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ईरान-अमेरिका: जंग खत्म होगी या और भड़केगी?

२८ मार्च २०२६

ईरान और अमेरिका के बीच जारी बातों के युद्ध के पीछे की वजह है, भरोसे की कमी. डॉनल्ड ट्रंप की ओर से पूर्व में उठाए गए कदम इस भरोसे के बनने में बाधा डाल रहे हैं.

अमेरिका के पाम बीच इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप
डॉनल्ड ट्रंप ने एक ओर ईरान पर हमले को रोकने की बात कही है, वहीं वो मध्यपूर्व में अमेरिकी सैनिकों का जमावड़ा बढ़ाते जा रहे हैंतस्वीर: Saul Loeb/AFP/Getty Images

युद्ध को रोकना, युद्ध शुरू करने जितना आसान नहीं होता. ईरान युद्ध से उपजी परिस्थितियों में फिलहाल इसे साफ देखा जा सकता है. डॉनल्ड ट्रंप कह चुके हैं कि उनकी ईरान से बात हुई, जो ‘बहुत अच्छी' रही. ट्रंप की ओर से ईरान को 15 बिंदुओं वाला समझौता कार्यक्रम भी भेजा गया है. लेकिन ईरानी सत्ता ने इसे नकार दिया है और लगातार बातचीत से इंकार कर रही है. ऐसे में असल समस्या है, दोनों पक्षों के बीच बिल्कुल भरोसा ना होना. और बिना भरोसे के कोई नतीजा निकलना मुमकिन नहीं. फिर यह युद्ध सिर्फ हथियारों का नहीं, बल्कि शब्दों का भी है.

डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के बिजली घरों को ‘तबाह' करने की धमकी दी थी. फिर अगले ही दिन शांति की बात भी की. यह उनकी पुरानी और आजमाई हुई रणनीति है. वो अपने उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से नहीं बताते. कई विश्लेषक इसे उनकी जिम्मेदार ठहराए जाने से बचने की रणनीति का हिस्सा भी बताते हैं. ट्रंप की इस रणनीति के चलते ही ईरानी नेताओं में ट्रंप को लेकर काफी संदेह है. उन्होंने ऐसे बयान भी दिए कि यह ट्रंप का बचे-खुचे नेतृत्व को खत्म करने का षड्यंत्र भी हो सकता है. फिर अमेरिका लगातार इस इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की कार्रवाई भी कर रहा है. इन्हीं वजहों से ईरान आसानी से बातचीत के लिए तैयार नहीं है. 

ईरान युद्ध के चलते खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर संकट

फैसला जो भी हो, पहले जैसी नहीं रहेगी दुनिया

ईरान की सरकार अमेरिका से युद्ध को अस्तित्व की लड़ाई मान रही है. यह जंग पिछले साल जून में इस्राएल के 12 दिन के हमले से शुरू हुई. तब अमेरिका और इस्राएल दोनों ने ईरान पर हमले किए. रात-दिन बमबारी हुई. फिर भी ईरान ना तो अपने उद्देश्यों से पीछे हटा और ना ही उसने इस्राएल पर मिसाइलें दागना छोड़ा. यह जिद्दीपना लगातार ईरानी सत्ता की आवाजों में बना हुआ है. 

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अब भी ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान की शर्तें बेहद सख्त और स्पष्ट हैं. वे चाहते हैं कि बमबारी का अच्छा-खासा मुआवजा ईरान को मिले. साथ ही परमाणु कार्यक्रम का अधिकार बरकरार रहे. और अंतरराष्ट्रीय गारंटी मिले कि देश पर भविष्य में हमला नहीं होगा. ऐसे में यह नामुमकिन है कि अमेरिका ये सारी शर्तें मानेगा. यानी होर्मुज स्ट्रेट का भविष्य फिलहाल ऐसे ही अधर में लटका रहेगा.

