सरकारों की रूल बुक में आर्थिक संकटों से बचाव के जो हथियार होते हैं, वो फिलहाल लागू किए गए तो और बड़े संकट पैदा हो सकते हैं. ईरान युद्ध से पैदा हुआ संकट तेल की कीमतों से ज्यादा, सरकार के विकल्पों का संकट बन गया है.
इस तेल संकट के दौरान कुछ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं ने देशों की सरकारों को लोगों को सब्सिडी ना देने के सुझाव दिए हैंतस्वीर: Ahmad Hatefi/UPI Photo/newscom/picture alliance
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पिछले एक दशक में दुनिया ने कई आर्थिक संकटों का सामना किया. अभी देश उनसे पूरी तरह उबरे भी नहीं थे कि ईरान युद्ध का संकट उनके सामने आ खड़ा हुआ. ईरान युद्ध का नतीजा क्या होगा, अब भी साफ नहीं है. लेकिन एक बात तय है, इस टकराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक खास कमजोरी उजागर कर दी है. यह कमजोरी दिखाती है कि वर्तमान तेल संकट, पिछले किसी भी तेल संकट से अलग है. सरकारों के पास इस तेल संकट से आम लोगों और कारोबारों को राहत देने की गुंजाइश कम है क्योंकि वो पहले ही गले तक कर्ज में फंसी हैं. और बॉन्ड बाजार, उनके खर्च को नियंत्रित करने के लिए चाबुक लिए खड़े हैं.
फिलहाल, पिछले बुधवार से शुरू हुई दो हफ्ते की नाजुक संघर्ष विराम की स्थिति जारी है. इसी वजह से बाजार घबराए नहीं हैं. अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी और ईरान के फिर से होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने के बावजूद, एशियाई शेयर बाजार चढ़ रहे हैं और कच्चा तेल लगातार सस्ता हो रहा है. दरअसल यह लापरवाही नहीं है, एक दांव है.
कूटनीति और टकराव साथ-साथ जारी
रविवार को पाकिस्तान में हुई बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हुई. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस वार्ता से यह कहते बाहर निकल गए कि वॉशिंगटन ने तेहरान को ‘अंतिम और सबसे अच्छा प्रस्ताव' सौंप दिया है. ईरान ने जवाब में कहा कि जो अमेरिका युद्ध के जरिए हासिल नहीं कर सका, उसे बातचीत की टेबल पर हासिल करना चाहता है. वैसे ईरान ने बातचीत की संभावना पूरी तरह खारिज भी नहीं की है.
ईरान युद्ध: कारोबार के ये ठिकाने भी होर्मुज जितने अहम
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ऐसे में दुनिया भर में मध्यस्थता की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक मध्यस्थों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है. इस बीच रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव बीजिंग पहुंचे. रूस ने एक समझौता कर ईरान के समृद्ध यूरेनियम को अपने पास सुरक्षित रखने का प्रस्ताव दिया है. चीन और अन्य देश भी पर्दे के पीछे से सक्रिय हैं.
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का दावा है कि ईरानी प्रतिनिधियों ने वॉशिंगटन से फिर संपर्क किया है. ट्रंप ने कहा, "वे समझौता करना चाहते हैं, बहुत बुरी तरह.” सच जो भी हो, संकेत साफ है. कोई भी पक्ष अभी हालात को पूरी तरह बिगाड़ने की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता.
पर सरकारें पहले से ज्यादा कमजोर क्यों
आमतौर पर तेल संकट कीमतों से जुड़ा होता है. लेकिन यह संकट सरकारी बजट से ज्यादा जुड़ा हुआ है. 1970 के दशक के बाद, बड़े तेल झटकों से उबरते समय सरकारों ने अपने वित्तीय संतुलन को सुधार लिया था. कर्ज घटा था. खर्च सीमित हुआ था और अगली आपदा के लिए गुंजाइश बन गई थी. आज हालात उलटे हैं. अधिकांश विकसित देशों में सरकारी कर्ज जीडीपी के 100 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुका है.
कोविड महामारी ने उस प्रक्रिया को और तेज किया जिसे वैश्विक वित्तीय संकट पहले ही शुरू कर चुका था. दुनिया पहले से कहीं ज्यादा कर्ज में डूबी है. इसका मतलब यह है कि सरकारें अब तेल झटके का सामना पहले की तरह सब्सिडी और राहत पैकेज से नहीं कर सकतीं हैं. हालांकि उनकी ऐसा करने की मंशा जरूर है. लेकिन ऐसा करने के खिलाफ बॉन्ड बाजार पहले ही चेतावनी दे चुके हैं.
