भारत के बारे में मीडिया परसेप्शन सच से दूर: हर्षवर्धन
३१ मई २०१७
भारत से सहयोग बढ़ाने को लेकर जर्मनी में उत्साह है, पर दूसरी तरफ सामाजिक असमानता और हिंसा भी सुर्खियों में हैं. केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन कहते हैं कि खबरों के आधार पर जर्मनी में भारत के बारे में गलतफहमी नहीं फैलनी चाहिए.
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केंद्रीय विज्ञान और प्रोद्योगिकी मंत्री डॉ हर्षवर्धन भी हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जर्मनी के दौरे पर आए. इस दौरे में जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जर्मनी-भारत अंतर-सरकारी परामर्श बैठक हुई जिसमें दोनों पक्षों के बीच परिवहन, शिक्षा और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग के समझौते हुए. केंद्रीय विज्ञान, तकनीक और पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन जर्मनी के साथ सहयोग को बहुत अहम मानते हैं. पेश हैं बर्लिन में उनके साथ हुई खास बातचीत के अंश:
प्रधानमंत्री मोदी के जर्मनी दौरे को आप कैसे देखते हैं?
मैं समझता हूं कि यह असाधारण रूप से सफल दौरा है. मैंने जर्मनी के लोगों में और यहां रह रहे भारतीयों में बहुत उत्साह देखा. भारत में भी लोगों को इस बात की खुशी हो रही होगी. यह सिर्फ दौरे के लिए दौरा नहीं था. इतने विषयों पर दोनों देशों के बीच इतनी गहरी बातचीत होना बहुत अहम है. दोनों देशों के संबंधों और उनकी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के हिसाब से मिल जुलकर काम करने की प्रवृत्ति के साथ जो यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में शुरू हुई, वह और ज्यादा तेजी से गति पकड़ रही है. यह बहुत स्पष्ट दिखता है. मोदी जी के साथ साथ यहां की चासंलर के अंदर भी हमें बहुत उत्साह और खुशी दिखाई दी. मुझे कोई ऐसा क्षेत्र नहीं दिखाई दिया जहां गहरा सहयोग न शुरू हुआ हो. साइंस एंड टेक्नोलोजी से लेकर पर्यावरण तक, जलवायु परिवर्तन से लेकर परिवहन और सुरक्षा, स्टार्ट अप मूवमेंट, स्किल डेवलपमेंट, स्वच्छ ऊर्जा, सोलर एलायंस, स्मार्ट सिटी. इन सब विषयों पर हम मिलकर काम कर रहे हैं. मोदी जी ने भारत को और नई ऊंचाइयों पर ले जाने और एक नया इंडिया बनाने संकल्प लिया है. कारोबार करने के लिए सहज माहौल बनाने की बात हो या विकास और वृद्धि के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग हों या फिर उद्योग के लिए बेहतर माहौल बनाने की बात, सभी तरह से हम लोग काफी आगे आ गए हैं.
भारत के प्रधानमंत्री मोदी के जितने आलोचक हैं, उससे कहीं ज्यादा समर्थक हैं. उन्हें टेक्नोसेवी और नए जमाने के साथ चलने वाला माना जाता है. सरकार में आते ही उन्होंने कई नई पहलें शुरू कीं. आइए डालते हैं इन्हीं पर एक नजर.
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डिजिटल इंडिया
इस पहल का मकसद लोगों तक सरकारी सेवाएं इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पहुंचाना है. साथ ही इंटरनेट कनेक्टिविटी बेहतर कर ऑनलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर को भी सुधारना है. सरकार इसके जरिए सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना चाहती है.
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स्किल इंडिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 जुलाई 2015 को इस पहल को शुरू किया. इसके तहत 2022 तक देश के 40 करोड़ लोगों को अलग अलग तरह की ट्रेनिंग देकर दक्ष बनाना है. सरकार जोर शोर से इसका प्रचार करती है, लेकिन आलोचक इसमें मिलने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं.
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मेक इन इंडिया
मोदी सरकार भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती है, ताकि बहुराष्ट्रीय और भारतीय कंपनियां अपने उत्पाद भारत में ही बनायें. इसलिए मेक इंडिया पहल की शुरुआत की गई. इसके तहत विदेशी निवेश और कंपनियों के लिए भारत में काम का बेहतर माहौल बनाया जाएगा.
