पिछले साल आई इरफान खान की फिल्म "हिन्दी मीडियम" ने भारत में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच के अंतर को बखूबी उजागर किया. लेकिन इस देश में सरकारी स्कूल प्राइवेट जितने ही अच्छे हैं.
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भारत में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. क्लासरूम के हालात हों या टीचर के पढ़ाने का तरीका, हर चीज में फर्क साफ पता चलता है. ऐसे में कम आमदनी होने के बाद भी लोग भारी फीसों वाले प्राइवेट स्कूलों में ही अपने बच्चों को भेजना पसंद करते हैं. लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं है. यहां मात्र 9 फीसदी बच्चे ही प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं. जाहिर है सरकारी और प्राइवेट की फीस में यहां भी बड़ा अंतर है. जहां सरकारी स्कूलों में बच्चे लगभग मुफ्त में पढ़ते हैं, वहीं प्राइवेट स्कूलों में कम से कम लाख रुपये की फीस लगती है.
लेकिन बावजूद इसके दोनों स्कूलों के नतीजे एक जैसे हैं. एक ताजा शोध के अनुसार बच्चों के स्तर में कोई फर्क देखने को नहीं मिला है. फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन द्वारा किए गए इस शोध में 67,000 बच्चों का सर्वे किया गया. उनकी जर्मन और अंग्रेजी को परखा गया, गणित के सवाल दिए गए. नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजी और जर्मन भाषा के टेक्स्ट को जितनी अच्छी तरह प्राइवेट स्कूल के बच्चे पढ़ और समझ सके, उतने ही अच्छे से सरकारी स्कूल के बच्चों ने भी पढ़ा. 9वीं क्लास में भी यही नतीजा मिला और चौथी में भी.
स्कूल का पहला दिन यादगार होता है. कुछ बच्चे उत्साहित और रोमांचित होते हैं तो कुछ दूसरे डरे हुए होते हैं. जर्मनी में स्कूल का पहला दिन परंपराओं से भरा है जिनमें कुछ तो सैकड़ों साल पुरानी हैं.
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तोहफों का डब्बा
जर्मनी में पहले दिन स्कूल जाने वाले बच्चों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है तोहफों से भरा कोणदार डब्बा जिसे जर्मन में शूलटुइटे कहते हैं. बचपन भुलाकर अगले 12-13 साल रोज स्कूल जाने की तकलीफ कम करने के लिए बच्चों को चॉकलेट और मिठाइयों का उपहार दिया जाता है. ये परंपरा 19वीं सदी के शुरू से चली आ रही है.
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नई जिंदगी
जब अगस्त या सितंबर में स्कूल शुरू होता है तो पहली क्लास में जाने वाले ज्यादातर बच्चे छह साल के होते हैं. उनमें से अधिकांश प्री-स्कूल या किंडरगार्टन में कुछ साल गुजार चुके होते हैं. ये जर्मनी में शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं. शिक्षा देने की शुरुआत पहली क्लास से ही होती है. इसलिए बच्चों और माता-पिता के लिए स्कूल का पहला साल चुनौतियों वाला होता है.
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सही बस्ता
स्कूल शुरू होने के पहले माता-पिता अपने बच्चों के लिए स्कूल बैग खरीदते हैं. इसे जर्मन में शूलरांसेन कहा जाता है. यह इस तरह बना होता है कि किताबें टेढ़ी न हों और लंच बॉक्स का खाना ना बिखरे. बाद में चलकर जींस से बने स्कूल बैग अहम हो जाते हैं लेकिन पहली क्लास के बच्चों के लिए सबसे ट्रेंडी बैग खरीदना महत्वपूर्ण होता है. इस साल स्टार वॉर्स ट्रेंड में हैं.
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जरूरी चीजें
स्कूल बैग खरीदने के बाद स्कूल में काम आने वाली जरूरी चीजों की खरीदने की बारी आती है. आखिरकार स्कूल बैग में पेन, पेंसिल, रूलर और फोल्डर जैसे सारे जरूरी औजार तो होने ही चाहिए. जर्मनी में आमतौर पर छोटे बच्चे स्कूल में लंच नहीं करते. वे सुबह का नाश्ता घर में करते हैं, दोपहर से पहले का स्नैक या पाउजेनब्रोट साथ ले जाते हैं और दिन का खाना या तो घर पर या डेकेयर सेंटर में करते हैं.
