पारा और फॉरएवर केमिकलों (पीएफएएस) के कारण समुद्री पक्षी शीयरवॉटर के शरीर में ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया प्रभावित हुई है. यह केमिकल माइटोकॉन्ड्रिया को प्रभावित करते हैं जिन्हें कोशिका का 'पावरहाउस' भी कहा जाता है.
स्कोपोली शीयरवॉटर समुद्री में नीची उड़ानें भरने के लिए मशहूर है. यह पक्षी औसतन 15 से 19 साल जीते हैं.तस्वीर: M. Woike/blickwinkel/picture alliance
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एक नई रिसर्च से पता चला है पानी में पाए जाने वाले आम प्रदूषक समुद्री पक्षियों में ऊर्जा उत्पादन को बाधित कर रहे हैं, जिससे उनकी सेहत बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. जर्मनी के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन, इटली के एक छोटे और दूरदराज ज्वालामुखी द्वीप लिनोसा पर प्रजनन करने वाले स्कोपोली शीयरवॉटर पक्षियों पर केंद्रित था.
वैज्ञानिकों ने पाया कि मरकरी (पारा) और कुछ खास पीएफएएस कंपाउंड (पर एंड पॉलीफ्लूरोएल्कायल सब्सटांस) जैसे व्यापक प्रदूषक माइटोकॉन्ड्रिया के काम को प्रभावित करते हैं. माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावरहाउस कहा जाता है. उड़ने से लेकर प्रजनन तक, शरीर की जरूरतों के लिए ज्यादातर ऊर्जा यहीं पैदा होती है.
शीर्ष शिकारियों को ज्यादा खतरा
समुद्रों में बैक्टीरिया मरकरी को अक्सर ज्यादा खतरनाक मिथाइलमरकरी में बदल देते हैं, जो ऊतकों में जमा हो जाता है. इस तरह छोटे जीव से छोटे शिकारी और फिर बड़े शिकारी के शरीर में जाता है. यानी खाद्य शृंखला के शीर्ष शिकारियों में इसका स्तर सबसे अधिक होता है.
पीएफएएस को "फॉरएवर केमिकल्स" यानी कभी ना खत्म होने वाले केमिकल कहा जाता है. यह नॉन-स्टिक बर्तन और दाग-प्रतिरोधी कपड़ों जैसे सामानों में पाए जाते हैं. इनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद वे बड़ी संख्या में जमा हो रहे हैं. लैब के अध्ययनों ने दिखाया है कि पीएफएएस माइटोकॉन्ड्रिया में ऊर्जा उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं. वन्यजीवों पर इनके प्रभाव की अब तक जानकारी नहीं थी.
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मरकरी और पीएफएएस का असर
वैज्ञानिक श्टेफानिया कासाग्रांडे के नेतृत्व में रिसर्चरों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने 'स्कोपोली शीयरवॉटर' पक्षी में प्रदूषक स्तर और माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन- दोनों को मापा.
माइटोकॉन्ड्रिया एक इलेक्ट्रिक चार्ज बनाते हैं जो एडेनोसीन ट्राइफॉस्फेट (एटीपी) के उत्पादन को संचालित करता है. यह कोशिका की एनर्जी करेंसी है. आम भाषा में समझें तो चाहे उड़ान भरनी हो या शिकार करना हो, काम करने के लिए उन्हें एटीपी खर्च करने होंगे. जिन पक्षियों में मरकरी की मात्रा ज्यादा हो जाती है, उनमें माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली में ज्यादा छेद हो जाते हैं. इससे एटीपी पैदा किए बिना ज्यादा ऊर्जा नष्ट हो जाती है. कुछ-कुछ वैसा ही जैसे मानो पानी, पनबिजली बांध के टरबाइनों को बिना छुए निकल जाए है.
वहीं कुछ पीएफएएस के उच्च स्तर का उल्टा असर पड़ता है. वे झिल्लियों को सख्त बना देते हैं और ऊर्जा के रिसाव कम कर देते हैं. लेकिन इससे उस सुरक्षा वाल्व को नुकसान होता है जो हानिकारक अणुओं के निर्माण को रोकता है. हानिकारक अणु बढ़ते हैं तो सेल को नुकसान होता है.
डायनासोरों के वो वंशज, जो आपके छत की मुंडेर पर बैठते हैं
करीब 6.6 करोड़ साल पहले आसमानी कहर बनकर आए ऐस्टेरॉइड ने डायनासोरों को मिटा तो दिया, लेकिन उनकी समूची हस्ती खत्म नहीं हुई. उनके वंशज आज भी हमारे बीच रहते हैं.
तस्वीर: Sadak Souici/ZUMA/picture alliance
बचे रहे गए डायनासोर!
