धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर बंट रहे हैं आप्रवासी भारतीय
१७ अक्टूबर २०२२
हिंदू राष्ट्रवाद के कारण भारत में जारी तनाव ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा हो या ऑस्ट्रेलिया, हर उस जगह पहुंच चुका है, जहां भारतीय आप्रवासी रहते हैं. यूरोप से लेकर अमेरिका तक में भारतीयों में दरार साफ दिखने लगी है.
इंग्लैंड में फासीवाद के विरोध में प्रदर्शनतस्वीर: Vuk Valcic/Zuma/picture alliance
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अमेरिका के न्यू जर्सी में हाल ही में जब भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था तो एडिसन में हुई परेड में एक बुलडोजर भी शामिल हुआ. यह बुलडोजर भारत में जारी उस अभियान का प्रतीक था, जिसके तहत कई राज्यों की सरकारों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल लोगों के घर गिरा दिए थे.
कैलिफॉर्निया के ऐनहाइम में एक आयोजन के दौरान कुछ लोग भारत में मुसलमानों के दमन का विरोध जताने के लिए आए तो दो पक्षों के बीच नारेबाजी शुरू हो गई.
हाल ही मेंब्रिटेन में हिंदू और मुसलमान भारतीयों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि बात मारपीट तक पहुंच गई और पुलिस को सख्त कदम उठाने पड़े. बीते साल किसान आंदोलन के दौरान ऑस्ट्रेलिया में कुछ लोगों ने उनके समर्थन में प्रदर्शन किया तो कुछ युवक तिरंगा झंडा लेकर उस प्रदर्शन का विरोध करने पहुंच गए और नारेबाजी करने लगे.
मंदिर की ‘रक्षक’ मगरमच्छ को आंसुओं से विदाई
केरल के कासरगोड़ में एक मंदिर में रहने वाली मगरमच्छ की अंतिम विदाई पर हजारों लोग जमा हुए. यह मगरमच्छ दशकों से मंदिर में रह रही थी.
तस्वीर: AFP/Getty Images
‘शाकाहारी’ मगरमच्छ की विदाई
कासरगोड़ के श्री अनंतपद्मनाभ स्वामी मंदिर में रहने वाली मगरमच्छ बाबिया को लोगों ने आंसुओं के साथ विदाई दी. उसके अंतिम संस्कर पर हजारों लोग जमा हुए.
तस्वीर: AFP/Getty Images
देवी स्वरूप
देवी की तरह पूजे जाने वाली इस मगरमच्छ की आयु लगभग 80 वर्ष बताई जाती थी. 3,000 साल पुराने विष्णु मंदिर के पास की झील में यह मगरमच्छ दशकों से रह रही थी.
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शाकाहार के दावे पर संदेह
बाबिया को लोग मंदिर की रक्षक मानते थे. यह भी मान्यता थी कि बाबिया सिर्फ प्रसाद खाती थी. हालांकि मंदिर के अधिकारी इस दावे की पुष्टि नहीं करते क्योंकि उनके मुताबिक झील में मछलियां भी हैं.
तस्वीर: Murali Krishnan
मंदिर के पास दफनाया गया
बाबिया को मंदिर के पास ही दफना दिया गया. लोगों की मान्यता थी कि यह मगरमच्छ 1942 में एकाएक आ गई थी.
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क्या मगरमच्छ शाकाहारी होते हैं?
हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों में पता चला है कि 20 करोड़ साल पहले मगरमच्छों की कुछ शाकाहारी प्रजातियां धरती पर होती थी. अमेरिका की यूटा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा था कि इन प्रजातियों के दांत फल और सब्जियां खाने के हिसाब से बने थे.
