गैस महंगी, मिट्टी का चूल्हा मजबूरी: गांव लौट रहे कई मजदूर
२ अप्रैल २०२६
बिहार के खगड़िया की रंजू देवी 10 साल से दिल्ली के रोहिणी इलाके की एक झुग्गी में रह रही हैं. वह घरेलू कामगार हैं. उनके पति मनोहर दिहाड़ी मजदूर हैं. दोनों मिलकर महीने में 15,000 रुपये तक कमा लेते हैं. रंजू देवी के घर के ठीक बाहर, एक कोने में मिट्टी का चूल्हा नजर आता है.
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यह चूल्हा उन्होंने हाल ही में बनाया, या कहें कि बनाना पड़ा. वजह बताते हुए रंजू देवी कहती हैं कि पिछले एक महीने से उनके जैसे कई परिवार गैस सिलिंडर नहीं भरवा पा रहे हैं. इन दिनों वह लकड़ी से खाना बना रही हैं.
होर्मुज का असर सीधा लोगों की रसोई पर
पश्चिम एशिया में अमेरिका-इस्राएल का ईरान के साथ युद्ध जारी है. जंग के कारण दुनियाभर में एलपीजी की आपूर्ति घट गई है. होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की बंद आवाजाही, हजारों किलोमीटर दूर रंजू देवी जैसे परिवारों की रसोई पर सीधा असर डाल रही है.
इस बीच सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने 1 अप्रैल से 19 किलो वाले कमर्शियल एलपीजी सिलिंडर की कीमत में 195.50 रुपये की बढ़ोतरी कर दी. अब दिल्ली में इसकी कीमत 1,883 रुपये से बढ़कर 2,078.50 रुपया हो गई है. हालांकि, घरेलू रसोई गैस की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. आखिरी बार 7 मार्च को घरेलू एलपीजी सिलेंडर का दाम 60 रुपया बढ़ाया गया था.
दिल्ली की कच्ची बस्तियों में रहने वालों में बहुत से लोग खाना बनाने के लिए पांच किलो का छोटा सिलिंडर इस्तेमाल करते है. ये सिलिंडर धड़ल्ले से बिकते हैं, भरवाए जाते हैं, लेकिन इनकी वैधता संदिग्ध है. क्योंकि, जिन जगहों पर इन्हें भरवाया जाता है वे अक्सर व्यावसायिक सिलिंडरों से रिफिल करते हैं. नतीजतन, ये विकल्प वैसे ही कुछ महंगा पड़ता है.
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पांच किलो का सिलेंडर कुछ-कुछ दिनों में भरवाना पड़ता है. इस्तेमाल करने वाले बताते हैं कि चार लोगों के परिवार को आमतौर पर हर हफ्ते करीब दो से ढाई किलो गैस की जरूरत पड़ती है. ईरान युद्ध से पहले, अनियमित बाजार में गैस की कीमत करीब 100 रुपया प्रति किलो थी. अब यह बढ़कर 350 से 400 रुपया प्रति किलो हो गई है.
गैस छोड़ मिट्टी का चूल्हा पकड़ा, लकड़ी भी महंगी हुई
दिल्ली की कच्ची बस्तियों में करीब 50 लाख से अधिक आबादी रहती है. इनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की है. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अनुसार, 78 प्रतिशत से ज्यादा परिवारों की मासिक आय 20,000 रुपये से कम है. ऐसे में गैस की कीमत बढ़ने और सिलेंडर की कमी ने यहां बहुत से लोगों को चूल्हे पर खाना बनाने के लिए मजबूर कर दिया है.
ऊपर से अब जलावन भी महंगा हो गया है. लकड़ी का बजट समझाते हुए रंजू देवी बताती हैं, "चार लोगों के लिए एक वक्त का खाना बनाने में कम-से-कम डेढ़ किलो लकड़ी लगती है. पहले 10 से 12 रुपये किलो मिलने वाली लकड़ी अब 20 रुपये किलो बिक रही है. मुझे डर है हालत कोविड जैसी हो सकती है, और शायद लॉकडाउन भी लग जाए. इसलिए मैंने 50 किलो लकड़ी जमा करके रख ली है."
