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समाजजर्मनी

ताज महल जैसी है जर्मनी की एक मस्जिद

बेटीना बाउमन
४ अक्टूबर २०२२

जर्मनी में हजारों मस्जिदें हैं. हर साल 3 अक्टूबर को यहां 'ओपन मॉस्क डे' मनाया जाता है. इस दिन तमाम मस्जिदों के दरवाजे आम जनता के लिए खोले जाते हैं. लेकिन क्यों?

बर्लिन की सेहितलिक मस्जिद
बर्लिन की सेहितलिक मस्जिदतस्वीर: Thomas Trutschel/photothek/picture alliance

साल 1997 से ही जर्मनी में 'ओपन मॉस्क डे' मनाया जा रहा है. 2022 के समारोह में ऐसा हुआ यह कि देश की करीब एक हजार मस्जिदों ने अपने दरवाजे खोले ताकि मुसलमानों और गैर मुसलमानों को करीब लाया जा सके. इस मौके पर जर्मनी की मस्जिदों के बारे में आपको कुछ दिलचस्प बातें बताना जरूरी हो जाता है.

जर्मनी में कुल कितनी मस्जिदें हैं यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. कई गलियों में पीछे के गलियारे से जो कुछ इंडस्ट्रियल पार्क के इलाके में बनी हैं. अनुमान है कि इनकी संख्या 2,350 से लेकर 2,750 के बीच होगी. 2019 के एक आंकड़े पर नजर डालिए. जर्मन इस्लाम कॉन्फ्रेंस की एक स्टडी से पता चला है कि जर्मनी में रहने वाले कुल 55 लाख मुसलमानों में करीब एक चौथाई कम से कम हफ्ते में एक बार मस्जिद जरूर जाते हैं.

पहली मस्जिद में हुई थी जिहादियों की ट्रेनिंग

1915 में इस्तांबुल के मुफ्ती के अनुरोध पर ब्रांडेनबुर्ग में वुंसडॉर्फ मस्जिद बनी थी. यह जर्मनी ही नहीं बल्कि पूरे सेंट्रल यूरोप की पहली इस्लामिक बिल्डिंग मानी जाती है. इसे खड़ा किया गया युद्ध अपराधों के लिए सजा काट रहे दोषियों की जेल के बीचो बीच, इसलिए यह "हाफ मून कैंप" के नाम से मशहूर हुई.

शांति से प्रार्थना करने की इस जगह का जर्मन साम्राज्य ने अलग तरह से इस्तेमाल किया. उस समय की औपनिवेशिक शक्तियों फ्रांस और इंग्लैंड के खिलाफ यहां के मुस्लिम कैदियों की भावनाओं को भड़काया गया. यहां से लोगों को जिहादी बना कर तथाकथित "पवित्र युद्ध" लड़ने भेज दिया जाता.

वुन्सडॉर्फ मस्जिद की 1915 की एक तस्वीर जिसमें बाद में रंग भरा गयातस्वीर: akg-images/picture alliance

इतिहास में दर्ज है कि कैसे इन मुसलमान युद्ध अपराधियों का कई और तरह से भी शोषण हुआ. कभी रिसर्च के लिए उनकी भाषा दर्ज की गई तो कभी मानवविज्ञान के दूसरे आंकड़ों के लिए. नाजी काल में ऐसे कई छद्म वैज्ञानिक प्रयोग करने के कारण यह तथाकथित "नस्ल विज्ञान" का एक गढ़ बन गया. सन 1928 में बर्लिन के विल्मर्सडॉर्फ में एक और नई मस्जिद के बनने के बाद इसका महत्व कम होने लगा और 1930 में इसे ढहा दिया गया.

ताज महल जैसी मस्जिद जर्मनी में

बर्लिन के विल्मर्सडॉर्फ वाली मस्जिद आज तक बची सबसे पुरानी मस्जिद है. मजे की बात है कि यह दिखने में भारत के विश्व प्रसिद्ध ताज महल जैसी लगती है. 30 मीटर से भी ऊंची दो मीनारें हैं. उस समय बाहर से आए अहमदिया समुदाय के लोगों के लिए इसका डिजाइन बनाया था जर्मन वास्तुकार कार्ल आगुस्ट हरमन ने.

वे अहमदिया लोग 1920 में उस इलाके से आए थे जहां आज का पाकिस्तान है. इन्हीं लोगों ने जर्मनी के मुसलमानों के साथ मिलकर 'जर्मन-मुस्लिम सोसायटी' स्थापित की. उस समय विल्मर्सडॉर्फ मस्जिद मुसलमानों के जीवन का एक केंद्र बन गया.

