रूस को कामगारों की जरूरत है और भारत इस कमी को पूरा कर रहा है. इस साल काम के सिलसिले में बड़ी संख्या में भारतीय रूस जा सकते हैं. रूस जाने वाले भारतीयों के सामने क्या चुनौतियों होंगी?
दिसंबर 2025 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच कामगारों की आवाजाही पर भी एक समझौता हुआ थातस्वीर: Alexander Kazakov/Sputnik/REUTERS
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इस साल कम-से-कम 40,000 भारतीय नागरिकों के काम के सिलसिले में रूस जाने की संभावना है.
हाल ही में रूस की सरकारी समाचार एजेंसी 'आरआईए नॉवस्ती' से बातचीत में बोरिस तितोव ने यह संभावना जताई. बोरिस, सस्टेनेबल डेवलपमेंट के क्षेत्र में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संबंधों में रूस के विशेष प्रतिनिधि हैं. मॉस्को में भारत के राजदूत विनय कुमार ने इसी एजेंसी के साथ बातचीत में बताया कि 2025 के अंत तक 70,000 से 80,000 भारतीय नागरिक रूस में कार्यरत थे.
दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद भारत से रूस जाने वाले कामगारों की संख्या बढ़ी है. इस बैठक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच कामगारों की आवाजाही पर एक समझौता हुआ था. इसके तहत साल 2026 के लिए 70,000 से अधिक भारतीय नागरिकों का कोटा निर्धारित किया गया है.
डीडब्ल्यू से बात करने वाले विशेषज्ञों की मानें, तो कामगारों की कमी दूर करने के लिए रूस का भारत को चुनना कोई संयोग नहीं है. मुमकिन है, रूस की योजना प्रवासी श्रमिकों को भारतीय रुपये में भुगतान करने की हो. उसे तेल की बिक्री से यह मुद्रा मिल रही हैतस्वीर: Grigory Sysoyev/Sputnik/REUTERS
विदेश जाने से भारत में बेरोजगारी की समस्या कम होगी?
डीडब्ल्यू की रिसर्च में सीमा पार करने वालों के आंकड़ों ने दिखाया कि रूस में प्रवेश करने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2025 की पहली तिमाही में यह संख्या करीब 32,000 थी. दूसरी तिमाही में लगभग 36,000 भारतीयों ने रूस में प्रवेश किया. तीसरी तिमाही में यह संख्या बढ़कर 63,000 तक पहुंच गई.
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कई सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों के जरिए भारतीय श्रमिकों की भर्ती की जा रही है. इन एजेंसियों पर जिम्मेदारी होती है कि काम के लिए जाने वाले भारतीयों को भावी रोजगार के अवसर की पूरी और सही जानकारी मिले. कम प्रशिक्षण वाले भारतीय कामगारों की रूस में मासिक मजदूरी लगभग 475 से 950 यूरो के बीच है, जो कि आमतौर पर भारत में मिलने वाली मजदूरी के मुकाबले काफी ज्यादा है.
दिसंबर में रूसी समाचार आउटलेट 'फॉनटैंका' ने सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर सफाई का काम करने वाले भारतीय श्रमिकों पर रिपोर्ट की. इसमें जिन कामगारों से बात की गई, उन्होंने बताया कि उन्हें लगभग एक लाख रूबल (करीब 1,125 यूरो) मासिक वेतन, मुफ्त आवास, खाना और साथ ही रूसी भाषा की कक्षाएं भी दी जा रही हैं. शहर प्रशासन के अनुसार, रोजगार की तलाश कर रहे लगभग 3,000 भारतीय नागरिक सेंट पीटर्सबर्ग पहुंचे हैं.
भारत के एक राजनयिक ने डीडब्ल्यू से कहा कि यह श्रम समझौता भारत के लिए भी फायदेमंद है. द्विपक्षीय संबंधों की संवेदनशीलता के कारण नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने कहा, "रूस को कामगारों की जरूरत है और भारत को अपनी बेरोजगारी का निर्यात करने की."
दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद भारत से रूस जाने वाले कामगारों की संख्या बढ़ी हैतस्वीर: GRIGORY SYSOYEV/AFP/Getty Images
काम के नाम पर लड़ाई में भेजने की घटनाएं
भारतीय राजनयिक के अनुसार, रूस में भारतीयों के प्रवासन को कानूनी रूप देने के लिए एक औपचारिक समझौता जरूरी था. इसलिए भी कि यह प्रक्रिया काफी लंबे समय से "अनौपचारिक और अव्यवस्थित तरीके से चल रही थी." इस अव्यवस्था के चलते कई भारतीय धोखाधड़ी के भी शिकार होते रहे थे. राजनयिक ने बताया कि कुछ ऐसे भी केस सामने आए जिनमें भारतीय नागरिकों ने गलत जानकारी या झूठे वादों पर यकीन करके रूसी सेना के साथ अनुबंध कर लिया, जिसके बाद युद्ध के लिए उन्हें यूक्रेन भेज दिया गया था.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमला शुरू किए जाने के बाद लगभग 126 भारतीय नागरिकों ने रूसी सेना के साथ कॉन्ट्रैक्ट किए थे. भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार इनमें से लगभग 12 भारतीय नागरिक, रूसी पक्ष की ओर से लड़ते हुए मारे गए. 96 भारतीय सुरक्षित अपने देश लौट चुके हैं.
