पिछला महीना अब तक के रिकॉर्ड का सबसे गर्म जनवरी का महीना था. ला नीना प्रभाव की वजह से वैश्विक तापमान में कमी आने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्या जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसा हो रहा है?
अब तक के दशकों में, वैश्विक औसत तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई हैतस्वीर: Tyson Paul/Loop Images/picture alliance
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तापमान में बढ़ोतरी का सिलसिला पिछले महीने भी जारी रहा. जनवरी में वैश्विक तापमान, औद्योगिक युग की शुरुआत से पहले के स्तर से 1.75 डिग्री सेल्सियस अधिक था. यूरोप की जलवायु निगरानी करने वाली संस्था ‘कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' (सी3एस) ने यह जानकारी दी है.
पिछले महीने प्रकाशित हुई उनकी ‘ग्लोबल क्लाइमेट हाइलाइट्स' रिपोर्ट में बताया गया था कि 2024 अब तक के रिकॉर्ड का सबसे गर्म साल था. पिछले साल, पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में तापमान 1.6 डिग्री सेल्यिस अधिक था. उससे पहले तक 2023 सबसे गर्म साल था.
क्या टूट गया है पेरिस समझौता
साल 2015 में पेरिस में हुए अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन में विश्व के 196 नेताओं ने सहमति जताई थी कि ग्लोबल वॉर्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं होने देंगे और वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के लिए प्रयास करते रहेंगे.
बढ़ते वैश्विक तापमान का असर भारत में भी देखा जा रहा हैतस्वीर: Money Sharma/AFP via Getty Images
सी3एस की उपनिदेशक समांथा बर्जेस ने डीडब्ल्यू से कहा कि दुनिया अब 1.5 डिग्री के स्तर को पार करने की कगार पर है. उन्होंने कहा, "पिछले दो सालों के औसत तापमान ने पहले ही सीमा को पार कर दिया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पेरिस समझौता टूट गया है क्योंकि समझौते के तहत दशकों के तापमान का औसत निकाला जाता है, ना कि अलग-अलग सालों का.”
हालांकि, उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यह बढ़ोतरी दिखाती है कि हम किस ओर जा रहे हैं. उन्होंने कहा, "जलवायु प्रणाली की हमारी समझ कहती है कि वातावरण जितना गर्म होगा, खतनाक चरम मौसमी घटनाओं के होने की आशंका उतनी ही बढ़ जाएगी. यही असल में लोगों और ईकोसिस्टमों को प्रभावित करता है.”
साल 2024 में गर्मी, बाढ़, जंगल की आग जैसी चरम मौसम की घटनाओं ने कई देशों को हिलाकर रख दिया. मौसमी घटनाओं ने न केवल जीवन बल्कि आजीविका को भी प्रभावित किया.
तस्वीर: Nacho Doce/REUTERS
पानी के लिए जद्दोजहद
यूएन के मुताबिक दुनिया भर में दो अरब से ज्यादा लोगों के पास सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल उपलब्ध नहीं है, जो कई जगहों पर एक भयावह सच्चाई है. ब्राजील में कुछ निवासियों ने पहाड़ से नीचे आने वाले पानी को इकट्ठा किया, जबकि भारत में लोगों ने पीने के पानी के लिए टैंकरों का सहारा लिया.
तस्वीर: Aijaz Rahi/AP Photo/picture alliance
बार-बार की समस्या, बाढ़
भारत से लेकर केन्या तक भारी बारिश के बाद आने वाली बाढ़ से आम जीवन को प्रभावित. भारत के असम जैसे राज्य में बाढ़ के कारण हर साल हजारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ता है. भारतीय शहरों ने भी बाढ़ का सामना किया.
तस्वीर: Sri Loganathan/ZUMA/picture alliance
चिल-चिलाती गर्मी
मेक्सिको से लेकर पाकिस्तान और उससे भी आगे, उच्च तापमान ने लोगों को बहुत परेशान किया. जैसे सऊदी अरब में, जहां हज के दौरान गर्मी से संबंधित बीमारियों ने 1,300 से अधिक लोगों की जान ले ली.