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स्टार्टअप इंडिया
स्टार्टअप इंडिया का उद्देश्य युवाओं में उद्यमशीलता को बढ़ावा देना और नौकरियों के नये अवसर पैदा करना है. इसके तहत छोटे कारोबारों के लिए बैंक लोन आसान बनाने और लालफीताशाही घटाने की बात भी शामिल है. सरकार स्टार्टअप इंडिया के तहत पिछड़े वर्गों और महिलाओं को भी उद्यम शुरू करने के लिए प्रेरित करना चाहती है.
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स्मार्ट विलेज इंडिया
गांवों के विकास के लिए इस पहल को शुरू किया गया है. इसे महात्मा गांधी के "आदर्श ग्राम" विजन से प्रेरित बताया जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही सांसद आदर्श ग्राम योजना भी शुरू की थी, जिसमें हर सांसद से एक गांव को गोद लेकर उसका पूरी तरह विकास करने का आग्रह किया गया था.
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स्मार्ट सिटी मिशन
इस योजना के तहत देश भर के 100 से ज्यादा शहरों को अत्याधुनिक बनाने का लक्ष्य तय किया है. संबंधित राज्य सरकारों के साथ मिल कर केंद्र सरकार इस योजना को लागू करेगी. इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर सरकार ने पांच साल के दौरान एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है.
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कैशलेस अर्थव्यवस्था
मोदी सरकार का कैशलेस लेन देन पर बहुत जोर है. आम जनता को भुगतान के डिटिजल विकल्पों से जोड़ने के लिये सरकार ने कई इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लॉन्च किये हैं. इनमें यूपीआई, इंटरनेट बैंकिंग, आधार कार्ड से भुगतना और भीम ऐप जैसे विकल्प शामिल हैं.
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स्वच्छ भारत अभियान
मोदी सरकार की जिन पहलों का सबसे ज्यादा प्रचार प्रसार हुआ है, उनसें से एक है स्वच्छ भारत अभियान. साफ सफाई पर जोर देने वाली इस मुहिम के साथ बहुत सी जानी-मानी हस्तियां भी जुड़ीं. हालांकि इसे कितनी गंभीरता से लागू किया जा रहा है, आलोचक इस पर सवाल उठाते हैं.
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गर्व ऐप
भारत के छह लाख गांवों में बिजली पहुंचाने का काम कहां किस रफ्तार से चल रहा है, इसकी जानकारी आप गर्व ऐप पर पा सकते हैं. इस ऐप का मकसद रियल टाइम डाटा मुहैया करा कर पारदर्शिता को बढ़ावा देना है. इसे गगूल प्ले और एप्पल ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.
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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को की. इसका उद्देश्य एक तरफ लड़कियों को शिक्षित, योग्य और समर्थ बनाना है, तो वही बिगड़ते लैंगिक अनुपात को सुधारना भी है. 2016 के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक इसकी ब्रैंड एम्बैसडर हैं.
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MyGov.in
देश के शासन और विकास में लोगों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए सरकार ने माईगव यानी मेरी सरकार पहल शुरू की. प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक इसका मकसद मतदाताओं और उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच अंतर को पाटना है. कई बार मोदी ने इस मंच के जरिए आने वाले विचारों, सवालों और सुझावों को अपने रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" में शामिल किया है.
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भारत और जर्मनी के बीच विकास की जितनी संभावनाएं हैं, क्या भारत और जर्मनी के रिश्ते उसी रफ्तार से आगे जा रहे हैं? क्या उसने संतुष्ट हुआ जा सकता है या उसमें कितनी तेजी लाने की जरूरत है?
