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क्यों हिंसक हुआ अरुणाचल में बिजली परियोजना का विरोध?

२६ अक्टूबर २०२६

पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में बड़े बांधों का विरोध तो पहले से ही होता रहा है. लेकिन अब चीन के मेगा बांध के खतरे से निपटने के लिए प्रस्तावित सियांग बहुउद्देशीय परियोजना का विरोध अचानक हिंसक हो उठा है.

अपर सियांग घाटी
तस्वीर: Arun Sankar/AFP

23 अक्टूबर 2026 को परियोजना का विरोध कर रहे लोग हिंसा पर उतर आए. उन्होंने इस परियोजना का काम देखने वाले नेशनल हाइड्रोपावर कारपोरेशन (एनएचपीसी) के एक दफ्तर में आग लगा दी और कई अन्य जगह हिंसा और आगजनी की. प्रदर्शनकारियों ने थाना परिसर में खड़े कुछ वाहनों को जला दिया और सत्तारूढ़ बीजेपी के कई नेताओं के घरों पर भी पथराव किया. जगह-जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई भिड़ंत में कम से कम एक दर्जन लोग घायल हो गए. इनमें कुछ सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं.

सियांग क्षेत्र में बंद, हिंसा और आगजनी

परियोजना का विरोध कर रहे लोगों ने शुक्रवार को इलाके में 12 घंटे बंद रखा था. उस दौरान भी छिटपुट हिंसा हुई. लेकिन बंद खत्म होने के बाद हिंसा और आगजनी अचानक तेज हो गई और यह शुक्रवार को पूरी रात जारी रही. उसके बाद इलाके में रैपिड एक्शन फोर्स (रैफ) की दो कंपनियों के अलावा सुरक्षा बलों की करीब 34 बटालियनों को तैनात किया गया है. उसके बाद हिंसा तो थम गई. लेकिन इलाके में भारी तनाव है.

बांध परियोजना का विरोध कर रहे हैं आदि समुदाय के लोगतस्वीर: Arun Sankar/AFP

शुक्रवार की हिंसा और आगजनी के मामले  पुलिस ने अब तक कम से कम 15 लोगों को गिरफ्तार किया है. बांध-विरोधी संगठन उनकी तत्काली रिहाई और परियोजना की प्री-फिजिबिलिटी स्टडी के लिए भारी तादाद में तैनात सुरक्षा बलों को तत्काल हटाने की मांग कर रहे हैं.

ईस्ट सियांग की जिला शासक जयंती परतिन ने पत्रकारों को बताया, "पासीघाट के अलावा मेबो, रस्किन और उससे सटे इलाकों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 के तहत लोगों को जमा होने पर पाबंदी लगा दी गई है."

मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने क्या कहा?

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने एक उच्चस्तरीय बैठक में हालात की समीक्षा की है. उन्होंने परियोजना का विरोध कर रहे संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ भी बातचीत की है. लेकिन फिलहाल गतिरोध कायम है.

मुख्यमंत्री ने बैठक के बाद एक्स पर अपनी एक पोस्ट में लिखा, "हमारी प्राथमिकता सियांग घाटी के लोगों के अधिकारों और आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है."

उनका कहना था, "परियोजना को लेकर फैली गलत जानकारी और भ्रामक धारणाओं के कारण जनता के मन में आशंकाएं पैदा हो रही हैं. तथ्यों, पारदर्शिता और खुली बातचीत के जरिए जानकारी के इस अंतर को पाटना बहुत जरूरी है."

पेमा खांडू ने राजधानी ईटानगर में पत्रकारों से कहा, "इलाके के लोगों को परियोजना को समझने, इसकी रणनीतिक अहमियत और इससे जुड़ी चिंताओं के बारे में सटीक जानकारी का अधिकार है."

केंद्र ने क्यों बनाई यह परियोजना?

चीन सरकार ने दो साल पहले यारलुंग सांगपो नदी, जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र कहा जाता है, पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने का एलान किया था. तब पर्वारणविदों ने उस परियोजना को भारत और उसके पड़ोसी बांग्लादेश के लिए 'वॉटर बम' बताया था. उसके बाद केंद्र सरकार ने इस खतरे से निपटने के लिए अपर सियांग जिले में एक बहुउद्देशीय परियोजना का फैसला किया था. इसकी क्षमता 11 हजार मेगावॉट होगी.

केंद्र के एलान के बाद से ही इलाके के लोगों ने प्रस्तावित परियोजना का विरोध शुरू कर दिया था. उनकी दलील थी कि इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा और स्थानीय लोगों को रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.

एक तरफ परियोजना, दूसरी तरफ सदियों से अपने इलाके में बसते आए स्थानीय लोगतस्वीर: Arun Sankar/AFP

समर्थन और विरोध के परस्पर विरोधी दावे

परियोजना के समर्थन और विरोध में परस्पर विरोधी दावे तेज हो गए हैं. कुछ लोग परियोजना को राष्ट्र हित में जरूरी बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि इससे पहले स्थानीय समुदाय को भरोसे में लिया जाना चाहिए था.

सियांग जिले के एक बीजेपी विधायक और राज्य सरकार में मंत्री ओजिंग तासिंग डीडब्ल्यू से बातचीत में दावा करते हैं, "जिले के 85 फीसदी लोगों को इस परियोजना से कोई आपत्ति नहीं है. सरकार ने प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट जारी रखने का फैसला किया है. कुछ बाहरी लोग स्थानीय लोगों को भड़का रहे हैं."

बीजेपी नेता ने इस विरोध प्रदर्शन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है. लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बोसीराम सिराम ने पत्रकारों से बातचीत में आरोप लगाया कि सरकार इस पूरे मामले से सही तरीके से निपटने में नाकाम रही है.

उनका कहना था, "स्थानीय लोगों और किसानों के सहमत नहीं होने तक इस परियोजना को लागू करना संभव नहीं होगा. इस परियोजना से बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा. सरकार ने परियोजना के बारे में फैसला करने से पहले स्थानीय समुदाय को भरोसे में नहीं लिया."

सियांग घाटी में आज भी पारंपरिक तरीके से रहते हैं कई समुदायतस्वीर: Arun Sankar/AFP

अपर सियांग जिले के गेकू गांव के निवासी टी शेरिंग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यह विवाद लंबे समय से जारी है. मौजूदा हालात बेहद कठिन है. इसकी वजह यह है कि प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोग बांध के लिए तैयार नहीं हैं. राज्य सरकार को सीधे उन लोगों से बात करनी चाहिए. लेकिन ऐसा करने की बजाय वो सुरक्षा बलों के जरिए लोगों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है."

बांध का विरोध करने वाले सियांग इंडिजीनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सियांग नदी के दोनों किनारों पर रहने वाले लोग अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से नदी के पानी पर निर्भर हैं. प्रस्तावित बांध के कारण खेत पानी में डूबने की स्थिति में उनका जीवन मुश्किल में पड़ जाएगा."

वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता टोंगम रीना ने अपनी एक एक्स पोस्ट में लिखा है, "अगर चीन के वॉटर बम के खतरे के बावजूद स्थानीय समुदाय वहां से हटने की बजाय अपनी जान देने को तैयार है  तो फिर केंद्र सरकार आखिर किस दलील के आधार पर इन लोगों पर 11 हजार मेगावॉट की परियोजना थोप रही है.? मुझे यह  बात समझाइए.”

भारत और चीन की होड़ में फंसी सियांग घाटी

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