तस्वीर: ALEXANDRE MENEGHINI/REUTERS
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ये वे चंद उदाहरण हैं, जो दिखाते हैं कि किस तरह भारत का राजनीतिक विभाजन आप्रवासी भारतीयों को भी विभाजित कर रहा है. विदेशों में रह रहे लगभग तीन करोड़ भारतीय दुनिया का सबसे बड़ा आप्रवासी समुदाय हैं. इनमें हर धर्म और जाति के लोग शामिल हैं. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में तो इनकी संख्या बहुत बड़ी है और वे दशकों से शांतिपूर्ण तरीके से रहते आए हैं.
लेकिन हाल की घटनाओं ने ऐसी चिंताओं को बढ़ा दिया है कि भारतीय समाज का धार्मिक और राजनीतिक विभाजन आप्रवासी समुदाय में भी घर बना रहा है. कई जानकार कहते हैं कि इसकी शुरुआत 2014 में ही हो गई थी, जब भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव जीतकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई थी. सत्ता में आने के बाद से ही भाजपा पर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्य समुदायों के दमन का आरोप लगता रहा है.
हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म
सदर्न कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में धार्मिक अध्ययन विभाग के डीन वरुण सोनी कहते हैं कि आप्रवासी समुदाय को हिंदू राष्ट्रवाद ने उसी तरह विभाजित कर दिया है, जैसे अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने पर हुआ था. इस यूनिवर्सिटी में करीब 2,000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं. हालांकि कैंपस में अभी किसी तरह का विवाद नजर नहीं आया है लेकिन यूनिवर्सिटी को तब खासा विरोध झेलना पड़ा जब उसने एक आयोजन में हिस्सा लिया, जिसे ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व' कहा गया था.
2021 में हुआ यह आयोजन हिंदुत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना था. बहुत से लोग हिंदुत्व को हिंदू धर्म से अलग करके देखते हैं और इसे एक राजनीतिक अवधारणा मानते हैं, जिसका मकसद भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना है. आलोचक कहते हैं कि हिंदुत्व की अवधारणा में मुस्लिम और ईसाइयों जैसे अन्य धर्मों के लोगों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है.
सोनी कहते हैं कि यह आवश्यक है कि विश्वविद्यालय ऐसी जगह बने रहें जहां "हम सभ्य तरीके से तथ्यों के आधार पर विभन्न मुद्दों पर बात कर सकें.” सोनी को चिंता है कि हिंदू राष्ट्रवाद के कारण हो रहा विभाजन छात्रों की मानसिक स्थिति को भी प्रभावित कर रहा है.
दुबई के 'वर्शिप विलेज' में पहला हिंदू मंदिर
दुबई के ‘वर्शिप विलेज’ में यह आकर्षक हिंदू मंदिर बनाया गया है. अन्य धर्मों के पूजा स्थलों के बीच अब एक हिंदू पूजा स्थल भी है. देखिए...
तस्वीर: Rula Rouhana/REUTERS
दुबई में हिंदू मंदिर
दुबई के जेबेल अली में वर्शिप विलेज है जहां विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल एक साथ बने हैं. उनमें हिंदू मंदिर भी अब शामिल हो गया है.
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16 देवताओं का मंदिर
इस हिंदू मंदिर में 16 देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं जो अलग-अलग मत और देवताओं को मानने वाले हिंदुओं की सुविधा के लिए है.
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50 साल बाद
दुबई में पहला हिंदू मंदिर 50 साल पहले बना था. उसके बाद अब इस मंदिर का 5 अक्टूबर को उद्घाटन हुआ. इसे एक ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की योजना है.
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दिवाली के लिए
दशहरे के ठीक पहले इस मंदिर में लोगों को पूजा की अनुमति दी गई. श्रद्धालुओं को दिवाली पर नए मंदिर में पूजा का मौका मिलेगा.
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सभी हिंदुओं के लिए जगह
आयोजक राजू श्रॉफ ने कहा कि इस मंदिर में सभी हिंदुओं के लिए जगह हो, इसलिए 16 देवताओं को स्थापित किया गया है.