जैसे मैंने कहा, असाधारण तेजी पहले से ही है. प्रधानमंत्री मोदी ने जर्मनी के निवेशकों के लिए या किसी भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए बहुत रास्ते खोले हैं. ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के अलावा भारत में जर्मनी के लिए फास्ट ट्रैक डेवलपमेंट शुरू हुआ है. इसके तहत कोशिश हो रही है कि जर्मनी के निवेशक, कारोबारी और छोटे बड़े हर तरह के लोग भारत में जाकर मेक इन इंडिया कार्यक्रम, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी को सफल बनाने के लिए योगदान दें. यहां हमें जर्मनी के निवेशकों और बड़ी बड़ी कंपनियों के सीइओ को सुनने का मौका मिला. हमने देखा कि उनके भीतर भारत को लेकर अभूतपूर्व उत्साह है. उन्हें लगता है कि भारत के साथ बड़ी संभावनाएं हैं. भारत के लिए भी यह बहुत बड़ा अवसर है. आज भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया है जो किसी भी निवेश के लिए पसंदीदा जगह माने जाते हैं. इसके अलावा भारत और जर्मनी के वैज्ञानिकों के बीच हर तरह के सहयोग हो रहे हैं. सहयोग के बहुत से नए क्षेत्र हैं जैसे साइबर सिक्योरिटी, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा, जल, जलवायु परिवर्तन के साथ जुड़ी हुई रिसर्च, तटीय इलाकों में पैदा हो रही चुनौतियां, क्रोनिक वायरल इंफेक्शन, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और मेडिकल सिस्टम्स के अंदर इफॉर्मेटिक्स. मौजूदा दौरे में भारत और जर्मनी के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में आठ समझौते हुए हैं, जिनके जरिए इन कामों को और तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा.
चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना को लेकर भारत की आपत्तियों के साथ साथ जर्मनी भी उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाता है. तो क्या इससे दोनों के बीच नए स्तर पर सहयोग बढ़ेगा?
देखिए यह तो चीजों की टेक्नीकल इंटरप्रेटेशन आप लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करते हैं, मैं तो केवल इतना कह सकता हूं कि भारत और जर्मनी के बीच में जो एक आदर्श रिश्ता हो सकता है, वह साफ तौर पर दिखता है. उस पर गंभीरता और गहराई से काम हो रहा है. मुझे विश्वास है कि उस पर हम बहुत तेजी से आगे बढ़ने वाले हैं.
900 अरब डॉलर की लागत से चीन कई नए अंतरराष्ट्रीय रूट बनाना चाहता है. वन बेल्ट, वन रोड नाम के अभियान के तहत बीजिंग ये सब करेगा.
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चीन-मंगोलिया-रूस
जून 2016 में इस प्रोजेक्ट पर चीन, मंगोलिया और रूस ने हस्ताक्षर किये. जिनइंग से शुरू होने वाला यह हाइवे मध्य पूर्वी मंगोलिया को पार करता हुआ मध्य रूस पहुंचेगा.
न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज
इस योजना के तहत चीन यूरोप से रेल के जरिये जुड़ चुका है. लेकिन सड़क मार्ग की संभावनाएं भी बेहतर की जाएंगी. 10,000 किलोमीटर से लंबा रास्ता कजाखस्तान और रूस से होता हुआ यूरोप तक पहुंचेगा.
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चाइना-पाकिस्तान कॉरिडोर
56 अरब डॉलर वाला यह प्रोजेक्ट चीन के पश्चिमी शिनजियांग प्रांत को कश्मीर और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ेगा.
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चाइना-सेंट्रल एंड वेस्ट एशिया कॉरिडोर
सदियों पुराने असली सिल्क रूट वाले इस रास्ते को अब रेल और सड़क मार्ग में तब्दील करने की योजना है. कॉरिडोर कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान, ईरान, सऊदी अरब और तुर्की को जो़ड़ेगा.
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दक्षिण पूर्वी एशियाई कॉरिडोर
इस कॉरिडोर के तहत चीन की परियोजना म्यांमार, वियतनाम, लाओस, थाइलैंड से गुजरती हुई इंडोनेशिया तक पहुंचेगी.
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चाइना-बांग्लादेश-इंडिया-म्यांमार कॉरिडोर
इस परियोजना के तहत इन चार देशों को सड़क के जरिये जोड़ा जाना था. लेकिन भारत की आपत्तियों को चलते यह ठंडे बस्ते में जा चुकी है. अब चीन बांग्लादेश और म्यांमार को जोड़ेगा.
