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समाज

अब मेघालय में बिका करेगी घर में बनी वाइन

प्रभाकर मणि तिवारी
२९ सितम्बर २०२०

मेघालय में वाइन का सेवन रोजमर्रा के जीवन और खान-पान का हिस्सा है. अकसर यहां वाइन को बढ़ावा देने के लिए महोत्सव भी आयोजित किए जाते रहे हैं.

Deutschland Weinberg vom Weingut Klosterhof Töplitz
तस्वीर: picture-alliance/dpa/J. Kalaene

पूरब का स्कॉटलैंड कहे जाने वाले पर्वतीय राज्य मेघालय में टैक्स नहीं होने की वजह से यूं तो विदेशी वाइन पहले से ही सस्ती रही है लेकिन राज्य के लोग और हर साल आने वाले पर्यटक अब यहां घर में अलग-अलग किस्म के फलों से बनने वाली वाइन का लुत्फ भी उठा सकेंगे. सरकार ने घरों में बनाई जाने वाली वाइन को कानूनी वैधता प्रदान करते हुए लोगों को इसे बेचने की अनुमति दे दी है.

बीते दो दशकों से यह मांग उठ रही थी. लेकिन कोरोना काल में जूझती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने आखिर इसकी अनुमति दे दी है. घरों में बनने वाली वाइन विदेशी वाइन के मुकाबले सस्ती होगी. अब इस वाइन को बाजारों में बेचा जा सकेगा. सरकार इसके लिए लाइसेंस जारी करेगी. इससे पहले बीते साल केरल सरकार ने काजू, कटहल और केले से वाइन बनाने वालों को लाइसेंस जारी करने का फैसला किया था.

20 साल से उठ रही थी मांग

शराब या वाइन की बिक्री और सेवन के मामले में मेघालय की तस्वीर पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों से अलग है. नागालैंड में तो शराबबंदी है. पहले लंबे अरसे तक मिजोरम में भी शराबबंदी थी. लेकिन कुछ साल पहले इसे खत्म कर दिया गया था. मेघालय में वाइन का सेवन रोजमर्रा के जीवन और खान-पान का हिस्सा है. इस ईसाई-बहुल राज्य में कई तरह के फलों से अलग-अलग किस्म की वाइन बनाई जाती रही है और अकसर ऐसी वाइन को बढ़ावा देने के लिए महोत्सव भी आयोजित किए जाते रहे हैं.

मेघालय वाइन मेकर्स एसोसिएशन करीब दो दशकों से इस वाइन को कानून वैधता मुहैया कर इसके बाजारों में बिक्री की अनुमति देने की मांग करती रही थी. अब सरकार ने मंत्रिमंडल की बैठक में मैन्यूफैक्चर एंड सेल ऑफ होम मेड फ्रूट वाइन रूल्स 2020 को हरी झंडी दिखा कर इस पुरानी मांग को पूरा कर दिया है. इसके तहत घर में वाइन बनाने वालों को लाइसेंस जारी किया जाएगा. इससे खासकर कोरोना काल के लंबे दौर में फलों की खेती करने वाले किसानों और घरेलू शराब निर्माताओं के चेहरे खिल गए हैं.

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होम मेड वाइन पर नहीं लगेगा टैक्स

मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा बताते हैं, "हमने नियम बना दिया है. अब लोग घरों में बनाई अपनी वाइन बाजार में बेच सकते हैं. इससे राज्य में फलों की खेती करने वाले किसानों को काफी सहायता मिलेगी. अब वे लोग अपनी उपज को स्थानीय बाजार में वाइन निर्माताओं को बेच सकेंगे. सरकार ने इस वाइन पर कोई टैक्स नहीं लगाने का फैसला किया है. नए नियमों के तहत कोई भी व्यक्ति निजी तौर पर या सहकारी समितियां या कंपनी बना कर लाइसेंस हासिल कर सकता है."

सरकार की दलील है कि राज्य में कोल्ड स्टोरेजों और परिवहन के साधनों की दिक्कत की वजह से खासकर जल्दी खराब होने वाले फलों की किसानों को बेहतर कीमत मिल सकेगी. इनके अलावा अपने अनूठे स्वाद की वजह से घरों में बनने वाली वाइन के जरिए पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकेगा. इससे गावों में भी रोजगार पैदा होगा. इस उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि अल्कोहल की मात्रा कम होने की वजह से यह वाइन देसी-विदेशी वाइन की तरह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह नहीं होगी. इससे अवैध वाइन निर्माण पर अंकुश लगाने के साथ ही सरकार को राजस्व भी मिलेगा. मेघालय के आबकारी आयुक्त प्रवीण बक्शी बताते हैं, "फलों से बनने वाली वाइन को बढ़ावा मिलने की स्थिति में गांवों से युवकों के पलायन पर अंकुश लगाया जा सकेगा."

फ्रांस की तरह वाइन टूरिज्म पर जोर

मेघालय वाइन मेकर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष माइकल सिएम ने इस फैसले का स्वागत किया है. वह कहते हैं, "हम सरकार के फैसले से खुश हैं. हम लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे. कुटीर उद्योग के तौर पर स्थापित हो जाने पर इससे फलों की खेती को तो बढ़ावा मिलेगा ही, पर्यटक भी आकर्षित होंगे और सरकार को राजस्व भी मिलेगा." उनका दावा है कि इससे रोजगार के नए मौके भी पैदा होंगे. अपने दावे के समर्थन में वह फ्रांस की वाइन ब्रुअरियों की मिसाल देते हैं जहां हर साल भारी तादाद में पर्यटक पहुंचते हैं.

एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य और वाइन निर्माता बीडी खारप्रान इस फैसले को सही दिशा में सही कदम बताते हैं. वे कहते हैं, "इससे अब वाइन बनाने से लेकर उसे बाजारों तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया एक नियमित तरीके से आगे बढ़ेगी. साथ ही क्वॉलिटी पर भी निगाह रखी जा सकेगी." 1992 से ही फलों से वाइन बनाने वाले 73 साल के ब्राइन के डाली बताते हैं, "मेघालय में पैदा होने वाले तमाम फलों से वाइन बनाई जा सकती है. इनमें नासपाती, अंगूर, अनानास, स्ट्रॉबेरी, ब्लैक चेरी, अमरूद, तरबूज, संतरा, टमाटर, केला, प्लम जैसे फल शामिल हैं. अब तक खास इस्तेमाल नहीं होने की वजह से कई ऐसे पेड़ काट दिए जाते थे. लेकिन अब इनकी खेती बढ़ेगी और उससे हरित आवरण भी बढ़ेगा." वे बताते हैं कि फलों से वाइन बनाने की प्रक्रिया में एक साल तक का समय लग सकता है. इसकी कीमत क्वॉलिटी के हिसाब से 500 रुपये प्रति बोतल से शुरू होती है.

अर्थशास्त्रियों ने सरकार के इस फैसले को अहम बताते हुए इसकी सराहना की है. एक अर्थशास्त्री जीके लापांग कहते हैं, "घरों में फलों से बनाई जाने वाली वाइन पहले भी असंगठित तरीके से बेची जाती थी. लेकिन उससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलता था. अब इसे संगठित रूप देने से इसके कई फायदे होंगे. कोरोना काल में जर्जर अर्थव्यवस्था के लिए यह फैसला बेहद दूरगामी साबित होगा."

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