहाजों पर अटका हुआ है. भारत ने रूसी तेल की जितनी आपूर्ति बंद की है, उतनी भरपाई वेनेजुएला से की जा सकती है. रिलायंस, रूसी तेल का सबसे बड़ा भारतीय खरीदार था. लेकिन उसने कहा है कि उसे इस महीने रूसी कच्चे तेल का कोई कार्गो नहीं मिलेगा क्योंकि भारत, रूसी तेल का आयात बंद करने पर ट्रंप के दबाव में है. रिलायंस और पीडीवीएसए का रिश्ता पुराना है और अमेरिका के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाने से पहले भारत, वेनेजुएला के कच्चे तेल के लिए तीसरा सबसे अहम बाजार था.
ट्रंप ने बताया है कि यूएस, निकोलस मादुरो को पकड़कर वेनेजुएला से बाहर ले आया. हूगो चावेज के निधन के बाद 2013 में मादुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने. माना जा रहा था कि मौजूदा कार्यकाल में वह कम-से-कम 2031 तक पद पर रहेंगे.
निकोलस मादुरो की पेशेवर जिंदगी मानो राजनीति के साथ-साथ शुरू हुई. साल 1962 में वह वेनेजुएला की राजधानी काराकस में पैदा हुए. उनके पिता एक यूनियन लीडर थे. स्कूली दौर में मादुरो का भी छात्र राजनीति से ताल्लुक रहा. वह हाई स्कूल छात्र संघ के अध्यक्ष थे.
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बस ड्राइवर और यूनियन लीडर
करियर के शुरुआती दिनों में मादुरो ड्राइवर थे. वह काराकस में बस चलाया करते थे. साथ ही, उन्होंने वेनेजुएला की तत्कालीन पार्टी 'सोशलिस्ट लीग' भी जॉइन की. ब्रिटिश अखबार 'गार्डियन' के आर्काइव्स के मुताबिक, मादुरो जिस 'काराकस मेट्रो कंपनी' में बस चालक थे वहां यूनियन बनाना प्रतिबंधित था. यहां मादुरो ने एक अनौपचारिक यूनियन बनाया, जो कंपनी के शुरुआती लेबर सिंडिकेट्स में से एक था.
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हूगो चावेज और उनका एमवीआर-200
रिवॉल्यूशनरी बोलीवेरियन मूवमेंट-200, हूगो चावेज के शुरू किए गए सैन्य अभियान का नागरिक रूप था. हूगो और उनके साथी सैन्य अधिकारियों ने गुपचुप तरीके से एमवीआर-200 ग्रुप बनाया. फरवरी 1992 में, चावेज के नेतृत्व में ग्रुप ने तख्तापलट की नाकाम कोशिश की. चावेज को जेल हुई, लेकिन वह लोकप्रिय होते गए.
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एमवीआर-200 और मादुरो
हूगो चावेज की मुहिम 'बोलीवारियानिजम' भी लोकप्रिय होती गई. यह दक्षिणी अमेरिकी स्वतंत्रता अभियान में मुख्य भूमिका निभाने वाले सिमोन बोलीवर से प्रेरित थी. 1990 के दशक के शुरुआती सालों में मादुरो भी एमवीआर-200 के सदस्य बन गए. ये लोग हूगो को जेल से छुड़वाने के लिए अभियान चलाया करते थे.
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मूवमेंट ऑफ दी फिफ्थ रिपब्लिक
जेल से छूटकर, साल 1997 में हूगो चावेज ने 'फिफ्थ रिपब्लिक मूवमेंट' (एमवीआर) नाम की एक पार्टी बनाई. इसमें मादुरो ने भी सहयोग दिया. हूगो ने 1998 के चुनाव में हिस्सा लिया और 56 फीसदी वोट जीतकर राष्ट्रपति बन गए. साल 1999 में मादुरो को संविधान सभा में चुना गया. इस असेंबली पर देश के लिए नया संविधान बनाने का दायित्व था.
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हूगो चावेज ने मादुरो को बनाया विदेश मंत्री
साल 2000 में मादुरो नेशनल असेंबली में चुने गए. इसके स्पीकर भी रहे. फिर 2006 में हूगो ने उन्हें विदेश मंत्री बनाया. खबरों के मुताबिक, विदेश मंत्री रहते हुए मादुरो ने एक सम्मेलन के दौरान तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोडोंलिजा राइस को 'हिपोक्रैट' बताया था. साल 2012 में हूगो ने उन्हें उपराष्ट्रपति भी चुना. उन दिनों हूगो की सेहत ठीक नहीं थी, उन्हें कैंसर था.
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हूगो ने बढ़ाया मादुरो का नाम
कैंसर के अपने ऑपरेशन के बाद, दिसंबर 2012 में हूगो ने अगले राष्ट्रपति के तौर पर मादुरो के नाम की अनुशंसा की. टीवी पर प्रसारित अपने भाषण में हूगो ने जनता से कहा कि वे निकोलस मादुरो को अपना राष्ट्रपति चुनें. फिर 5 मार्च 2013 को मादुरो ही थे, जो हूगो के निधन की सूचना जनता को देने आए. हूगो के देहांत के बाद फौरी तौर पर मादुरो को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया.
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अप्रैल 2013 में चुनाव जीतकर बने राष्ट्रपति
अप्रैल 2013 में चुनावी जीत के बाद मादुरो राष्ट्रपति बने. हालांकि, जीत का अंतर बहुत मामूली था. उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हेनरिके केप्रिलेस रादोंस्की ने फिर से वोटों की गिनती कराने की मांग की. मगर, देश की मुख्य न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि मतों की हाथ से दोबारा गिनती मुमकिन नहीं है.