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चाइना-नेपाल-इंडिया कॉरिडोर
म्यांमार के अलावा चीन नेपाल के रास्ते भी भारत से संपर्क जोड़ना चाहता है. इसी को ध्यान में रखते हुए चीन ने नेपाल को भी वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट में शामिल किया है.
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प्रोजेक्ट का मकसद
वन बेल्ट, वन रूट जैसी योजनाओं की बदौलत चीन करीब 60 देशों तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है. परियोजना के तहत पुल, सुरंग और आधारभूत ढांचे पर तेजी से काम किया जा रहा है. निर्यात पर निर्भर चीन को नए बाजार चाहिए. बीजिंग को लगता है कि ये सड़कें उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जीवनधारा बनेंगी.
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अमेरिका नहीं, चीन
डॉनल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों के चलते दुनिया भर के देशों को अमेरिका से मोहभंग हो रहा है. चीन इस स्थिति का फायदा उठाना चाहता है. बीजिंग खुद को अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धुरी बनाने का सपना देख रहा है. इसी वजह से इन परियोजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है.
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ईयू-भारत मुक्त व्यापार समझौते के लिए जर्मनी काफी समय से प्रयास कर रहा है. क्या उस दिशा में कोई प्रगति हुई है?
मैं समझता हूं कि यह विषय भी रखा गया है और हमारी सरकार भी इस बारे में गंभीरता से काम कर रही है. चांसलर मैर्केल ने भी अपने भाषण में इसका जिक्र किया है. जहां तक प्रधानमंत्री मोदी जी को मैं जान और समझ पाया हूं, वह बहुत उदार, खुले हैं और भारत को ऊंचाइयों तक ले जाना चाहते हैं. भारत में ही उन्होंने एक एक नियम की समीक्षा की है और एक हजार से ज्यादा कानून खत्म कर दिए है. वीआईपी कल्चर उन्होंने खत्म कर दिया है. मोदी जी के पास एक बड़ा विजन और जज्बा है और वह भारत को विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं.
ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की तैयारी कर रहा है. यूरोपीय संघ में अब से पहले भारत की बहुत तवज्जो ब्रिटेन पर रहती थी. अब कुछ नया देखने को मिलेगा?
मोदी जी किसी भेदभाव की दृष्टि से संबंध बनाने के बारे में विचार नहीं करते हैं. उनके लिए उतना ही महत्व इंग्लैंड का है और उतना ही यूरोप के देशों का और जर्मनी का है. वह सबके साथ भारत को गहराई से जोड़ना चाहते हैं. भारत की तो यह सांस्कृतिक विरासत और सोच है कि वह पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता है. सभी उस परिवार के अंग हैं. मानवीय मूल्य, मानवीय दृष्टिकोण और हमारी सांस्कृतिक विरासत, इन सब बातों को हम लोग हमेशा से तवज्जो देते आए हैं. ये मोदी जी की सोच और कामों में भी स्पष्ट रूप से दिखता है.
भारत को लेकर यहां मानवाधिकार का मुद्दा अकसर उठता है. खास कर दलित और गाय का मुद्दा. उस दिशा में चिंताओं को दूर करने की क्या कोशिश है?
देखिए मैं आपको यह बात विश्वास के साथ कह सकता हूं कि खबरों के आधार पर एक वातारण बनाने की जो कोशिश कभी कभी मीडिया में होती है, जो परेसेप्शन बनाया जाता है, उसमें और जमीनी सच्चाई में बहुत फर्क होता है. मोदीजी एक स्टैट्समैन हैं. जिस सब चीजों का आपने जिक्र किया, वो इनसे बहुत ऊपर हैं. इसलिए जो भी आप मीडिया में देखते हैं उनके आधार पर जर्मनी के अंदर गलतफहमी नहीं होनी चाहिए. भारत का दृष्टिकोण वृहद है. चाहे दलित हो, मुस्लिम भाई हो या कोई भी भारतवासी हो, हम लोग किसी को वोट बैंक की नजर से नहीं देखते. जो उन्हें वोट बैंक के नजरिए देखते हैं वो इस तरह की राजनीति भारत में करते हैं और उन्हीं के कारण झूठे परसेप्शन बनते हैं. सर्वधर्म समभाव की संस्कृति के अनुरूप ही हम लोग राजनीति में भी काम करते हैं. हमारी सोच है कि "सबको न्याय और तुष्टिकरण किसी का नहीं". सबका साथ सबका विकास. कई बार मीडिया में ऐसी घटनाओं को लेकर सही दृष्टिकोण ना देकर एक परसेप्शन बनाने की कोशिश की जाती है. कई बार ऐसा लगता है कि सरकार की छवि को बिगाड़ने का प्रयास होता है. लेकिन मोदी जी का व्यक्तित्व इन सब चीजों से बहुत ऊंचा है.