साल 2024 में रूस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन से उन भारतीय नागरिकों की स्वदेश वापसी का मुद्दा उठाया था, जिन्होंने रूसी सेना के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत कर दिए थे. साथ ही, भविष्य में भारतीय नागरिकों की रूसी सेना में भर्ती को रोकने पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हुई थी.
भारत के एक राजनयिक ने डीडब्ल्यू से कहा कि श्रम समझौता भारत के लिए भी फायदेमंद है, "रूस को कामगारों की जरूरत है और भारत को अपनी बेरोजगारी का निर्यात करने की"तस्वीर: Irina Polina/ZUMA/picture alliance
रूस में भारतीयों के सामने कैसी चुनौतियां आती हैं?
इगर लिप्सीटस, एक रूसी अर्थशास्त्री हैं. वह बताते हैं कि रूस में काम कर रहे अधिकांश भारतीय नागरिकों के लिए रुसी भाषा सबसे बड़ी चुनौती है. अधिकतर भारतीय कामगार रूसी भाषा नहीं जानते हैं. जबकि रूस की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, खासकर ग्रामीण इलाकों के लोग अंग्रेजी नहीं बोल पाते हैं.
लिप्सीटस ने बताया, "आप ऐसे लोगों को देश में ला रहे हैं, जिनसे आप बात ही नहीं कर सकते हैं. इसकी वजह से वे केवल सामान ढोने, सफाई करने और बर्फ हटाने जैसे कामों तक ही सीमित रह जाते हैं."
लिप्सीटस के अनुसार, सांस्कृतिक अंतर भी रूसी समाज में भारतीयों के घुलने-मिलने की संभावनाओं को सीमित करता है. रूसी अर्थशास्त्री, अंद्रेई याकोवलेव ने कहा, "मुझे लगता है कि भारत पर इसलिए भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है ताकि देश में आने वाले मुसलमानों की संख्या को न्यूनतम रखा जा सके. यह मान लिया गया है कि ज्यादातर आने वाले लोग हिंदू ही होंगे."
याकोवलेव भारतीय श्रमिकों को रूस की श्रमिक कमी का स्थायी समाधान नहीं मानते हैं. इगर लिप्सीटस भी इस राय से सहमत हैं. उनके अनुसार, "रूस में असल कमी सड़क साफ करने वाले या अकुशल श्रमिकों की नहीं, बल्कि कुशल पेशेवरों की है." लिप्सीटस का कहना है, "फिलहाल यह पहल एक तरह का टेस्ट रन है. वह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ये लोग रूसी अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त साबित होंगे भी या नहीं."
रूस में काम कर रहे अधिकांश भारतीय नागरिकों के लिए रुसी भाषा सबसे बड़ी चुनौती हैतस्वीर: Yaroslav Belyayev/ZUMA/picture alliance
रूस का ध्यान भारत पर क्यों है?
22 मार्च 2024 को मॉस्को के क्रॉकुस सिटी हॉल में भीषण आतंकी हमला हुआ था. इसमें कम-से-कम 143 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद रूसी अधिकारियों ने मध्य एशिया से आने वाले प्रवासियों के प्रति अपना लहजा सख्त कर दिया. इन देशों से रूस आने वाले लोगों की संख्या पर भी पाबंदियां लगा दी गईं.
अर्थशास्त्री लिप्सीटस के मुताबिक, समस्या यह भी है कि मध्य एशिया के देश खुद श्रमिकों की कमी से जूझ रहे हैं, "मध्य एशियाई देशों के नागरिकों को अब दूसरे श्रम बाजार, खासतौर पर ब्रिटेन और दक्षिणी यूरोप आकर्षित कर रहे हैं. इसके कारण प्रवासी श्रमिक ज्यादा मजदूरी की मांग कर रहे हैं और रूसी नियोक्ताओं के लिए उन्हें काम पर रखना कम फायदेमंद हो गया है."
यूक्रेन में युद्ध शुरू हुए अब चार साल होने को हैं. युद्ध के इन सालों में यहां आबादी का संकट घनघोर हो गया है. जन्मदर बहुत कम है, मौतों की संख्या बहुत ज्यादा.