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यादगार दिन
दुनिया भर में बहुत से बच्चे स्कूल के पहले दिन क्लास के साथ फोटो खिंचवाते हैं. जर्मनी में वे अपना तोहफों का डब्बा हाथ में लिए होते हैं जो अक्सर उनसे ज्यादा बड़ा होता है. और उस पर लिखा होता है, स्कूल में मेरा पहला दिन. ज्यादातर बच्चों के लिए ये उनके बड़े दिन की पराकाष्ठा नहीं होती. इसलिए अक्सर वे उन्हें स्कूल पहुंचाने आए माता-पिता या रिश्तेदारों से तस्वीर खिंचवाने में उत्साह नहीं दिखाते .
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धार्मिक परंपरा
जर्मनी में स्कूल का पहला दिन क्लास के साथ नहीं बल्कि बच्चों के लिए एक स्वागत समारोह के साथ मनाया जाता है. इसमें बच्चों के माता-पिता, रिश्तेदार और परिवार के साथी भाग लेते हैं. इस परंपरा में ईसाई बहुल जर्मनी में गिरजे में प्रार्थना सभा की परंपरा भी शामिल है जहां बच्चों को शिक्षा के सफर पर शुभकामनाएं दी जाती हैं. कुछ स्कूल मुस्लिम छात्रों के लिए अंतरधार्मिक सभा का आयोजन करते हैं.
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अनुभवियों से मिलता निर्देश
स्कूल के पहले दिन होने वाले स्वागत समारोह में दूसरी क्लास के बच्चे और टीचर प्रदर्शनों के जरिये बताते हैं कि स्कूल कैसे चलता है. कुछ स्कूलों में पहले क्लास के बच्चों की देखभाल और मदद की जिम्मेदारी तीसरी या चौथी क्लास के बच्चों को दी जाती है ताकि वे छोटे बच्चों के तंग करने के बदले ज्ञान की खोज की नई राह पर उनका साथ दें और उनकी मदद करें.
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अपना घर समझो
स्वागत समारोह का एक हिस्सा स्कूल का भ्रमण भी होता है. पहली क्लास के बच्चों को स्कूल टूर के दौरान उनका क्लास दिखाया जाता है. स्कूल के आकार के हिसाब से क्लास 1ए, 1बी और 1सी जैसे सेक्शनों में बंटा होता है. यहां बोर्ड पर लिखा है कक्षा 1ए के बच्चों का स्वागत है. बच्चों को क्लास के अलावा वे जरूरी चीजें भी बताई जाती है जिनकी उन्हें स्कूल में आने वाले दिनों में जरूरत होगी.
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पारिवारिक समारोह
स्कूल का औपचारिक समारोह खत्म हो जाने के बाद परिवार में जश्न मनाने की बारी आती है. मात-पिता अक्सर नाना-नानी, दादा-दादी और दूसरे रिश्तेदारों को खाने पर या शाम में केक पर बुलाते हैं ताकि वे युवा छात्र को शिक्षा की साहसिक डगर पर सम्मान के साथ विदा कर सकें. बच्चों के लिए यह मौका तंग होने के बदले खुशी का होता है क्योंकि मेहमान उनके लिए तोहफे लेकर आते हैं.
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असली पहला दिन
समारोह खत्म हो जाने, केक खा लिए जाने और तोहफों के डब्बे खोल लिए जाने के बाद आता है स्कूल का सचमुच का पहला दिन. बच्चों को अकेले अपनी क्लास खोजनी होती है. जर्मनी में प्राइमरी स्कूलों में आम तौर पर पहली से चौथी क्लास तक की पढ़ाई होती है. उसके बाद छात्र माध्यमिक शिक्षा के लिए तीन प्रकार के स्कूलों में से एक का चुनाव करते हैं.
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हालांकि जहां तक भाषा को सुन कर समझने का सवाल है, तो इसमें प्राइवेट स्कूल के बच्चे बेहतर निकले. लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसमें स्कूल से ज्यादा परिवारों की भूमिका है. जो बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, उनके माता पिता आर्थिक रूप से सशक्त हैं और उनके घर में बेहतर भाषा का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा प्राइवेट स्कूल बच्चों को विदेश में एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए ले जाते हैं, जहां बच्चों को अपनी भाषा को सुधारने का मौका मिलता है. लेकिन क्लासरूम में मिले ज्ञान में कोई बड़ा फर्क देखने को नहीं मिलता है.
