भारत सरकार के "मेक इन इंडिया" कार्यक्रम में जर्मन कंपनियों की भागीदारी आपस में सघन सहयोग की मिसाल है. जर्मनी में इसके लिए खास पहल हुई है जिसके तहत जर्मनी की छोटे स्तर की कंपनियां भारत में निवेश करेंगी.
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में हनोवर मेले के दौरान जर्मन उद्योगपतियों के सामने "मेक इन इंडिया" कार्यक्रम पेश किया था और भारत में कारोबार करने के लिए सहज और सुगम परिवेश देने करने का वादा किया था. जर्मन कंपनियों और खास कर छोटी और मझौले स्तर की कंपनियों की रुचि को देखते हुए बर्लिन में भारतीय दूतावास ने भारत सरकार के सहयोग से एक निवेश समर्थक कार्यक्रम शुरू किया. इसका नाम "मेक इन इंडिया मिटेलस्टांड (एमआईआईएम)" है और इसके तहत भारत में कारोबार और निवेश करने की इच्छा रखने वाली कंपनियों की मदद करना है.
जर्मनी में मिटेलस्टांड को आर्थिक प्रगति और रोजगार के हिसाब से बहुत अहम माना जाता है. ये आम तौर पर परिवारों द्वारा चलाई जाने वाली छोटी और मझौली कंपनियां हैं जिनका टर्नओवर 5 करोड़ यूरो तक है और 500 से कम कर्मचारी काम करते हैं. जर्मन मिटेलस्टांड में 36 लाख से ज्यादा कंपनियां हैं जो देश के सारे उद्यमों का 99.5 प्रतिशत है. इन कंपनियों में 1.64 करोड़ लोग काम करते हैं जो देश के कुल श्रमबल का 58.5 प्रतिशत है. 2014 में उन्होंने 2204 अरब यूरो का टर्नओवर किया जो जर्मनी के कुल टर्नओवर का 35 प्रतिशत था. जर्मन छोटी और मझौली कंपनियों ने 2014 में 201 अरब यूरो का निर्यात किया.
एमआईआईएम जर्मनी की छोटी और मझौली कंपनियों को आकर्षित करने के लिए समय समय पर वर्कशॉप आयोजित करता है जिसमें जर्मन कंपनियों को भारत के कारोबारी क्षेत्र में उतरने के लिए तैयार किया जाता है. इन वर्कशॉप्स में भारत की परिस्थितियों और चुनौती के बारे में जानकारी दी जाती है. एमआईआईएम पहल के तहत करीब 300 कंपनियों से संपर्क किया गया और उनमें से 72 कंपनियों की मदद की जा रही है जो भारत में निवेश करेगी और इससे में नौकरियों के नए अवसर पैदा होंगे. इससे भारत में 31 नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगेंगे, 11 परियोजनाओं का विस्तार होगा और लघु से लेकर मध्यम अवधि के दो नए पायलट प्रोजेक्ट शुरू होंगे.
मध्य युग तक काम करने को अच्छा नहीं माना जाता था. उसके बाद चर्च में सुधारों के जनक मार्टिन लूथर आए और उन्होंने काम को ईश्वरीय कर्तव्य बना दिया. अब 500 साल बाद रोबोट हमसे काम छीनने की तैयारी कर रहे हैं.
आदर्श था निकम्मा होना
प्राचीन ग्रीस के दार्शनिकों के बीच काम को निंदनीय माना जाता था. अरस्तू ने काम को आजादी विरोधी बताया तो होमर ने प्राचीन ग्रीस के कुलीनों के आलसीपने को अभीष्ठ बताया. उस जमाने में शारीरिक श्रम सिर्फ महिलाओं, मजदूरों और गुलामों का काम था.
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जश्न करने वालों को काम की जरूरत नहीं
मध्ययुग में भी हालत बेहतर नहीं हुई. उस समय काम का मतलब खेती था और खेतों में काम करना खिझाने वाला कर्तव्य था. जिसे जमींदारों की सेवा करनी थी, उसके पास कोई चारा नहीं था. जिसके पास चारा था वह कमाई की चिंता किए बिना जश्न मनाता था. साल में 100 दिन छुट्टियां होती थीं.
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काम का मतलब ईश्वर का आदेश
16वीं सदी में जर्मनी में धर्मशास्त्री मार्टिन लुथर ने अपने अभियान के तहत आलस्य को पाप घोषित कर दिया. उन्होंने लिखा कि इंसान का जन्म काम करने के लिए हुआ है. काम करना ईश्वर की सेवा भी है और कर्तव्य भी. इंगलिश नैतिकतावादी परंपरा में काम को ईश्वर का चुनाव माना गया. इससे पूंजीवाद के उदय में तेजी आई
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मशीनों की सेवा में
18वीं सदी में यूरो में औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई. आबादी बढ़ने लगी, जमीन कम पड़ने लगी. लोग देहात छोड़कर फैक्ट्रियों और आयरन फाउंड्री में काम करने आने लगे. 1850 के करीब इंगलैंड के ज्यादातर लोग दिन में 14 घंटे और हफ्ते में छह दिन काम करते थे. पगार फिर भी इतनी कम कि जीने के लिए काफी नहीं थी.
