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स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में क्यों पिछड़ गया ग्रीन हाइड्रोजन?

स्टुअर्ट ब्राउन
१९ सितम्बर २०२५

स्वच्छ और ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा का लंबे समय से प्रचार किया जाता रहा है. हालांकि, अब इस ग्रीन ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाएं रद्द हो रही हैं और इस क्षेत्र में निवेश कम हो रहा है, तो इसे क्या माना जाए? आखिर कहां गलती हुई?

हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन
हाइड्रोजन से जुड़ी परियोजनाएं बड़े उत्साह से शुरू हुईं लेकिन अब उनके लिए वैसा जोश नहीं दिख रहातस्वीर: Tim Schauenberg/DW

साल 2022 में, ऑस्ट्रेलियाई खनन और ऊर्जा कंपनी ‘फोर्टेस्क्यू' ने जर्मन एनर्जी नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर ऑपरेटर ‘ई.ऑन' के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था. इसके तहत, यूरोप को हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन की आपूर्ति की जानी थी.

इस समझौते को लेकर जर्मनी के जलवायु एवं आर्थिक मामलों के तत्कालीन मंत्री रॉबर्ट हाबेक ने कहा था, "ग्रीन हाइड्रोजन के बड़े पैमाने पर उत्पादन और परिवहन की होड़ शुरू हो गई है.” उन्होंने आगे कहा कि यह ‘बिना जीवाश्म ईंधन वाले भविष्य' की शुरुआत होगी.

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दरअसल, ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर काफी चर्चा हुई है. इसकी वजह यह है कि यह ट्रकों से लेकर लंबी दूरी की ट्रेनों तक, हर चीज को ऊर्जा प्रदान कर सकती है, रसायनों और उर्वरकों के लिए स्टॉक उपलब्ध करा सकती है, और इस्पात तथा लौह उत्पादन जैसे अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों के लिए एक संभावित समाधान के रूप में कार्य कर सकती है. जबकि, ये उद्योग पारंपरिक रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कोयला से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर हैं.

हालांकि, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया के बीच ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर हुआ यह समझौता तीन साल बाद ही रद्द हो गया. ई.ऑन ने तब से ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़े बड़े बुनियादी ढांचे में निवेश से हाथ खींच लिया है और आयात लक्ष्यों में कटौती की है.

स्पेन ने ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैंतस्वीर: Bernat Armangue/picture alliance / ASSOCIATED PRESS

ई.ऑन के प्रवक्ता अलेक्जांडर इल ने डीडब्ल्यू को बताया, "दूसरे देशों से हाइड्रोजन के आयात, हाइड्रोजन के उत्पादन और उससे जुड़ी बाकी गतिविधियों को कम प्राथमिकता दी जाएगी.”

यह सिर्फ एकमात्र संकेत नहीं है जिससे पता चलता है कि जो सोचा गया था और असल में जो हो रहा है, उसमें बहुत ज्यादा अंतर है. यूरोपीय संघ ने 2023 तक प्रति वर्ष 1 करोड़ टन नवीकरणीय हाइड्रोजन का उत्पादन और 1 करोड़ टन अतिरिक्त आयात करने की योजना बनाई थी. हालांकि, ऊर्जा अनुसंधान कंपनी ‘वेस्टवुड ग्लोबल एनर्जी' के हाइड्रोजन मैनेजर जून ससामुरा ने एक बयान में कहा कि इस दशक के अंत तक ईयू अपनी ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं से जुड़े सिर्फ 17 फीसदी लक्ष्य ही हासिल कर पाएगा.

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उन्होंने कहा, "हाइड्रोजन के क्षेत्र में यूरोप की महत्वाकांक्षा और वास्तविकता के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है.”

ग्रीन हाइड्रोजन से बड़े पैमाने पर पीछे हटने का सबसे बड़ा उदाहरण जुलाई के अंत में देखने को मिला. उस समय तेल और गैस की दिग्गज कंपनी ‘बीपी' ने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में एक अक्षय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना में अपना 36 अरब डॉलर का निवेश रद्द कर दिया.

बीपी के एक प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा, "यह फैसला बीपी की हालिया रणनीति में हुए बदलाव को दिखाता है. इसके तहत, बीपी अपने अपस्ट्रीम तेल और गैस व्यवसाय को बढ़ाएगी, अपने डाउनस्ट्रीम व्यवसाय पर ध्यान देगी, और ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव के लिए अधिक अनुशासन के साथ निवेश करेगी.”

कई देशों ने हाइड्रोजन को लेकर बड़ी योजनाएं बनाईं लेकिन ऊंची कीमतों की वजह से कई योजनाएं खटाई में पड़ गई हैंतस्वीर: DW

आखिर गड़बड़ी कहां हुई?

हाइड्रोजन ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व है. यह एक रंगहीन, गंधहीन और गैर-विषाक्त गैस है, जिसमें एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन होता है. यह बहुत ज्वलनशील भी है और प्रति किलो हाइड्रोजन में प्राकृतिक गैस की तुलना में लगभग 2.4 गुना ज्यादा ऊर्जा होती है. इसलिए, इसका उपयोग कई जगहों पर होता है.

