नेपाल के भूले-बिसरे दूर-दराज के इलाके को चीन से आई सड़क ने पूरी तरह बदल दिया है. अब वहां बदलाव की बयार बह रही है.
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अपर मुस्तांग कभी समृद्ध हुआ करता था और हिमालय तथा भारत के बीच व्यापार का केंद्र था. लेकिन समय के साथ उसका महत्व गिरता गया और वह नेपाल का एक भूला-बिसरा इलाका बन गया. लोग कहते थे कि यह एक श्रापित इलाका है. बहुत अधिक ऊंचाई पर एक उजाड़ रेगिस्तान में किसी की दिलचस्पी नहीं थी. वहां के लोग बस जी रहे थे, बेमकसद और भूले हुए. फिर वहां एक सड़क आई. चीन की ओर से आई इस सड़क के रास्ते एक नई दुनिया आई. एक नई जिंदगी, जिसमें खुशहाली थी, उमंगें थीं और बदलाव की बयार थी.
आगे बढ़ने से पहले इन बुजुर्गवार से मिलिए, तस्वीरें देखिए मजा आ जाएगा
70 साल के दुर्गा कामी नेपाल के सबसे बुजुर्ग छात्र हैं. दलित होने की वजह से बचपन में उन्हें पढ़ाई का मौका नहीं मिला. फिर बाल बच्चों की जिम्मेदारियां आ गई. अब फुर्सत मिली है और दुर्गा ज्योति की तरह जगमगा रहे हैं.
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दृढ़ इच्छाशक्ति
मध्य नेपाल के फेडीखोला में रहने वाले 68 साल के दुर्गा कामी हर दिन स्कूल जाते हैं. 2001 में पत्नी के निधन के बाद दुर्गा सुबह घर का सारा काम काज अकेले करते हैं और फिर स्कूल के लिए तैयार होते हैं.
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कई किलोमीटर का सफर
साफ सुथरी यूनिफॉर्म पहनकर दुर्गा रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं और स्कूल पहुंचते हैं. गांव से उनका स्कूल दूर है, इसके बावजूद दुर्गा हर दिन श्रीकाल भैरब हायर सेकेंडरी स्कूल जाते हैं. रास्ते में अक्सर उनकी मुलाकात अपने 14 साल के सहपाठी सागर थापा से भी होती है.
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धीरे धीरे हाईस्कूल
दुर्गा को पढ़ना लिखना बिल्कुल नहीं आता था. लेकिन स्कूल में दाखिला लेने के बाद अब दुर्गा 10वीं पढ़ रहे हैं. वह बोर्ड का पर्चा भर चुके हैं. टीचरों के मुताबिक बुजुर्ग छात्र काफी मन लगाकर पढ़ाई करते हैं. अगर कुछ समझ में नहीं आता तो वे बेझिझक दूसरे बच्चों और टीचरों से पूछते हैं.
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टीचर भी आनंदित
स्कूल के प्रिंसिपल और बाकी टीचरों को भी दुर्गा को देखकर बेहद खुशी होती हैं. दुर्गा की उम्र कई टीचरों के पिता के बराबर है. लिहाजा क्लास में उनके साथ एक बेहद भावुक नाता बनता है.
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बच्चों जैसे दुर्गा
इंटरवल के दौरान या खेलकूद के दौरान भी दुर्गा लोगों को हैरान करते हैं. बच्चों के साथ वॉलीबॉल सीखने के बाद अब वह गजब का वॉलीबॉल खेलते हैं. पहाड़ी पगडंडियों पर चलने के लिए भले ही वह लाठी का सहारा लें लेकिन वॉलीबॉल खेलते हुए वह उम्र को काफी पीछे छोड़ देते हैं.
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1992 तक तो इस इलाके में विदेशियों के आने पर पाबंदी थी. पूर्व बौद्ध राज्य के अपर मुस्तांग इलाके में चीन की ओर से आई सड़क ने सच में जिंदगी को बदल दिया है. लाल पहाड़ियों वाले दूर-दराज के इस इलाके के लोग एक लोककथा सुनाते हैं. उनके अनुसार तिब्बती बौद्ध धर्म के संस्थापक ने यहां एक राक्षस को मारा था. उसी के खून से ये चोटियां लाल हुईं. हाल ही में अपर मुस्तांग को चीन से जोड़ता हाईवे पूरा हुआ है. और अब यहां बदलाव के संकेत देखे जा रहे हैं. कभी पारंपरिक तिब्बती पोशाक पहनने वाले युवा अब डेनिम जीन्स में देखे जा सकते हैं. स्थानीय कैफे चहल-पहल से खुश नजर आते हैं. हाल ही में फ्रांस में हुए यूरो 2016 का कई कैफे सीधा प्रसारण दिखाकर पैसे कमा रहे थे.
