जर्मनी की बूढ़ी होती आबादी, ल्यूकेमिया के मरीजों के लिए भी चुनौती बन गई है. ल्यूकेमिया के पीड़ितों के लिए स्टेम सेल दान करने वालों का डेटाबेस तैयार करने वाली जर्मनी की एक संस्था ने इस बात की जानकारी दी है.
जर्मनी में नए, खासकर युवा स्टेम सेल दानकर्ताओं की संख्या घटती जा रही हैतस्वीर: Great Ormond Street Hospital For Children/dpa/picture alliance
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जनसांख्यिकी में हो रहे बदलावों के कारण जर्मनी में स्टेम सेल दान करने वालों की संख्या में कम होती जा रही है. इस कमी के कारण ल्यूकेमिया जैसी गंभीर बीमारी का इलाज बेहद मुश्किल होता जा रहा है. जर्मनी में स्टेम सेल दान करने वालों की उम्र 18 से 61 के बीच होनी जरूरी है. चूंकि अब बड़ी जनसंख्या ऐसे लोगों की है जो इस उम्र के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए नए दानकर्ताओं को खोजने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
जर्मनी की गैर सरकारी संस्था 'बोन मैरो डोनर फाइल' के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जर्मनी में हर बारह मिनट पर एक व्यक्ति ल्यूकेमिया का शिकार हो जाता है. संस्था के अध्यक्ष स्टेफान शूमाकर ने समाचार एजेंसी डीपीए को बताया कि ल्यूकेमिया के मरीजों के लिए स्टेम सेल उम्मीद की एकमात्र किरण होती है. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जर्मनी में हर दस में से एक मरीज को खुद के लिए स्टेम सेल मैच नहीं मिलता.
किचन में कैंसर पैदा करने वाली चीजें
हमारे किचन में कई सारी ऐसी चीजें हर समय मौजूद रहती हैं जो हमें कैंसर भी दे सकती हैं. इनके बारे में जानना बहुत जरूरी है. यहां देखिए कौन सी हैं ये चीजें.
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मसाला पैकेट
भारतीय खाना पूरे विश्व में लोकप्रिय हो चुका है. अमेरिका से लेकर सिंगापुर तक एमडीएच और एवरेस्ट जैसी कंपनियों के सारे भारतीय मसाले बिकते हैं. सिंगापुर ने इन दोनों कंपनियों के कुछ मसालों पर रोक लगा दी है. उसका कहना है कि इन मसालों में इथाइलीन ऑक्साइड नाम का कीटनाशक पाया गया. यह इंसानों में कैंसर पैदा कर सकता है.
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मैदा
मैदे में सफेदी ब्लीच की प्रक्रिया के कारण आती है. यह ब्लीच क्लोरीन गैस से की जाती है. इसी ब्लीच का इस्तेमाल तरल रूप में कपड़ों के लिए भी किया जाता है. इससे ना सिर्फ इस सफेद आटे में से सारा पोषण धुल जाता है बल्कि कैंसर का खतरा भी बढ़ता है.
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नमकीन स्नैक
बहुत ज्यादा नमक वाले स्नैक से बचना चाहिए क्योंकि इनमें कैंसर पैदा करने वाले तत्व मौजूद होते हैं. चिप्स को कुरकुरा बनाए रखने के लिए निर्माता इसमें एक्रिलामाइड मिलाते हैं जो कि सिगरेट में भी पाया जाता है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के मुताबिक एक्रिलामाइड कैंसर पैदा करने वाली चीज मानी जाती है.
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वेजिटेबल ऑयल
सूर्यमुखी से प्राप्त वेजिटेबल ऑयल को देखने में अच्छा बनाने के लिए कई बार रंगाई की प्रक्रिया से गुजारा जाता है. इस तेल में ओमेगा 6 फैटी एसिड होता है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. लेकिन अगर अत्यधिक मात्रा में इस्तेमाल किया जाए तो ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा रहता है. ये नतीजे द जर्नल ऑफ क्लीनिकल इंवेस्टिगेशन में प्रकाशित किए गए.