वर्तमान में, इसका लगभग 95 फीसदी उत्पादन कोयले और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से होता है. इसे ब्लैक, ब्राउन या ग्रे हाइड्रोजन कहा जाता है.

वहीं, ग्रीन हाइड्रोजन के नाम से ही जाहिर है कि इसे अक्षय ऊर्जा से बनाया जाता है. हालांकि, इसमें हमेशा एक समस्या रही है, क्योंकि इसे बनाने में बहुत ज्यादा ग्रीन या अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए, बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन करना बहुत महंगा है.

ऑस्ट्रेलिया स्थित थिंक टैंक ‘ग्रैटन इंस्टिट्यूट' में ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन की कार्यक्रम निदेशक एलिसन रीव ने कहा, "ग्रीन हाइड्रोजन को बनाने में ज्यादातर खर्चा बिजली का होता है. हालांकि, ग्रीन बिजली यानी अक्षय ऊर्जा से हासिल की जाने वाली बिजली की लागत तेजी से कम हो रही है, लेकिन हाइड्रोजन को दूसरे ईंधनों से मुकाबला करने लायक सस्ता बनाने के लिए इसकी कीमत में काफी ज्यादा कमी की जरूरत है.”

उन्होंने बताया कि ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़ी परियोजनाओं की धीमी गति का एक मुख्य कारण घटती सरकारी सब्सिडी और समर्थन है. इस तकनीक को चलाने वाली पर्याप्त अक्षय ऊर्जा तैयार करने के लिए सरकार की मदद की जरूरत है, जो अब कम हो रही है. इसके अलावा, प्राकृतिक गैस जैसे सस्ते विकल्पों से मिल रही चुनौती भी इस क्षेत्र की मांग को और भी कम कर रही है.

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रीव ने डीडब्ल्यू को बताया कि इसका मतलब है कि शुरुआती दौर में ‘अनुमानित परियोजनाओं' पर जो काम चल रहा था उन्हें अब बंद किया जा रहा है.

इसका एक उदाहरण लक्जमबर्ग स्थित स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल है. इस कंपनी ने हाल ही में अपनी दो जर्मन स्टील इकाइयों को 2050 तक ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल करके कार्बन-न्यूट्रल बनाने की योजना को रद्द कर दिया. लागत में भारी वृद्धि के कारण कंपनी ने 1.3 अरब यूरो (1.5 अरब डॉलर) की सब्सिडी भी वापस कर दी.

फोर्टेस्क्यू मेटल्स एंड ऑपरेशंस के सीईओ डिनो ओट्रान्टो ने डीडब्ल्यू को बताया, "इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ग्रीन हाइड्रोजन का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और उसे निर्यात उत्पाद के रूप में स्थापित करना बड़ी चुनौती है. हम एक ऐसे सिस्टम में काम कर रहे हैं जहां सीमित बुनियादी ढांचा है, नीतियां स्पष्ट नहीं हैं, और नियम-कानून अभी भी बन रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, "जब तक हम कम लागत वाले और बड़े पैमाने पर बिजली के बुनियादी ढांचे में निवेश नहीं करते, तब तक हम हाइड्रोजन की पूरी क्षमता का दोहन नहीं कर पाएंगे.”

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क्या ग्रीन हाइड्रोजन का कोई भविष्य है?

स्टील बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले लौह अयस्क की दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनी फोर्टेस्क्यू अब अपने नवीकरणीय हाइड्रोजन बिजनेस को ग्रीन आयरन और अमोनिया पर केंद्रित कर रही है. अमोनिया, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन के मिश्रण से बनने वाला एक उर्वरक है.

ओट्रान्टो ने कहा, "बड़े पैमाने पर ग्रीन आयरन बनाने के लिए, ग्रीन हाइड्रोजन सबसे सही तरीका है. कोई और तकनीक कार्बन उत्सर्जन में उतनी कमी नहीं ला सकती, जितनी हमें इस समस्या से निपटने के लिए चाहिए.”

वहीं, एलिसन रीव का कहना है कि ग्रीन हाइड्रोजन शायद स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में हमेशा एक ‘खास जगह' ही ले पाएगी, यानी वह स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में हमेशा एक छोटा हिस्सा ही रहेगी.

उन्होंने कहा, "अब सीधे बिजली का इस्तेमाल करके अयस्क को पिघलाने के क्षेत्र में कुछ तरक्की हुई है, जबकि पहले इसे हाइड्रोजन में बदला जाता था.”

लंबी दूरी के परिवहन के लिए अब बैटरी एक अच्छा विकल्प बनती जा रही हैं. इसके अलावा, लंबी दूरी के जहाजों के लिए ई-मेथनॉल जैसे कई दूसरे ईंधन भी उपलब्ध हो रहे हैं.

रीव कहती हैं, "इसलिए, हाइड्रोजन की भूमिका वैसी नहीं होगी, जैसा पहले सोचा जा रहा था. यह भविष्य में हर जगह और हर काम के लिए 'एकमात्र ईंधन' नहीं होगी.”

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