रिसर्चर मानते हैं कि 6.6 करोड़ साल पहले एक रोज सुदूर अंतरिक्ष से आया एक ऐस्टेरॉइड पृथ्वी पर गिरा. उसकी धमक से पैदा हुए असर ने पृथ्वी से सबसे विशालकाय जीव डायनासोरों का खात्मा कर दिया. मगर उस हादसे के बाद भी डायनासोरों का एक नामलेवा बचा रह गया. उनके वंशज आज भी हमारी इसी दुनिया में रहते हैं. कुछ चटक रंग वाले, बहुत सुंदर, बला के मेहनती, कई मंजे हुए कारीगर, तो कई बेहतरीन गायक-संगीतकार हैं.
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गौरैया, कबूतर... सारे पक्षियों का पूर्वज
डायनासोर के खानदान का एक सदस्य था, ट्रायनोसॉरस रेक्स. अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मुताबिक, यह लंबाई में करीब 40 फीट और ऊंचाई में 12 फीट था. वजन, पांच से सात हजार किलो तक. यह पृथ्वी पर अब तक के सबसे खूंखार शिकारियों में एक माना जाता है. अब सोचिए, यह ट्रायनोसॉरस रेक्स उन डायनासोरों में हैं, जो नन्ही सी गौरैया के पूर्वज हैं. पेलियनटॉलजिस्ट की मानें, तो पक्षी अपने आप में एक डायनासोर हैं.
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थेरोपॉड डायनासोर
अधिकतर मांसभक्षी डायनासोर, थेरोपॉड समूह के थे. पक्षी भी इसी समूह से ताल्लुक रखते हैं. दिलचस्प यह है कि उड़ने वाले पक्षी, जिन थेरोपॉड्स के वंशज हैं वो उड़ते नहीं थे. मतलब, आप कह सकते हैं कि पक्षी दरअसल उड़ने वाले डायनासोर हैं. इस निष्कर्ष पर पहुंचने में दक्षिणी जर्मनी में हुई एक खोज बड़ी अहम साबित हुई.
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अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन पक्षी
जर्मनी के बवेरिया प्रांत में एक लाइमस्टोन संरचना है. जॉलेनहोफेन नाम के एक गांव के नजदीक होने के कारण इसे 'जॉलेनहोफेन लाइमस्टोन' कहते हैं. 1861 में यहां एक अनूठा जीवाश्म मिला, जिसे नाम दिया गया: ऑर्कियॉप्टरिक्स लीथोग्रैफिका. इसकी संरचना दो समूहों का मिश्रण थी: छिपकली और पक्षी. यह खोज प्राचीन डायनासोरों और आधुनिक पक्षियों के रिश्ते को समझने में एक बड़ा मोड़ मानी जाती है.
मुमकिन है, पक्षियों का इससे भी प्राचीन कोई स्वरूप हो. कुछ ऐसा, जिससे विकसित होते हुए ऑर्कियॉप्टरिक्स लीथोग्रैफिका बना हो. हालांकि, इसका जीवाश्म के रूप में अब तक कोई सबूत नहीं मिला. बहरहाल, जिस लाइमस्टोन में ऑर्कियॉप्टरिक्स का जीवाश्म मिला, उसमें उसके पंखों की आकृति भी दर्ज रह गई थी. ये पंख वैसे ही हैं, जैसे आज के पक्षियों में होते हैं.
तस्वीर: TONY KARUMBA/AFP
कैसे विकसित हुए आधुनिक पक्षी
डायनासोरों ने पृथ्वी पर बहुत ही लंबे समय तक राज किया. 14 करोड़ साल से ज्यादा वक्त तक उनकी बाहशाहत कायम रही. फिर सुदूर अंतरिक्ष के ऐस्टेरॉइड बेल्ट से आए एक विशालकाय ऐस्टेरॉइड का पृथ्वी से टकराना उनके अंत की वजह बना. डायनासोर विलुप्त हो गए, लेकिन पूरी तरह नहीं. थेरोपॉड परिवार के उनके पक्षीनुमा सदस्य बचे रहे. आप आज के पक्षियों को देखें, तो वो बाकी जीवों से कई बातों में अलग हैं.
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करोड़ों सालों तक विकसित होते रहे
इनके प्राचीन पूर्वज तो और भी अलग दिखते थे. उनकी रूपरेखा डायनासोर से ज्यादा मेल खाती थी. पक्षियों के उस प्राचीन स्वरूप और आधुनिक पक्षियों में जो बदलाव दिखता है, वो करोड़ों साल तक हुए विकासक्रम का हासिल है. नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के मुताबिक, ऐस्टेरॉइड के टकराने के बाद अगले 6.6 करोड़ सालों में प्राचीन पक्षियों का वो स्वरूप कई तरीकों से विकसित होता रहा.
