नौ साल पहले 27 दिसंबर को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या अभी तक रहस्य है. लेकिन एक बात साफ है कि उनकी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी देश की राजनीति में कोई बड़ी ताकत नहीं रह गई है.
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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और सबसे करिश्माई नेता बेनजीर भुट्टो की नौ साल पहले रावलपिंडी में एक चुनाव प्रचार के दौरान हत्या कर दी गई थी. उनके बेटे बिलावल जरदारी, जिन्हें बेनजीर ने अपनी वसीयत में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था, आज सिंध प्रांत के गढ़ी खुदा बख्श में अपने समर्थकों को संबोधित कर रहे हैं. लेकिन उनमें न तो अपनी मां या नाना जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह नेतृत्व के गुण हैं और न ही जनता का समर्थन. फिर भी 28 वर्षीय बिलावल पार्टी में नई जान फूंकने की जी जान से कोशिश कर रहे हैं. बिलावल जरदारी ने अक्टूबर में अपने समर्थकों से कहा था, "यदि लोग हमें समर्थन दें तो हम पाकिस्तान को बदल देंगे."
तस्वीरों में: 2016 में एशिया की सबसे बड़ी घटनाएं
एशिया के लिए 2016 राष्ट्रवादी राजनीति, युद्ध को लेकर बयानबाजी और क्षेत्रीय संघर्षों के नाम रहा. एक नजर इस साल की अहम घटनाओं पर.
साल के भीतर दो परमाणु परीक्षण
6 जनवरी को उत्तर कोरिया की सरकार ने बताया कि उसने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया है. बाद में पता चला कि वह एक "आम" परमाणु परीक्षण था. फरवरी में फिर उसने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण किया. 9 सितंबर को एक बार फिर दुनिया से अलग थलग इस देश ने एक परमाणु परीक्षण किया. यूएन ने उत्तर कोरिया पर और पाबंदियां लगा दीं.
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म्यांमार में सत्ता का ऐतिहासिक हस्तांतरण
करीब आधी सदी तक सेना के नियंत्रण में रहने के बाद म्यांमार का शासन सेना के हाथों से निकल कर नागरिक सरकार के हाथों में आया. 30 मार्च को टिन चॉ देश के पहले चुने हुए राष्ट्रपति बने. चॉ नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नेता ऑन्ग सान सू ची के करीबी सहयोगी माने जाते हैं. सू ची म्यांमार के नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नेता हैं.
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राष्ट्रपति दुटैर्टे की देश के भीतर जंग
5 मई को रोड्रिगो डुटेर्टे ने फिलिपींस के राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की. जून में सत्ता संभालने के बाद से ही उन्होंने ड्रग डीलरों और ड्रग्स के लती लोगों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी. आने वाले महीनों में नशा करने वालों को ढूंढ ढूंढ कर मारना शुरु हो गया. सुरक्षा बल अब तक ड्रग्स से संबंधित कई हजार लोगों को जान से मार चुके हैं.
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ताइवान में पहली महिला राष्ट्रपति
ताइवान में साई इंग-वेन इस द्वीपीय देश की राष्ट्रपति बनने वाली पहली महिला बनीं. पूर्व राष्ट्रपति की चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने की नीतियों का विरोध करने वाली मजबूत नेता वेन ने 16 जनवरी को चुनाव जीता. अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने डॉनल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की, जो चीन को बड़ी नागवार गुजरी.
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तालिबान प्रमुख की ड्रोन हमले में मौत
मई में मुल्ला अख्तर मंसूर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच के इलाके में अमेरिकी सेना के ड्रोन हमले में मारा गया. 2015 में आतंकी गुट के संस्थापक मुल्ला ओमर के मारे जाने के बाद मंसूर मुखिया बना था. अब मंसूर की मौत के बाद हैबतुल्ला अखुंदजादा को तालिबान ने नेता बनाया है.