बर्लिन की ही विल्मर्सडॉर्फ मस्जिदतस्वीर: Schoening/imageBROKER/picture alliance

महिला मौलवियों ने शुरु किया नया दौर

सन 2017 में 'इब्न रुश्द-गोएथे' मस्जिद की स्थापना के साथ एक खास पहल हुई. बर्लिन में मुसलमानों के लिए बने इस नए प्रार्थनास्थल में पुरुष और महिलाएं एक साथ नमाज पढ़ सकते हैं. यहां महिलाएं उपदेश भी दे सकती हैं और क्वीयर लोगों को भी अलग थलग नहीं किया जाता.

यहां हर तरह के मुसलमानों का स्वागत है चाहे वे सुन्नी हों, शिया, सूफी या अलेवी. ऐसी मस्जिद बनाने वाली सहसंस्थापक को आज तक जान से मारने की धमकियां मिलती हैं और चौबीस घंटे पुलिस की सुरक्षा में रहना पड़ता है.

सभी लिंग के लोगों का एक ही छत के नीचे नमाज पढ़ना यहां संभव हैतस्वीर: Christophe Gateau/dpa/picture alliance

मस्जिद संगठनों को लेकर विवाद

जर्मनी में मस्जिदों को चलाने वाले कई संगठन हैं. इनमें सबसे बड़ा और जाना माना इस्लामिक संगठन है तुर्की-इस्लामियों का जिसका छोटा नाम डितिब (Ditib) है. इसकी आलोचना होती है क्योंकि यह तुर्की की धार्मिक शक्तियों से निर्देशित होता है. इस संघ के इमाम भी तुर्की से ट्रेनिंग ले कर आते है और जर्मन मस्जिदों का काम संभालते हैं.

2018 में तुर्की में हुए राष्ट्रपति चुनाव के समय जब रेचप तैयप एर्दोआन जर्मनी आए तो उनका जिस गर्मजोशी से स्वागत हुआ, उसमें इस संघ की अहम भूमिका मानी जाती है.

हजारों की तादाद फिर भी आंखों से ओझल

जर्मनी के किसी भी हिस्से में चले जाएं तो ईसाई धर्म में पवित्र मानी जाने वाली इमारतें, खासकर चर्च साफ साफ नजर आते हैं. वहीं मस्जिदें हैं तो लेकिन ऐसे बनाई गई हैं कि आसानी से नजर नहीं आतीं. किसी भी रिहायशी इलाके में एक घर पर छोटा सा बोर्ड लगा होता है कि अंदर मस्जिद है. जर्मन भाषा में ऐसी मस्जिदों के लिए थोड़ा दुर्भावना से भरा एक शब्द प्रचलित है - "हिंटरहोफमोशी," जिसका मतलब हुआ "पिछवाड़े वाली मस्जिद"

पूरे जर्मनी में कोलोन शहर में बनी सेंट्रल मस्जिद एक अपवाद है. इसे जर्मनी को स्टार आर्किटेक्ट पाउल बोएम ने डिजाइन किया था. 2017 में खुली यह मस्जिद कांच और कंक्रीट से बनी एक मॉडर्न इमारत लगती है. योजना थी कि इसे जर्मनी की सबसे बड़ी मस्जिद बनाया जाए लेकिन बाद में इसकी डिजाइन बदल दिया गया. फिर भी मस्जिद इतनी बड़ी है कि यहां एक साथ 1,200 लोग प्रार्थना कर सकते हैं.

कोलोन के सेंट्रल मॉस्क में हजार से भी ज्यादा लोगों के लिए है जगह तस्वीर: Mesut Zeyrek/AA/picture alliance

मुअज्जिन से नमाज की अजान का ज्यादा प्रचलन नहीं

इस्लामिक देशों में मस्जिद से नमाज के लिए अजान का चलन है. शुक्रवार यानि जुमे की नमाज के लिए तो मीनार से खास पुकार लगाई जाती है. जर्मनी में इस पर मनाही नहीं है लेकिन फिर भी ऐसा विरले ही होता है. ज्यादातर मस्जिदों में मीनार होती ही नहीं है. जर्मन समाज में भी इसे लेकर बहुत स्वीकार्यता नहीं दिखती.

ऊंचे स्वर में अजान के कई विरोधी भी हैं जो इसे ध्वनि प्रदूषण मानते हैं. चर्च में बजने वाले घंटों को वे सही मानते हैं लेकिन मस्जिदों से आने वाली पुकार को बहुत ज्यादा धार्मिक संदेश से ओतप्रोत मानते हैं. जर्मनी की हजारों में से केवल 30 के करीब मस्जिदों से ही अजान होती है. 

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