खाड़ी देशों के दुबई जैसे शानदार शहर कभी लग्जरी और सुरक्षा की मिसाल हुआ करते थे. आज मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ने के बाद से वहां पर्यटन तो ठप हुआ ही है, इसकी साख भी दांव पर है.
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सब पड़ा है खाली
आम दिनों में दुबई के अल-सीफ बाजार में पर्यटकों का तांता लगा होता था लेकिन आज पूरा बाजार सुनसान है. अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर हमला करने के बाद से बाजार का नजारा बिल्कुल उलट गया है.
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अमीरों की दुनिया
पिछले कई दशकों से दुबई के लिए एक बात कही जाती थी कि यह अमीरों की दुनिया है. दुनिया भर में कहीं किसी भी तरह का संघर्ष हो रहा हो, अमीरात की सीमाओं तक आते-आते सब थम जाता है. इस बार यह धारणा गलत साबित हुई. ईरान के जवाबी हमलों की चपेट में इस बार खाड़ी देश भी आ गए हैं, जिसने विदेशियों को यह क्षेत्र छोड़ के जाने के लिए मजबूर कर दिया है.
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हवाई अड्डे पर हमला
28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध शुरू होने के बाद से कई खाड़ी देशों ने लगातार अपने इलाके में मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. इस हमले में दुबई हवाई अड्डे के आस-पास कई ईंधन डिपो, अमेरिकी दूतावास और होटलों जैसे नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया.
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हवाई उड़ानें रद्द
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए दुबई हवाई अड्डा इस क्षेत्र के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है लेकिन यात्री विमानों की उड़ानें लगातार रद्द हो रही हैं. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों के बीच युद्ध की शुरुआत से ही इलाके के कई हवाई अड्डे आंशिक या सीमित क्षमता के साथ काम करने को मजबूर हैं.
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खाली पड़े समुद्री किनारे
दुबई के ब्रांड न्यू लग्जरी होटल जुमेराह मरसा अल अरब के समुद्री किनारे पर समुद्री पक्षियों के अलावा कोई नहीं है. विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के अनुसार पर्यटन में आई भारी गिरावट के कारण खाड़ी देशों को कम से कम 60 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है. साल 2025 में पर्यटन संयुक्त अरब अमीरात की जीडीपी का लगभग 12 फीसदी था.
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साख है दांव पर
दुबई के प्रमुख पर्यटन बाजार अल-सीफ के इस दुकानदार के लिए भी यह एक बड़ा झटका है. होटल, रेस्तरां और दुकान सभी इससे प्रभावित हुए हैं. ईरान के साथ छिड़ा युद्ध न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायी है बल्कि क्षेत्र की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP/dpa/picture alliance
कुछ सुरक्षित नहीं
अंतरराष्ट्रीय असमंजस के बीच पिछले कई सालों से खाड़ी देश खासकर दुबई खुद को निवेशकों और व्यवसायों के सामने एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था. केवल 2025 में ही लगभग 9,800 करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात में आकर बसे, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है.
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बंजर पड़े शहर
दुबई की गिनती दुनिया के सबसे अमीरों शहरों में की जाती है. टैक्स में भारी छूट, व्यवस्थित नौकरशाही और ‘गोल्डन वीजा प्रोग्राम’ ने इसे अमीरों और व्यवसायों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया था. कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली जुमैरा बीच रेजिडेंस की सड़कें आज वीरान हैं.
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आर्थिक मॉडल संकट में
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध कितना लंबा चलता है, इस बार निर्भर करेगा कि देश की प्रतिष्ठा को कितना नुकसान पहुंचा है और निवेशक कितनी गति से पैसा खीचेंगे. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टिट्यूट के जिम क्रेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “दुबई का आर्थिक मॉडल कितना संकट में है, इसे कम आंकना मुश्किल है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैकल्पिक स्थानों की खोज उतनी ही तेज होगी.”
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‘पर्यटकों की याददाश्त कमजोर’
कुछ लोगों का मानना है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. जर्मन सोसाइटी फॉर टूरिज्म स्टडीज के प्रेसिडेंट युरगन श्मुडे ने जेडडीएफ को बताया, “पर्यटकों की याददाश्त कमजोर होती है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई संघर्ष या युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलता है तो पर्यटन स्थल को अधिक नुकसान नहीं पहुंचता है.