साउथ चाइना सी पर जारी विवाद पर फैसला सुनाते हुए हेग की मध्यस्थता अदालत ने कहा है कि चीन का दक्षिण चीनी समुद्र पर कोई ऐतिहासिक हक नहीं है. साथ ही अदालत का कहना है कि चीन इस समुद्र में अपनी गतिविधियों से फिलिपींस के संप्रभुता के अधिकारों का हनन कर रहा है. चीन ने इस फैसले को नहीं माना और सेना की मदद से अपनी संप्रभुता और समुद्री हितों की रक्षा करने की बात कही.
4 सितंबर को पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को कैथोलिक संत की उपाधि दे दी. 1910 में मैसेडोनिया में जन्मी अल्बेनियाई मूल की समाज सेविका 1929 में भारत पहुंची थीं. सन 1979 में मदर टेरेसा को गरीबों और कुष्ठ रोगियों की सेवा के क्षेत्र में काम के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
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एक 'अनन्त सम्राट' का जाना
13 अक्टूबर को थाईलैंड के राजा भूमिबोल अदुल्यादेज के निधन के बाद देश में एक साल के शोक की घोषणा की गई. सन 1946 से राज करने वाले थाई राजा अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे. राजकुमार माहा वज्रालॉन्गकॉर्न भूमिबोल ने थाईलैंड के राजा राम दसवें के तौर पर दिसंबर की शुरुआत में पद संभाला.
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पाकिस्तान में खूनखराबा
पाकिस्तान के क्वेटा में 24 अक्टूबर को कुछ हथियारबंद हमलावरों ने एक पुलिस अकादमी पर हमला कर 61 कैडेट्स को मार डाला. इस हमले की जिम्मेदारी तथाकथित इस्लामिक स्टेट ने ली. अगस्त में एक आत्मघाती हमलावर ने इसी शहर के एक अस्पताल में घुसकर खुद को उड़ा दिया. इस हमले में भी 71 लोग मारे गए थे.
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दक्षिण कोरिया में राजनीतिक संकट
दक्षिण कोरिया में पिछले कई महीनों से सरकार-विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं. राष्ट्रपति पार्क गून-हे पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को बाद उन पर महाभियोग चलाया जा रहा है. दिसंबर की शुरुआत में ही देश की संसद में वोटिंग हुई और पार्क पर महाभियोग चलाने का निर्णय लिया गया और उन्हें पद से हटा दिया गया. 2017 की शुरुआत में संवैधानिक अदालत उनके राजनीतिक करियर पर अंतिम फैसला लेगी.
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अफगानिस्तान में जर्मन कंसुलेट पर हमला
10 दिसंबर को तालिबान के लड़ाकों ने उत्तरी अफगानिस्तान में मजारे शरीफ में जर्मन कंसुलेट पर हमला किया. हमले में कम से कम 4 लोग मारे गए और करीब 130 घायल हो गए. मरने वालों में कोई जर्मन नागरिक नहीं था. कुछ ही दिन बाद बागराम में अमेरिकी सैनिक अड्डे पर हमला हुआ जिसमें दो अमेरिकी सैनिक और अमेरिकी सेना के लिए काम करने वाले दो कर्मचारी मारे गए. (एस्थर फेल्डन/आरपी)
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अज्ञात हमलावरों द्वारा बेनजीर की हत्या के बाद से उनके पति आसिफ अली जरदारी अपने बेटे के साथ पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने 2008 का आम चुनाव जीता था. उसके बाद जरदारी देश के राष्ट्रपति बने. लेकिन 2013 के चुनाव में पार्टी बुरी तरह हार गई और भुट्टो के गढ़ सिंध के अलावा उसका हर कहीं सफाया हो गया. जरदारी की शासन भ्रष्टाचार, अक्षम प्रशासन भाई भतीजावाद और घरेलू इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्थान के साए में रहा. पार्टी समर्थकों को सबसे ज्यादा नाराज भुट्टो के हत्यारों को सजा देने में सरकार की अनिच्छा ने किया.