लो मंथंग मध्य युग में इस इलाके की राजधानी थी. यह दीवारों से घिरी हुई थी. अब भले ही आधुनिकता की बयार बहने लगी हो और चीन का असर बढ़ रहा हो लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो परंपराओं को, पुराने जीवन को बचाए रखना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि पुराने मूल्य और संस्कृति बची रहे. स्थानीय लोबा समुदाय के लिए यह संस्कृति बहुत अहमियत रखती है.
देखें, भूकंप के सालभर बाद का नेपाल
25 अप्रैल 2015 की दोपहर, नेपाल में 7.8 तीव्रता वाले उस भूकंप ने करीब 9,000 लोगों की जिंदगी छीन ली. जो बच गए, वो आज भी स्तब्ध से हैं. ऐसा दिखता है नेपाल साल भर बाद.
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सिरहीन स्तूप
नेपाल की राजधानी काठमांडू का बुद्धनाथ विश्व सांस्कृतिक विरासत है. यहां का स्तूप हिमालय आने वाले बौद्धों के लिए धार्मिक आस्था से भरा है. अप्रैल 2015 में आए भूकंप ने स्तूप के सिरे को ध्वस्त कर दिया. अब इसके पुर्ननिर्माण का काम चल रहा है.
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मंदिर ध्वस्त
दरबार चौक भी यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर है. इस मंदिर को भी काफी नुकसान पहुंचा. ज्यादातर मंदिर ध्वस्त हो गए, जो बचे, उनकी हालत भी जर्जर है.
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अवशेषों के बीच जिंदगी
भूकंप के बाद से ही काठमांडू के लोग इस तरह के हालात में जी रहे हैं. फिलहाल अतिआवश्यक चीजों को ही ठीक किया जा रहा है.
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साल भर पहले का वो दिन
काठमांडू के पूर्व में बसे सिंधुपालचौक जिले ने खासतौर पर सबसे ज्यादा मार झेली. चौतारा के 15,000 लोगों को आज भी बहुत कम राहत मिली है, ऐसा लगता है जैसे भूकंप हाल ही में उनकी जिंदगी बर्बाद करके गया हो.
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टेंट में अस्पताल
चौतारा में यह अस्पताल का इमरजेंसी रूम है. डॉक्टरों को हमेशा टेंट में ही ऑपरेशन करने पड़ रहे हैं. अस्पताल की पुरानी इमारत को इतना ज्यादा नुकसान पहुंचा है कि बड़े पैमाने पर पुर्ननिर्माण करना पड़ेगा.
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शहर का यह मंजर
अब सिंधुपालचौक के ज्यादातर लोग ऐसे जीवन बिता रहे हैं. 80 फीसदी से ज्यादा घर भूकंप में तबाह हो गए. दूर दराज के इलाकों में भूचाल की मार झेलने वाले लोग भी यहीं आ गए हैं.
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संक्रामक बीमारियां
केबिन एक दूसरे से सटे हुए हैं. लोगों को बड़ी संख्या में तंग जगहों पर रहना पड़ रहा है. ऐसे में सक्रांमक बीमारियां भी काफी आसानी से फैलती है.
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खुद की मदद
भूकंप प्रभावित इलाकों के लोग सरकार से मायूस हो चुके हैं. अब वह खुद से जो कुछ बन रहा है, वह कर रहे हैं.
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बेखबर खंडहर
सिंधुपालचौक के करीब सभी स्कूल या तो पूरी तरह ध्वस्त हो गए या कभी भी ढहने की कगार पर हैं. इक्का दुक्का स्कूल ही ऐसे हैं जिनकी मरम्मत मुमकिन है.
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सर्दी और शोरगुल
पढ़ाई लिखाई का काम टिनशेडों या लोहे के केबिनों में हो रहा है. इनके भीतर कड़ाके की सर्दी और काफी ज्यादा शोरगुल बना रहता है.