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केंद्रीय बैंक भी फंसे हुए हैं
केंद्रीय बैंकों की स्थिति भी अच्छी नहीं है. पिछले दशकों में तेल संकट आते ही वे ब्याज दरें घटा देते थे. माना जाता था कि ये तो अस्थायी महंगाई है, गुजर जाएगी. विकास प्राथमिकता होता था. आज दौर ऐसा नहीं रहा है. केंद्रीय बैंकों के महंगाई रोकने के लक्ष्य लगातार चूक रहे हैं. अमेरिका का फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और उभरते बाजारों के नीति‑निर्माताओं के सामने एक मुश्किल विकल्प है.
अगर वे ऊर्जा जोखिम पर नरम रुख अपनाते हैं, तो महंगाई फिर सिर उठा सकती है. वहीं अगर ब्याज दरें बढ़ाकर सख्ती दिखाते हैं, तो कमजोर ग्रोथ और कमजोर हो सकती है. युद्ध की वजह से बाजार में तेल और गैस की कमी हो गई है, जो पश्चिमी देशों में उद्योगों की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल रही है और उत्पादों को महंगा बना रही है. तेल की कीमतें ज्यादा ना भी बढ़ें, तो भी ये जोखिम अभी बना रहने वाला है.
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फिर शेयर बाजार क्यों मजबूती दिखा रहे हैं
यह एक दिलचस्प बात जरूर है. पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद से बाजार घबराए नहीं दिख रहे. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया में कच्चे तेल के कुल कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है. फिर भी अभी कीमतें अपेक्षा से नीचे हैं. नीचे होने का मतलब ये नहीं कि आप युद्ध पूर्व की स्थिति से तुलना करने लगें. वो दौर शायद अब संभव नहीं लेकिन फिर भी कीमतें आशंकाओं से उलट नीची हैं.
सरकार विरोधी प्रदर्शनों की लहर भारत समेत ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में चली हुई है. इनमें से कइयों का मोर्चा देश की महिलाओं ने संभाला है, जो बड़े जोखिम उठा कर व्यवस्था को चुनौती दे रही हैं.
तस्वीर: DW/H.Sirat
भेदभावपूर्ण कानून के खिलाफ
भारत के आम नागरिकों के समूहों ने देश में लागू हुए नए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ कई हफ्तों से प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारी सत्ताधारी बीजेपी पर मुसलमानों के प्रति इस तथाकथित भेदभावपूर्ण कानून को वापस लेने का दबाव बना रहे थे.
तस्वीर: DW/M. Javed
फासीवाद के खिलाफ संघर्ष
भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राओं ने देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को ठेस पहुंचाने की कोशिशों का विरोध किया. विवादास्पद कानून के अलावा युवा स्टूडेंट ने फासीवादी सोच, स्त्री जाति से द्वेष, धार्मिक कट्टरवाद और पुलिस की बर्बरता के खिलाफ भी आवाज उठाई.
तस्वीर: DW/M. Krishnan
दमनकारी सत्ता के खिलाफ
ईरानी महिलाओं ने 1979 की इस्लामी क्रांति के समय से ही सख्त पितृसत्तावादी दबाव झेले हैं. बराबरी के अधिकारों और बोलने की आजादी जैसी मांगों पर सत्ताधारियों ने हमेशा ही महिलाओं को डरा धमका कर पीछे रखा है.फिर भी महिलाएं हिम्मत के साथ तमाम राजनैतिक एवं नागरिक प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/J. Roberson
पाकिस्तानी महिलाएं बोल उठीं बस बहुत हुआ
भारत के पड़ोसी पाकिस्तान में भी बराबर का हक मांगने वाली महिलाओं के प्रति बुरा रवैया रहता है. इन्हें कभी "पश्चिम की एजेंट" तो कभी "एनजीओ माफिया" जैसे विशेषणों के साथ जोड़ा जाता है. महिला अधिकारों की बात करने वाली फेमिनिस्ट महिलाओं को अकसर समाज से अवहेलना झेलनी पड़ती है. फिर भी रैली, प्रदर्शन कर समाज में बदलाव लाने की महिलाओं की कोशिशें जारी हैं.
तस्वीर: Reuters/M. Raza
लोकतंत्र को लेकर बड़े सामाजिक आंदोलन
पाकिस्तान में हुए अब तक के ज्यादातर महिला अधिकार आंदोलन कुछ ही मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं, जैसे लैंगिक हिंसा, बाल विवाह और इज्जत के नाम पर हत्या. लेकिन अब महिलाएं लोकतंत्र-समर्थक प्रदर्शनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगी हैं. पिछले साल पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का नेतृत्व किया जिसकी मांग छात्र संघों की बहाली थी. दबाव का असर दिखा और संसद में इस पर बहस कराई गई.