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया में मौजूद तेल के रास्तों में सबसे अहम है. दुनिया में कुल तेल के व्यापार का पांचवां हिस्सा यहीं से गुजरता है. ईरान ने इसे लेकर स्पष्ट कहा है कि अब यह पहले जैसा नहीं रहेगा. जहाज मालिक डरे हुए हैं और रास्ता बदल रहे हैं. कुछ टैंकर लाखों डॉलर टोल चुकाने भी लगे हैं. 

वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा

तेल बाजार पहले से ही इस युद्ध के तनाव से हिला हुआ है. ऊर्जा की कीमतें कई सालों के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं सबसे ज्यादा दबाव में हैं. उनके पेट्रोकेमिकल निर्यात पहले से ही बुरी तरह प्रभावित हैं. अब यह सिर्फ एक युद्ध नहीं रह गया है बल्कि यह पिछले कई दशकों में उभरी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की पिछले कई दशकों की सबसे कठिन परीक्षा बन चुका है. 

ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस पूरी लड़ाई के केंद्र में है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान 440 किलो 60 फीसदी संवर्धित यूरेनियम के साथ हथियार बनाने की क्षमता के बेहद करीब है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ईरान के परमाणु संयंत्रों के मलबे के नीचे दबा है. अमेरिका इसे लेकर अपनी ‘जीरो स्टॉकपाइलिंग' की मांग रख चुका है. यानी वह चाहता है कि ईरान सारा संवर्धित यूरेनियम देश से हटा दे. ईरान इससे इंकार कर चुका है.

डॉनल्ड ट्रंप पर बढ़ रहा दबाव

अमेरिका के खाड़ी सहयोगी सबसे ज्यादा डरे हुए हैं. उन्होंने शांति के दौर का सबसे ज्यादा फायदा उठाया था. अरबपतियों को खींचते उनके शहर और चारों ओर बिखरी उनकी संपन्नता इसकी मिसाल थे. अब यही खाड़ी के देश ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का सबसे ज्यादा निशाना बन रहे हैं. सऊदी अरब, यूएई जैसे देश चाहते हैं कि यह खतरा जल्द से जल्द खत्म हो. लेकिन वे भी जानते हैं कि कोई समझौता होना आसान नहीं है. उनकी बेचैनी वॉशिंगटन पर लगातार दबाव डाल रही है. 

जंग के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था और भी खस्ताहाल होगी. देश का बुनियादी ढांचा बेहद बुरी हालत में पहुंच गया है, सेना को भी पैसे की सख्त जरूरत है. प्रतिबंधों में राहत के बिना देश का आगे बढ़ना मुश्किल है. लोगों की जिंदगी बेहाल है, महंगाई आसमान छू रही है. ऐसे में देश के जल्द स्थिर हो जाने की उम्मीद कम ही है. 

डॉनल्ड ट्रंप से दुश्मन को राहत देने की उम्मीद नहीं की जा सकती. उनकी राजनीतिक पहचान है, कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए. हालांकि होर्मुज बंद है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी असर दिख रहा है. तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, महंगाई लौट रही है. डॉनल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग्स लगातार गोता लगा रही हैं. परिस्थितियां ऐसी ही रहीं तो मध्यावधि चुनावों में ट्रंप को नुकसान होना तय है. यही दबाव है कि वो समझौते के लिए उत्सुक दिख रहे हैं.

ऐसे में अगर मध्यस्थ इतने काबिल रहे कि अमेरिका और ईरान अपने बीच का संदेह को कम करके किसी समझौते तक पहुंच गए, तो यह मध्य-पूर्व के इतिहास में निर्णायक मोड़ हो सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो निकट भविष्य में होर्मुज जलसंधि नहीं खुलेगी और कुछ वर्षों तक दुनिया को महंगे तेल के लिए तैयार रहना होगा. दुनिया की अर्थव्यवस्था फिलहाल इसी एक फैसले पर टिकी है. डॉनल्ड ट्रंप और मोज्तबा खमेनेई, दोनों ही जानते हैं कि इस युद्ध में दुनिया का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है, बस सवाल यही है कि पहले कौन झुकेगा और किस कीमत पर. 

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