तस्वीर: FADEL SENNA/AFP/Getty Images
जंगल की आग
बढ़ते तापमान और लंबे समय तक सूखे के कारण जंगल में आग लगने की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है. लगातार सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली जगहों में से एक है अमेरिका का कैलिफोर्निया राज्य. इस साल भी कोई अपवाद नहीं रहा. जंगल में लगी आग ने 10 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन को खाक कर दिया.
तस्वीर: FRED GREAVES/REUTERS
तूफान का कहर
दुनिया भर में कई तूफानों ने अपना शक्तिशाली रूप दिखाया. तेज हवाओं के कारण मकान तबाह हुए. लोगों को चक्रवात के कारण अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.
तस्वीर: Jonathan Drake/REUTERS
जहां नहीं सोचा गया
यूरोपीय देशों में चरम मौसम का कहर देखने को मिला. कभी गर्मी तो कभी तेज बारिश के बाद बाढ़ ने लोगों को बेहाल किया. स्पेन के वेलेंसिया प्रांत में मूसलाधार बारिश के बाद आई भीषण बाढ़ ने 200 से अधिक लोगों की जान ले ली और कई मकान नष्ट हो गए. 2021 के बाद यह पहला मौका है जब बाढ़ ने यूरोप में इतने बड़े पैमाने पर लोगों की जान ली हो. 2021 में जर्मनी में 185 लोग बाढ़ की चपेट में आकर मारे गए थे.
तस्वीर: Emilio Morenatti/AP/dpa/picture alliance
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बढ़ते तापमान से कैसे प्रभावित होता है मौसम
अब तक के दशकों में, वैश्विक औसत तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है. इस बढ़ोतरी की वजह से कई चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिली हैं. ‘वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन' नाम की संस्था जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम के बीच के संबंध का अध्ययन करती है. इसके वैज्ञानिकों ने पिछले साल हुई ऐसी 26 घटनाओं का पता लगाया है जो बढ़ते तापमान की वजह से हुईं या तापमान की वजह से उन घटनाओं की गंभीरता बढ़ी.
उद्योग, परिवहन और हीटिंग जैसी गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है. यह ग्लोबल वॉर्मिंग की एक मुख्य वजह है. हालांकि, सी3एस के वैज्ञानिकों के मुताबिक, पिछले दो सालों में अल नीनो जैसे प्राकृतिक कारकों ने भी तापमान को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई है.
बढ़ती गर्मी की वजह से जानवरों को भी परेशानी होती हैतस्वीर: Sunil Ghosh /Hindustan Times/picture alliance / Sipa USA
महासागर भी हो रहे हैं गर्म
अल नीनो की स्थिति आमतौर पर हर दो से सात साल बाद बनती है. इसकी वजह से मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर गर्म हो जाता है और समुद्र की सतह का औसत तापमान बढ़ जाता है. अल नीनो की वजह से महासागरों की सतह के औसत तापमान में साल 1991-2020 के औसत की तुलना में 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी देखी गई.
वैज्ञानिकों के लिए यह काफी चिंता वाली बात है क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग से जुड़ी लगभग 90 फीसदी हीट को महासागर ही स्टोर करके रखते हैं. जलवायु वैज्ञानिक ब्रेंडा ऐकवुर्जल कहती हैं, "महासागरों ने पिछले 50 या 70 सालों से एक बफर जोन का काम किया है. हम उस बफर की क्षमता को पार कर रहे हैं और धरती पर चरम मौसमी घटनाओं के रूप में उसका असर भी देख रहे हैं.”
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जलवायु परिवर्तन है असली समस्या
तमाम चिंताओं के बावजूद, वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है. अमेरिका की ग्रीनपीस एनजीओ के वरिष्ठ सदस्य जॉन नोएल जीवाश्म ईंधन कंपनियों के अधिकायों और उनके राजनीतिक सहयोगियों को तापमान बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार मानते हैं.
उन्होंने एक बयान में कहा, "हमें कॉर्पोरेट के इस खतरनाक भ्रम को तोड़ना होगा कि नुकसान झेले बिना जीवाश्म ईंधन का विस्तार जारी रह सकता है. इसके बजाय हमें जीरो-कार्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने पर ध्यान देना चाहिए जो हम सभी के सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी है.”