"कुछ दिन दही-चूड़ा खाकर गुजारा किया"
रंजू देवी के तीन बच्चे हैं. उनका स्कूल चार किलोमीटर दूर है. बच्चों के स्कूल आने-जाने के लिए उन्होंने एक रिक्शा लगवाया हुआ था. जब खाना बनाने पर खर्च बढ़ा, तो रिक्शा छुड़वाना पड़ा. रंजू देवी बताती हैं, अब स्कूल आने-जाने में एक बच्चे का 40 रुपया खर्च होता है.
कटौती के लिए वह अपने दो बच्चों को ही स्कूल भेज पा रही हैं, सबसे छोटे बच्चे का स्कूल फिलहाल छूट गया है. वह बताती हैं कि सिर्फ जलावन ही नहीं बल्कि आटा, चावल और तेल की कीमत भी बढ़ गई है. ऐसे में एक बच्चे को स्कूल न भेजकर पैसे बचाना ही उन्हें मुनासिब लग रहा है.
सहरसा की पिंकी कुमारी भी अपने पति के साथ इसी झुग्गी में रहती हैं. उन्होंने पिछले महीने बेटी को जन्म दिया. इसलिए फिलहाल घर में कमाने वाले सिर्फ उनके पति हैं. वह डिलीवरी का काम करते हैं और महीने का करीब 10,000 रुपया कमा लेते हैं. पिंकी भी अब लकड़ी से खाना बना रही हैं.
जलावन की कम खपत के लिए वह सुबह के खाने के साथ ही एक कटोरी ज्यादा चावल उबाल लेती हैं. ताकि उन्हें दोपहर को दोबारा चूल्हा न जलाना पड़े. वह बताती हैं, "चूल्हे पर खाना बनाने से मेरी सांस फूलने लगती है. लकड़ी महंगी हो गई है. मैंने कुछ दिन दही-चूड़ा खाकर गुजारा किया, लेकिन मेरी तबीयत खराब हो गई और मुझे लगता है कि इससे मेरी बच्ची को सर्दी लग गई. अब मैं सोच रही हूं कि कुछ दिनों के लिए गांव चली जाऊं, लेकिन वहां काम नहीं है."
"दो हफ्ते से खाना नहीं बनाया, रोटी-नमक-दही से पेट भर रहे हैं"
गोरखपुर के आकाश कुमार एक फैक्ट्री में काम करते हैं. वह दिल्ली में अपने दो दोस्तों के साथ रहते हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "सिलेंडर खत्म हो गया है. दो हफ्ते से खाना नहीं बनाया है. हमारा कमरा चारों तरफ से बंद है, इसलिए मकान मालिक घर में आग या चूल्हा जलाने से मना करता है. इंडक्शन के लिए अलग तरह के बर्तन चाहिए. ढाबे का खाना भी महंगा हो गया है. हम रोटी, नमक, और दही से पेट भर रहे हैं."
प्रदीप कुमार, शाहबाद डेरी में मिठाई की दुकान और छोटा ढाबा चलाते हैं. वह बताते हैं, "12 रुपये की रोटी कोई नहीं खा रहा है, ऐसे में ढाबा बंद होने की कगार पर है. जितनी गैस बची है, उसी में चाय बेच रहा हूं. पहले 10 रुपये की चाय अब 15 रुपये में बेचनी पड़ रही है. लोग इतनी महंगी चाय नहीं पीना चाहते. मुझे बहुत नुकसान हुआ है."
घरों पर लटका है ताला
शाहबाद डेरी की झुग्गी के कई घरों पर ताला दिखा. यहां रह रहीं नौरीन सबा ने बताया कि लोगों के घर पर न होने की कई वजहें हैं. कुछ लोग मार्च के आखिर में चैती छठ के लिए गांव गए थे. इस बीच लॉकडाउन की अफवाह फैल गई, तो कई लोग लौटे नहीं. ऊपर से किराने का सामान भी महंगा हो गया है.
नौरीन बताती हैं, "10 किलो आटे की बोरी 350 रुपये में मिलती थी. अब उसका दाम 400 रुपया कर दिया है. यहां हर कमरे का किराया तीन से पांच हजार रुपये है. महंगाई और लॉकडाउन के डर से लोग गांव जा रहे हैं, ताकि किराए पर खर्च बच जाए."
