सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर फिर उठे सवाल
२९ अगस्त २०२५
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हस्ताक्षर के बाद आज पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली और मुंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे की सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्ति हो गई. इन दोनों जजों की नियुक्ति के साथ सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या पूरी हो गई यानी सुप्रीम कोर्ट में अब कुल जजों की संख्या 34 हो गई जिनमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं.
लेकिन इस नियुक्ति पर एक बड़ा विवाद भी सामने आ गया. कॉलेजियम में दोनों जजों की नियुक्ति के बारे 4:1 के बहुमत से प्रस्ताव पारित किया गया था. कॉलेजियम की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना इससे सहमत नहीं थीं और उन्होंने असहमति का नोट दिया था. उनका कहना था कि जस्टिस पंचोली वरिष्ठता क्रम में काफी नीचे हैं और दूसरी बात ये कि वो गुजरात हाईकोर्ट के हैं और सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही गुजरात के दो जज हैं. तीसरा जज लाने से क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ेगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में कई राज्यों का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है.
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जस्टिस नागरत्ना की आपत्ति थी कि ऐसी नियुक्ति न्याय प्रशासन के लिए विपरीत असर डालेगी और कॉलेजियम सिस्टम की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में होगी. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जस्टिस पंचोली मौजूदा जजों की अखिल भारतीय वरिष्ठता सूची में 57वें नंबर पर हैं, और उनकी सिफारिश करते वक्त कई प्रतिभाशाली और वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज किया गया.
सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश करने वाले 5 जजों के कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस जेके महेश्वरी और बीवी नागरत्ना शामिल हैं.
कॉलेजियम के फैसले पर सवाल
इस मामले में विवाद तब बढ़ गया जब जस्टिस बीवी नागरत्ना के असहमति नोट को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया. यह पहली बार था जब जस्टिस नागरत्ना ने कोई असहमति नोट लिखा था.
कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स, सीजेएआर नामक गैर सरकारी संस्था सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए गए कॉलेजियम के बयान को निराशाजनक बताया है. संस्था का कहना है कि इसमें उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि का विवरण नहीं है, जबकि पहले ऐसा हुआ करता था. इसके अलावा कॉलेजियम कोरम का भी जिक्र नहीं है और न ही यह बताया गया है कि वरिष्ठता में नीचे होने के बावजूद जस्टिस पंचोली को वरीयता क्यों दी गई.
सीजेएआर ने जस्टिस नागरत्ना के असहमति नोट को प्रकाशित करने की मांग की है.
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सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कॉलेजियम की सिफारिश पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पदोन्नति में तीन महिला जजों की अनदेखी क्यों की गई. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "जस्टिस विपुल पंचोली से सीनियर कई जज हैं जिनमें कम से कम तीन महिला सीनियर जज हैं- गुजरात हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल, बॉम्बे हाईकोर्ट कीजस्टिस रेवती मोहिते डेरे और पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस लिसा गिल. साल 2021 में जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस बेला त्रिवेदी की नियुक्तियों के बाद एक भी महिला जज की नियुक्ति नहीं हुई, जबकि चार चीफ जस्टिस के अधीन सुप्रीम कोर्ट में 28 न्यायिक नियुक्तियां की गईं.”
सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा समय में सिर्फ बीवी नागरत्ना ही एकमात्र महिला जज हैं.
क्या है कॉलेजियम?
भारत में कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से बहस का विषय रही है. कॉलेजियम प्रणाली भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के मुताबिक, राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं. लेकिन राष्ट्रपति यह नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की सिफारिश पर करते हैं. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के मामले में संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की परामर्श ली जाती है.
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लेकिन 1993 के दूसरे जजेज केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था कर दी कि यह परामर्श केवल सलाह नहीं बल्कि बाध्यकारी होगी. इसके बाद जजों की नियुक्ति के बारे में अंतिम राय देने के लिए मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम न्यायाधीशों की एक समिति का प्रावधान किया गया, जिसे कॉलेजियम कहा जाता है. फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश और उच्च न्यायालयों में तीन वरिष्ठतम न्यायाधीश मिलकर कॉलेजियम बनाते हैं.
कॉलेजियम पर विवाद
कॉलेजियम की व्यवस्था और कॉलेजियम के फैसलों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. सबसे बड़ा विवाद तो इसमें व्याप्त कथित ‘अंकल कल्चर' यानी भाई-भतीजावाद के आरोपों को लेकर है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील दीपक कुमार कहते हैं, "कॉलेजियम में अक्सर ऐसे लोगों को जज चुने जाने की संभावना ज्यादा होती है तो जजों के परिवार के होते हैं, पहचान के होते हैं या फिर बड़े वकीलों के परिवार से आते हैं. ऐसे में पारदर्शिता को लेकर तो सवाल उठते ही रहेंगे.”
कॉलेजियम बहुत पुराना सिस्टम नहीं है और इसके अस्तित्व में आने से पहले सुप्रीम कोर्ट में कई मामले आए और फिर सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों के बाद इसकी नींव पड़ी. सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों को 'जजेज केस' के नाम से जाना जाता है.
तीन जजों के मामले
पहला केस 1981 का है जिसे एसपी गुप्ता केस नाम से भी जाना जाता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास एकाधिकार नहीं होना चाहिए. इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष रूप से इस ओर भी इशारा किया कि इस नियुक्ति में सरकार की भी भूमिका होनी चाहिए.
1993 में दूसरे केस में नौ जजों की एक बेंच ने कहा कि जजों की नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की राय को बाकी लोगों की राय के ऊपर तरजीह दी जाए.
अंत में 1998 में तीसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का आकार बड़ा करते हुए इसे पांच जजों का एक समूह बना दिया.
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लेकिन साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए सरकार बनी तो उसी साल सरकार संविधान में 99वाँ संशोधन विधेयक लेकर आई जिसे नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (एनजेएसी) कहा जाता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की जगह एक कमीशन का प्रस्ताव था जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज और दो कानूनी विशेषज्ञों को रखने का प्रावधान था.
इसके अलावा इस कानून में संसद को यह अधिकार भी दिया गया कि वह भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियम बना सकता है या उनमें फेरबदल कर सकता है.
लेकिन अक्तूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इस नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को "संविधान के आधारभूत ढांचे से छेड़छाड़" बताते हुए रद्द कर दिया.
उसके बाद कॉलेजियम व्यवस्था फिर से उसी तरह काम करने लगी और उस पर उठने वाले सवाल भी वैसे ही बने हुए हैं.