ट्रंप मार्को रूबियो के साथ ज्यादा सहज नजर आते हैं लेकिन रूबियो ऐसा इशारा दे चुके हैं कि वो मैदान में तभी आएंगे, जब जेडी वैंस वहां नहीं होंगे. दोनों का राजनीतिक भविष्य तय करने में ईरान युद्ध भी अहम भूमिका निभाएगा.
जेडी वैंस और मार्को रूबियो, फिलहाल अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के बाद रिपब्लिकन पार्टी के दो सबसे मशहूर चेहरे हैंतस्वीर: Brendan Smialowski/AFP
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यह लगभग तय माना जा रहा है कि ईरान युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की विरासत में अहम रोल निभाएगा. लेकिन उनकी टीम के दो अहम चेहरों, उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेश मंत्री मार्को रूबियो की राजनीतिक किस्मत भी इसी संघर्ष से जुड़ती नजर आ रही है. दोनों राष्ट्रपति ट्रंप के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जा रहे हैं. यही वजह है कि ईरान पर कूटनीतिक बातचीत के केंद्र में भी यही दोनों हैं. रिपब्लिकन पार्टी पहले से ही ट्रंप के बाद के दौर की चर्चा में जुट गई है.
अभी रिपब्लिकन पार्टी का मूड भांपने वाले एक पोल में तो जेडी वैंस को ही बढ़त मिली. कंजर्वेटिव पॉलिटिकल एक्शन कॉन्फ्रेंस के इस पोल में शामिल 1600 लोगों में से 53 फीसदी ने अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर जेडी वैंस को समर्थन दिया. मार्को रूबियो इस मामले में दूसरे पायदान पर रहे. 35 फीसदी लोगों ने उनका समर्थन किया. हालांकि अभी राष्ट्रपति चुनावों में दो साल से ज्यादा का समय है. माना जा रहा है कि ईरान युद्ध का निष्कर्ष इन दो सालों में रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक को काफी प्रभावित करेगा.
जेडी वैंस फिलहाल ईरान युद्ध को लेकर बेहद सतर्क रुख अपना रहे हैं. वे लंबे समय से विदेशी सैन्य हस्तक्षेपों को लेकर संशय दिखाते रहे हैं और यही सोच उनकी हालिया टिप्पणियों में भी झलकती है. दूसरी ओर रूबियो खुलकर ट्रंप की रणनीति का बचाव कर रहे हैं और खुद को सरकारी कैंपेनिंग का सबसे मुखर चेहरा बना चुके हैं. ट्रंप की ओर से दोनों को ही ईरान पर दबाव बढ़ाने वाली कोशिशों का हिस्सा बताया है. इन कोशिशों की तरह ट्रंप ईरान से उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम खत्म करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल यातायात खोलने की मांग कर चुके हैं.
खाड़ी देशों के दुबई जैसे शानदार शहर कभी लग्जरी और सुरक्षा की मिसाल हुआ करते थे. आज मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ने के बाद से वहां पर्यटन तो ठप हुआ ही है, इसकी साख भी दांव पर है.
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सब पड़ा है खाली
आम दिनों में दुबई के अल-सीफ बाजार में पर्यटकों का तांता लगा होता था लेकिन आज पूरा बाजार सुनसान है. अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर हमला करने के बाद से बाजार का नजारा बिल्कुल उलट गया है.
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अमीरों की दुनिया
पिछले कई दशकों से दुबई के लिए एक बात कही जाती थी कि यह अमीरों की दुनिया है. दुनिया भर में कहीं किसी भी तरह का संघर्ष हो रहा हो, अमीरात की सीमाओं तक आते-आते सब थम जाता है. इस बार यह धारणा गलत साबित हुई. ईरान के जवाबी हमलों की चपेट में इस बार खाड़ी देश भी आ गए हैं, जिसने विदेशियों को यह क्षेत्र छोड़ के जाने के लिए मजबूर कर दिया है.
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हवाई अड्डे पर हमला
28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध शुरू होने के बाद से कई खाड़ी देशों ने लगातार अपने इलाके में मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. इस हमले में दुबई हवाई अड्डे के आस-पास कई ईंधन डिपो, अमेरिकी दूतावास और होटलों जैसे नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया.
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हवाई उड़ानें रद्द
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए दुबई हवाई अड्डा इस क्षेत्र के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है लेकिन यात्री विमानों की उड़ानें लगातार रद्द हो रही हैं. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों के बीच युद्ध की शुरुआत से ही इलाके के कई हवाई अड्डे आंशिक या सीमित क्षमता के साथ काम करने को मजबूर हैं.
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खाली पड़े समुद्री किनारे
दुबई के ब्रांड न्यू लग्जरी होटल जुमेराह मरसा अल अरब के समुद्री किनारे पर समुद्री पक्षियों के अलावा कोई नहीं है. विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के अनुसार पर्यटन में आई भारी गिरावट के कारण खाड़ी देशों को कम से कम 60 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है. साल 2025 में पर्यटन संयुक्त अरब अमीरात की जीडीपी का लगभग 12 फीसदी था.
