वैज्ञानिक अब तक नहीं सुलझा पाए हैं स्काई डिस्क का रहस्य
महेश झा८ सितम्बर २०१६
जर्मनी के हाले शहर के म्यूजियम में एक डिस्क रखी है जिसका पता ही नहीं चल पाया है कि वह कहां से आई, क्यों बनाई गई और कब व किसने बनाई.
तस्वीर: imago/Steffen Schellhorn
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जर्मन शहर हाले के स्टेट म्यूजियम ऑफ प्रीहिस्ट्री में जर्मनी का सबसे महत्वपूर्ण आर्कियोलॉजिकल खजाना संभाल कर रखा गया है. इस संग्रह में 3600 साल पुरानी एक स्काई डिस्क है जिसके इर्द-गिर्द रहस्य का एक वातावरण है. यह डिस्क कहां से आई, किसने बनाई और क्यों बनाई? इन सवालों के जवाब वैज्ञानिक अब तक नहीं खोज पाए हैं.
हाले म्यूजियम में रखीं पुरानी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने से पहले उनका गहन परीक्षण किया जाता है और उन्हें प्रदर्शन के तैयार किया जाता है. अपने हुनर से म्यूजियम के वर्कशॉप के कारीगर प्राचीन खोजों को सहेजना जानते हैं. और सहेजने के दौरान जब चीजों के सिरे जुड़ते हैं तो कई कहानियां बनती चली जाती हैं. जैसे कि कांच के जार के कुछ टुकड़ों का ढेर मिला. यह ढेर 500 साल पुराने एक घर के सेलर में मिला था. और जब उन्हें कुशलता से एक दूसरे से जोड़ा गया तो वे एक रसायन प्रयोगशाला का सामान निकले. उन्होंने हाइनरिष वुंडरलिष के सपनों को हवा दी. रसायनविज्ञानी वुंडरलिष बताते हैं, "हमें कुछ चीजों के बाकी बचे अंश मिले, खासकर ग्लास वाले एंटीमनी कंपाउंड के रूप में. यह कंपाउंड 16वीं सदी में रसायनशास्त्रियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ करता था. इसकी वजह यह थी कि लोगों को पता चल गया था कि एंटीमनी सलफाइज से सोने की सफाई की जा सकती है."
किसने सोचा था कि कांच के सदियों पुराने टुकड़े यह बता सकते हैं कि आधुनिक चिकित्सा के जनक के रूप में अलकेमिस्ट और डॉक्टर पारासेलसुस ने किस तरह जहरीले नुस्खों से उपचार विकसित किए. वुंडरलिष बताते हैं, "पारासेलसुस की राय थी, कि इतनी कम दवा लो कि वह जहरीली न रहे, फिर वह इलाज करता है. और वह विख्यात उक्ति जो आज भी आधुनिक फार्मेसी का मूलमंत्र है, डोसिस फिएट वेनेनुम, यानि खुराक ही जहर का कारण होता है. यह उक्ति पारासेलसुस की है, जो दरअसल हेवी मेटल एंटीमनी से इलाज करने में विफलता के अनुभवों से आई."
देखिए, जब डायनासोरों का राजा पहुंचा बर्लिन
डायनासोरों का राजा पहुंचा बर्लिन
विशालता के लिए मशहूर टायरानोसॉरस रेक्स के दुनिया भर में करीब 50 पुनर्निर्मित नमूने हैं, जिनमें ज्यादातर अमेरिका में हैं. अब यूरोप के पास भी एक टी-रेक्स है. यह अगले तीन साल बर्लिन के नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में रहेगा.
तस्वीर: DW/A. Kirchhoff
भारी सर
टी-रेक्स का सर उसके 12 मीटर लंबे शरीर के लिए काफी भारी है इसलिए इसे अलग से दिखाया जाता है. थ्रीडी प्रिंटर से सर और बाकी के शरीर की एक हल्की कॉपी बनाई गई है. 1.5 मीटर लंबी खोपड़ी का करीब 98 फीसदी हिस्सा बचा कर रखा गया है.
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अमेरिका से डिलिवरी
बर्लिन के संग्रहालय के पास इसे जोड़ने के लिए सिर्फ एक महीने का समय था. अमेरिकी स्टेट मोनटाना में पाए गए टी-रेक्स को ट्रांसपोर्ट के लिए पेनसिल्वेनिया में तैयार किया गया. इसे अटलांटिक महासागर से बड़े बड़े डब्बों में बर्लिन भेजा गया.