घटती कीमतें, बढ़ती मजदूरी
20वीं सदी के शुरू में अमेरिकी उद्यमी हेनरी फोर्ड ने कार उद्योग में एसेंबली लाइन प्रोडक्शन शुरू किया. इस तरह पूरे उद्योग के लिए नया पैमाना तय हुआ. इस नए प्रोडक्शन लाइन के कारण फोर्ड मॉडल टी का उत्पादन 8 गुना हो गया. कारों की कीमतें तेजी से गिरीं और फोर्ड के लिए कर्मचारियों को बेहतर मेहनताना देना संभव हुआ.
काम का नशा और काहिली का हक
कारखानों के खुलने से एक नया सामाजिक वर्ग पैदा हुआ. प्रोलेटैरियेट. इस शब्द को गढ़ने वाले दार्शनिक कार्ल मार्क्स का कहना था कि काम इंसान की पहचान है. उनके दामाद समाजवादी पॉल लाफार्ग ने 1880 में कहा, "सभी देशों के मजदूर वर्ग में एक अजीब सा नशा है. काम के लिए प्यार और थककर चूर होने तक रहने वाला नशा."
वैश्वीकृत काम की दुनिया
20वीं सदी के दौरान दुनिया के समृद्ध देशों में रोजगार मिटने लगे. उद्यमों ने उत्पादन का कम उन देशों में भेजना शुरू किया जहां मजदूर सस्ते थे. बहुत से विकासशील देशों में आज हालात ऐसे हैं जैसे यूरोप में औद्योगिकीकरण की शुरुआत में थे, सख्त शारीरिक श्रम, बाल मजदूरी, कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा का पूरी तरह अभाव.
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काम की बदलती सूरत
यूरोप में इस बीच नए रोजगार सर्विस सेक्टर में पैदा हो रहे हैं. तकनीकी और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में नई तरह के काम और रोजगार पैदा हो रहे हैं. बुजुर्गों की तादाद बढ़ने से बुजुर्गों की देशभाल करने वाले नर्सों की मांग बढ़ रही है. काम के घंटे कम हो रहे हैं. 1960 से 2010 के बीच जर्मनी में प्रति व्यक्ति काम 30 फीसदी कम हो गया है.
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फिर कभी काम न करना पड़े
ये औद्योगिक रोबोट हैं, ये हड़ताल नहीं करते, मेहनताना नहीं मांगते और एकदम सटीक तरीके से काम करते हैं. रोबोट काम की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे हैं. अमेरिकी अर्थशास्त्री जेरेमी रिफकिन का कहना है कि इस समय "तीसरी औद्योगिक क्रांति" हो रही है जो वेतन और मजदूरी वाले ज्यादातर काम को खत्म कर देगी.
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जॉब किलर रोबोट?
ये सवाल पिछले 40 साल से पूछा जा रहा है जब से हाड़ मांस के बदले लोहे और स्टील के मददगार ने कारखानों में प्रवेश किया है.लेकिन पहली बार अब विकास उस चरण में पहुंचता लग रहा है. डिजीटलाइजेशन, इंटरनेट ऑफ द थिंग्स और इंडस्ट्री 4.0 बहुत सारे रोजगार को खत्म कर देंगे और वह भी सिर्फ कारखानों में ही नहीं.
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काम की सुंदर नई दुनिया
मशीनें काम करेंगी और इंसान के पास ज्यादा अहम चीजों के लिए वक्त होगा. अरस्तू की भावना में लोगों को आजादी मिलेगी. पर्यवरण सुरक्षा, बूढ़े और बीमार लोगों की सुश्रुषा और जरूरतमंदों की मदद जैसे काम फिलहाल अवैतनिक लोग करते हैं. भविष्य में काम की नई दुनिया में कर्तव्य फिर से पेशा बन जाएगा.
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विदेशी कंपनियों के लिए भारत के बाजार सहज बनाने के लिए एमआईआईएम समय समय पर बेव सेमिनार यानी वेबीनार भी करता है, जिसमें एमआईआईएम कंपनियों के प्रतिनिधि हिस्सा लेते हैं. अब तक ऐसे पांच वेबिनार हो चुके हैं जिनमें जीएसटी, सप्लाई चेन एंड लोकेलाइजेशन और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर जैसे विषयों पर चर्चा हुई.
एमआईआईएम को जर्मन सरकार की तरफ से भी सराहना मिली है और इसे जर्मन-भारतीय व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में एक शानदार पहल बताया गया है. जर्मन के आर्थिक और ऊर्जा मंत्रालय ने कई मौके पर कहा है कि इस तरह की पहलें साफ तौर पर दिखाती हैं कि भारत की सरकार अपने यहां जर्मन कंपनियों के निवेश को सहज और आसान बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है.