2023 अब तक का सबसे गर्म साल रहा. वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि इन 365 दिनों में ग्लोबल वॉर्मिंग 1.48 डिग्री सेल्सियस के स्केल तक पहुंच गई. लेकिन क्या हालात इतने पर ही सिमट जाएंगे? और ऐसी चरम गर्मी का हम पर क्या असर होगा?
तस्वीर: FABRICE COFFRINI/AFP
कितना गर्म था 2023
साबित हो चुका है कि 2023 हमारी जानकारी में अब तक का सबसे गर्म साल था. वैज्ञानिकों ने बताया कि बीते साल दुनिया का औसत तापमान, गर्मी के मौजूदा कीर्तिमानों से करीब 0.25 डिग्री ज्यादा रहा. ये बात खुद ही बेहद डरावनी है, लेकिन वैज्ञानिकों की एक और बड़ी चिंता है. तस्वीर में: लहरों के साथ बहकर आई एक जेलीफिश. जुलाई 2023 में भूमध्यसागर में रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया.
तस्वीर: JOSE JORDAN/AFP
जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बढ़ने का डर
कई वैज्ञानिकों ने समाचार एजेंसी एपी को बताया कि उन्हें जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और बढ़ने का डर है. हम अभी ही डेढ़ डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के मुहाने पर हैं. पेरिस जलवायु समझौते में शामिल देशों को उम्मीद थी कि अगर हम इतनी वृद्धि तक सीमित रहें, तो बड़ी कामयाबी होगी. तस्वीर: फरवरी 2023 में गर्म लहर से चिली का बुरा हाल था. बेतहाशा गर्मी के बीच सैकड़ों जगहों पर जंगल में आग लग गई.
तस्वीर: Javier Torres/AFP
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो का असर?
वैज्ञानिकों का कहना है कि बीते साल जलवायु का बर्ताव बहुत अजीब था. वो पसोपेश में हैं कि क्या इसकी वजह इंसानी गतिविधियों के कारण हो रहा क्लाइमेट चेंज और अल नीनो का मिला-जुला असर है. या फिर इसके पीछे कोई ज्यादा सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जो या तो शुरू हो चुकी है या होने वाली है. मसलन, यह थिअरी कि ग्लोबल वॉर्मिंग हमारी समझ से भी ज्यादा तेजी से हो रही है. तस्वीर: इटली में मिलान के पास नदी का सूखा किनारा
तस्वीर: Antonio Calanni/AP Photo/picture alliance
क्या है अल नीनो?
इसका संकेत हमें इस साल बसंत या गर्मी की शुरुआत तक मिल जाएगा, चूंकि इसी दौरान अल नीनो का असर कमजोर होने की उम्मीद है. अल नीनो, जलवायु का एक चक्र है. इस दौरान प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. यह दो से सात साल की अवधि में लौटता है. इसका असर समुद्र के तापमान, लहरों की रफ्तार और ताकत, तटीय इलाकों में मछलियों की मौजूदगी और मौसम पर पड़ता है. तस्वीर: ब्राजील की पिरान्हा झील
तस्वीर: BRUNO KELLY/REUTERS
बस अल नीनो नहीं है जिम्मेदार
तो अगर 2023 की तरह इस साल भी समुद्र का तापमान ज्यादा रहा और इस बार भी रिकॉर्डतोड़ गर्मी पड़ी, तो यह अच्छा संकेत नहीं होगा. हालांकि 2023 के इतना भीषण गर्म होने की वजह बस अल नीनो नहीं है. जीवाश्म ईंधनों से निकली ग्रीनहाउस गैसें सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं. तस्वीर: रोम के चिड़ियाघर में चिलचिलाती गर्मी से राहत पाने के लिए ठंडा खरबूज खाते मीरकैट्स
तस्वीर: Yara Nardi/REUTERS
मौसम के स्वभाव में फर्क दिखा
लेकिन गर्मी की इस तस्वीर में एक पेचीदगी है. आमतौर पर औसत तापमान का अंतर सर्दी और बसंत में ज्यादा प्रत्यक्ष दिखता है. वहीं 2023 में सबसे ज्यादा गर्मी जून के आसपास शुरू हुई और कई महीनों तक रिकॉर्ड स्तर पर रही. तस्वीर: गर्मी से झुलसाए पौधे
तस्वीर: Aventurier Patrick/ABACA/picture alliance
औद्योगिकीकरण से पहले के मुकाबले क्या स्थिति
अमेरिका के नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फैरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने बताया कि 2023 में पृथ्वी का औसत तापमान 15.8 डिग्री सेल्सियस रहा. यह 2016 में बने रिकॉर्ड से 0.15 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था. औद्योगिकीकरण से पहले के मुकाबले देखें, तो यह करीब 1.35 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि है. तस्वीर: विएना में हीट वेव के बीच पानी की बौछार में खेलते दो बच्चे
तस्वीर: GEORG HOCHMUTH/APA/AFP/Getty Images
पृथ्वी के गर्म होने की रफ्तार बढ़ी है!
