क्या ईरान का मध्यम वर्ग गरीबी के दलदल में धंस रहा है?
१४ अगस्त २०२६
ईरान में रहने वाली गृहिणी मीना के लिए अब युद्ध का मतलब हवाई हमले या सैन्य बयानों से नहीं है. अब वह युद्ध को इस बात से समझती हैं कि उनके परिवार की खाने की मेज से क्या-क्या चीजें गायब हो गई हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "पिछले साल जब से युद्ध शुरू हुआ है, हम हर दिन और गरीब होते जा रहे हैं. सच कहूं तो मुझे याद नहीं कि मैंने आखिरी बार रेड मीट कब खरीदा था. हमने उसकी जगह चिकन लेना शुरू किया, लेकिन अब चिकन भी एक लग्जरी बन गया है. हम अब पैसे बचाने के बारे में नहीं सोचते. हम सिर्फ किराया देने और खाना खरीदने के बारे में सोचते हैं.”
होर्मुज का बैकअप प्लान तैयार करने के लिए बेचैन खाड़ी देश
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि इस साल ईरान की अर्थव्यवस्थामें 5.4 फीसदी की गिरावट आएगी, जबकि महंगाई दर लगभग 69 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है. विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि युद्ध, कमजोर व्यापार और लंबे समय से बनी अनिश्चितता देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रही है.
ईरान युद्ध से संकट पैदा नहीं हुआ बल्कि बढ़ा
स्वीडन में रहने वाले अर्थशास्त्री अहमद अलावी के मुताबिक, ईरान युद्धने देश के आर्थिक संकट को पैदा नहीं किया, बल्कि उसे बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "जब ईरान इस संघर्ष में शामिल हुआ, तब वहां महंगाई दर पहले से ही 40 फीसदी से ज्यादा थी. मुद्रा कमजोर हो रही थी, बजट घाटा बना हुआ था, और सालों से प्रतिबंध लगे हुए थे.”
उन्होंने आगे बताया, "युद्ध ने एक बाहरी झटके की तरह काम किया. बुनियादी ढांचे को पहुंचा नुकसान, होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापार में रुकावट, इंटरनेट का बंद होना और महंगाई तेज होने की बढ़ती आशंकाओं ने लोगों की खरीदारी की ताकत के खत्म होने की गति को और तेज कर दिया.”
अलावी सरकारी आंकड़ों की ओर इशारा करते हैं जिनसे पता चलता है कि सालाना महंगाई दर 66 फीसदी और साल-दर-साल महंगाई दर 88 फीसदी के करीब पहुंच गई है. खाने-पीने की चीजों की कीमतें और भी तेजी से बढ़ी हैं. ब्रेड और अनाज की कीमतों में लगभग 140 फीसदी, मीट और पोल्ट्री में 135 फीसदी, डेयरी उत्पादों में 116 फीसदी से ज्यादा और खाने के तेल में 200 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.
कई परिवारों के लिए इन आंकड़ों का मतलब है, कम मीट खरीदना, इलाज टालना और पैसे बचाने की योजना छोड़ देना.
गरीबी की चपेट में आए लगभग 40 लाख ईरानी
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि परिवार अक्सर सबसे पहले यात्रा और कपड़ों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं. हालांकि महंगाई जब बनी रहती है तो यह कटौती खाने-पीने, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक भी पहुंच जाती है. इससे मध्यम आय वाले परिवारों पर दबाव बढ़ जाता है, जो कभी खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित मानते थे.
अलावी का कहना है कि कम आय वाले परिवारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, लेकिन उनका तर्क है कि मध्यम वर्ग भी तेजी से इन्हीं दबावों का सामना कर रहा है, "कई वेतनभोगी कर्मचारी और पेंशनभोगी पहली बार गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं, क्योंकि उनकी आय महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ी है.”
उनका अनुमान है कि संघर्ष तेज होने के बाद से 35 से 45 लाख और ईरानी गरीबी की चपेट में आ गए हैं. इससे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की कुल संख्या 4 करोड़ से ज्यादा हो गई है.
