आतंकवाद और युद्ध के कारण देश छोड़कर चले गए अफगान लौट रहे हैं. इस साल के पहले हफ्ते में ही ईरान और पाकिस्तान से 9400 अफगान घर लौटे हैं. लेकिन ये लोग देश के लिए समस्या बन सकते हैं.
तस्वीर: kamran Shefayee
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संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि युद्ध पीड़ित अफगानिस्तान पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में नए लोगों के आने से दबाव बढ़ सकता है.
इस महीने वतन लौटने वालों में ज्यादातर युवा हैं जिन्हें ईरान ने निर्वासित किया है. ये लोग यूरोपीय देशों में पहुंचने की कोशिश कर रहे थे. पाकिस्तान ने भी अपने यहां अवैध तरीके से रह रहे अफगानों पर दबाव बढ़ा दिया है. स्थानीय लोगों के बीच अफगान प्रवासियों को लेकर गुस्सा बढ़ा है जिसके बाद सरकार ने दस्तावेजों की जांच में सख्ती शुरू कर दी है. इसके बाद बड़ी संख्या में अफगान प्रवासी अपने घर लौट रहे हैं.
देखिए, अफगानिस्तान में लड़की बनी लड़ाका
अफगानिस्तान: लड़की बनी लड़ाका
अफगानिस्तान की महिला फौजियों से मिलिए...
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अफगान महिला फौजी
जिस देश में लड़कियों के स्कूलों को बम से उड़ा दिया जाता है, वहां औरतों को सेना की वर्दी पहनाना और बंदूक थमाना बहुत बड़ी बात है. अफगानिस्तान में ऐसा ही हो रहा है. मिलिए, अफगानिस्तान की महिला फौजियों से.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/M. Hossaini)
नया नया है
अफगानिस्तान में सेना के पुनर्गठन के बाद महिलाओं का पहला बैच आर्मी ऑफिसर एकेडमी से 2015 में निकला.
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एकेडमी
महिला सैनिकों को काबुल की अफगान नेशनल आर्मी ऑफिसर एकेडमी में ट्रेनिंग दी जाती है.
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ट्रेनिंग
ट्रेनिंग तो अफगान ही देते हैं लेकिन इसमें ब्रिटिश आर्मी के अफसर उनकी मदद करते हैं.
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काबुल से पहला बैच
पहले बैच में 23 कैडेट्स थीं जिनमें से 19 को कमिश्न मिला.
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पढ़ाई भी
उन्हें इंग्लिश और लीडरशिप स्किल भी पढ़ाए गए हैं.
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हथियार और खेल
हथियारों की ट्रेनिंग भी हुई है और साथ ही खेलों में भी प्रशिक्षित किया गया है.
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पुरुषों के बराबर
महिलाओं ने हर स्तर पर पुरुषों के साथ ट्रेनिंग की है.
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अभी भी कमी है
अब भी बहुत ज्यादा महिलाएं आर्मी में भर्ती नहीं हो रही हैं.
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संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी इंटरनेशनल ऑर्गनाजइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) के मुताबिक लौटने वालों में ज्यादातर युवा हैं जो काम की तलाश में यूरोप जाने की कोशिश में थे और ईरान ने उन्हें वापस उनके देश भेज दिया. लेकिन संभव है कि बाकी लोग भी लौटें. अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता मैथ्यू ग्रेडन ने कहा, "आप अनुमान नहीं लगा सकते कि लौटने वालों का ट्रेंड क्या रहेगा. बहुत से कारण हैं जो वतन वापसी को किसी भी दिन बढ़ा सकते हैं."
