ईरान‑इस्राएल संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर विस्थापन के बावजूद जर्मनी में प्रवासन का दबाव नहीं बढ़ा है. जर्मन सरकार ने एहतियातन सीमाओं पर सख्त जांच जारी रखते हुए हालात पर कड़ी नजर रखने की बात कही है.
जर्मनी ने अपनी सीमाओं पर सख्ती बढ़ा दी हैतस्वीर: Lisi Niesner/REUTERS
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मध्य पूर्व में जारी जंग के कारण लाखों लेबनानी और ईरानी लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं, लेकिन जर्मनी के गृह मंत्री आलेक्जांडर डोब्रिंट का कहना है कि इससे अब तक यूरोप की ओर कोई बड़ा पलायन शुरू नहीं हुआ है.
डोब्रिंट ने कहा कि अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण अब तक यूरोप में शरण लेने वालों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई है, हालांकि यूरोपीय अधिकारी एहतियाती कदम उठा रहे हैं.
बदलते हालातों पर कड़ी नजर
शनिवार को प्रकाशित राइनिशे पोस्ट अखबार को दिए एक इंटरव्यू में डोब्रिंट ने कहा, "फिलहाल हमें प्रवासन का कोई बढ़ा हुआ दबाव नहीं दिख रहा है.” उन्होंने बताया कि अधिकारी ईरान और लेबनान जैसे देशों में लोगों की आवाजाही पर नजर रखे हुए हैं.
मध्य-पूर्व युद्ध की मार: दुबई की चमक पर पड़ा साया
खाड़ी देशों के दुबई जैसे शानदार शहर कभी लग्जरी और सुरक्षा की मिसाल हुआ करते थे. आज मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ने के बाद से वहां पर्यटन तो ठप हुआ ही है, इसकी साख भी दांव पर है.
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सब पड़ा है खाली
आम दिनों में दुबई के अल-सीफ बाजार में पर्यटकों का तांता लगा होता था लेकिन आज पूरा बाजार सुनसान है. अमेरिका-इस्राएल के ईरान पर हमला करने के बाद से बाजार का नजारा बिल्कुल उलट गया है.
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अमीरों की दुनिया
पिछले कई दशकों से दुबई के लिए एक बात कही जाती थी कि यह अमीरों की दुनिया है. दुनिया भर में कहीं किसी भी तरह का संघर्ष हो रहा हो, अमीरात की सीमाओं तक आते-आते सब थम जाता है. इस बार यह धारणा गलत साबित हुई. ईरान के जवाबी हमलों की चपेट में इस बार खाड़ी देश भी आ गए हैं, जिसने विदेशियों को यह क्षेत्र छोड़ के जाने के लिए मजबूर कर दिया है.
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हवाई अड्डे पर हमला
28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध शुरू होने के बाद से कई खाड़ी देशों ने लगातार अपने इलाके में मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. इस हमले में दुबई हवाई अड्डे के आस-पास कई ईंधन डिपो, अमेरिकी दूतावास और होटलों जैसे नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया.
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हवाई उड़ानें रद्द
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए दुबई हवाई अड्डा इस क्षेत्र के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है लेकिन यात्री विमानों की उड़ानें लगातार रद्द हो रही हैं. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों के बीच युद्ध की शुरुआत से ही इलाके के कई हवाई अड्डे आंशिक या सीमित क्षमता के साथ काम करने को मजबूर हैं.
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खाली पड़े समुद्री किनारे
दुबई के ब्रांड न्यू लग्जरी होटल जुमेराह मरसा अल अरब के समुद्री किनारे पर समुद्री पक्षियों के अलावा कोई नहीं है. विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के अनुसार पर्यटन में आई भारी गिरावट के कारण खाड़ी देशों को कम से कम 60 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है. साल 2025 में पर्यटन संयुक्त अरब अमीरात की जीडीपी का लगभग 12 फीसदी था.