जर्मनी पत्रिका डेय श्पीगल में छपे लेख के अनुसार, अब तक जर्मनी में भी प्राइवेट स्कूलों को सरकारी से बेहतर माना जाता रहा है. यह धारणा इसलिए बनी क्योंकि नब्बे के दशक से प्राइवेट स्कूलों की तारीफ में बहुत कुछ लिखा जाता रहा है. कौन सा स्कूल बेहतर है, इसे नापने का एक ही पैमाना रहा है और वह है परीक्षा में बच्चों के अंक. लेकिन ताजा शोध में अन्य बातों पर भी ध्यान दिया गया है, जैसे बच्चे किस पृष्ठभूमि से आते हैं, उनके माता पिता जर्मन हैं या विदेशी, लड़कों की तुलना में लड़कियों का स्तर क्या है. इस शोध में एक जैसे परिवारों से आने वाले बच्चों की तुलना की गई है और नतीजा यह निकला है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सरकारी स्सेकूलों के बच्चों से बेहतर नहीं होते.
शिक्षा और साक्षरता के मामले में विकसित देशों में फिनलैंड का स्थान काफी ऊंचा है. इसका कारण फिनलैंड की असाधारण शिक्षा प्रणाली को बताया जाता है. देखिए क्या हैं वे खास बातें.
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देर से शुरुआत
अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की रैंकिंग में लगातार टॉप पर रहने वाले फिनलैंड के स्कूलों की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को आदर्श माना जाता है. पहला कारण बच्चों को ज्यादा लंबे समय तक बच्चे बने रहने देना है. यहां बच्चे करीब सात साल की उम्र में स्कूल जाना शुरु करते हैं जबकि भारत में 3 साल में.
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खेल खेल में पढ़ाई
बच्चों को हर घंटे के हिसाब से कम से कम 15 मिनट खेल के मैदान में बिताने ही होते हैं. ऐसा पाया गया है कि खेल के बाद बच्चों का पढ़ाई में काफी ध्यान लगता है. जिसको ध्यान में रखते हुए फिनलैंड में बच्चों को लगातार कक्षा में नहीं बैठाया जाता.
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परीक्षा का बोझ नहीं
फिनलैंड का राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड बताता है कि "शिक्षा का जोर परखने से अधिक सिखाने पर है." यहां हाई स्कूल में स्कूल छोड़ने के पहले एक अनिवार्य परीक्षा देनी होती है. उसके पहले की क्लासों में शिक्षक बच्चों के असाइनमेंट पर विस्तार से केवल अपना फीडबैक देते हैं, कोई ग्रेड या अंक नहीं.
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शिक्षक का सम्मान
फिनलैंड में शिक्षकों को नए नए प्रयोग करने की पूरी आजादी होती है. शिक्षक का पेशा बहुत इज्जत से देखा जाता है और इसके लिए आपको कम से कम मास्टर्स डिग्री लेना जरूरी होता है. ओईसीडी का सर्वे दिखाता है कि शिक्षक बच्चों पर होमवर्क का बोझ भी नहीं डालते. फिनलैंड के किशोर हफ्ते में औसतन 2.8 घंटे ही होमवर्क में लगाते हैं.
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हर हुनर की कीमत
फिनलैंड में 1960 के दशक में नए शिक्षा सुधार लाए गए. यह सबके लिए मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराने के सिद्धांत पर आधारित है. यहां हर बच्चे पर ध्यान देकर उसके किसी खास हुनर को पहचानने और उसे बढ़ावा देने पर जोर होता है.
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डिजिटल दुनिया के लिए तैयार
दुनिया में कुछ ही देशों में बच्चों को डिजिटल युग के लिए ठीक से तैयार किया जा रहा है. फिनलैंड उनमें से एक है क्योंकि 2016 तक ही यहां के सभी प्राइमरी स्कूलों में कोडिंग उनके पाठ्यक्रम का एक मुख्य विषय होगा. कोडिंग की मदद से ही कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, ऐप और वेबसाइटें बनाई जाती हैं.
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मुफ्त पर बहुमूल्य शिक्षा
फिनलैंड में केवल स्कूल ही नहीं बल्कि कॉलेज की पढ़ाई भी मुफ्त है. यहां प्राइवेट स्कूल नहीं होते. धीमी गति से सीखने वाले बच्चों के लिए खास संस्थान हैं. सालाना करीब दो प्रतिशत बच्चे इन विशेष संस्थानों में जाते हैं.