मालदा से दिल्ली आईं माया भी बताती हैं कि उनके पड़ोसी पिछले हफ्ते गांव चले गए. माया का कहना है कि फैक्ट्री और कोठियों में काम करने वालों की तनख्वाह नहीं बढ़ रही है, जबकि महंगाई आसमान छू रही है. वह कहीं से लकड़ी का एक टूटा दरवाजा खोजकर लाई हैं और इसी लकड़ी से चूल्हा जला रही हैं.
माया कहती हैं, "इंसान कुछ दिन अपनी बाकी जरूरतों को त्याग सकता है, लेकिन खाना नहीं रोक सकता. इस महीने खर्च चलाने के लिए मुझे 3,000 रुपया उधार लेना पड़ा. उधार में रहने से बेहतर है कि हालत सुधरने तक गांव ही लौट जाएं." यहां रह रहे कई लोगों को गैस की किल्लत का कीमत बढ़ने की वजह नहीं पता है. पूछने पर माया जवाब देती हैं, "मुझे इसका सही कारण नहीं पता. बस इतना सुनते हैं कि कहीं हिंदू और मुसलमानों में लड़ाई चल रही है."
माया को यह जानकारी भी नहीं है कि सरकार पेट्रोल पंपों पर केरोसिन उपलब्ध कराने जा रही है. दरअसल, 29 मार्च को जारी सरकारी नोटिफिकेशन के तहत 21 राज्यों में पीडीएस के जरिए केरोसिन के एड-हॉक आवंटन और चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर इसकी बिक्री की अनुमति दी गई है. माया कहती हैं, "हमारे पास गाड़ी नहीं है. केरोसिन लेने कैसे जाएंगे? ऊपर से उसके लिए अलग चूल्हा खरीदना पड़ेगा. जब खाने और घर भेजने के पैसे नहीं हैं, तो उसे कैसे खरीदेंगे?"
गैस गायब, अब लकड़ी की कीमत बेलगाम!
डीडब्ल्यू ने कीर्ति नगर में एक गैस एजेंसी के मालिक गौरव शुक्ला से एलपीजी उपलब्धता पर बात की. उन्होंने बताया, "हमें ही पीछे से गैस नहीं मिल रही, तो हम दूसरों को कैसे दें." छोटे सिलिंडरों में गैस भरने वाले ज्यादातर दुकानदार कथित तौर पर ब्लैक में बाजार से बड़े गैस सिलेंडर खरीदते हैं और कुछ मुनाफे पर प्रति किलो गैस बेचते हैं.
साकेत में 'कुमार कोल कंपनी' के मालिक मनीष बताते हैं कि वह लकड़ी 15 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रहे हैं, "पिछले दो हफ्तों में जलाने वाली लकड़ी की बिक्री 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ी है. हर दुकानदार अपनी मर्जी से कीमत तय कर रहा है."
"कई मजदूर काम छोड़कर जा चुके हैं, ढाबों का शटर गिर गया है"
धर्मेंद्र कुमार अमेजॉन इंडिया वर्कर्स यूनियन से जुड़े हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि मानेसर स्थित कंपनी के गोदाम में कई मजदूर काम छोड़कर जा चुके हैं. आसपास के ढाबों का शटर गिर गया है. मजदूरों के पास गोदाम की कैंटीन ही एक सहारा थी. मगर गैस सिलिंडर की कमी के कारण वहां भी असर पड़ा है. कैंटीन में समोसे की कीमत 10 रुपये से बढ़कर 15 रुपये हो गई है.
धर्मेंद्र कुमार बताते हैं, "ये सभी प्रवासी मजदूर हैं. उन्हें यहां आने के बाद किसी तरह की सब्सिडी और सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता. एलपीजी के दाम बढ़ने से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं. 12,000 रुपये महीने की कमाई में उनका गुजारा मुश्किल हो गया है. अभी के समय और कोविड के समय में बस इतना फर्क है कि इस बार मकान मालिक उन्हें घर खाली करने के लिए नहीं कह रहे हैं."
'क्रांतिकारी मजदूर पार्टी' की सदस्य अदिति कहती हैं, "दिल्ली सरकार ने तंदूर बंद करने को कहा क्योंकि उसके धुएं से प्रदूषण होता है. अब सरकार केरोसिन और चूल्हे पर खाना बनाने को कह रही है. हम चाहते हैं कि सरकार सिलिंडर की कालाबाजारी पर रोक लगाए और हर नागरिक को साधारण दर पर सिलिंडर उपलब्ध कराया जाए."