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विकास के लंबे सालों में कई खासियतें हासिल कीं
इन्होंने कई खासियतें विकसित कीं, जो उन्होंने बाकी जीवों से अलग बनाती हैं. मसलन, उनके शरीर पर उगे पर. शरीर के दोनों ओर उगे डैनों का जोड़ा, जो उन्हें उड़ने की ताकत देता है. चमगादड़ को छोड़ दें, तो रीढ़ वाले जीवों में एकमात्र पक्षी ही हैं जो रफ्तार के साथ हुए उड़ान भर सकते हैं. कुछ और खासियतें हैं, जो हमें नंगी आंखों से नहीं दिखती. कुछ और खासियतें हैं, जो हमें नंगी आंखों से नहीं दिखती.
तस्वीर: Mary Altaffer/AP Photo/picture alliance
कमाल के कामयाब जीव
खासियत जैसे कि सिर के अनुपात में बड़ा मस्तिष्क. खोखली हड्डियों वाला हल्का कंकाल, जो उड़ने में उनकी मदद करता है. जीव इतिहास में देखिए, तो पक्षी सबसे सफल जीवों में हैं. उन्होंने क्रैटेशियस पीरियड के अंत में हुए मास एक्सटिंशन को भी चकमा दे दिया. आज पक्षियों की 11,000 से ज्यादा प्रजातियां हैं. अलग-अलग रंग, आकार, आदतों वाले ये पक्षी आर्कटिक से लेकर अंटार्कटिक तक, दुनिया के हर महादेश में पाए जाते हैं.
तस्वीर: Helge Schulz/Zoonar/picture alliance
प्रवासी पक्षी: मुश्किलों से पार पाकर बने रहने की एक प्रेरणा
ये रेगिस्तान से लेकर वर्षावन, कई कुदरती परिवेशों में जीते हैं. कितनी अद्भुत बात है कि प्रवासी पक्षियों ने मौसम के हिसाब से अलग-अलग घर बनाए. गर्मियों के लिए एक जगह को चुना और सर्दियों के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी सैकड़ों किलोमीटर दूर कहीं कतार बांधकर पहुंचते रहे. यह क्या है? मुश्किलों से पार पाकर जीना, बदलते हालात के मुताबिक ढलना, अपनी प्रजाति को बचाए रखने की अकूत इच्छाशक्ति, यानी इवॉल्यूशन का सार!
तस्वीर: Menahem Kahana/AFP
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आहार और कोशिकाओं को होने वाला नुकसान
शीयरवॉटर की उम्र 20 से 30 साल के बीच हो सकती है. यानी समय के साथ वे प्रदूषकों को जमा करते हैं, और एक तरह से समुद्र के स्वास्थ्य के संकेतक बन जाते हैं.
रिसर्चरों ने दो सीजनों में प्रजनन करने वाले 52 वयस्कों के सैंपल लिए, सभी पक्षियों में मरकरी और माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन को मापा गया. वहीं, एक सीजन के 20 पक्षियों में पीएफएएस का विश्लेषण किया गया.
स्कोपोली शीयरवॉटर पर यह रिसर्च इटली के सिसली तट के पास मौजूद ज्वालामुखी द्वीप लिनोसा पर कई गईतस्वीर: M. Woike/ blickwinkel/picture alliance
जांच में ज्यादा उम्र के नर पक्षियों में मरकरी का स्तर अधिक था. मादाओं के मामले में अंडे देने के साथ मरकरी शरीर से बाहर निकल आता है, इसलिए स्तर थोड़ा कम दर्ज किया गया. वहीं पीएफएएस ने उम्र, लिंग या आहार के साथ ऐसा कोई संबंध नहीं दिखाया. यानी मरकरी की तुलना में पीएफएएस का शीयरवॉटर पक्षी के शरीर में पहुंचने का जरिया कुछ और रहा.
प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खतरे
गीसन यूनिवर्सिटी की छात्रा और रिसर्च पेपर की प्रथम सह-लेखिका लूसी मिशेल कहती हैं रासायनिक प्रदूषण अपनी अदृश्य प्रकृति और अलग-अलग प्रभावों के कारण सभी स्तरों पर समुद्री इकोसिस्टम के लिए काफी जटिल खतरों में से हैं. उन्होंने कहा कि वन्यजीवों के लिए अन्य खतरों जैसे कि अत्यधिक मछली पकड़ने, प्लास्टिक प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग के संदर्भ में इन प्रभावों को समझना भी जरूरी है. इन सवालों के जवाब देने के लिए लंबी अवधि की निगरानी चाहिए होगी. इनका मानव स्वास्थ्य पर मरकरी और पीएफएएस के प्रभावों को समझने के लिए भी महत्व है, क्योंकि हम भी इसी तरह के जोखिमों का सामना करते हैं.
समुद्री अल्बाट्रॉस को अनचाहे शिकार से बचाने के तरीके