जर्मन न्यूज एजेंसी डीपीए के एक सर्वे में पता चला कि जर्मनी की 75% से ज्यादा आबादी आप्रवासन कम करने की सरकार की योजनाओं का समर्थन करती है. लेकिन सख्त नीतियों का असर हुआ है या नहीं, इस पर राय बंटी हुई है.
यूरोपीय संघ में जर्मनी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भीतस्वीर: Michael Kuenne/PRESSCOV/ZUMA/picture alliance
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जर्मनी की करीब तीन-चौथाई आबादी आप्रवासन कम करने की सरकार की योजनाओं का समर्थन करती है. जर्मन न्यूज एजेंसी ‘डीपीए' के ‘यू गोव' के साथ मिलकर कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है. एजेंसी ने शनिवार, 20 दिसंबर को बताया कि जर्मनों की बड़ी आबादी गृह मंत्री आलेक्जांडर डोबरिंट के आप्रवासन कम करने के लक्ष्यों का समर्थन करती है.
75 प्रतिशत से ज्यादा लोग समर्थन में
जब लोगों से पूछा गया कि क्या वे शरणार्थी आप्रवासन घटाने के डोबरिंट के लक्ष्यों का समर्थन करते हैं, तो 53% ने कहा कि वे "पूरी तरह" समर्थन करते हैं. और 23% ने "कुछ हद तक" समर्थन करने की बात कही. जबकि 15% जर्मनों ने डोबरिंट की योजना को "पूरी तरह” या "कुछ हद तक खारिज” किया. जवाब ना देने वाले करीब 9% रहे. कंजरवेटिव पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रैटिक यूनियन (सीडीयू) के नेता फ्रीडरिष मैर्त्स के नेतृत्व में इसी साल मई में सत्ता संभालने के बाद नई सरकार ने देश की सीमाओं पर सख्ती बढ़ाई है. गृह मंत्री डोबरिंट ने अपनी पूर्ववर्ती नैंसी फेजर के कार्यकाल के दौरान सीमाओं पर शुरू हुईं सुरक्षा जांचों को और तेज करने का आदेश दिया है. उन्होंने शरणार्थियों को सीमाओं से ही लौटा देने के आदेश जारी किए हैं, सिवाय गर्भवती महिलाओं, बीमारों और संकटग्रस्त परिस्थितियों से आ रहे लोगों के.
जर्मनी के गृह मंत्री आलेक्जांडर डोबरिंटतस्वीर: Sebastian Rau/photothek.de/picture alliance
ईयू के स्तर पर भी बदलाव की कोशिश
डोबरिंट, यूरोपीय संघ के स्तर पर भी ऐसे कड़े नियमों की वकालत कर रहे हैं जो शरण की प्रक्रिया को यूरोपीय संघ से बाहर के देशों को सौंपने और तथाकथित रिटर्न सेंटर्स चलाने की अनुमति देंगे. यह सेंटर वे जगहें हो सकती हैं जहां देश छोड़ने को बाध्य शरणार्थियों को, उनके मूल देश में डिपोर्ट ना कर पाने की सूरत में रखा जा सके. हालांकि, पहले ऐसे देश तलाशने होंगे जो अपनी जमीन पर ऐसी व्यवस्थाओं की इजाजत दें.
सरकारी नीति के असर पर राय बंटी
सरकार की आप्रवासन नीति में घोषित बदलावों का वाकई कितना असर हुआ है, इस सवाल पर जर्मनों की राय बंटी नजर आई. सर्वे में शामिल सिर्फ 8% लोगों को "बड़ा बदलाव" नजर आया. 38% नागरिकों को "हल्का बदलाव" दिखा, जबकि 42% जर्मनों को सरकार की आप्रवासन नीति में कोई बदलाव महसूस नहीं हुआ. वहीं 12% लोग या तो मूल्यांकन नहीं कर पाए, या फिर उन्होंने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. इसी महीने 12 से 15 दिसंबर के बीच हुए इस सर्वे में 2,100 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया.
थिंकटैंक फ्रीडम हाउस द्वारा जारी ‘फ्रीडम ऑफ द नेट रिपोर्ट’ में बताया गया है कि सरकारें विरोध दबाने, जानकारी नियंत्रित करने और नागरिकों की निगरानी बढ़ाने के लिए डिजिटल स्पेस का इस्तेमाल कर रही हैं.
