उड़ी हमले के बाद भारत में मीडिया और सोशल मीडिया युद्धोन्माद से पटे पड़े हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक जहां उनसे ‘पाकिस्तान को सबक सिखाने' की फरियाद कर रहे हैं, वहीं उनके आलोचक प्रधानमंत्री बनने से पहले की उनकी वीडियो क्लिप दिखा दिखा कर दूसरी तरह से उन पर दबाव बनाने में जुटे हैं. मीडिया और सोशल मीडिया को कसौटी मानें तो युद्ध या तो छिड़ चुका है, या बस अगले ही पल छिड़ने वाला है. कुछ मीडिया संस्थानों ने तो यहां खबर चला दी कि भारतीय सेना नियंत्रण रेखा पार कर 20 पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार चुकी है. लेकिन जल्द ही ये खबर फुस्स हो गई.
कश्मीर के उड़ी में हुए हमले में 18 भारतीय सैनिकों की मौत पर जनता का गुस्सा स्वाभाविक है. जंग की आवाजें सिर्फ इस हमले की देन नहीं हैं, बल्कि लोग बरसों हो रहे इस तरह के हमलों से तंग आ चुके हैं. कभी मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके होते हैं तो कभी संसद को निशाना बनाया जाता है तो कभी 26/11 हो जाता है. जगह बदल जाती है, मरने वालों के नाम बदल जाते हैं, लेकिन हिंसा अपने उसी रूप में मौजूद होती है. और हर बार उंगली एक ही तरफ उठती है. इसलिए सब समस्याओं का एक ही समाधान नजर आता है. लेकिन क्या जंग समाधान है? इस वक्त भी दुनिया में कई जगह जंगें चल रही हैं लेकिन जंग से चीजें सुलझती नजर कहीं नहीं आतीं. और हम तो ऐसे दो देशों के जंग की बात कर रहे हैं जो परमाणु हथियारों से लैस हैं.
तस्वीरों में: युद्ध के ये विकल्प हैं भारत के पास
पाकिस्तान से होने वाले आतंकी हमलों के बाद हर बार भारत के सामने एक ही सवाल होता है कि क्या जवाब दें. एक नजर भारत सरकार के पांच संभावित कदमों पर:
तस्वीर: picture-alliance/dpa/Press Information Bureauभारत में कई राजनेता और पूर्व सैन्य अफसर सरकार से मांग कर रहे हैं कि वो सीमा पार कर पाकिस्तान में आंतकवादी ट्रेनिंग कैंपों पर हवाई हमले करे. लेकिन जानकारों का कहना है कि भारत के पास इस तरह की क्षमता नहीं है. उसने कभी पहले ऐसा नहीं किया और इससे बड़ी जंग शुरू होने का खतरा है. वहीं कुछ लोगों की राय है कि भारत को गुपचुप तरीके से नियंत्रण रेखा के उस पार अभियान चलाना चाहिए.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/J. Singhभारत अमेरिका और अन्य सहयोगी देशों को दशकों से इस बात के लिए राजी करने में जुटा है कि पाकिस्तान को ‘एक आतंकवादी राष्ट्र’ मानते हुए अलग थलग किया जाए ताकि उस पर अपने यहां से सक्रिय चरमपंथियों पर कार्रवाई करने का दबाव पड़े. लेकिन भारत की ये कोशिशें अब तक कोई खास रंग नहीं ला पाई हैं.
तस्वीर: Reutersभारतीय मीडिया ये भी कह रहा है कि भारत को पाकिस्तान से अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लेना चाहिए. पाकिस्तान उच्यायुक्त को दिल्ली से निकालने की मांगें भी उठ रही हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/Press Information Bureauभारत पर अकसर आरोप लगते रहे हैं कि वो पाकिस्तान के संसाधनों से मालामाल बलूचिस्तान प्रांत में अलगाववादी गुटों को मदद दे रहा है. 2016 में लाल किले से अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने बलूचिस्तान के संघर्ष का जिक्र किया और वहां के लोगों को खुले तौर पर समर्थन जताया. विशेषज्ञ कहते हैं कि बलूचिस्तान के स्वतंत्रता संघर्ष को जोर शोर से उठा कर मोदी पाकिस्तान पर दबाव बना सकते हैं.
