एक किसान और दिग्गज जर्मन कंपनी के मुकदमे पर दुनिया की नजरें
१७ मार्च २०२५
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू का एक किसान 10,500 किलोमीटर लंबी यात्रा करके जर्मनी पहुंचा है, वो भी जर्मनी की एक दिग्गज ऊर्जा कंपनी की जबावदेही तय करने.
तस्वीर: Alexander Luna/Germanwatch e.V.
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बर्फ से चमकते सफेद धवल पहाड़ और उन पर इठलाते रुई जैसे बादल. सऊल लुसियानो लुलिया इसी नजारे के साथ बड़े हुए हैं. 8-10 साल की उम्र में लुलिया गाय चराने के लिए कोडिएंरा ब्लांका के पहाड़ों पर जाते थे. तब चरागाह के ऊपर हिमाच्छादित पर्वत और हिम से बने ठोस ग्लेशियर हुआ करते थे. आज ऐसा लगता है जैसे ग्लेशियर की सिर्फ छाती और सिर ही बचे हों. उसका ज्यादातर हिस्सा पिघल चुका है और ग्लेशियर के ठीक नीचे एक बड़ी झील बन चुकी है.
लुलिया का दावा है कि उनके शहर हुआरास पर इसी झील से बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है. समुद्र तल से 4,550 मीटर की ऊंचाई पर बनी ग्लेशियर झील कभी भी फट या छलक सकती है और हुआरास में तबाही ला सकती है. पेरू के इस किसान के मुताबिक, 50,000 लोग बाढ़ के इस जोखिम तले जी रहे हैं.
पेरू के पाल्काकोचा ग्लेशियर के पास बनी झील से है खतरातस्वीर: Alexander Luna/Germanwatch e.V.
जर्मन बिजली कंपनी पर मुकदमा क्यों?
44 साल के लुलिया की मांग है कि जर्मन बिजली कंपनी आरडब्ल्यूई, हुआरास शहर को बाढ़ से बचाने की योजना का कुछ खर्च उठाए. आरडब्ल्यूई, दुनिया में सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाली कंपनियों में शामिल है. लुलिया ने अपने समुदाय की सुरक्षा के लिए कंपनी से 17,000 यूरो की मांग की है. उनका तर्क है कि जर्मन कंपनी बिजली बनाने के लिए जीवाश्म ईंधन इस्तेमाल करती है, जिसके चलते वह भी बाढ़ का जोखिम पैदा करने की आंशिक जिम्मेदार है.
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पिछले हफ्ते पेरू की राजधानी लीमा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए लुलिया ने कहा, "मैं कंपनी से निर्माण लागत के एक हिस्से की जिम्मेदारी लेने की मांग कर रहा हूं."
लूलिया ने पहली बार 2015 में आरडब्ल्यूई के विरुद्ध जर्मन शहर एसेन की अदालत में मुकदमा दायर किया. एसेन में आरडब्ल्यूई का मुख्यालय है. तब अदालत ने लूलिया का मुकदमा खारिज कर दिया. केस को खारिज करते हुए एसेन की अदालत ने कहा कि इस मामले में निश्चित उत्सर्जन और निश्चित नुकसान के बीच संबंध स्थापित करना नामुमकिन है.
2015 से जर्मन बिजली कंपनी आरडब्ल्यूई के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं लुलियातस्वीर: Arte France
जलवायु न्याय बनाम कॉरपोरेट जवाबदेही
एसेन कोर्ट के फैसले के साल भर बाद हाम शहर की उच्च अदालत ने लूलिया की अपील स्वीकार कर ली. कोविड महामारी के चलते सुनवाई में देरी होती रही. अब हाम की अदालत ने 17 मार्च से 19 मार्च तक सुनवाई तय की है. लूलिया खुद इस सुनवाई में मौजूद रहने वाले हैं. इस कानूनी लड़ाई में जर्मनी का एक पर्यावरण एनजीओ, जर्मनवॉच भी पेरू के इस किसान की मदद कर रहा है.