तस्वीर: Avishek das/ZUMA Press/Imago Images
27 देशों में हालात बिगड़े
फ्रीडम ऑफ द नेट रिपोर्ट के तहत विशेषज्ञों ने कुल 72 देशों के हालात का अध्ययन किया है. रिपोर्ट कहती है कि 27 देशों में हालात पहले से ज्यादा खराब हुए. सिर्फ 17 देशों में स्थिति में पहले से कुछ सुधार दिखा है.
तस्वीर: Uriel Soberanes / Walkator / Ali Shah Lakhani via unsplash.com
केन्या में सबसे बड़ी गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक, केन्या में इंटरनेट फ्रीडम में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है. जून 2025 के टैक्स विरोध के दौरान सरकार ने पूरे देश का इंटरनेट लगभग 7 घंटे बंद किया था. सैकड़ों शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी ने इंटरनेट आजादी को बुरी तरह चोट पहुंचाई.
रिपोर्ट में जिन देशों में स्थिति बेहतर होती बताई गई है, उनमें बांग्लादेश सबसे ऊपर है. 2025 के छात्र आंदोलन में इंटरनेट की बड़ी भूमिका का भी जिक्र किया गया है. रिपोर्ट के मुताबीक नई अंतरिम सरकार ने इंटरनेट आजादी को मजबूत करने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए.
तस्वीर: Fatima Tuj Johora/REUTERS
चीन और म्यांमार सबसे खराब
इस रिपोर्ट के हिसाब से चीन और म्यांमार उन देशों में सबसे निचले पायदान पर हैं, जहां इंटरनेट की आजादी सबसे कम है. दोनों देशों में सख्त सेंसरशिप, निगरानी और दमनकारी नीतियां लागू हैं. इसके उलट आइसलैंड लगातार सबसे स्वतंत्र डिजिटल माहौल देता है.
तस्वीर: CFOTO/picture alliance
'फ्री' माने जाने वाले देशों में भी बिगड़े हालात
18 पूरी तरह स्वतंत्र देशों में से आधे की स्कोर में गिरावट आई. जॉर्जिया में सबसे बड़ी कमी देखी गई. उसके बाद जर्मनी और अमेरिका में भी चिंताजनक रुझान दिखे, जहां नेताओं की आलोचना करने वाले लोगों पर केस दर्ज हुए.
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अमेरिका में खतरे बढ़े
फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका में इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी की जगह बहुत कम हुई है. इस साल कुछ विदेशी नागरिकों को शांतिपूर्ण ऑनलाइन पोस्ट के लिए हिरासत में लिया गया. ऐसे में, सिविक स्पेस में बढ़ती पाबंदियों से ऑनलाइन बोलने की आजादी प्रभावित हुई.
तस्वीर: Artur Widak/NurPhoto/picture alliance
नियंत्रण का तरीका
मिस्र, पाकिस्तान, रूस, तुर्की और वेनेजुएला आदि देशों का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी ने ऑनलाइन निगरानी, सेंसरशिप और सजाएं बढ़ाई हैं. प्रदर्शन और चुनावों के दौरान यह दमन और ज्यादा तेज हो जाता है.
तस्वीर: Sayed Hassib/REUTERS
पोस्ट पर गिरफ्तारी
रिपोर्ट बताती है कि 81 फीसदी लोग ऐसे देशों में रहते हैं जहां इंटरनेट पर पोस्ट करने पर गिरफ्तारी होती है. यानी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक मुद्दों पर सिर्फ लिख देने से भी जेल हो सकती है. 70 फीसदी लोग ऐसे देशों में हैं जहां ऑनलाइन एक्टिविटी पर हमला या हत्या तक हुई है.
तस्वीर: Avishek Das/ZUMA Wire/picture-alliance
इंटरनेट पर पाबंदी
इस रिपोर्ट के मुताबिक, 70 फीसदी लोग उन देशों में रहते हैं जहां सरकारें ऑनलाइन बहस को प्रभावित करती हैं. 69 फीसदी लोग ऐसे देशों में हैं जहां राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कंटेंट ब्लॉक किया गया. जबकि 52 फीसदी लोग ऐसे देशों में रहते हैं जहां इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क राजनीतिक कारणों से बंद किए जाते हैं.