ईरान और अमेरिका के बीच जारी बातों के युद्ध के पीछे की वजह है, भरोसे की कमी. डॉनल्ड ट्रंप की ओर से पूर्व में उठाए गए कदम इस भरोसे के बनने में बाधा डाल रहे हैं.
डॉनल्ड ट्रंप ने एक ओर ईरान पर हमले को रोकने की बात कही है, वहीं वो मध्यपूर्व में अमेरिकी सैनिकों का जमावड़ा बढ़ाते जा रहे हैंतस्वीर: Saul Loeb/AFP/Getty Images
विज्ञापन
युद्ध को रोकना, युद्ध शुरू करने जितना आसान नहीं होता. ईरान युद्ध से उपजी परिस्थितियों में फिलहाल इसे साफ देखा जा सकता है. डॉनल्ड ट्रंप कह चुके हैं कि उनकी ईरान से बात हुई, जो ‘बहुत अच्छी' रही. ट्रंप की ओर से ईरान को 15 बिंदुओं वाला समझौता कार्यक्रम भी भेजा गया है. लेकिन ईरानी सत्ता ने इसे नकार दिया है और लगातार बातचीत से इंकार कर रही है. ऐसे में असल समस्या है, दोनों पक्षों के बीच बिल्कुल भरोसा ना होना. और बिना भरोसे के कोई नतीजा निकलना मुमकिन नहीं. फिर यह युद्ध सिर्फ हथियारों का नहीं, बल्कि शब्दों का भी है.
डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के बिजली घरों को ‘तबाह' करने की धमकी दी थी. फिर अगले ही दिन शांति की बात भी की. यह उनकी पुरानी और आजमाई हुई रणनीति है. वो अपने उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से नहीं बताते. कई विश्लेषक इसे उनकी जिम्मेदार ठहराए जाने से बचने की रणनीति का हिस्सा भी बताते हैं. ट्रंप की इस रणनीति के चलते ही ईरानी नेताओं में ट्रंप को लेकर काफी संदेह है. उन्होंने ऐसे बयान भी दिए कि यह ट्रंप का बचे-खुचे नेतृत्व को खत्म करने का षड्यंत्र भी हो सकता है. फिर अमेरिका लगातार इस इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की कार्रवाई भी कर रहा है. इन्हीं वजहों से ईरान आसानी से बातचीत के लिए तैयार नहीं है.
ईरान की सरकार अमेरिका से युद्ध को अस्तित्व की लड़ाई मान रही है. यह जंग पिछले साल जून में इस्राएल के 12 दिन के हमले से शुरू हुई. तब अमेरिका और इस्राएल दोनों ने ईरान पर हमले किए. रात-दिन बमबारी हुई. फिर भी ईरान ना तो अपने उद्देश्यों से पीछे हटा और ना ही उसने इस्राएल पर मिसाइलें दागना छोड़ा. यह जिद्दीपना लगातार ईरानी सत्ता की आवाजों में बना हुआ है.
कितना महंगा है कई भारतीय छात्रों का जर्मन सपना
12:11
अब भी ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान की शर्तें बेहद सख्त और स्पष्ट हैं. वे चाहते हैं कि बमबारी का अच्छा-खासा मुआवजा ईरान को मिले. साथ ही परमाणु कार्यक्रम का अधिकार बरकरार रहे. और अंतरराष्ट्रीय गारंटी मिले कि देश पर भविष्य में हमला नहीं होगा. ऐसे में यह नामुमकिन है कि अमेरिका ये सारी शर्तें मानेगा. यानी होर्मुज स्ट्रेट का भविष्य फिलहाल ऐसे ही अधर में लटका रहेगा.
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया में मौजूद तेल के रास्तों में सबसे अहम है. दुनिया में कुल तेल के व्यापार का पांचवां हिस्सा यहीं से गुजरता है. ईरान ने इसे लेकर स्पष्ट कहा है कि अब यह पहले जैसा नहीं रहेगा. जहाज मालिक डरे हुए हैं और रास्ता बदल रहे हैं. कुछ टैंकर लाखों डॉलर टोल चुकाने भी लगे हैं.
वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा
तेल बाजार पहले से ही इस युद्ध के तनाव से हिला हुआ है. ऊर्जा की कीमतें कई सालों के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं सबसे ज्यादा दबाव में हैं. उनके पेट्रोकेमिकल निर्यात पहले से ही बुरी तरह प्रभावित हैं. अब यह सिर्फ एक युद्ध नहीं रह गया है बल्कि यह पिछले कई दशकों में उभरी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की पिछले कई दशकों की सबसे कठिन परीक्षा बन चुका है.
एशिया में विरोध का परचम लहराती महिलाएं
सरकार विरोधी प्रदर्शनों की लहर भारत समेत ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में चली हुई है. इनमें से कइयों का मोर्चा देश की महिलाओं ने संभाला है, जो बड़े जोखिम उठा कर व्यवस्था को चुनौती दे रही हैं.
तस्वीर: DW/H.Sirat
भेदभावपूर्ण कानून के खिलाफ
भारत के आम नागरिकों के समूहों ने देश में लागू हुए नए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ कई हफ्तों से प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारी सत्ताधारी बीजेपी पर मुसलमानों के प्रति इस तथाकथित भेदभावपूर्ण कानून को वापस लेने का दबाव बना रहे थे.
तस्वीर: DW/M. Javed
फासीवाद के खिलाफ संघर्ष
भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राओं ने देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को ठेस पहुंचाने की कोशिशों का विरोध किया. विवादास्पद कानून के अलावा युवा स्टूडेंट ने फासीवादी सोच, स्त्री जाति से द्वेष, धार्मिक कट्टरवाद और पुलिस की बर्बरता के खिलाफ भी आवाज उठाई.
तस्वीर: DW/M. Krishnan
दमनकारी सत्ता के खिलाफ
ईरानी महिलाओं ने 1979 की इस्लामी क्रांति के समय से ही सख्त पितृसत्तावादी दबाव झेले हैं. बराबरी के अधिकारों और बोलने की आजादी जैसी मांगों पर सत्ताधारियों ने हमेशा ही महिलाओं को डरा धमका कर पीछे रखा है.फिर भी महिलाएं हिम्मत के साथ तमाम राजनैतिक एवं नागरिक प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/J. Roberson
पाकिस्तानी महिलाएं बोल उठीं बस बहुत हुआ
भारत के पड़ोसी पाकिस्तान में भी बराबर का हक मांगने वाली महिलाओं के प्रति बुरा रवैया रहता है. इन्हें कभी "पश्चिम की एजेंट" तो कभी "एनजीओ माफिया" जैसे विशेषणों के साथ जोड़ा जाता है. महिला अधिकारों की बात करने वाली फेमिनिस्ट महिलाओं को अकसर समाज से अवहेलना झेलनी पड़ती है. फिर भी रैली, प्रदर्शन कर समाज में बदलाव लाने की महिलाओं की कोशिशें जारी हैं.
तस्वीर: Reuters/M. Raza
लोकतंत्र को लेकर बड़े सामाजिक आंदोलन
पाकिस्तान में हुए अब तक के ज्यादातर महिला अधिकार आंदोलन कुछ ही मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं, जैसे लैंगिक हिंसा, बाल विवाह और इज्जत के नाम पर हत्या. लेकिन अब महिलाएं लोकतंत्र-समर्थक प्रदर्शनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगी हैं. पिछले साल पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का नेतृत्व किया जिसकी मांग छात्र संघों की बहाली थी. दबाव का असर दिखा और संसद में इस पर बहस कराई गई.