ग्रेडन का कहना है कि सबसे ज्यादा समस्या उन लोगों के साथ है जो पंजीकृत नहीं हैं. ऐसे लोग सहायता एजेंसियों से मिलने वाली मदद के भी हकदार नहीं हो पाते और सरकार की ओर से शिक्षा और जमीन आदि की मदद भी नहीं पा सकते. 2017 के पहले ही हफ्ते में पाकिस्तान से ऐसे 1643 लोग आए हैं जबकि ईरान से 77796. आईओएम का कहना है कि अगले दो महीनों में और ज्यादा ऐसे लोग आ सकते हैं. 2017 के आखिर तक ही 5 लाख अफगान लौट सकते हैं जो गैरपंजीकृत होंगे. पिछले दो साल से वतन लौटने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसमें कोई कमी आती नहीं दिख रही है. जनवरी 2016 से अब तक साढ़े सात लाख गैरपंजीकृत लोग लौट चुके हैं. यानी 2015 के मुकाबले 50 हजार ज्यादा. लौटने वाले पंजीकृत प्रवासियों की संख्या तीन लाख 72 हजार 577 रही.
तस्वीरों में: ऐसे होते हैं अफगान
ऐसे होते हैं अफगान
जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने उत्तरी अफगानिस्तान का दौरा किया. इस इलाके में जर्मन सेना तैनात रही है और लोग जर्मन लोगों से अपरिचित नहीं हैं.
मजार-ए-शरीफ के चेहरे
ये बुजुर्ग उन 100 से ज्यादा अफगान लोगों में से एक हैं जिन्हें जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने मजार-ए-शरीफ शहर के हालिया दौरे में अपने कैमरे में कैद किया है.
असली चेहरे
उमबाख ऐसे चेहरों को सामने लाना चाहते थे जो अकसर सुर्खियों के पीछे छिप जाते हैं. वो कहते हैं, “जैसे कि ये लड़की जिसने अपनी सारी जिंदगी विदेशी फौजों की मौजूदगी में गुजारी है.”
नजारे
उमबाख 2010 में पहली बार अफगानिस्तान गए और तभी से उन्हें इस देश से लगाव हो गया. उन्हें शिकायत है कि मीडिया सिर्फ अफगानिस्तान का कुरूप चेहरा ही दिखाता है.
मेहमानवाजी
अफगान लोग उमबाख के साथ बहुत प्यार और दोस्ताना तरीके से पेश आए. वो कहते हैं, “हमें अकसर दावतों, संगीत कार्यक्रमों और राष्ट्रीय खेल बुजकाशी के मुकाबलों में बुलाया जाता था.”
सुरक्षा
अफगानिस्तान में लोगों की फोटो लेना आसान काम नहीं था. हर जगह सुरक्षा होती थी. उमबाख को उनके स्थानीय सहायक ने बताया कि कहां जाना है और कहां नहीं.
नेता और उग्रवादी
उमबाख ने अता मोहम्मद नूर जैसे प्रभावशाली राजनेताओं की तस्वीरें भी लीं. बाल्ख प्रांत के गवर्नर मोहम्मद नूर जर्मनों के एक साझीदार है. उन्होंने कुछ उग्रवादियों को भी अपने कैमरे में कैद किया.
जर्मनी में प्रदर्शनी
उमबाख ने अपनी इन तस्वीरों की जर्मनी में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की. कोलोन में लगने वाले दुनिया के सबसे बड़े फोटोग्राफी मेले फोटोकीना में भी उनके फोटो पेश किए गए.
फोटो बुक
येंस उमबाख अपनी तस्वीरों को किताब की शक्ल देना चाहते हैं. इसके लिए वो चंदा जमा कर रहे हैं. वो कहते हैं कि किताब की शक्ल में ये तस्वीरें हमेशा एक दस्तावेज के तौर पर बनी रहेंगी.
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ग्रेडन कहते हैं कि देश अब भी युद्ध से जूझ रहा है और अर्थव्यवस्था व सेवाओं पर खासा दबाव है. वह कहते हैं, "हम सीमा पर सुविधाएं बढ़ा रहे हैं ताकि और ज्यादा परिवारों को मदद पहुंचा सकें. हम उम्मीद कर रहे हैं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग लौटेंगे."