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पहले के तेल संकटों से अलग है ईरान युद्ध से उपजा संकट

१५ अप्रैल २०२६

सरकारों की रूल बुक में आर्थिक संकटों से बचाव के जो हथियार होते हैं, वो फिलहाल लागू किए गए तो और बड़े संकट पैदा हो सकते हैं. ईरान युद्ध से पैदा हुआ संकट तेल की कीमतों से ज्यादा, सरकार के विकल्पों का संकट बन गया है.

तेहरान की एक तेल रिफाइनरी में लगी आग और उसे देखते लोग
इस तेल संकट के दौरान कुछ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं ने देशों की सरकारों को लोगों को सब्सिडी ना देने के सुझाव दिए हैंतस्वीर: Ahmad Hatefi/UPI Photo/newscom/picture alliance

पिछले एक दशक में दुनिया ने कई आर्थिक संकटों का सामना किया. अभी देश उनसे पूरी तरह उबरे भी नहीं थे कि ईरान युद्ध का संकट उनके सामने आ खड़ा हुआ. ईरान युद्ध का नतीजा क्या होगा, अब भी साफ नहीं है. लेकिन एक बात तय है, इस टकराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक खास कमजोरी उजागर कर दी है. यह कमजोरी दिखाती है कि वर्तमान तेल संकट, पिछले किसी भी तेल संकट से अलग है. सरकारों के पास इस तेल संकट से आम लोगों और कारोबारों को राहत देने की गुंजाइश कम है क्योंकि वो पहले ही गले तक कर्ज में फंसी हैं. और बॉन्ड बाजार, उनके खर्च को नियंत्रित करने के लिए चाबुक लिए खड़े हैं.

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फिलहाल, पिछले बुधवार से शुरू हुई दो हफ्ते की नाजुक संघर्ष विराम की स्थिति जारी है. इसी वजह से बाजार घबराए नहीं हैं. अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी और ईरान के फिर से होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने के बावजूद, एशियाई शेयर बाजार चढ़ रहे हैं और कच्चा तेल लगातार सस्ता हो रहा है. दरअसल यह लापरवाही नहीं है, एक दांव है. 

कूटनीति और टकराव साथ-साथ जारी

रविवार को पाकिस्तान में हुई बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हुई. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस वार्ता से यह कहते बाहर निकल गए कि वॉशिंगटन ने तेहरान को ‘अंतिम और सबसे अच्छा प्रस्ताव' सौंप दिया है. ईरान ने जवाब में कहा कि जो अमेरिका युद्ध के जरिए हासिल नहीं कर सका, उसे बातचीत की टेबल पर हासिल करना चाहता है. वैसे ईरान ने बातचीत की संभावना पूरी तरह खारिज भी नहीं की है. 

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ऐसे में दुनिया भर में मध्यस्थता की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक मध्यस्थों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है. इस बीच रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव बीजिंग पहुंचे. रूस ने एक समझौता कर ईरान के समृद्ध यूरेनियम को अपने पास सुरक्षित रखने का प्रस्ताव दिया है. चीन और अन्य देश भी पर्दे के पीछे से सक्रिय हैं.

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राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का दावा है कि ईरानी प्रतिनिधियों ने वॉशिंगटन से फिर संपर्क किया है. ट्रंप ने कहा, "वे समझौता करना चाहते हैं, बहुत बुरी तरह.” सच जो भी हो, संकेत साफ है. कोई भी पक्ष अभी हालात को पूरी तरह बिगाड़ने की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता.

पर सरकारें पहले से ज्यादा कमजोर क्यों

आमतौर पर तेल संकट कीमतों से जुड़ा होता है. लेकिन यह संकट सरकारी बजट से ज्यादा जुड़ा हुआ है. 1970 के दशक के बाद, बड़े तेल झटकों से उबरते समय सरकारों ने अपने वित्तीय संतुलन को सुधार लिया था. कर्ज घटा था. खर्च सीमित हुआ था और अगली आपदा के लिए गुंजाइश बन गई थी. आज हालात उलटे हैं. अधिकांश विकसित देशों में सरकारी कर्ज जीडीपी के 100 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुका है. 

कोविड महामारी ने उस प्रक्रिया को और तेज किया जिसे वैश्विक वित्तीय संकट पहले ही शुरू कर चुका था. दुनिया पहले से कहीं ज्यादा कर्ज में डूबी है. इसका मतलब यह है कि सरकारें अब तेल झटके का सामना पहले की तरह सब्सिडी और राहत पैकेज से नहीं कर सकतीं हैं. हालांकि उनकी ऐसा करने की मंशा जरूर है. लेकिन ऐसा करने के खिलाफ बॉन्ड बाजार पहले ही चेतावनी दे चुके हैं. 