जरदारी की सरकार के आग्रह पर गठित संयुक्त राष्ट्र के एक आयोग ने 2010 की अपनी विस्तृत रिपोर्ट में कहा कि भुट्टो की सुरक्षा के इंतजाम अत्यंत अपर्याप्त थे और कुछ सैनिक एजेंसियों ने शुरुआती जांच में बाधा डालने की कोशिश की थी. देश के पूर्व सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ पर भी भुट्टो हत्या कांड में आरोप लगे. वे अपनी हिस्सेदारी ने इंकार करते हैं और आरोप तालिबान पर मढ़ते हैं जबकि कट्टरपंथी इस्लामी संगठन का कहना है कि उसने बेनजीर भुट्टो को नहीं मारा.
खानदानीराजनीतिकाअंत
पाकिस्तानी राजनीति में बहस अब बेनजीर भुट्टो की हत्या से आगे जा चुकी है. राजनीतिक परिदृश्य पर क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने इमरान खान जैसे दूसरे बड़े किरदार उभर आए हैं. नई पार्टियों को मध्य वर्ग के बड़े हिस्से से मिल रहे समर्थन की वजह यह है कि वे सुशासन पर जोर दे रहे हैं, खासकर भ्रष्टाचार और राजनीतिक उत्तरदायित्व पर. कुछ उदारवादी बुद्धिजीवियों को छोड़कर पाकिस्तान के अवाम समाजवादी क्रांति के नारों और भुट्टो खानदान के करिश्मे से आगे निकल चुकी है.
देखिए, पाकिस्तान में दहशत के 10 साल
अफगानिस्तान पर 2001 में तालिबान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई के बाद से पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हजारों लोगों की जान ली है. यहां तस्वीरों में पिछले एक दशक के कुछ प्रमुख कट्टरपंथी हमले.
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2017- शाहबाज कलंदर की मजार पर हमला
सिंध प्रांत के सेहवान में 16 फरवरी 2017 को एक सूफी संत शाहबाज कलंदर की मजार को निशाना बनाया जिसमें 70 से ज्यादा लोग मारे गए. आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने हमले की जिम्मेदारी ली है.
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2016 - क्वेटा पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज
24 अक्टूबर को क्वेटा के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज पर तीन आतंकवादियों ने हमला किया. इस हमले में 60 से ज्यादा कैडेटों की मौत हो गई. इस साल के सबसे भयानक हमलों में से एक में तीनों आत्मघाती हमलावरों को मार डाला गया.
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2016 - क्वेटा में अस्पताल पर हमला
आतंकवादियों ने 8 अगस्त 2016 को क्वेटा के सरकारी अस्पताल पर आत्मघाती हमला किया. फायरिंग और उसके बाद हुए आत्मघाती हमले में 70 लोग मारे गए. निशाना वकीलों को बनाया गया था जो अस्पताल में बार एसोसिएशन के प्रमुख बिलाल अनवर कासी की लाश के साथ आए थे. उन्हें अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी.
तस्वीर: Getty Images/AFP/B. Khan
2016 - लाहौर में पार्क पर हमला
27 मार्च 2016 को लाहौर में एक लोकप्रिय पार्क पर आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 75 लोग मारे गए. हमला ईसाई समुदाय पर लक्षित था जो ईस्टर मना रहे थे. मृतकों में 14 लोगों की शिनाख्त ईसाइयों के रूप में हुई, बाकी मुसलमान थे. तहरीके तालिबान से जुड़े गुट जमात उल अहरार ने जिम्मेदारी ली.
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2015 - कराची में एक बस को बनाया निशाना
कराची में सफूरा गोठ में 8 बंदूकधारियों ने एक बस पर हमला किया. फायरिंग में 46 लोग मारे गए. मरने वाले सभी लोग इस्माइली शिया समुदाय के थे. प्रतिबंधित उग्रपंथी गुट जुंदलाह ने हमले की जिम्मेदारी ली. हमले की जगह इस्लामिक स्टेट को समर्थन देने वाली पर्चियां भी मिली.