तस्वीर: DW/A.Sherjanविशेषज्ञों का कहना है कि भारत पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए अभियान शुरू कर सकता है. ठीक वैसे ही प्रतिबंध जैसे अमेरिका ने ईरान पर लगाए थे. लेकिन इनका असर ज्यादा हो पाएगा, ये कहना मुश्किल है क्योंकि पाकिस्तान के साथ भारत का अपना व्यापार बहुत ही कम है. अगर बहुत सारे देशों को भारत ऐसे प्रतिबंधों लगाने के लिए राजी कर ले तो दूसरी बात है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/S. Shahzad तो फिर समाधान क्या है. एक है समाधान सुरक्षा को चाकचौबंद बनाना. जितने भी आतंकवादी हमले भारत की सरजमीन पर हुए, उनमें सीमापार से कोई मिसाइल या गोला नहीं दागा गया. आतंकवादियों ने भारत में आकर ही उन्हें अंजाम दिया है. पहले पठानकोट और अब उड़ी, सेना के ठिकानों तक आतंकवादियों का पहुंच जाना चिंता की बात है. जंग के समर्थकों को ये भी नहीं भूलना चाहिए, भारत का एक बड़ा पड़ोसी हमेशा पाकिस्तान के पाले में खड़ा है. चीन, जिसके साथ पाकिस्तान अपनी दोस्ती को ‘समंदर से गहरी, हिमालय से ऊंची और शहद से मीठी' बताता है, और चीन ने इस बात को सही साबित करने में कभी कसर नहीं छोड़ी है. वहीं भारत शायद अमेरिका से इतनी उम्मीद नहीं कर सकता.
इसलिए भारत को जंग राजनयिक मोर्चे पर लड़नी होगी. लगता है, सरकार उसी दिशा में आगे बढ़ रही है. आज की दुनिया में लड़ाइयां आर्थिक मोर्चे पर भी लड़ी जाती है. युद्ध के मोर्चे पर शायद पाकिस्तान पीछे न हटे, लेकिन आर्थिक लिहाज से उसकी हालत बहुत खस्ता है. हाल के दिनों में पाकिस्तान को लेकर अमेरिका में अविश्वास भी बढ़ा है. अमेरिका अब तक पाकिस्तान का बड़ा मददगार रहा है. जब से पाकिस्तान ‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई' में अमेरिका का साथी बना है, उसे अरबों डॉलर मिले हैं. लेकिन अब घेरा तंग हो रहा है.
तस्वीरों में: कश्मीर मुद्दे की पूरी रामकहानी
आजादी के बाद से ही कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में एक फांस बना हुआ है. कश्मीर के मोर्चे पर कब क्या क्या हुआ, जानिए.
तस्वीर: AFP/R. Bakshi
बंटवारे के बाद पाकिस्तानी कबायली सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया तो कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ विलय की संधि की. इस पर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया.
तस्वीर: dapdभारत ने कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाया. संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 47 पास किया जिसमें पूरे इलाके में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई.
तस्वीर: Keystone/Getty Imagesलेकिन प्रस्ताव के मुताबिक पाकिस्तान ने कश्मीर से सैनिक हटाने से इनकार कर दिया. और फिर कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया गया.
तस्वीर: Getty Imagesभारतीय कश्मीर में चुनाव हुए और भारत में विलय का समर्थन किया गया. भारत ने कहा, अब जनमत संग्रह का जरूरत नहीं बची. पर संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तान ने कहा, जनमत संग्रह तो होना चाहिए.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/F. Khanजनमत संग्रह समर्थक और भारत में विलय को लटका रहे कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया. जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने भारत में कश्मीर के विलय पर मुहर लगाई.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/F. Khanभारत के संविधान में जम्मू कश्मीर को भारत के हिस्से के तौर पर परिभाषित किया गया.
तस्वीर: picture-alliance / dpaचीन ने 1962 की लड़ाई भारत को हराया और अक्साई चिन पर नियंत्रण कर लिया. इसके अगले साल पाकिस्तान ने कश्मीर का ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट वाला हिस्सा चीन को दे दिया.