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हिंदू समुदाय प्रसन्न
राजू श्रॉफ ने कहा, “आज दुबई में हम वर्शिप विलेज का हिस्सा बन गए हैं. यह दुबई में हिंदू मंदिर बनने के 50 साल बाद संभव हुआ है.”
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12 लाख हिंदू
संयुक्त अरब अमीरात में करीब 12.40 लाख हिंदू रहते हैं जो कुल प्रवासी भारतीयों का एक तिहाई है.
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सोनी ने कहा, "यदि किसी व्यक्ति को उनकी पहचान के लिए हमला झेलना पड़ता है, उपहास सहना पड़ता है या हिंदू अथवा मुसलमान होने के कारण उन्हें बलि का बकरा बनाया जाता है तो मुझे ठीक-गलत की नहीं, उनके स्वास्थ्य की चिंता है.”
अनंतानंद रामबचन त्रिनिदाद और टबैगो में जन्मे भारतीय मूल के हिंदू हैं. सारी उम्र वह हिंदू धर्म का पालन करते आए हैं. धर्मशिक्षा पढ़ाने वाले प्रोफेसर रामबचन अब रिटायर हो चुके हैं. मिनेसोटा एक मंदिर में वह धर्मशिक्षा पढ़ाते थे. वह कहते हैं कि जब वह कुछ ऐसे संगठनों से जुड़े जो हिंदू राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं तो उनके खिलाफ शिकायतों की बाढ़ आ गई. रामबचन कहते हैं कि हिंदू राष्ट्रवाद के विरोध को हिंदू धर्म और भारत का विरोध कहा जाने लगा है, जो सरासर गलत है.
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ऑस्ट्रेलिया में पसरता विभाजन
बीते साल किसान आंदोन के दौरान ऑस्ट्रेलिया में कुछ लोगों ने उनके समर्थन में एक रैली का आयोजन किया. कुछ युवक भारतीय झंडा लेकर उस रैली में पहुंच गए और ‘भारत माता की जय' व ‘मोदी जिंदाबाद' के नारे लगाने लगे, जिसके बाद उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया. यह विवाद बढ़ते-बढ़ते इस हद तक पहुंच गया कि एक समूह ने सिख युवकों पर हमला कर दिया. पुलिस ने उन युवकों में से एक को गिरफ्तार कर लिया.
सोशल मीडिया पर उस युवक के पक्ष में बड़ा अभियान चलाया गया जिसमें भारतीय जनता पार्टी के समर्थक समूह शामिल हुए. उस युवक की कानूनी लड़ाई के लिए धन भी जमा किया गया. बाद में उस युवक को सजा हुई और उसे ऑस्ट्रेलिया वापस भेज दिया गया. उस घटना ने ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय समाज में बड़ा बंटवारा कर दिया. युवक द्वारा मारपीट करने की आलोचना करने पर लोगों को भारत विरोधी और हिंदू धर्म विरोधी आदि कहा गया.
भारत में इन मुद्दों से खड़ा हुआ विवाद
भारत में बीते कुछ अर्से से हर रोज एक नया विवाद जन्म ले रहा है. ज्यादातर विवाद दो धर्मों के बीच होते हैं. खान-पान, पहनावा और प्रार्थना स्थल को लेकर देश के कई हिस्सों में विवाद पैदा हो चुके हैं.
तस्वीर: Anushree Fadnavis/REUTERS
कर्नाटक का हिजाब विवाद
जनवरी 2022 में कर्नाटक के उडुपी में एक कॉलेज में छह छात्राओं के हिजाब पहनकर आने से रोकने पर विवाद खड़ा हो गया था. कॉलेज प्रशासन ने लड़कियों को हिजाब पहनकर कॉलेज में आने से मना कर दिया. जिसके खिलाफ लड़कियों ने विरोध प्रदर्शन किया. मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य प्रथा का हिस्सा नहीं है.