इंटरव्यू - अशोक कुमार
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव का अंदाजा सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर्स की संख्या से भी लगाया जा सकता है. दुनिया के तमाम नेताओं में फेसबुक पर सबसे ज्यादा फॉलोअर उनके हैं. देखिए और कौन कर रहा है फेसबुक पर लीड.
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
जनसंपर्क कंपनी बर्सन-मार्सटेलर की हाल ही में आई रिपोर्ट में विश्व भर के नेताओं की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर फॉलोइंग के हिसाब से रैंकिंग की गयी. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी पेज को 4 करोड़ लोग फॉलो करते हैं. सवा अरब की आबादी वाले देश में अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा फेसबुक यूजर रहते हैं.
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अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप
ट्रंप के निजी पेज को करीब 2 करोड़ लोग फॉलो करते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के ट्विटर एकाउंट पर इससे ज्यादा यानि करीब 2.5 करोड़ फॉलोअर हैं. बर्सन-मार्सटेलर की इस स्टडी में साल 2016 के दौरान विश्व भर के 590 टॉप नेताओं के फेसबुक अकाउंट पर गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है.
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ओबामा, पद पर नहीं फिर भी सबसे आगे
आठ साल तक अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभालने वाले लोकप्रिय नेता बराक ओबामा की कुर्सी छूट जाने के बावजूद सोशल मीडिया पर लोकप्रियता कम नहीं हुई है. अब भी फेसबुक पर उनके निजी अकाउंट को करीब 5.4 करोड़ लोग फॉलो करते हैं. यानि बाकी सब नेताओं के मिलाकर भी इतने फॉलोअर नहीं हैं.
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जॉर्डन की क्वीन रानिया
क्वीन रानिया ऑफ जॉर्डन, किंग अब्दुल्लाह द्वितीय की पत्नी हैं. मानवाधिकार और महिला अधिकार फोरमों से सक्रिय रूप से जुड़ी क्वीन के फेसबुक पर 1 करोड़ से भी अधिक फॉलोअर हैं. यह जॉर्डन की कुल आबादी से भी ज्यादा है. साफ पता चलता है कि पश्चिमी मीडिया में इस प्रगतिशील मुस्लिम अरब क्वीन की लोकप्रियता कितनी ज्यादा है.
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तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोवान
रेचेप तैय्यप एर्दोवान को 90 लाख लोग फॉलो करते हैं. पिछले साल वे ओबामा और मोदी के बाद तीसरे नंबर पर थे. इस बार फॉलोअर्स की संख्या के मामले में क्वीन रानिया से पिछड़ने के कारण उन्हें चौथे नंबर पर संतोष करना पड़ेगा.
तस्वीर: Reuters/T. Schmuelgen
मिस्र के राष्ट्रपति अल सीसी
मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल सीसी को 70 लाख लोग फेसबुक पर फॉलो करते हैं. इस रिपोर्ट में ध्यान दिया गया है कि नेता किस तरह की चीजें पोस्ट करते हैं और उनके पोस्ट पर कितने लोगों की "इंगेजमेंट" (यानि लाइक्स, कमेंट्स और शेयर) होते हैं.
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कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन
इस स्टडी में विश्लेषण किया गया है कि नेताओं ने सोशल मीडिया पर लोगों के साथ कितना इंटरऐक्शन किया है. पाया गया कि 5.8 करोड़ इंटरऐक्शन के साथ कंबोडिया के प्रधानमंत्री सेन का फेसबुक अकाउंट विश्व नेताओं में तीसरे नंबर पर है. (नदीने बेर्गहाउसेन/आरपी)