तस्वीर: DW/T. Shahzad
इंसाफ के लिए लड़तीं अफगानी महिलाएं
अमेरिका और तालिबान का समझौता हो गया तो अफगानिस्तान में एक ओर युद्धकाल का औपचारिक रूप से खात्मा हो जाएगा. लेकिन साथ ही बीते 20 सालों में अफगानी महिलाओं को जो कुछ भी अधिकार और आजादी हासिल हुई है वो खतरे में पड़ सकती है. 2015 में कुरान की प्रति जलाने के आरोप में भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार डाली गई फरखुंदा मलिकजादा के लिए इंसाफ की मांग लेकर भी महिला अधिकार कार्यकर्ता सड़क पर उतरीं. (शामिल शम्स/आरपी)
तस्वीर: DW/H.Sirat
6 तस्वीरें1 | 6
ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस पूरी लड़ाई के केंद्र में है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान 440 किलो 60 फीसदी संवर्धित यूरेनियम के साथ हथियार बनाने की क्षमता के बेहद करीब है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ईरान के परमाणु संयंत्रों के मलबे के नीचे दबा है. अमेरिका इसे लेकर अपनी ‘जीरो स्टॉकपाइलिंग' की मांग रख चुका है. यानी वह चाहता है कि ईरान सारा संवर्धित यूरेनियम देश से हटा दे. ईरान इससे इंकार कर चुका है.
विज्ञापन
डॉनल्ड ट्रंप पर बढ़ रहा दबाव
अमेरिका के खाड़ी सहयोगी सबसे ज्यादा डरे हुए हैं. उन्होंने शांति के दौर का सबसे ज्यादा फायदा उठाया था. अरबपतियों को खींचते उनके शहर और चारों ओर बिखरी उनकी संपन्नता इसकी मिसाल थे. अब यही खाड़ी के देश ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का सबसे ज्यादा निशाना बन रहे हैं. सऊदी अरब, यूएई जैसे देश चाहते हैं कि यह खतरा जल्द से जल्द खत्म हो. लेकिन वे भी जानते हैं कि कोई समझौता होना आसान नहीं है. उनकी बेचैनी वॉशिंगटन पर लगातार दबाव डाल रही है.
जंग के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था और भी खस्ताहाल होगी. देश का बुनियादी ढांचा बेहद बुरी हालत में पहुंच गया है, सेना को भी पैसे की सख्त जरूरत है. प्रतिबंधों में राहत के बिना देश का आगे बढ़ना मुश्किल है. लोगों की जिंदगी बेहाल है, महंगाई आसमान छू रही है. ऐसे में देश के जल्द स्थिर हो जाने की उम्मीद कम ही है.
मध्य-पूर्व युद्ध की मार: दुबई की चमक पर पड़ा साया
खाड़ी देशों के दुबई जैसे शानदार शहर कभी लग्जरी और सुरक्षा की मिसाल हुआ करते थे. आज मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ने के बाद से वहां पर्यटन तो ठप हुआ ही है, इसकी साख भी दांव पर है.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP/dpa/picture alliance
सब पड़ा है खाली
आम दिनों में दुबई के अल-सीफ बाजार में पर्यटकों का तांता लगा होता था लेकिन आज पूरा बाजार सुनसान है. अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर हमला करने के बाद से बाजार का नजारा बिल्कुल उलट गया है.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP/dpa/picture alliance
अमीरों की दुनिया
पिछले कई दशकों से दुबई के लिए एक बात कही जाती थी कि यह अमीरों की दुनिया है. दुनिया भर में कहीं किसी भी तरह का संघर्ष हो रहा हो, अमीरात की सीमाओं तक आते-आते सब थम जाता है. इस बार यह धारणा गलत साबित हुई. ईरान के जवाबी हमलों की चपेट में इस बार खाड़ी देश भी आ गए हैं, जिसने विदेशियों को यह क्षेत्र छोड़ के जाने के लिए मजबूर कर दिया है.
तस्वीर: Amr Alfiky/REUTERS
हवाई अड्डे पर हमला
28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध शुरू होने के बाद से कई खाड़ी देशों ने लगातार अपने इलाके में मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. इस हमले में दुबई हवाई अड्डे के आस-पास कई ईंधन डिपो, अमेरिकी दूतावास और होटलों जैसे नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया.
तस्वीर: AFP
हवाई उड़ानें रद्द
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए दुबई हवाई अड्डा इस क्षेत्र के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है लेकिन यात्री विमानों की उड़ानें लगातार रद्द हो रही हैं. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों के बीच युद्ध की शुरुआत से ही इलाके के कई हवाई अड्डे आंशिक या सीमित क्षमता के साथ काम करने को मजबूर हैं.