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साख है दांव पर
दुबई के प्रमुख पर्यटन बाजार अल-सीफ के इस दुकानदार के लिए भी यह एक बड़ा झटका है. होटल, रेस्तरां और दुकान सभी इससे प्रभावित हुए हैं. ईरान के साथ छिड़ा युद्ध न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायी है बल्कि क्षेत्र की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है.
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कुछ सुरक्षित नहीं
अंतरराष्ट्रीय असमंजस के बीच पिछले कई सालों से खाड़ी देश खासकर दुबई खुद को निवेशकों और व्यवसायों के सामने एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था. केवल 2025 में ही लगभग 9,800 करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात में आकर बसे, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है.
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बंजर पड़े शहर
दुबई की गिनती दुनिया के सबसे अमीरों शहरों में की जाती है. टैक्स में भारी छूट, व्यवस्थित नौकरशाही और ‘गोल्डन वीजा प्रोग्राम’ ने इसे अमीरों और व्यवसायों के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया था. कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली जुमैरा बीच रेजिडेंस की सड़कें आज वीरान हैं.
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आर्थिक मॉडल संकट में
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध कितना लंबा चलता है, इस बार निर्भर करेगा कि देश की प्रतिष्ठा को कितना नुकसान पहुंचा है और निवेशक कितनी गति से पैसा खीचेंगे. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टिट्यूट के जिम क्रेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “दुबई का आर्थिक मॉडल कितना संकट में है, इसे कम आंकना मुश्किल है. युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैकल्पिक स्थानों की खोज उतनी ही तेज होगी.”
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‘पर्यटकों की याददाश्त कमजोर’
कुछ लोगों का मानना है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. जर्मन सोसाइटी फॉर टूरिज्म स्टडीज के प्रेसिडेंट युरगन श्मुडे ने जेडडीएफ को बताया, “पर्यटकों की याददाश्त कमजोर होती है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई संघर्ष या युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलता है तो पर्यटन स्थल को अधिक नुकसान नहीं पहुंचता है.
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डोब्रिंट के मुताबिक, "इस समय दोनों देशों में बड़ी संख्या में लोग अपने ही देश के भीतर स्थान बदल रहे हैं, लेकिन तुर्की सीमा पर अभी किसी दबाव के संकेत नहीं दिखते. तुर्की सीमा पर दबाव बढ़ना यूरोप की ओर नए प्रवासन की पहली बड़ी निशानी होगी.”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने से लेकर अप्रैल की शुरुआत तक इन दोनों देशों में 42.5 लाख से ज्यादा लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं.
डोब्रिंट ने कहा कि आने वाले सप्ताह यह बताएंगे कि मध्य पूर्व में हालात किस दिशा में जाते हैं और उनके कारण किस तरह की प्रवासन गतिविधियां होती हैं. उन्होंने यह संभावना भी खुली रखी कि जर्मनी में सीमा नियंत्रण को सितंबर के बाद भी बढ़ाया जा सकता है.
प्रवासन को लेकर सख्त नीति
पिछले साल मई में पद संभालने के तुरंत बाद डोब्रिंट ने जर्मनी की सभी नौ बाहरी सीमाओं पर सख्त जांच और प्रवेश से इनकार के आदेश दिए थे. यूरोपीय संघ के शेंगेन नियमों के तहत ऐसे कदम केवल अस्थायी रूप से ही उठाए जा सकते हैं. इन जांचों को अब तक दो बार बढ़ाया जा चुका है, क्योंकि जर्मनी प्रवासन को लेकर लगातार सख्त नीति अपना रहा है.
ईरान‑इस्राइल संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर विस्थापन के बावजूद जर्मनी में प्रवासन का दबाव नहीं बढ़ा है. जर्मन सरकार ने एहतियातन सीमाओं पर सख्त जांच जारी रखते हुए हालात पर कड़ी नजर रखने की बात कही है.