2022 में अदालत द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों की टीम पेरू के अंकाश इलाके का दौरा कर चुकी है. टीम ने वहां सबूत भी जुटाए. सुनवाई के दौरान लुलिया से पूछा जाएगा कि क्या अंकाश इलाके में उनकी संपत्ति पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है. यह बात साबित हुई तो अगली सुनवाई में आरडब्ल्यूई की जिम्मेदार पर सवाल उठाए जाएंगे.
लूलिया का दावा 2014 के एक शोध पर टिका हुआ है. उस शोध में दावा किया गया कि ओद्योगिक युग की शुरुआत से अब तक आरडब्ल्यूई 0.47 फीसदी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. आरडब्ल्यूई ने पेरू में कभी काम नहीं किया है. 1898 में स्थापित की गई ये कंपनी लंबे समय तक कोयला जलाकर बिजली पैदा करती थी. हालांकि आज आरडब्ल्यूई, सौर, पवन, गैस और कोयले से ऊर्जा की आपूर्ति करती है.
जर्मनवॉच की कानून अधिकारी फ्रांचेस्का माशा क्लाइन कहती हैं, "समय आ गया है कि आरडब्ल्यूई जैसी कंपनियां उस नुकसान की भरपाई के के लिए उचित योगदान दें, जो उनकी मदद से हुआ है."
एक सदी तक कोयले से ही बिजली बनाती रही आरडब्ल्यूईतस्वीर: Christoph Hardt/Panama Pictures/picture alliance
आरडब्ल्यूई समेत कई कंपनियों की धड़कन तेज
आरडब्ल्यूई का कहना है कि लूलिया के पक्ष में फैसला आया तो इससे जर्मनी के बाहर घटने वाले पर्यावरणीय नतीजों के लिए जर्मन कानून के तहत लोगों को जिम्मेदार ठहराने का चलन शुरू हो जाएगा. कंपनी के प्रवक्ता ने कहा, "हमें लगता है कि ये कानूनन अस्वीकार्य है और इस सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे को देखने का यह गलत तरीका है."
एक गैरलाभकारी रिसर्च संगठन, जीरो कार्बन एनालिटिक्स के मुताबिक इस वक्त दुनिया भर में क्लाइमेंट डैमेज से जुड़े 43 मामले चल रहे हैं. हाम कोर्ट में आरडब्ल्यूई का प्रतिनिधित्व कानूनी फर्म, फ्रेशफील्ड्स ब्रुकहाउज डेरिंगर कर रही है. लॉ फर्म का कहना है कि, "विवाद की कुल रकम भले ही 20,000 यूरो से कम हो. लेकिन एक परिपाटी तय होने की संभावना काफी साफ है."
ओएसजे/सीके (एएफपी, एपी)
अभूतपूर्व रफ्तार से पिघल रहे हैं एंडीज पर्वतमाला के ग्लेशियर
एंडीज पर्वतमाला पर जलवायु परिवर्तन का बहुत गहरा असर दिख रहा है. यहां बहुत नाटकीय तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसकी वजह से लोगों की जीवनशैली भी बदल रही है.
तस्वीर: Ivan Alvarado/REUTERS
पिघलती खूबसूरती
अमेरिका के ये सबसे ऊंचे पहाड़ पेरू के उत्तरी एंडीज में कॉर्डिएरा ब्लैंका रेंज में पाए जाते हैं. करीब 22 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चोटियों की बर्फ भी खतरे में है. बढ़ते तापमान से ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहे हैं. इसके कारण बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है. लाखों लोगों के आगे पीने के पानी का संकट खड़ा हो सकता है.
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ऊंची चोटियां, तापमान ज्यादा
हुआस्करन नेशनल पार्क में नेवादो पास्तोरूरी के ग्लेशियर भी तेजी से गायब हो रहे हैं. एक बहुराष्ट्रीय शोध के मुताबिक, नई सदी के इन 24 सालों के दौरान एंडीज में 1,000 से 1,500 फीट की ऊंचाई पर दिन के समय के 'विंटर सरफेस टेंपरेचर' में प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है. 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर यह वृद्धि 1.7 डिग्री सेल्सियस तक है.
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बदलता परिवेश
पेरू के माटियो पर्वत में गर्मी के कारण झीलें बन गई हैं. कुछ वर्ष पहले तक यहां पर्वतारोहियों को पहाड़ की चोटी तक पहुंचने के लिए ग्लेशियर पार करना पड़ता था. अब बस एक चट्टानी ढाल ही है, जिसे पार करके लोग चोटी पर पहुंचते हैं.
