चीन में पश्चिमी प्रांत शिनचियांग से धार्मिक चरमपंथ देश के दूसरे हिस्सों में फैल रहा है. चीन के अधिकारियों को कहना है कि देश को इस्लामी कट्टरपंथियों से खतरा बढ़ रहा है.
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चीन के शिनचियांग प्रांत की सीमाएं पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लगती हैं. यह इलाका चीन में रहने वाले उइगुर मुसलमानों का है. हाल के समय में वहां हमले बढ़े हैं जिनमें सैकड़ों लोग मरे गए हैं. चीन की सरकार इसके लिए धार्मिक कट्टरपंथियों को जिम्मेदार मानती है. कट्टरपंथ को रोकने और स्थिरता बनाने के नाम पर सरकार ने धार्मिक गतिविधियों पर कई तरह की बंदिशें लगाई हैं.
धार्मिक मामलों से संबंधित सरकारी प्रशासन के प्रमुख वांग चुओआन कहते हैं कि कट्टरपंथी विचारधारा अब चीन के दूसरे हिस्सों में भी फैल रही है. चीनी अखबार चाइना डेली की खबर के अनुसार उन्होंने चीनी इस्लामिक एसोसिएशन की कांग्रेस में ये बात कही. अखबार ने कट्टरपंथ के फैलने के बारे में स्पष्ट ब्यौरा तो नहीं दिया है और न ही यह बताया है कि किन प्रांतों में खासतौर से यह समस्या देखने को मिल रही है. लेकिन रिपोर्ट में वांग के हवाले से कहा है कि चीन के सरकारी इस्लामी मौलवियों को कट्टरपंथ से निपटने में सबसे अहम भूमिका अदा करनी चाहिए.
ऐसे थीं पैगंबर की बीवी, देखिए..
पैगंबर मोहम्मद की पहली बीवी खदीजा बिंत ख्वालिद की इस्लाम धर्म में महिलाओं के अधिकार तय करवाने में अहम भूमिका मानी जाती है. कई मायनों में उन्हें मुस्लिम समुदाय की पहली फेमिनिस्ट भी माना जाता है.
पिता से सीखे व्यापार के गुर
खदीजा के पिता मक्का के रहने वाले एक सफल व्यापारी थे. कुराइश कबीले के पुरुष प्रधान समाज में खदीजा को हुनर, ईमानदारी और भलाई के सबक अपने पिता से मिले. उनके पिता फर्नीचर से लेकर बर्तनों और रेशम तक का व्यापार करते थे. उनका कारोबार उस समय के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों मक्का से लेकर सीरिया और यमन तक फैला था.
आजादख्याल और साहसी
खदीजा की शादी पैगंबर मोहम्मद से पहले भी दो बार हो चुकी थी. उनके कई बच्चे भी थे. दूसरी बार विधवा होने के बाद वे अपना जीवनसाथी चुनने में बहुत सावधानी बरतना चाहती थीं और तब तक अकेले ही बच्चों की परवरिश करती रहीं. इस बीच वे एक बेहद सफल व्यवसायी बन चुकी थीं, जिसका नाम दूर दूर तक फैला.
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ना उम्र की सीमा हो
पैगंबर मोहम्मद से शादी के वक्त खदीजा की उम्र 40 थी तो वहीं मोहम्मद की मात्र 25 थी. पैगंबर मोहम्मद को उन्होंने खुद शादी के लिए संदेश भिजवाया था और फिर शादी के बाद 25 सालों तक दोनों केवल एक दूसरे के ही साथ रहे. खदीजा की मौत के बाद पैगंबर मोहम्मद ने 10 और शादियां कीं. आखिरी बीवी आयशा को तब जलन होती थी जब वे सालों बाद तक अपनी मरहूम बीवी खदीजा को याद किया करते.
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आदर्श पत्नी, प्रेम की मूरत
अपनी शादी के 25 सालों में पैगंबर मोहम्मद और खदीजा ने एक दूसरे से गहरा प्यार किया. तब ज्यादातर शादियां जरूरत से की जाती थीं लेकिन माना जाता है कि हजरत खदीजा को पैगंबर से प्यार हो गया था और तभी उन्होंने शादी का मन बनाया. जीवन भर पैगंबर पर भरोसा रखने वाली खदीजा ने मुश्किल से मुश्किल वक्त में उनका पूरा साथ दिया. कहते हैं कि उनके साथ के दौरान ही पैगंबर पर अल्लाह ने पहली बार खुलासा किया.
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पहले मुसलमान
हजरत खदीजा को इस्लाम में विश्वास करने वालों की मां का दर्जा मिला हुआ है. वह पहली इंसान थीं जिन्होंने मोहम्मद को ईश्वर के आखिरी पैगंबर के रूप में स्वीकारा और जिन पर सबसे पहले कुरान नाजिल हुई. माना जाता है कि उन्हें खुद अल्लाह और उसके फरिश्ते गाब्रियाल ने आशीर्वाद दिया. अपनी सारी दौलत की वसीयत कर उन्होंने इस्लाम की स्थापना में पैगंबर मोहम्मद की मदद की.
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गरीबों की मददगार
अपने व्यापार से हुई कमाई को हजरत खदीजा गरीब, अनाथ, विधवा और बीमारों में बांटा करतीं. उन्होंने अनगिनत गरीब लड़कियों की शादी का खर्च भी उठाया और इस तरह एक बेहद नेक और सबकी मदद करने वाली महिला के रूप में इस्लाम ही नहीं पूरे विश्व के इतिहास में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा.