एनओएए में वैश्विक निरीक्षण के प्रमुख रस वोसे ने एपी से बातचीत में कहा कि वह पृथ्वी के गर्म होने की रफ्तार में इजाफा देख रहे हैं. पिछले साल की स्थितियों पर वोसे कहते हैं कि यह ऐसा था मानो हम अचानक ही सामान्य ग्लोबल वॉर्मिंग की सीढ़ी से थोड़े ज्यादा गर्म हिस्से में कूद गए हों. तस्वीर: ऑस्ट्रेलिया में गर्म लहर के बीच नदी की सतह पर बहती मरी मछलियां.
तस्वीर: Australian Broadcasting Corporation via AP/picture alliance
कई दहलीजें पार हुईं
2023 में गर्मी की कई दहलीजें पार हुईं. वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान से ज्यादा गर्मी बढ़ी. 17 नवंबर को पहली बार पृथ्वी का तापमान अस्थायी तौर पर दुनिया के औसत तापमान के मुकाबले दो डिग्री सेल्सियस की वॉर्मिंग लिमिट के पार गया. जून से दिसंबर के बीच हर महीना रिकॉर्ड स्तर पर गर्म रहा. तस्वीर: लद्दाख में सिकुड़ते ग्लेशियर.
तस्वीर: Sā Ladakh
इतनी तेजी से बन रहे हैं नए रिकॉर्ड
नासा और एनओएए, दोनों के मुताबिक 2014 से 2023 के दरमियान 10 साल सबसे गर्म रहे हैं. पिछले आठ साल में तीसरी बार वैश्विक गर्मी का नया रिकॉर्ड सेट हुआ. वैज्ञानिक कहते हैं कि कीर्तिमानों का इतनी जल्दी-जल्दी टूटना ज्यादा बड़ी चिंता है. जलवायु में लगातार हो रहा बदलाव और इसकी तीव्रता सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात है. तस्वीर: फ्रांस में सूखे की गंभीर स्थिति थी. फोटो में नदी का सूखा बहाव दिख रहा है.
कई जलवायु वैज्ञानिकों को अब ग्लोबल वॉर्मिंग के डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य में ज्यादा उम्मीद नहीं दिखती. वो चेताते हैं कि अब ये लक्ष्य सच्चाई के करीब नहीं लगता. हालांकि वो यह भी कहते हैं कि तकनीकी तौर पर इसे हासिल करना भले मुमकिन हो, लेकिन राजनैतिक तौर पर यह नामुमकिन है.
तस्वीर: DAVE HUNT/AAP/IMAGO
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बर्जेस कहती हैं कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए जाते हैं तो औसत तापमान में बदलाव को डेढ़ डिग्री सेल्सियस के भीतर रखना मुश्किल होगा. हालांकि, वह यह भी कहती हैं कि दुनिया को इन लक्ष्यों को छोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि डिग्री का हर एक अंश मायने रखता है.
वह अंत में कहती हैं, "जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य की समस्या नहीं है, जिसका हमें या हमारी आने वाली पीढ़ियों को सामना करना होगा बल्कि इस समस्या के बारे में हमें अभी बात करने की जरूरत है. हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि हम जिसे भी वोट दें, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम करे जिससे हम भविष्य में जलवायु परिवर्तन को कम कर सकें और मौजूदा जलवायु के हिसाब से ढल सकें.”