तस्वीर: Money SHARMA/AFP
मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर मचा शोर
महाराष्ट्र में अप्रैल के महीने में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों में प्रार्थनाओं की आवाज को सीमा के भीतर रखने को लेकर अभियान चलाया था. उन्होंने कहा था कि अगर मस्जिदों ने ऐसा नहीं किया तो उनके समर्थक विरोध जताने के लिए मस्जिदों के बाहर हिंदू मंत्रोच्चार करेंगे. महाराष्ट्र की करीब 900 मस्जिदों ने अजान की आवाज कम करने की सहमति दी थी.
तस्वीर: Getty Images/AFP/C. Mahyuddin
उत्तर प्रदेश में लाउडस्पीकरों पर कार्रवाई
उत्तर प्रदेश में सभी धार्मिक स्थलों से करीब 1.29 लाख लाउडस्पीकर उतारे गए या फिर उनकी आवाज को तय मानकों के मुताबिक कम किया गया. यूपी सरकार ने 23 अप्रैल को धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने के आदेश जारी किए थे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर राज्य सरकार ने पूरे प्रदेश में यह अभियान चलाया. सरकारी कार्रवाई मंदिर, मस्जिद और अन्य संस्थानों के लाउडस्पीकरों पर हुई.
तस्वीर: Getty Images/AFP/M. Sharma
हिंसक घटनाएं
रामनवमी और हनुमान जयंती के दौरान दो समुदायों के बीच कई जगहों पर हिंसक झड़प हो गई थी. दिल्ली के जहांगीरपुरी में दो समुदायों के बीच झड़प हुई और माहौल तनावपू्र्ण हो गया. इसके अलावा मध्य प्रदेश के खरगोन, मुंबई की आरे कॉलोनी में एक धार्मिक यात्रा के दौरान दो समुदायों के लोगों के बीच हिंसा हुई. कर्नाटक के हुबली में भी एक व्हाट्सऐप संदेश को लेकर बवाल मच गया था.
तस्वीर: Charu Kartikeya/DW
बुलडोजर पर सवाल
उत्तर प्रदेश में हाल के महीने में कई मामले सामने आए जिनमें ऐसे आरोपियों के घर पर प्रशासन ने बुलडोजर चलवा दिया जिनका नाम किसी तरह के मामले में दर्ज हुआ. बुलडोजर चलाने को लेकर सवाल भी खड़े हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा. कोर्ट में यूपी सरकार ने हलफनामा देकर कहा कि नियमों के मुताबिक कार्रवाई की गई है.
तस्वीर: Ritesh Shukla/REUTERS
यूपी की तर्ज पर एमपी में भी बुलडोजर चला
मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी पर दंगों के बाद प्रशासन ने कई मकान और दुकानों पर बुलडोजर चलवाकर तोड़ दिया. खरगोन प्रशान ने दंगों के एक दिन बाद 12 अप्रैल को कम से 45 मकानों और दुकानों पर बुलडोजर चलाकर कार्रवाई की थी. यहां भी सवाल उठे कि बिना नोटिस के प्रशासन ने कार्रवाई क्यों की.
तस्वीर: Charu Kartikeya/DW
पैगंबर मोहम्मद पर विवादित टिप्पणी
एक टीवी बहस के दौरान बीजेपी की प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने पैगंबर मोहम्मद पर विवादित टिप्पणी की जिसके बाद अरब जगत से इस पर विरोध दर्ज कराया गया. इसके बाद बीजेपी ने नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को पार्टी से निकाल दिया और बयान से किनारा कर लिया. टिप्पणी के विरोध में कई जगहों पर हिंसक घटनाएं हुईं.
तस्वीर: Vipin Kumar/Hindustan Times/imago
मुस्लिमों के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी
दिसंबर 2021 में हरिद्वार में एक धर्म संसद हुई थी और इस धर्म संसद में देश के मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बयान दिए गए. इस धर्म संसद में हिंदू राष्ट्र की स्थापना की बात कही गई और मीडिया और कोर्ट के खिलाफ भी आपत्तिजनक बयान दिए गए थे.