केंद्रीय बैंक भी फंसे हुए हैं

केंद्रीय बैंकों की स्थिति भी अच्छी नहीं है. पिछले दशकों में तेल संकट आते ही वे ब्याज दरें घटा देते थे. माना जाता था कि ये तो अस्थायी महंगाई है, गुजर जाएगी. विकास प्राथमिकता होता था. आज दौर ऐसा नहीं रहा है. केंद्रीय बैंकों के महंगाई रोकने के लक्ष्य लगातार चूक रहे हैं. अमेरिका का फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और उभरते बाजारों के नीति‑निर्माताओं के सामने एक मुश्किल विकल्प है. 

अगर वे ऊर्जा जोखिम पर नरम रुख अपनाते हैं, तो महंगाई फिर सिर उठा सकती है. वहीं अगर ब्याज दरें बढ़ाकर सख्ती दिखाते हैं, तो कमजोर ग्रोथ और कमजोर हो सकती है. युद्ध की वजह से बाजार में तेल और गैस की कमी हो गई है, जो पश्चिमी देशों में उद्योगों की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल रही है और उत्पादों को महंगा बना रही है. तेल की कीमतें ज्यादा ना भी बढ़ें, तो भी ये जोखिम अभी बना रहने वाला है.

फिर शेयर बाजार क्यों मजबूती दिखा रहे हैं

यह एक दिलचस्प बात जरूर है. पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद से बाजार घबराए नहीं दिख रहे. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया में कच्चे तेल के कुल कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है. फिर भी अभी कीमतें अपेक्षा से नीचे हैं. नीचे होने का मतलब ये नहीं कि आप युद्ध पूर्व की स्थिति से तुलना करने लगें. वो दौर शायद अब संभव नहीं लेकिन फिर भी कीमतें आशंकाओं से उलट नीची हैं. 

इसकी एक वजह यह भरोसा है कि कूटनीति आखिरकार कामयाब होगी. इसके अलावा अमेरिका अब ऊर्जा के मामले में पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर है. यूरोप ने मिडिल-ईस्ट के तेल पर निर्भरता घटाई है. दुनिया के कई हिस्सों ने ऊर्जा सुरक्षा के मामले में पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है. लेकिन असली वजह यह है कि निवेशक मानते हैं कि झटका भू‑राजनीतिक रहेगा, आपूर्ति‑आधारित नहीं. 

तो फिर अर्थव्यवस्था के लिए असली खतरा क्या है

अगर संघर्ष विराम टूटता है और तेल महंगा होता है, तो सरकारों पर दबाव जबरदस्त होगा. उन पर ईंधन सब्सिडी का दबाव बनेगा. जर्मनी ने अभी दो महीने के लिए तेल पर टैक्स कम करने और उपभोक्ताओं को 1000 यूरो की सबसिडी देने का फैसला लिया है. सरकारों पर कीमत नियंत्रित करने का दबाव है. आपातकालीन स्थिति के राहत पैकेज देने का दबाव है.

ये सब पुराने हथियार हैं और अभी तो बेहद खतरनाक भी हो चले हैं. सरकारों ने गिरती मांग, कमजोर होते उद्योगों, कोविड से टूटी सप्लाई चेन, रोजगार की धीमी ग्रोथ जैसे संकटों के खिलाफ इन्हीं हथियारों के इस्तेमाल से मदद देने की कोशिश की. इससे स्थिति बेहद खराब होने से बची रही लेकिन सरकारें खुद आकंठ कर्ज में डूब गईं. ज्यादातर बड़े विकासशील देश अपनी पीठ पर जीडीपी के 100 फीसदी के बराबर के कर्ज का बोझ लादे घूम रहे हैं. 

ऐसे में अब माना जा रहा है कि लंबी अवधि में नुकसान पेट्रोल पंप से नहीं होगा. असली नुकसान तो बढ़े कर्ज से होगा. क्योंकि बढ़ते ब्याज का भुगतान नामुमकिन हो जाएगा और ऐसे में बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपनी वित्तीय विश्वसनीयता खो देंगी. ये स्थिति ज्यादा बड़े वित्तीय आपातकाल को पैदा करेगी.

तेल कीमत का नहीं, नीतियों का संकट

इस बार वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ज्यादा बड़ी, ज्यादा कुशल और ज्यादा विविध है. लेकिन नीति‑निर्माता पहले से कहीं ज्यादा बंधे हुए हैं. सरकारों के पास इस तेल संकट के खिलाफ विकल्प बहुत सीमित हैं. अभी तक ऑयल शॉक से बचाव के लिए दुनिया में उठाए गए कदमों में यह बात अब तक स्पष्ट भी हो चुकी है.

अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से कोई हल निकल आया, तो बाजार राहत की सांस लेंगे और आगे बढ़ जाएंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो झटका सिर्फ तेल से नहीं आएगा. यह संकट इस बात की परीक्षा है कि कर्ज के बोझ तले दबी दुनिया अब झटकों से कैसे निपटेगी, जबकि पुराने औजार काम नहीं करने वाले. इसीलिए यह तेल संकट अलग है, और इसमें असल संकट तेल कीमतों के स्तर का नहीं है. 

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