तस्वीर: Getty Imagesकश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ. लेकिन आखिर में दोनों देश अपने पुरानी पोजिशन पर लौट गए.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/J. Singhदोनों देशों का फिर युद्ध हुआ. पाकिस्तान हारा और 1972 में शिमला समझौता हुआ. युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा बनाया गया और बातचीत से विवाद सुलझाने पर सहमति हुई.
तस्वीर: APभारत ने सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण कर लिया, जिसे हासिल करने के लिए पाकिस्तान कई बार कोशिश की. लेकिन कामयाब न हुआ.
तस्वीर: APजम्मू कश्मीर में विवादित चुनावों के बाद राज्य में आजादी समर्थक अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ. भारत ने पाकिस्तान पर उग्रवाद भड़काने का आरोप लगाया, जिसे पाकिस्तान ने खारिज किया.
तस्वीर: APगवकदल पुल पर भारतीय सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 100 प्रदर्शनकारियों की मौत. घाटी से लगभग सारे हिंदू चले गए. जम्मू कश्मीर में सेना को विशेष शक्तियां देने वाले अफ्सपा कानून लगा.
तस्वीर: AFP/Getty Images/Tauseef Mustafaघाटी में 1990 के दशक में हिंसा जारी रही. लेकिन 1999 आते आते भारत और पाकिस्तान फिर लड़ाई को मोर्चे पर डटे थे. कारगिल की लड़ाई.
तस्वीर: picture-alliance/dpaभारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की कोशिशें पहले संसद पर हमले और और फिर मुबई हमले समेत ऐसी कई हिंसक घटनाओं से नाकाम होती रहीं.
तस्वीर: picture-alliance/Pacific Press/F. Khanभारतीय सेना की गोली लगने से एक प्रदर्शनकारी की मौत पर घाटी उबल पड़ी. हफ्तों तक तनाव रहा और कम से कम 100 लोग मारे गए.
तस्वीर: picture-alliance/Pacific Press/U. Asifसंसद पर हमले के दोषी करार दिए गए अफजल गुरु को फांसी दी गई. इसके बाद भड़के प्रदर्शनों में दो लोग मारे गए. इसी साल भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मिले और तनाव को घटाने की बात हुई.
तस्वीर: Reutersप्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ गए. लेकिन उसके बाद नई दिल्ली में अलगाववादियों से पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात पर भारत ने बातचीत टाल दी.
तस्वीर: Reutersबुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में आजादी के समर्थक फिर सड़कों पर आ गए. अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और गतिरोध जारी है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/R.S.Hussain14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में 46 जवान मारे गए. इस हमले को एक कश्मीरी युवक ने अंजाम दिया. इसके बाद परिस्थितियां बदलीं. भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना हुआ है.
तस्वीर: Reuters/Y. Khaliq22 जुलाई 2019 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दावा किया की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर मुद्दे को लेकर मध्यस्थता करने की मांग की. लेकिन भारत सरकार ने ट्रंप के इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि कश्मीर का मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझेगा.
तस्वीर: picture-alliance5 अगस्त 2019 को भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक संशोधन विधेयक पेश किया. इस संशोधन के मुताबिक अनुच्छेद 370 में बदलाव किए जाएंगे. जम्मू कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा. लद्दाख को भी एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा. धारा 35 ए भी खत्म हो गई है.
तस्वीर: Reuters यह सही है कि कई बार चुनाव या उससे पहले वादे करना जितना आसान होता है, उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल होता है. लेकिन एकदम जंग करने जैसा फैसला सिर्फ इसलिए नहीं लिया जा सकता कि "मोदी जी ने चुनाव प्रचार के वक्त पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कही थी". वैसे भी चुनावी वादे राजनेताओं के लिए सत्ता हासिल करने का जरिया होते है, लेकिन वो अकसर सरकार या राष्ट्र की नीतियों की बुनियाद नहीं होते. अब मोदी को देश की सत्ता संभाले लगभग ढाई साल हो गए हैं. अगर वो जंग न करने का फैसला करते हैं तो इसे वादा न निभाने की बजाय उनके राजनीतिक रूप से परिपक्व होने के रूप में भी देखा जा सकता है. हालांकि आलोचकों के लिए गले ये बात कभी नहीं उतरेगी और सोशल मीडिया पर घमासान अभी कुछ दिन और होता रहेगा.
ब्लॉग: अशोक कुमार
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