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साख है दांव पर
दुबई के प्रमुख पर्यटन बाजार अल-सीफ के इस दुकानदार के लिए भी यह एक बड़ा झटका है. होटल, रेस्तरां और दुकान सभी इससे प्रभावित हुए हैं. ईरान के साथ छिड़ा युद्ध न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायी है बल्कि क्षेत्र की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है.
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कुछ सुरक्षित नहीं
अंतरराष्ट्रीय असमंजस के बीच पिछले कई सालों से खाड़ी देश खासकर दुबई खुद को निवेशकों और व्यवसायों के सामने एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था. केवल 2025 में ही लगभग 9,800 करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात में आकर बसे, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है.
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बंजर पड़े शहर
दुबई की गिनती दुनिया के सबसे अमीरों शहरों में की जाती है. टैक्स में भारी छूट, व्यवस्थित नौकरशाही और ‘गोल्डन वीजा प्रोग्राम’ ने इसे अमीरों और व्यवसायों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया था. कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली जुमैरा बीच रेजिडेंस की सड़कें आज वीरान हैं.
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आर्थिक मॉडल संकट में
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध कितना लंबा चलता है, इस बार निर्भर करेगा कि देश की प्रतिष्ठा को कितना नुकसान पहुंचा है और निवेशक कितनी गति से पैसा खीचेंगे. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टिट्यूट के जिम क्रेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “दुबई का आर्थिक मॉडल कितना संकट में है, इसे कम आंकना मुश्किल है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैकल्पिक स्थानों की खोज उतनी ही तेज होगी.”
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‘पर्यटकों की याददाश्त कमजोर’
कुछ लोगों का मानना है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. जर्मन सोसाइटी फॉर टूरिज्म स्टडीज के प्रेसिडेंट युरगन श्मुडे ने जेडडीएफ को बताया, “पर्यटकों की याददाश्त कमजोर होती है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई संघर्ष या युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलता है तो पर्यटन स्थल को अधिक नुकसान नहीं पहुंचता है.
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उत्तराधिकारी तय करने में ईरान युद्ध अहम
साल 2028 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव भले ही अभी थोड़ा दूर है लेकिन डॉनल्ड ट्रंप अपने करीबी लोगों से पूछने लगे हैं कि कमान किसके हाथ देनी चाहिए, जेडी या मार्को? ट्रंप के करीबी दो लोगों ने इस बात की पुष्टि की है.
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रिपब्लिकन रणनीतिकारों का मानना है कि युद्ध का परिणाम दोनों नेताओं का भविष्य तय करने में अहम हो सकता है. अगर संघर्ष जल्दी खत्म होता है और इसे कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जाता है, तो रूबियो की छवि मजबूत हो सकती है. वहीं लंबा युद्ध वैंस को यह कहने की गुंजाइश देगा कि वे ट्रंप समर्थक मतदाताओं की एंटी‑वार भावना के ज्यादा नजदीक खड़े हैं. इसके लिए उन्हें राष्ट्रपति से खुली असहमति दिखाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी.
डॉनल्ड ट्रंप की अपनी लोकप्रियता भी दांव पर लगी है. हालिया सर्वे में उनकी रेटिंग गिरकर 36 फीसदी पर आ गई है, जो ईरान युद्ध और बढ़ती ईंधन कीमतों से जुड़ी नाराजगी का संकेत देती है. रिपब्लिकन खेमे में यह भी चर्चा है कि ट्रंप किस ओर झुक रहे हैं. कुछ को लगता है कि राष्ट्रपति रूबियो के साथ ज्यादा सहज दिखते हैं, हालांकि ट्रंप के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे अचानक फैसले बदल लेते हैं.
सिलेंडर के बाद अब खाने पर भी संकट
07:24
अन्य दावेदारों का भी हो सकता है उभार
जेडी वैंस और मार्को रूबियो दोनों की राजनीतिक यात्रा भी दिलचस्प है. वैंस, जो कभी खुद को ‘नेवर‑ट्रंप' कहते थे, अब उपराष्ट्रपति हैं और ईरान मुद्दे पर ट्रंप की लाइन का समर्थन कर रहे हैं. प्रशासन का कहना है कि दोनों के बीच किसी तरह का टकराव नहीं है और वैंस की संशयपूर्ण सोच राष्ट्रपति को उस हिस्से की नब्ज समझने में मदद करती है जो युद्ध से बचे रहना चाहता है.
वहीं रूबियो की तरफ से भी यह संदेश दिया गया है कि वे 2028 में तभी राजनीतिक मैदान में उतरेंगे जब वैंस नहीं उतरते. लेकिन युद्ध अगर लंबा खिंचता है या वैंस पर दबाव बढ़ता है, तो रिपब्लिकन दावेदारों की कतार और लंबी हो सकती है. बहरहाल, ट्रंप ने दोनों के एक साथ चुनाव लड़ने का आइडिया भी सामने रखा है, यह कहते हुए कि ऐसी जोड़ी को हराना मुश्किल होगा.
फैसला जो भी हो, यह साफ है कि ईरान युद्ध अब सिर्फ विदेश नीति का मसला नहीं रहा. यह रिपब्लिकन पार्टी की अगली पीढ़ी की राजनीति तय करने वाला मोड़ बन चुका है.