अनिश्चितता के कारण कारोबार पर दबाव
ईरान के निजी क्षेत्र भी दबाव महसूस कर रहे हैं. ईरान के एक व्यापारी मोर्तेजा का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग मुश्किल होने के बाद क्षेत्रीय व्यापार के रास्ते तेजी से बदले.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "दुबई के सप्लायरों की कमी से बने खालीपन को भरने के लिए चीन ने तेजी से कदम उठाए. खाड़ी देशों के उलट, चीन मध्य एशिया के रेल नेटवर्क के जरिए भी सामान भेज सकता है, जिससे वह समुद्री रास्ते से जुड़े जोखिमों और देरी से बच जाता है.”
उनका मानना है कि इन जमीनी रास्तों का बढ़ता महत्व एक वजह थी कि अमेरिका ने तुर्कमेनिस्तान से लगी ईरान की सीमा के पास रेलवे लाइन को निशाना बनाया. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी.
इसके बावजूद, मोर्तेजा का कहना है कि इस बदलाव से ईरानी व्यापारियों को कोई खास फायदा नहीं हुआ है. वह कहते हैं, "रियाल की गिरती कीमत और आसमान छूती महंगाई ने बाजार को आगे बढ़ने से रोक दिया है. व्यापारी लगातार अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा की दरें लगभग हर दिन बदल जाती हैं. जो सामान हमने कम कीमतों पर खरीदा और बेचा था, अब उसे फिर से दुकान में लाने के लिए बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है और वह भी तब, जब ग्राहकों के पास उन्हें खरीदने की क्षमता बची हो.”
मोर्तेजा के लिए, अनिश्चितता सबसे बड़ी बाधा बन गई है. उन्होंने कहा, "तनाव जारी रहने के कारण, सच कहूं तो मुझे ईरान में कारोबार करने का कोई स्पष्ट भविष्य नजर नहीं आता है.”
क्या सरकार इस असर को कम कर सकती है?
दुनिया भर में तेल की कीमतें ज्यादा होने के बावजूद, अलावी का कहना है कि ईरान को इससे कोई खास फायदा होने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि प्रतिबंधों, निर्यात पर रोक और परिवहन की ज्यादा लागत की वजह से उसकी तेल से होने वाली कमाई सीमित बनी हुई है.
उनका तर्क है कि सब्सिडी, कीमतों पर नियंत्रण और विदेशी मुद्रा बाजार में दखल जैसे सरकारी उपायों से कुछ हद तक तुरंत राहत तो मिल सकती है, लेकिन इनसे असल समस्याओं का समाधान होने की उम्मीद कम ही है.
वह कहते हैं, "भरोसा बहाल किए बिना, प्रतिबंधों को कम किए बिना और ढांचागत समस्याओं को हल किए बिना, ये नीतियां स्थायी समाधान के बजाय केवल अल्पकालिक उपाय ही बनी रहेंगी.”
अनिश्चितता की लागत
अलावी का कहना है कि अनिश्चितता खुद आर्थिक सुधार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गई है. उनके मुताबिक, कई व्यवसाय निवेश में देरी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भविष्य की आर्थिक स्थितियों पर बहुत कम भरोसा है. साथ ही, परिवार खर्च करने को लेकर ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि कीमतें बढ़ती रहेंगी और उनकी कमाई की वैल्यू और गिर जाएगी.
उनका कहना है कि युद्ध से हुए भौतिक नुकसान की भरपाई करने में जितना समय लगेगा, उससे ज्यादा वक्त निवेशकों, कारोबारियों और आम ग्राहकों के बीच भरोसा फिर से कायम करने में लगेगा.
अलावी का मानना है कि जब तक महंगाई कम नहीं होती, एक्सचेंज रेट स्थिर नहीं होता और व्यापार की स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक कई परिवार आर्थिक दबाव में रहेंगे, भले ही सैन्य तनाव कम हो जाए.
भविष्य की बात करें, तो उनका मानना है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे, तो लोगों के रहन-सहन का स्तर और भी ज्यादा गिर जाएगा. उनका कहना है कि और भी ज्यादा परिवार प्रोटीन वाले खाने, स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की पढ़ाई के खर्च में कटौती करने को मजबूर होंगे. जबकि, दुकानें-कारोबार बंद होने और बेरोजगारी बढ़ने का सिलसिला जारी रह सकता है.
मीना कहती हैं, "हम अब भविष्य के बारे में बात नहीं करते. हम बस यही उम्मीद करते हैं कि अगले महीने का किराया भर सकें.”