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कार्बोनेटेड ड्रिंक्स
कोका कोला, पेप्सी और अन्य कार्बोनेटेड ड्रिंक्स में ना सिर्फ अत्यधिक चीनी होती है बल्कि बहुत सारा सोडियम भी होता है. इसके अलावा डायट सॉफ्टड्रिंक्स और भी हानिकारक होती हैं क्योंकि उनमें कृत्रिम स्वीटनर के इस्तेमाल के कारण सोडियम की मात्रा और भी ज्यादा होती है. अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक मानव मस्तिष्क इन पेय पदार्थों के ऊपर अपनी निर्भरता विकसित कर लेता है.
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नॉन ऑर्गेनिक फल
इस तरह के फलों को पैदा करने के लिए इस्तेमाल में होने वाले पेस्टिसाइड और नाइट्रोजन फर्टिलाइजर शरीर के लिए हानिकारक हैं. न्यूकासल यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों के मुताबिक इस तरह के फलों के नियमित इस्तेमाल से कैंसर का खतरा रहता है.
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रेड मीट
हल्की फुल्की मात्रा में रेड मीट का सेवन नुकसानदेह नहीं है, लेकिन उसकी अति नुकसान पहुंचाती है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की एक स्टडी के मुताबिक रेड मीट में एक प्रकार का सिलिसिक एसिड होता है जिससे कैंसर हो सकता है.
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प्रोसेस्ड मीट
सॉसेज और कॉर्न्ड बीफ जैसी चीजें दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हैं. लेकिन इनमें नमक और प्रिजर्वेटिव बहुत बड़ी मात्रा में होते हैं. प्रोसेस्ड मीट को तैयार करने में इस्तेमाल किया जाने वाला सोडियम नाइट्राइट कैंसर पैदा कर सकता है.
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लगातार घट रही है स्टेम सेल दान करने वालों की संख्या
वक्त के साथ नए स्टेम सेल दानकर्ताओं की संख्या घटती जा रही है. 2019 में जहां संस्था के दानकर्ताओं के डेटाबेस से 66,000 लोग कम हुए थे. वहीं, आज 2025 में यह संख्या 1,50,000 तक पहुंच गई है. कोरोना महामारी से पहले संस्था ने 2019 में 6,88,000 नए दानकर्ताओं को रजिस्टर किया था. 2024 में ऐसे लोगों की संख्या घटकर 3,44,000 पर पहुंच गई.
स्टेम सेल दान करने वालों में 30 साल की उम्र के लोगों की मांग सबसे ज्यादा होती है लेकिन संस्था नए युवा दानकर्ताओं की कमी से भी जूझ रही है. युवाओं तक पहुंचने के लिए डीकेएमएस ने स्कूलों का सहारा लिया है. अब संस्था स्कूल पाठ्यक्रम के जरिए युवाओं को जागरूक कर रही है. इसके साथ ही सोशल मीडिया, स्पोर्ट्स क्लब और म्यूजिक फेस्टिवल की भी मदद ली जा रही है, जहां अमूमन युवाओं की संख्या अधिक होती है. शूमाकर का मानना है कि इन उपायों की मदद से ही वह स्टेम सेल दान करने वालों की घटती संख्या की भरपाई कर सकते हैं.
कैंसर के इलाज का रास्ता खोल सकते हैं ये रोबोट
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कोरोनो महामारी के बाद बदली स्थिति
यह समस्या सिर्फ जर्मनी ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी देखने को मिल रही है. यूके में भी स्टेम सेल दान करने वालों की संख्या में गिरावट देखी गई है. इसके साथ ही जरूरत पड़ने पर अगर डेटाबेस में मौजूद लोगों से संपर्क किया जाता है तो कई बार वे स्टेम सेल दान करने से इनकार कर देते हैं. इससे मरीज के लिए मैच खोजना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
संस्था के मुताबिक कोरोना महामारी के बाद स्थिति तेजी से बदली है. लोग स्टेम सेल दान करने को लेकर अधिक असहज हुए हैं. फिलहाल डीकेएमएस के डेटाबेस में करीब 1.25 करोड़ लोग मौजूद हैं. इनमें से 78 लाख लोग जर्मनी के हैं. संस्था ना केवल जर्मनी बल्कि भारत, यूके, अमेरिका, चिली, पोलैंड और दक्षिण अफ्रीका में भी ल्यूकेमिया के मरीजों की मदद कर रही है.