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सेलेब्रिटी डायनासोर
हालांकि इसे विलुप्त हुए 6.5 करोड़ साल बीत गए हैं, लेकिन इसे पॉप संस्कृति में अहम माना जाता है. निर्देशक स्टीवन श्पीलबर्ग की फिल्म जुरासिक पार्क से इसे खतरनाक शिकारी के तौर पर देखा जाने लगा. हालांकि कई रिसर्चर मानते हैं कि वे शिकारी से ज्यादा मरे हुए जीवों को खाने वाले जीव थे.
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प्यार हो तो ऐसा
बचपन से ही डेन नील्स नीलसन को डायनासोर बहुत लुभाते थे. वे लंदन के एक कामयाब इंवेस्टमेंट बैंकर हैं. इस कामयाबी की बदौलत उन्होंने टी-रेक्स के एक महत्वपूर्ण कंकाल को खरीद भी डाला.
तस्वीर: Niels Nielsen
सॉरोपोड भी
तीन साल तक टी-रेक्स के साथ बर्लिन के संग्रहालय में नुमाइश के लिए सॉरोपोड भी होगा. जब बर्लिन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम को पता चला कि वे इन्हें अपने यहां दिखा सकते हैं तो उन्होंने झट इसकी नुमाइश और साथ साथ एक रिसर्च प्रोजेक्ट की तैयारी शुरू कर दी.
तस्वीर: DW/A. Kirchhoff
परिवार का सदस्य
उम्मीद की जा रही है कि ट्रिसटन बर्लिन के संग्रहालय में भीड़ जुटाने में कामयाब होगा. इसके साथ ही नुमाइश में अन्य डायनासोर भी दिखाए जा सकेंगे. जैसे 5 मीटर लंबा डायसालोटोसॉरस.
तस्वीर: Museum für Naturkunde Berlin
भूगर्भविज्ञान की दृष्टि से
बर्लिन के साथ डायनासोर की खोज का लंबा इतिहास जुड़ा है. शुरुआती 20वीं शताब्दी में नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम ने टेंडागुरू पहाड़ी पर खोज का पैसा दिया. उस समय वह डायनासोर के अवशेषों के लिए दुनिया का सबसे मशहूर ठिकाना था. वहां से करीब 250 टन अवशेष बर्लिन भेजे गए. कई पर आज भी रिसर्च जारी है.
तस्वीर: Museum für Naturkunde Berlin
बर्लिन का आकर्षण
बर्लिन का म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री 1889 में खुला था. यह जर्मनी का सबसे बड़ा नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम है. यहां प्रदर्शनी में दिखाई जाने वाली चीजों में डायनासोर के अलावा छोटी छोटी मछलियों और अन्य कीटों के भी अवशेष हैं. संग्रहालय में हर साल करीब 50 लाख लोग आते हैं.
तस्वीर: DW/A. Kirchhoff
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लेकिन एक कहानी है जिसके रहस्य सुलझ नहीं रहे. यह कहानी है कांसे और सोने से बनी डिस्क की जो कम से कम 3600 साल पुरानी है. हाले म्यूजियम के डाइरेक्टर प्रो. हाराल्ड मेलर कहते हैं कि यह स्काई डिस्क दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में एक है. स्काई डिस्क की खोज की कहानी भी बहुत दिलचस्प है. कब्रगाहों में चोरी करने वाले लुटेरों ने इसे मेटल डिटेक्टर की मदद से खोजा.
वे इसकी असली कीमत का अंदाजा नहीं लगा पाए और इसे ब्लैक मार्केट में बेच दिया. चोर 2002 में स्विट्जरलैंड के बाजेल में पकड़े गए और उसके बाद स्काई डिस्क हाले के म्यूजियम के पास पहुंची.
स्काई डिस्क कहां से आई, किसने और कब बनाई, इस पर उभरे चांद और तारों के क्या मायने हैं, इन तमाम सवालों का जवाब तलाशने में दुनिया भर के वैज्ञानिकों की दिलचस्पी थी. जर्मन शहर मनहाइम में इस धातु की उम्र का पता लगा लिया गया और फिर शुरू हुई बाकी अनुत्तरित सवालों के जवाबों की खोज.