तस्वीर: STR/AFP/Getty Images
2014 - पेशावर में बच्चों पर क्रूर हमला
16 दिसंबर 2014 को तहरीके तालिबान से जुड़े 7 बंदूकधारियों ने पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला किया. आतंकियों ने बच्चों और स्टाफ पर गोलियां चलाईं और 154 लोगों को मार दिया. उनमें 132 बच्चे थे. यह पाकिस्तान में होने वाला अब तक का सबसे खूनी आतंकी हमला था.
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2013 - पेशावर में चर्च पर हमला
पेशावर में 22 सितंबर 2013 को ऑल सेंट चर्च पर हमला हुआ. यह देश के ईसाई अल्पसंख्यकों पर सबसे बड़ा हमला था. इस हमले में 82 लोग मारे गए. हमले की जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान से जुड़े एक इस्लामी कट्टरपंथी गुट जुंदलाह ने ली.
तस्वीर: Getty Images/AFP/B. Khan
2011 - चारसद्दा में पुलिस पर हमला
13 मई 2011 को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के चारसद्दा जिले में शाबकदर किले पर दोहरा हमला हुआ. दो आत्मघाती हमलावरों ने एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर के बाहर दस दिन की छुट्टी के लिए बस पर सवार होते कैडेटों पर हमला किया और 98 लोगों की जान ले ली. कम से कम 140 लोग घायल हो गए.
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2010 - कबायली इलाके पर दबिश
उत्तर पश्चिम के मोहमंद जिले में एक आत्मघाती हमलावर ने व्यस्त बाजार पर हमला किया और 105 लोगों की जान ले ली. केंद्र शासित कबायली इलाके में ये हमला 9 जुलाई को हुआ. माना जाता है कि हमले का लक्ष्य कबायली सरदारों की एक मीटिंग थी. जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने ली.
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2010 - लाहौर नरसंहार
मई 2010 के आतंकी हमले को लाहौर नरसंहार के नाम से भी जाना जाता है. 28 मई को जुम्मे की नमाज के दौरान अल्पसंख्यक अहमदिया संप्रदाय की दो मस्जिदों पर एक साथ हमले हुए. 82 लोग मारे गए. हमले की जिम्मेदारी तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने ली.
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2010 - वॉलीबॉल मैच को बनाया निशाना
पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी जिले बन्नू के एक गांव में वॉलीबॉल मैच चल रहा था. आतंकवादियों ने इस मैच को भी शांति में नहीं होने दिया. उस पर कार में रखे बम की मदद से आत्मघाती हमला हुआ. हमले में 101 लोग मारे गए. खेल का मैदान कत्लेआम का गवाह बना.
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2009 - लाहौर का बाजार बना निशाना
दिसंबर 2009 में लाहौर के बाजार में दो बम धमाके किए गए और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर के भीड़ भरे बाजार में फायरिंग भी की गई. हमलों में कम से कम 66 लोग मारे गए. मरने वालों में सबसे ज्यादा तादाद महिलाओं की थी. इस हमले के साथ देश का प्राचीन शहर आतंकियों की जद में आ गया था.
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2009 - नया निशाना पेशावर
पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर में बसे शहर पेशावर के मीना बाजार में एक कार बम का धमाका किया गया. इस धमाके में 125 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हो गए. पाकिस्तान की सरकार ने हमले के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन तालिबान और अल कायदा दोनों ने ही हमले में हाथ होने से इंकार किया.
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2008-राजधानी में लक्जरी होटल पर हमला
कट्टरपंथी आम लोगों पर हमले के तरह तरह के तरीके ईजाद कर रहे थे. एक ट्रक में विस्फोटक भर कर उन्होंने 20 सितंबर 2008 को राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल के सामने उसे उड़ा दिया. कम से कम 60 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हो गए. मरने वालों में 5 विदेशी नागरिक भी थे.