तस्वीर: DW/T. Shahzad
इंसाफ के लिए लड़तीं अफगानी महिलाएं
अमेरिका और तालिबान का समझौता हो गया तो अफगानिस्तान में एक ओर युद्धकाल का औपचारिक रूप से खात्मा हो जाएगा. लेकिन साथ ही बीते 20 सालों में अफगानी महिलाओं को जो कुछ भी अधिकार और आजादी हासिल हुई है वो खतरे में पड़ सकती है. 2015 में कुरान की प्रति जलाने के आरोप में भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार डाली गई फरखुंदा मलिकजादा के लिए इंसाफ की मांग लेकर भी महिला अधिकार कार्यकर्ता सड़क पर उतरीं. (शामिल शम्स/आरपी)
तस्वीर: DW/H.Sirat
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इसकी एक वजह यह भरोसा है कि कूटनीति आखिरकार कामयाब होगी. इसके अलावा अमेरिका अब ऊर्जा के मामले में पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर है. यूरोप ने मिडिल-ईस्ट के तेल पर निर्भरता घटाई है. दुनिया के कई हिस्सों ने ऊर्जा सुरक्षा के मामले में पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है. लेकिन असली वजह यह है कि निवेशक मानते हैं कि झटका भू‑राजनीतिक रहेगा, आपूर्ति‑आधारित नहीं.
तो फिर अर्थव्यवस्था के लिए असली खतरा क्या है
अगर संघर्ष विराम टूटता है और तेल महंगा होता है, तो सरकारों पर दबाव जबरदस्त होगा. उन पर ईंधन सब्सिडी का दबाव बनेगा. जर्मनी ने अभी दो महीने के लिए तेल पर टैक्स कम करने और उपभोक्ताओं को 1000 यूरो की सबसिडी देने का फैसला लिया है. सरकारों पर कीमत नियंत्रित करने का दबाव है. आपातकालीन स्थिति के राहत पैकेज देने का दबाव है.
ये सब पुराने हथियार हैं और अभी तो बेहद खतरनाक भी हो चले हैं. सरकारों ने गिरती मांग, कमजोर होते उद्योगों, कोविड से टूटी सप्लाई चेन, रोजगार की धीमी ग्रोथ जैसे संकटों के खिलाफ इन्हीं हथियारों के इस्तेमाल से मदद देने की कोशिश की. इससे स्थिति बेहद खराब होने से बची रही लेकिन सरकारें खुद आकंठ कर्ज में डूब गईं. ज्यादातर बड़े विकासशील देश अपनी पीठ पर जीडीपी के 100 फीसदी के बराबर के कर्ज का बोझ लादे घूम रहे हैं.
डॉनल्ड ट्रंप दुनिया भर में जारी संघर्षों को रुकवाने का दावा करके खुद को नोबेल शांति पुरस्कार की कतार में सबसे आगे देखना चाहते हैं. लेकिन वो कौन से संघर्ष विराम हैं, जिनके दम पर ट्रंप नोबेल हासिल करना चाहते हैं.
तस्वीर: Samuel Corum/MediaPunch/IMAGO
अर्मेनिया-अजरबैजान संघर्ष
पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया के बीच पहाड़ी इलाके में स्थित अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच पिछले 35 सालों से नागोर्नो-काराबाख के इलाके को लेकर संघर्ष चल रहा था. इस साल अगस्त में ट्रंप ने दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठक कर शांति समझौते पर हस्ताक्षर करवाए. शांति समझौते के बाद दोनों देशों ने ट्रंप के लिए नोबेल पुरस्कार की वकालत की.
तस्वीर: Daniel Torok/White House/SIPA/picture alliance
कांगो और रवांडा संघर्ष
मध्य और पूर्वी अफ्रीका में मौजूद डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और रवांडा के बीच 1990 से जारी संघर्ष जून 2025 में, अमेरिकी मध्यस्थता के बाद समाप्त होने का दावा किया गया. संयुक्त राष्ट्र ने भी इस समझौते को शांति और स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया. नोबेल का दावा करते समय ट्रंप इस संघर्ष विराम को भी गिनती में शामिल करते हैं भले ही संघर्ष दोबारा शुरु हो गया है.