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मलबा ही मलबा
चलते फिरते समय हर वक्त इस बात का अहसास होता है कि साल भर पहले यहां क्या हुआ था. मलबा उस विनाशकारी भूकंप की लगातार गवाही देता है. थुलोसिरुबाड़ी के स्कूल का मैदान बीते एक साल से ऐसा दिखता है.
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एवरेस्ट इलाके में कम नुकसान
खुम्बू इलाका भी भूकंप से प्रभावित तो हुआ लेकिन सिंधुपालचौक जैसी तबाही यहां नहीं हुई. इसके बावजूद इन इलाकों में बहुत कम सैलानी पहुंच रहे हैं.
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बौद्ध लोग जो भाषा बोलते हैं वह तिब्बती भाषा का ही एक रूप है. वे लोग सदियों से यहां रह रहे हैं. अब ये लोग अपनी संस्कृति के संरक्षण में जुटे हैं. दीवारों पर बने चित्रों को बचाने से लेकर ऐतिहासिक इमारतों तक के संरक्षण का काम चल रहा है. वक्त की मार इन इमारतों पर पड़ चुकी है. अब नेपाल की कई समाजसेवी संस्थाएं और कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं. इन्हीं संस्थाओं में एक है
लो ग्यालपो जिग्मे फाउंडेशन, जिसके अध्यक्ष अपर मुस्तांग के पूर्व राजा हैं. वह इमारतों को बचाने में लगे हुए हैं. मिट्टी से बनी दीवारें हवा और बारिश की मार से भुरभुरा गई हैं. लकड़ी की छतें गिरने लगी हैं. मिट्टी के दीयों से निकले धुएं ने घर के अंदर दीवारों पर बने चित्रों को काला कर दिया है.
एक दशक से ये संस्थाएं संरक्षण के काम में लगी हुई हैं. काले पड़ चुके चित्रों को साफ किया जा रहा है. जो पेंटिंग्स खराब हो चुकी हैं उन्हें बौद्ध स्टाइल में दोबारा बनाया जा रहा है. बौद्धों का मानना है कि टूटी मूर्तियों और खराब चित्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए. इसलिए इन्हें संवारने और संभालने को वे अपना फर्ज मानकर जुटे हुए हैं.
बीते साल नेपाल में आए भयंकर भूकंप में कई बौद्ध मठ गिर गए थे. लो मंथांग में भी कई मठों को भारी नुकसान पहुंचा था. अब उन्हें भी ठीक करना है. आधुनिकता की बयार में आए साधन इस काम में भी मददगार साबित हो रहे हैं. अपर मुस्तांग बदल रहा है.
तस्वीरों में, नेपाल की ध्वस्त धरोहर
हर साल हजारों नेपाली लड़कियों का अपहरण कर वेश्यावृत्ति के पेशे में बेच दिया जाता है. इस चंगुल से आजाद होने वाली खुशकिस्मतों के जीवन में माइती नेपाल गरिमा और खुशियां वापस लाने का काम कर रहा है.
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भयावह आंकड़े
राहत एजेंसियों के अनुमान के अनुसार हर साल करीब दस हजार नेपाली लड़कियों को तस्कर विदेशों में नौकरी दिलाने के झूठे वादे के साथ उनके परिवार से दूर ले जाते हैं. लेकिन कइयों की नौकरी की चाह देहव्यापार जैसे एक दुःस्वप्न में खत्म होती है. छुड़ाकर वापस लाए जाने पर परिवार तो नहीं लेकिन माइती नेपाल उनके जीवन में फिर से खुशियां भरने की कोशिश करता है. जैसे कि नृत्य के माध्यम से.
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नारकीय जीवन
नेपाली लड़कियों को भारत ले जाकर उन्हें वेश्यावृत्ति के पेशे में बेच दिया जाता है. लड़कियां बलात्कार और हिंसा की शिकार बनती हैं. इन दर्दनाक अनुभवों के कारण कई बार महिलाएं कई तरह के यौन संचारित रोगों, हेपेटाइटिस या एचआईवी से संक्रमित हो जाती हैं. माइती नेपाल में ऐसी बीमार महिलाओं को भी शरण मिलती है.