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समझ से परे है यह बदलाव
चिली के सिविल इंजीनियर पाब्लो वेन्स्टाइन ने एंडीज के ग्लेशियरों और आर्कटिक का दो दशक तक अध्ययन किया है. उन्होंने रॉयटर्स न्यूज एजेंसी को बताया, "ये बदलाव जो हम देख रहे हैं, वो हालिया मानव इतिहास में 'अभूतपूर्व' हैं." इन ग्लेशियरों पर बहुत कम अध्ययन हुआ है क्योंकि यह पर्वत शृंखला बहुत बड़ी और दूर तक फैली है.
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सामान्य नहीं है 5,000 हजार मीटर की ऊंचाई पर बारिश
एंडीज, ताजे पानी का अहम स्रोत है. सर्दियों में ग्लेशियर पर बर्फ जमती है, जो बसंत आने पर पिघलकर पानी बन जाती है. अब पेरू में बहुत ऊंचाई के इलाकों में भी बारिश होती है, जैसे कि यहां नेवादो पास्तोरूरी में. हुआस्करन के पार्क रेंजर एडसन रेमिरेज बताते हैं, "5,000 मीटर की ऊंचाई पर बरसात होना प्राकृतिक या सामान्य नहीं है. यह संकेत है कि तापमान पूरी तरह से बदल गया है."
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एक चोटी जिसमें लोगों की आस्था थी, ढह गई
यहां से दक्षिण की ओर करीब 2,000 किलोमीटर की दूरी पर भी यही हाल है. चिली की अल प्लोमो चोटी 5,400 मीटर ऊंची है. साफ दिनों में इसे राजधानी सैंटियागो से भी देखा जा सकता है, जो कि नजदीक ही है. सदियों से यहां लोगों की इस चोटी में आस्था रही है. इंका सभ्यता के लोग तो इसे समर्पित करते हुए इंसानी बलि भी देते थे. अब एल प्लोमो की बर्फ पर जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है.
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रोजी-रोटी पर खतरा
खच्चर चलाने वाले फ्रांसिस्को गैलार्डो ने रॉयटर्स को बताया, "हर साल चीजें बदल रही हैं. हर साल दुख बढ़ रहा है." वह 14 साल की उम्र से ही एल प्लोमो पर काम कर रहे हैं. वह पर्वतारोहियों को चोटी से लगभग 1,300 मीटर नीचे बेस कैंप तक पहुंचाने में मदद करते हैं. 60 वर्षीय गैलार्डो को डर है कि अब वह और उनका परिवार कुछ ही सालों तक यहां रह पाएंगे. फिर मजबूरी में उन्हें बाहर निकलकर नया काम खोजना पड़ेगा.
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ग्लेशियर से वनों तक
ऑस्वाल्डो सेगुंडो विलेगास 50 वर्षों से एल प्लोमो पर फंसे लोगों को बचाकर लाने का काम कर रहे हैं. 1972 में सैंटियागो जाते समय उरुग्वे की रग्बी टीम का विमान एंडीज में दुर्घटनाग्रस्त हुआ था. तब भी रेस्क्यू करने वालों में विलेगास शामिल थे. वह चेताते हैं, "पेटागोनिया में ऐसी जगहें थीं, जहां पहले जब मैं गया तो वहां समूची जगह ग्लेशियर थे. अब वहां जंगल है. यहां भी ऐसा ही होने वाला है."
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चट्टानों का गिरना पारंपरिक रास्तों के लिए जोखिम भरा
सेंटियागो के पास लो कुर्रो चोटी तक जाने का रास्ता आज भी वही है, जिनका इस्तेमाल कभी इंका सभ्यता के लोग करते थे. पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने के कारण चट्टानों के गिरने और भूस्खलन का जोखिम बढ़ गया है. यहां सोकोरो एडिनो पर्वत में काम करने वाले बचाव दल के वॉलिंटियर इस चीज का अभ्यास करते हैं कि गिरती हुई चट्टान से खुद को सुरक्षित रखते हुए लोगों को हिफाजत के साथ कैसे वापस लाया जाए.