लुटेरों का कहना था कि उन्हें नेबरा डिस्क जंगल में मिली थी. वैज्ञानिक उस जंगल में पहुंचे और वहां की मिट्टी का परीक्षण किया तो पता चला कि लुटेरे सच बोल रहे थे. कुछ और परीक्षणों से इस बात की पुष्टि हो गई कि डिस्क बहुत पुरानी है.
देखिए, जर्मनी के 10 अजीबोगरीब म्यूजियम
जर्मनी के 10 अजीबोगरीब म्यूजियम
कभी इतिहास, कभी विज्ञान, कभी अर्थव्यवस्था को समझाने के लिए अक्सर स्कूली छात्रों को म्यूजियम ले जाया जाता है. जर्मनी में 6,300 से भी ज्यादा म्यूजियम हैं. लेकिन इनमें से कुछ इतने अजीब हैं कि हर कोई इनका लुत्फ उठाना चाहेगा.
तस्वीर: Schokoladenmuseum Köln/DW/N. Sarenac
हैम्बर्ग: मिनिएचर म्यूजियम
इस जगह का नाम है मिनिएचर वंडरलैंड और यह हैम्बर्ग के सबसे बड़े आकर्षण में से एक है. यह अपने आप में एक छोटी सी दुनिया है. मिनिएचर रेल दुनिया के सबसे लंबे रास्ते पर यहां चलती है. 2014 में इसे देखने दस लाख लोग पहुंचे.
तस्वीर: Miniatur Wunderland Hamburg
ड्रेसडेन: हाइजीन म्यूजियम
सुनने में यह अजीब सा नाम लगता है लेकिन इंसानी शरीर के विज्ञान से जुड़ी छोटी छोटी बातों को यहां सीखा जा सकता है. कुछ ऑडियो फाइलों के जरिए सेक्स जैसे विषयों पर भी जानकारी मिल सकती है. मिसाल के तौर पर इंसानी खुशबू किस तरह से आकर्षण के लिए जिम्मेदार होती है.
तस्वीर: Jörg Gläscher
एसेन: सोल ऑफ अफ्रीका
वूडू परंपरा करीब चार हजार साल पुरानी है. आज वूडू डॉल्स दुनिया भर के बाजारों में मिलती हैं लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि काले जादू की यह परंपरा अफ्रीका में शुरू हुई. एसेन शहर के इस म्यूजियम में पानी की देवी मामी वाता के भी दर्शन किए जा सकते हैं.
तस्वीर: Jörg Gläscher
फ्रैंकफर्ट: टेस्ट ऑफ डार्कनेस
क्या आप अंधेरे में खाना खाना पसंद करेंगे? फ्रैंकफर्ट के म्यूजियम में ऐसा किया जा सकता है. मकसद है यह समझाना कि नेत्रहीनों का जीवन कैसा होता है. म्यूजियम में छह ऐसे कमरे हैं जहां अंधेरे में रोजमर्रा की जिंदगी का अनुभव किया जा सकता है.
तस्वीर: Jürgen Röhrscheidt
हाइडेलबर्ग: केमिस्ट म्यूजियम
हर कोई चाहता है कि दवाएं खरीदनी या खानी ना पड़ें, लेकिन जर्मनी में तो इनका म्यूजियम ही बना दिया गया है. हाइडेलबर्ग के मशहूर किले के बीचोबीच यह म्यूजियम है. यहां 2000 सालों के चले आ रहे दवाओं के चलन को देखा और समझा जा सकता है. केमिस्ट की दुकान का यह नमूना 1724 की एक झलक दिखाता है.
तस्वीर: Dt. Apotheken Museum-Stiftung Heidelberg
बर्लिन: सॉसेज म्यूजियम
जर्मनी की राजधानी बर्लिन दो चीजों के लिए जानी जाती है, एक अपनी जिंदादिली और दूसरा करीवुर्स्ट. यह एक सॉसेज है जिस पर टमाटर की चटनी, प्याज और मसाला डाल कर खाया जाता है. इस म्यूजियम में तरह तरह के करीवुर्स्ट देखे और खाए जा सकते हैं. मसाला कैसे तैयार करना है और सॉसेज को कैसे सही ढंग से तलना है, इस पर यहां टिप्स मिल सकते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
ब्रूल: टैक्स म्यूजियम
जर्मनी में आमदनी का करीब चालीस फीसदी हिस्सा टैक्स में जाता है. अधिकतर लोग टैक्स का हिसाब लगाने के लिए कंप्यूटर सॉफ्टवेयर या फिर सीए पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में एक म्यूजियम उन्हें टैक्स के बारे में सारी जानकारी मुहैया कराता है, वह भी चार शताब्दी ईसा पूर्व से अब तक की.