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कमजोरों की चैंपियन
माइती नेपाल की स्थापना 1993 में अनुराधा कोइराला ने की. लक्ष्य था, जबरन वेश्यावृत्ति में धकेली गई पीड़ितों को आजाद कराना और उन्हें जीवन संवारने का एक नया अवसर देना. लड़कियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था और सम्मान के साथ जीने के लिए मदद मुहैया कराना. इसके अलावा यह मानव तस्करी के रोकथाम पर भी केंद्रित है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर जबरन वेश्यावृत्ति के बारे में जागरुकता नहीं है.
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भाग्यशालियों का मंच
बचाई गई लड़कियां माइती नेपाल के साथ काम करने के दौरान इससे जुड़े जागरूकता अभियानों का भी हिस्सा बनती हैं. नृत्य या पूर्व पीड़ितों के मुद्दे पर स्ट्रीट थिएटर जैसी कलात्मक अभिव्यक्ति भी इसके कुछ तरीके हैं. लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वे उन्हें तस्करों के तौर तरीके और उनके बहकावे में आने पर पैदा होने वाले खतरों के बारे में बताते हैं.
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बॉर्डर पर चेकिंग
इसके अलावा माइती नेपाल भारत से लगी अपनी सीमा पर भी नजर रखता है. अगर उन्हें किसी लड़की के अगवा किए जाने या संभावित शिकार की तलाश में घूमते पुरुष मिलते हैं तो इस संदेह के बारे में वे पुलिस को जानकारी देती हैं.
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भारत का प्रवेश द्वार
नेपाल और भारत के बीच सीमा खुली है. गीता नामकी लड़की जब केवल नौ साल की थी तब उसका अपहरण कर इसी रास्ते ले जाकर एक भारतीय वेश्यालय में बेच दिया गया था. वह वापस लौटी लेकिन टूटे हुए हौसले और एचआईवी संक्रमण के साथ.
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माइती नेपाल की स्थापना
कोइराला गीता जैसी महिलाओं के लिए ही राहत संगठन चलाती हैं. मानव तस्करी, शोषण, अत्याचार, बलात्कार की शिकार बनी महिलाओं की मदद कर उन्हें सेहतमंद और इज्जतदार जीवन जीने का मौका देना अनुराधा कोइराला का लक्ष्य है.
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बनाएं रक्षा दीवारें
माइती नेपाल भारत से लगे सीमा क्षेत्र में ग्यारह "ट्रांजिट होम" चला रही है, जहां लौटने वाली लड़कियों का ध्यान रखा जाता है. राजधानी काठमांडू में माइती नेपाल का मुख्यालय है. यहां पढ़ाई, व्यावहारिक और व्यावसायिक प्रशिक्षण देने की व्यवस्था है. ट्रेनिंग का उद्देश्य समाज में उन्हें दोबारा जोड़ना है.
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आघात के लिए नृत्य
हर दिन काठमांडू में माइती केंद्र के आंगन में नाच गाना होता है. यह उनके आंदोलन को मजबूत बनाता है और लड़कियों में आत्मविश्वास भरता है. संगठन अब तक 12,000 से भी अधिक लड़कियों और महिलाओं को बचा कर उनको मदद पहुंचा चुका है. कोइराला बताती हैं कि ऐसी 30,000 लड़कियों को सीमा पार करने से पहले ही रोका जा सकता है.
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यूरोप में कदम
यूनिसेफ के एक कार्यक्रम के तहत इस साल माइती नेपाल के एक नृत्य समूह को जर्मन शहर कोलोन के स्कूल में एक वर्कशॉप के लिए लाया गया. एक जर्मन युवा ने एली हॉएस स्कूल में इस समूह के नृत्य की कोरियोग्राफी की.
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"मां" के साथ घूमना
अनुराधा कोइराला (बीच में) इन लड़कियों के साथ कोलोन में थी. कोइराला या तो इन लड़कियों को उनके नाम से या फिर 'मेरी बच्ची' कह कर बुलाती हैं. पीड़ितों को हर दिन और मजबूत बनने के लिए प्रेरित करने वाली एक मां के रूप में उनका सपना है कि एक दिन माइती नेपाल जैसी संस्था की जरूरत ही ना रह जाए.
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दो महीने के दौरे पर
कोलोन की एक शाम को उनका प्रदर्शन. यूरोप में माइती नेपाल की नर्तकियां दो महीने के सफर पर हैं. नेपाल लौटने से पहले वे जर्मनी के अलावा ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड का दौरा भी करेंगी.