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2008-पाकिस्तान की हथियार फैक्टरी पर हमला
वाह में 21 अगस्त 2008 को पाकिस्तान की ऑर्डिनेंस फैक्टरी पर दोहरा आत्मघाती हमला किया गया. हमलों में कम से कम 64 लोग मारे गए. यह पाकिस्तानी सेना के इतिहास में उसके संस्थान पर हुआ अब तक का सबसे खूनी हमला है. तहरीके तालिबान पाकिस्तान के एक प्रवक्ता ने हमले की जिम्मेदारी ली.
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2007- बेनजीर की वापसी पर बम हमला
सैनिक तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने 2008 में चुनाव कराकर सत्ता के बंटवारे का रास्ता चुना था. दो बार प्रधानमंत्री रही बेनजीर भुट्टो चुनाव में भाग लेने निर्वासन से वापस लौटीं. करांची में उनके काफिले पर बम हमला हुआ. वे बाल बाल बची. लेकिन दो महीने बाद 27 दिसंबर को रावलपिंडी में भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया.
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बहुत से पाकिस्तानी शहरियों का मानना है कि भ्रष्टाचार देश के विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है और इसके लिए वे अपने राजनीतिज्ञों को जवाबदेह मानते हैं. कराची, लाहौर, इस्लामाबाद और रावलपिंडी जैसे शहरों के इन पढ़े लिखे लोगों ने अपनी उम्मीदें न्यायपालिका से लगा रखी हैं. उनका मानना है कि न्यायपालिका ने भ्रष्ट नेताओं और विधायकों पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आजादी पा ली है. लेकिन देश के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को दक्षिणपंथी पार्टियों और गैरसरकारी मीडिया का भी समर्थन मिल रहा है. कराची का एक छात्र कहता है, "सबसे अहम बात व्यवस्था को बदलना है. भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए राजनीतिज्ञों की नैतिकता और जवाबदेही पर जोर देना होगा."
अकेलीअसलीउदारवादीपार्टी
इसके बावजूद बेनजीर भुट्टो की शख्सियत पाकिस्तान के बहुत से उदारवादी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को प्रेरित करती है जिनका मानना है कि भुट्टो ने अपनी जान लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए दे दी. लाहौर में पीपल्स पार्टी के एक समर्थक ने डॉयचे वेले को बताया, "पीपल्स पार्टी अभी भी देश की अकेली सच्ची प्रगतिशील पार्टी है. यह अकेली पार्टी है जो सेना के जनरलों और बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ का मुकाबला कर सकती है. भुट्टो हमेशा हमारी प्रेरणा और उदारवादी लोकतंत्र का प्रतिरूप रहेंगी."
लेकिन दूसरी ओर से बहुत से लोगों का मानना है कि बेनजीर भुट्टो की पीपल्स पार्टी का अस्तित्व खत्म हो गया है. पार्टी उनके साथ ही 2007 में मर गई. उनका मानना है कि मौजूदा पीपल्स पार्टी जरदारी की पार्टी है और उसकी एकदम अलग विचारधारा है. पार्टी के कुछ विधुब्ध नेता पतन के लिए पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि जरदारी ने पीपल्स पार्टी की विचारधारा को तिलांजलि दे दी है. उनका बिलावल भुट्टो को संदेश है कि अगर वे पार्टी को फिर से जिंदा करना चाहते हैं तो अपने बदनाम पिता का साथ छोड़ दें और मां और नाना की विचारधारा की ओर वापस लौटें.
लेकिन ऐसे राजनीतिक विश्लेषक भी हैं जो नहीं मानते कि भुट्टो प्रगतिशील राजनीतिज्ञ थीं. उनके ही शासन में तालिबान ने काबुल पर हमला किया था और अपना बर्बर इस्लामी शासन शुरू किया. कुछ का तो ये भी कहना है कि यह इस्लामाबाद सरकार के समर्थन से हुआ.