तस्वीर: AFP/Getty Images
खाली पड़े समुद्री किनारे
दुबई के ब्रांड न्यू लग्जरी होटल जुमेराह मरसा अल अरब के समुद्री किनारे पर समुद्री पक्षियों के अलावा कोई नहीं है. विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के अनुसार पर्यटन में आई भारी गिरावट के कारण खाड़ी देशों को कम से कम 60 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है. साल 2025 में पर्यटन संयुक्त अरब अमीरात की जीडीपी का लगभग 12 फीसदी था.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP Photo/picture alliance
साख है दांव पर
दुबई के प्रमुख पर्यटन बाजार अल-सीफ के इस दुकानदार के लिए भी यह एक बड़ा झटका है. होटल, रेस्तरां और दुकान सभी इससे प्रभावित हुए हैं. ईरान के साथ छिड़ा युद्ध न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायी है बल्कि क्षेत्र की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP/dpa/picture alliance
कुछ सुरक्षित नहीं
अंतरराष्ट्रीय असमंजस के बीच पिछले कई सालों से खाड़ी देश खासकर दुबई खुद को निवेशकों और व्यवसायों के सामने एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था. केवल 2025 में ही लगभग 9,800 करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात में आकर बसे, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है.
तस्वीर: Fatima Shbair/AP Photo/picture alliance
बंजर पड़े शहर
दुबई की गिनती दुनिया के सबसे अमीरों शहरों में की जाती है. टैक्स में भारी छूट, व्यवस्थित नौकरशाही और ‘गोल्डन वीजा प्रोग्राम’ ने इसे अमीरों और व्यवसायों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया था. कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली जुमैरा बीच रेजिडेंस की सड़कें आज वीरान हैं.
तस्वीर: Fadel Senna/AFP/Getty Images
आर्थिक मॉडल संकट में
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध कितना लंबा चलता है, इस बार निर्भर करेगा कि देश की प्रतिष्ठा को कितना नुकसान पहुंचा है और निवेशक कितनी गति से पैसा खीचेंगे. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टिट्यूट के जिम क्रेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “दुबई का आर्थिक मॉडल कितना संकट में है, इसे कम आंकना मुश्किल है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैकल्पिक स्थानों की खोज उतनी ही तेज होगी.”
तस्वीर: Fatima Shbair/AP Photo/picture alliance
‘पर्यटकों की याददाश्त कमजोर’
कुछ लोगों का मानना है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. जर्मन सोसाइटी फॉर टूरिज्म स्टडीज के प्रेसिडेंट युरगन श्मुडे ने जेडडीएफ को बताया, “पर्यटकों की याददाश्त कमजोर होती है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई संघर्ष या युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलता है तो पर्यटन स्थल को अधिक नुकसान नहीं पहुंचता है.
तस्वीर: Fadel Senna/AFP/Getty Images
10 तस्वीरें1 | 10
डॉनल्ड ट्रंप से दुश्मन को राहत देने की उम्मीद नहीं की जा सकती. उनकी राजनीतिक पहचान है, कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए. हालांकि होर्मुज बंद है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी असर दिख रहा है. तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, महंगाई लौट रही है. डॉनल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग्स लगातार गोता लगा रही हैं. परिस्थितियां ऐसी ही रहीं तो मध्यावधि चुनावों में ट्रंप को नुकसान होना तय है. यही दबाव है कि वो समझौते के लिए उत्सुक दिख रहे हैं.
ऐसे में अगर मध्यस्थ इतने काबिल रहे कि अमेरिका और ईरान अपने बीच का संदेह को कम करके किसी समझौते तक पहुंच गए, तो यह मध्य-पूर्व के इतिहास में निर्णायक मोड़ हो सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो निकट भविष्य में होर्मुज जलसंधि नहीं खुलेगी और कुछ वर्षों तक दुनिया को महंगे तेल के लिए तैयार रहना होगा. दुनिया की अर्थव्यवस्था फिलहाल इसी एक फैसले पर टिकी है. डॉनल्ड ट्रंप और मोज्तबा खमेनेई, दोनों ही जानते हैं कि इस युद्ध में दुनिया का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है, बस सवाल यही है कि पहले कौन झुकेगा और किस कीमत पर.