तस्वीर: Andrew Caballero-Reynolds/AFP/Getty Images
इस्राएल-ईरान संघर्ष
24 जून, 2025 को ट्रंप ने इस्राएल और ईरान के बीच पूर्ण युद्धविराम की घोषणा की. दोनों देशों के बीच 12 दिनों तक चले संघर्ष के दौरान इस्राएल ने 'ऑपरेशन लॉयन' के तहत ईरान के सैन्य और परमाणु केंद्रों पर हमले किए थे. संघर्ष विराम से दो दिन पहले अमेरिका ने ईरान के परमाणु केंद्रों पर बमबारी की थी. फिलहाल इस संघर्ष का व्यापक हल नहीं मिल पाया है.
तस्वीर: Saul Loeb/AFP/Getty Images
भारत-पाकिस्तान संघर्ष
पहलगाम में हुए हमले के बाद भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच मई में करीब चार दिन तक संघर्ष चला था. राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक मंचों से यह दावा किया कि उन्होंने एक लंबी बातचीत के बाद इस संघर्ष को खत्म कराया. पाकिस्तान ने भी ट्रंप के इस दावे का समर्थन किया और आधिकारिक तौर पर ट्रंप के लिए नोबेल पुरस्कार की वकालत की. हालांकि, भारत इस संघर्ष विराम में अमेरिकी भूमिका को नकार चुका है.
एक प्राचीन हिंदू मंदिर को लेकर शुरू हुआ विवाद जुलाई में तब भीषण संघर्ष में बदल गया जब थाईलैंड ने कंबोडियाई सैन्य ठिकानों पर हमला करने के लिए लड़ाकू विमान तैनात कर दिए. कई दिनों तक चले संघर्ष के बाद मलेशिया की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ. ट्रंप ने इस युद्ध को भी रोकने का श्रेय लिया क्योंकि उन्होंने दोनों देशों के साथ व्यापार खत्म करने की धमकी दी थी.
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इथियोपिया-मिस्र जल विवाद
इथियोपिया और मिस्र के बीच नील नदी पर इथियोपिया द्वारा बनाए जा रहे बांध और उसके पानी को लेकर विवाद है. मिस्र अपनी 97 फीसदी पानी से जुड़ी जरूरतों के लिए नील नदी पर निर्भर है. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इथियोपिया और मिस्र के बीच संघर्ष को सुलझाने का दावा किया था, लेकिन यह दावा सटीक नहीं है क्योंकि इसमें कोई सक्रिय संघर्ष शामिल नहीं था.
तस्वीर: Luis Tato/AFP/Getty Images
सर्बिया-कोसोवो आर्थिक सामान्यीकरण
दक्षिण-पूर्वी यूरोप में स्थित सर्बिया और कोसोवो के बीच विवाद कोसोव के स्वतंत्र देश के दर्जे को लेकर है. दोनों देशों के बीच संघर्ष की असल वजह उत्तरी कोसोवो में सर्ब समुदाय और अल्बानियाई लोगों के बीच जारी विवाद है. दोनों देशों के बीच यह विवाद आज भी जारी है लेकिन ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में दोनों देशों के बीच एक आर्थिक सामान्यीकरण समझौते में मध्यस्थता की थी.
तस्वीर: Office of the Kosovo presidency
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ऐसे में अब माना जा रहा है कि लंबी अवधि में नुकसान पेट्रोल पंप से नहीं होगा. असली नुकसान तो बढ़े कर्ज से होगा. क्योंकि बढ़ते ब्याज का भुगतान नामुमकिन हो जाएगा और ऐसे में बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपनी वित्तीय विश्वसनीयता खो देंगी. ये स्थिति ज्यादा बड़े वित्तीय आपातकाल को पैदा करेगी.
तेल कीमत का नहीं, नीतियों का संकट
इस बार वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ज्यादा बड़ी, ज्यादा कुशल और ज्यादा विविध है. लेकिन नीति‑निर्माता पहले से कहीं ज्यादा बंधे हुए हैं. सरकारों के पास इस तेल संकट के खिलाफ विकल्प बहुत सीमित हैं. अभी तक ऑयल शॉक से बचाव के लिए दुनिया में उठाए गए कदमों में यह बात अब तक स्पष्ट भी हो चुकी है.
अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से कोई हल निकल आया, तो बाजार राहत की सांस लेंगे और आगे बढ़ जाएंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो झटका सिर्फ तेल से नहीं आएगा. यह संकट इस बात की परीक्षा है कि कर्ज के बोझ तले दबी दुनिया अब झटकों से कैसे निपटेगी, जबकि पुराने औजार काम नहीं करने वाले. इसीलिए यह तेल संकट अलग है, और इसमें असल संकट तेल कीमतों के स्तर का नहीं है.