तस्वीर: Fotolia/46700946
म्यूनिख: पोटेटो म्यूजियम
जर्मनी में आलू इतना खाया जाता है कि कई बार मजाक में इसे जर्मनी की नेशनल डिश भी कहा जाता है. आलू के दीवाने देश में आलू का म्यूजियम भी है. लेकिन चाव से आलू खाने वालों के लिए बुरी खबर यह है कि यहां फ्रेंच फ्राई या फार्म पोटेटो खाने को नहीं मिलते. यहां केवल आलू के विज्ञान और उसके इतिहास का वर्णन है.
तस्वीर: DW Akademie/L. Vierecke
म्यूनिख: बीयर म्यूजियम
अक्टूबरफेस्ट के लिए मशहूर म्यूनिख शहर में केवल आलू ही नहीं बीयर का भी म्यूजियम है और यहां कई तरह की बीयर चखी जा सकती है. म्यूजियम एक ऐसी इमारत में बना है जिसका निर्माण 1340 में हुआ. यहां बीयर बनते भी देखा जा सकता है और 1487 की असली बीयर रेसिपी भी मिल सकती है.
तस्वीर: Bier und Oktoberfest Museum
कोलोन: चॉकलेट म्यूजियम
कार्निवाल के शहर कोलोन में मौजूद है चॉकलेट म्यूजियम. चॉकलेट की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसे बनाने की क्या विधि है, कहां कहां से इसके बीज लाए जाते हैं, ये सारी जानकारी इस म्यूजियम में मिल सकती है. तमाम ज्ञान लेने के बाद यहां गर्मागर्म ताजा चॉकलेट चखने को भी मिलती है.
तस्वीर: Schokoladenmuseum Köln/DW/N. Sarenac
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मेटल के विश्लेषण से यह भी पता चला कि डिस्क में इस्तेमाल तांबा किस जगह का है. यह पूर्वी आल्प्स पहाड़ी क्षेत्र की हजारों साल पुरानी एक खान से आया था. डिस्क की प्रामाणिकता का पता चल जाने के बाद जांच किया जाने वाला दूसरा पहलू था इसका डिजायन. यह 32 सितारों, एक हंसिया जैसे चांद और सुनहरे सर्किल से बना है. सात तारों का समूह जरूर सात बहनें हैं जिन्हे प्लाइडिस के नाम से जाना जाता है. खगोलविज्ञानी माथियू ओसेनड्राइवर ने चौंकाने वाली खोज की. ओसोनड्राइवर बताते हैं, "चांद और प्लाइडीस का मेल हमें बेबीलोन काल के टेक्स्ट मुलापिन की याद दिलाता है. इसमें भी चांद और प्लाइडीस का जिक्र है ताकि साल में एक कैलेंडर महीना अतिरिक्त रूप से जोड़ा जा सके. कहते हैं कि मेसोपोटेमिया में भी खगोलविज्ञानी पंडित अपने मंदिरों से स्वर्ग की ओर निहारा करते थे. वे स्वर्गिक घटनाओं के बारे में जो भी देखते उसे मिट्टी के स्लेट पर लिख दिया करते. वे साल के शुरू में पहले चांद की जगह को देखते. और वह जहां कहीं भी स्थित होता, प्लाइडीस के साथ तुलना कर वे फैसला करते कि इस साल हम साल में एक महीना और जोड़ देंगे, तेरहवां महीना."
इस्लामी दुनिया का धार्मिक कैलेंडर भी चांद के आकलन पर निर्भर है. चांद देखकर ही ईद का दिन तय होता है. तो क्या ईद मनाने से इस डिस्क का कुछ रिश्ता होगा? इतनी गहराई तक अभी वैज्ञानिक नहीं पहुंच पाए हैं.