तस्वीर: Hindustan Times/imago images
कन्हैयालाल का कत्ल
राजस्थान के उदयपुर में 28 जून को एक दर्जी कन्हैयालाल को इस सिर्फ दो मुसलमान व्यक्तियों ने धारदार हथियार से मार डाला क्योंकि उन्होंने नूपुर शर्मा के समर्थन में व्हॉट्सऐप स्टेटस लगाया था. कन्हैयालाल इस मामले में गिरफ्तार हो चुके थे और शिकायतकर्ता और उनके बीच पुलिस ने समझौता करा लिया था, उन्होंने पुलिस से जान मारने की धमकी मिलने की शिकायत की थी. हत्या के विरोध में राजस्थान में तनाव का माहौल बन गया.
तस्वीर: ANI/REUTERS
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सिडनी में रहने वाले राजवंत सिंह कहते हैं कि उस घटना ने भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनका मोहभंग कर दिया. वह बताते हैं, "मैं किसान परिवार से आता हूं. मैं नरेंद्र मोदी को समर्थक था. लेकिन किसान आंदोलन में जब मैंने किसानों के हक की बात की, तो मुझे राष्ट्रविरोधी कह दिया गया. यह कैसा राष्ट्र प्रेम है, जो हक की बात नहीं करने देता?”
हिंदू होने का अर्थ
इसका दूसरा पहलू यह है कि विदेशों में बसे कुछ हिंदू अपने विचारों के कारण प्रताड़ित महसूस करते हैं. वॉशिंगटन में हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के महाप्रबंधक समीर कालरा कहते हैं, "हिंदुओं के लिए स्वतंत्र अभिव्यक्ति की गुंजाइश कम हो रही है. अगर आप भारत सरकार की ऐसी नीतियों का समर्थन करो, जिनका धर्म से कोई लेना देना नहीं है, तो भी आपको हिंदू राष्ट्रवादी कहा जाता है.”
कोएलिशन ऑफ हिंदूज नॉर्थ अमेरिका की प्रवक्ता पुष्पित प्रसाद कहती हैं कि वह उन युवाओं की काउंसलिंग करती हैं जिन्हें उनके दोस्त इसलिए छोड़ गए क्योंकि वे भारत में जारी जंग में किसी एक पक्ष के साथ हो लेने को तैयार नहीं थे. प्रसाद बताती हैं, "अगर वे किसी का पक्ष नहीं लेते या उनकी कोई राय नहीं है, तो उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी मान लिया जाता है. उनके मूल देश और धर्म के कारण उनका विरोध होता है.”
इन दोनों ही संस्थाओं ने ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व' कॉन्फ्रेंस का विरोध किया था. उन्होंने इसे हिंदू विरोधी बताया और विभिन्न पक्षों को जगह ना देने का आरोप लगाया.
25 वर्षीय सरव्या ताडेपल्ली जैसे कई हिंदू-अमेरिकी हैं जो मानते हैं कि बोलना फर्ज है. मसैचुसेट्स में रहने वालीं ताडेपल्ली हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स की सदस्य हैं. उनका कहना है कि हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ उनका आंदोलन हिंदू धर्म के बारे में उनकी जागरूकता का ही परिणाम है.
ताडेपल्ली कहती हैं, "यदि हिंदू धर्म का मूलभूत सिद्धांत है कि ईश्वर सभी में वास करता है, हरकोई उसी का रूप है, तो हिंदू होने के नाते यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है कि हम इंसानों की बराबरी के लिए आवाज उठाएं. यदि किसी इंसान को कमतर करके आंका जाता है, उसके अधिकारों का उल्लंघन होता है तो फिर उस गलत को सही करना हमारा कर्तव्य है.”