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वांग ने कहा, "हमें मुसलमानों को बताना होगा कि कानूनी और गैरकानूनी धार्मिक गतिविधियों की सीमाएं क्या हैं, ताकि वो गैर कानूनी गतिविधियों को ना कह सकें." वांग ने कहा कि चीन की सरकार को इस्लाम के मजबूत होते मैनहुआन पंथ की समस्या से भी ठीक से निपटना होगा. धार्मिक मामलों से जुड़े प्रशासन की वेबसाइट पर मैनहुआन को चीनी तर्ज का एक सूफीज्म बताया गया है.
चीन में मुसलमानों की आबादी 2.1 करोड़ है, उनमें से एक वर्ग उइगुर मुसलमानों का है. हुई समेत अन्य मुसलमान समूह देश के दूसरे हिस्सों में रहते हैं. पश्चिमी क्षेत्र निंगशिया और दक्षिण पश्चिमी युन्नान प्रांत में कई मुसलमान समूह रहते हैं. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने देश के मुसलमानों से कहा है कि वे गैर कानूनी धार्मिक "घुसपैठ" से दूर रहें.
देखिए एक छत के नीचे तीन धर्म
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक प्रोजेक्ट के जरिए तीन धर्मों को एक छत के नीचे एक किया जा रहा है. यहां मुसलमान, कैथोलिक और यहूदी धर्मावलम्बी एक ही जगह प्रार्थना कर सकेंगे. यह प्रार्थनागृह आम लोगों के चंदे से बनेगा.
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एक छत के नीचे
बर्लिन में जल्द ही एक ऐसी जगह होगी जहां तीन धर्मों के लोग एक ही छत के नीचे प्रार्थना और ईश वंदना कर सकेंगे. यह प्रार्थना भवन तीन अब्राहमी धर्मों इस्लाम, ईसाइयत और यहूदियों को एक साथ लाएगा.
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तीन की पहल
हाउस ऑफ वन के विचार को पास्टर ग्रेगोर होबैर्ग, रब्बी तोविया बेन-चोरिन और इमाम कादिर सांची अमली जामा पहना रहे हैं. कादिर सांची का कहना है कि तीनों धर्म अलग अलग रास्ता लेते हैं लेकिन लक्ष्य एक ही है.
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इतिहास वाली जगह
जहां इस समय साझा प्रार्थना भवन बन रहा है वहां पहले सेंट पेट्री चर्च था जिसे शीतयुद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया. आर्किटेक्ट ब्यूरो कुइन मालवेजी ने हाउस ऑफ वन बनाने के लिए चर्च के फाउंडेशन का इस्तेमाल किया है.
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शुरुआती संदेह
शुरू में कोई मुस्लिम संगठन इस प्रोजेक्ट में शामिल नहीं होना चाहता था. बाद में तुर्की के मॉडरेट मुसलमानों का संगठन एफआईडी राजी हो गया. उन्हें दूसरे इस्लामी संगठनों के उपहास का निशाना बनना पड़ा.
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आलोचना का निशाना
इस प्रोजेक्ट को नियमित रूप से आलोचना का निशाना बनाया गया है. कैथोलिक गिरजे के प्रमुख प्रतिनिधि मार्टिन मोजेबाख को शिकायत है कि इमारत की वास्तुकला इसकी धार्मिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करती.
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चंदे पर भरोसा
हाउस ऑफ वन प्रोजेक्ट के संचालक इसके विकास में आम लोगों की भूमिका के महत्व से वाकिफ हैं. इसलिए वे चंदे पर भरोसा कर रहे हैं. इमारत बनाने में 43.5 लाख ईंटें लगेंगी. हर कोई इन्हें खरीद सकता है.
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शांति की कोशिश
इस प्रोजेक्ट के कर्णधारों की उम्मीद है कि नई इमारत तीनों धर्मों के लोगों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान का केंद्र बनेगी और इसकी वजह से पारस्परिक आदर पैदा होगा. पड़ोसी के बारे में जानना उन्हें करीब लाता है.
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अब कट्टरपंथी हमले शिनचियांग के अलावा दूसरे प्रांतों में भी देखने को मिल रहे हैं. मार्च 2014 में युन्नान हुए चाकू हमले में 30 से ज्यादा लोग मारे गए थे. मानवाधिकार समूहों का कहना है कि शिनचियांग में अशांति स्थानीय कारणों से होती है. इनमें जातीय हिंसा और तुर्क जुबान बोलने वाले उइगुर लोगों के धार्मिक और आर्थिक उत्पीड़न भी शामिल है.
दूसरी तरफ, चीन की सरकार इन आरोपों से बराबर इनकार करती है कि वह शिनचियांग या देश के अन्य किसी हिस्से में अल्पसंख्यकों के साथ किसी तरह का भेदभाव करती है. चीन आधिकारिक रूप से एक नास्तिक देश है. लेकिन हाल के दिनों में वहां कई धार्मिक समूह उभरे हैं. ऐसे में, चीनी लोग सिर्फ उन्हीं धार्मिक समूहों का हिस्सा बन सकते हैं, जिनकी बराबर निगरानी सरकार करती है.