तस्वीर: Narciso Contreras/AA/picture alliance
अस्पताल भरे हैं, मैटरनिटी वॉर्ड खाली
यूक्रेन के बहुत से अस्पतालों में मरीजों की कोई कमी नहीं. बल्कि, घायलों की संख्या अस्पतालों की क्षमता से कहीं ज्यादा है. मगर, इन भरे हुए अस्पतालों का एक हिस्सा ऐसा है जो दिनोदिन ज्यादा वीरान होता जा जा रहा है. कई यूक्रेनी अस्पतालों के मैटरनिटी वॉर्ड आमतौर पर खाली रहते हैं. जैसे कि पश्चिमी यूक्रेन के होश्चा में अस्पताल का यह मैटरनिटी वॉर्ड.
तस्वीर: Thomas Peter/REUTERS
दिसंबर आ गया, पूरे साल में यहां बस 139 बच्चे जन्मे
होश्चा हॉस्पिटल के मैटरनिटी वॉर्ड में इस साल अब तक बस 139 बच्चे पैदा हुए हैं. बीते साल यह संख्या 164 थी. एक दशक पहले इसी मैटरनिटी वॉर्ड में हर साल 400 से ज्यादा बच्चे जन्म लेते थे. यवहेन हेक्केल इसी अस्पताल में गायनेकोलॉजिस्ट हैं. वह बताती हैं, "बहुत सारे युवाओं की मौत हो चुकी है. सीधे से कहूं, तो ऐसे युवा जिन्हें यूक्रेन के जीन पूल की भरपाई करनी थी, मर चुके हैं." (फाइल फोटो)
तस्वीर: Marko Djurica/REUTERS
जब युद्ध खत्म होगा, तो कैसे खड़े होंगे?
युद्ध खुद ही भीषण विपत्ति है. महीनों-सालों तक चलने वाले युद्ध, लोगों के लिए और बड़ी आपदा साबित होते हैं. युद्ध में बेतहाशा संसाधन खपते हैं, मगर जंग खत्म होते ही चुनौतियां खत्म नहीं होंगी. फिर खड़े होने का संघर्ष शुरू होगा. कम होती आबादी और घटती जन्मदर के कारण यूक्रेन के आगे एक त्रासद सवाल खड़ा है. जब युद्ध खत्म होगा, तो बची-खुची ताकत समेटकर खड़ा होने और बर्बाद हुए को फिर संवारने के लिए कौन बचेगा?
तस्वीर: Anatolii Stepanov/REUTERS
मोर्चे पर ही नहीं, दूर के शहरों का भी बुरा हाल
युद्ध शुरू हुए चार साल होने ही वाले हैं. मारे गए और घायल हुए लोगों की संख्या लाखों में है. कई लाख यूक्रेनी देश छोड़कर जा चुके हैं. लगभग 5,000 की आबादी वाला होश्चा एक छोटा सा शहर है. सबसे नजदीकी मोर्चे से भी सैकड़ों किलोमीटर दूर, फिर भी यहां आबादी का संकट बहुत गहरा है.
तस्वीर: Thomas Peter/REUTERS
बच्चे नहीं, तो स्कूल क्यों खुलेगा?
नजदीक ही सदोवे नाम का गांव है. यहां के स्कूल में पहले 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते थे, अब स्कूल बंद हो चुका है. होश्चा टाउन काउंसिल के प्रमुख, मेकोला पानचुक इसकी वजह बताते हैं, "दो साल पहले हमें मजबूर होकर स्कूल बंद करना पड़ा. क्यों? क्योंकि, बस नौ बच्चे ही रह गए थे." (सांकेतिक तस्वीर)
तस्वीर: Hanna Sokolova-Stekh/DW
देश को फिर से खड़ा करने के लिए कितने लोग चाहिए?
एक छोटे से घर, या कमरे को रेनोवेट करना भी कई दिन का काम है. फिर यहां तो समूचे देश को दोबारा तकरीबन दोबारा बनाने का जिम्मा होगा. फरवरी 2022 में युद्ध शुरू होने से पहले यूक्रेन की जनसंख्या करीब 4.2 करोड़ थी.
तस्वीर: Daniel Carde/ZUMA Wire/IMAGO
युद्ध की बर्बादी
युद्ध के इन सालों में आबादी घटकर 3.6 करोड़ से भी कम हो गई है. इनमें उन इलाकों के लोग भी हैं, जिनपर रूस ने कब्जा कर लिया है. ये यूक्रेन की नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज के डेमोग्रैफी इंस्टिट्यूट का आंकड़ा है.
तस्वीर: AP Photo/picture alliance
कम बच्चों का जन्म लेना भविष्य में संकट बढ़ाएगा
औद्योगिक देशों में जब जन्मदर, आबादी की भरपाई के स्तर से नीचे चली जाती है, तो जनसंख्या सिकुड़नी शुरू होती है. यानी, कुल प्रजनन दर (प्रति महिला) लगभग 2.1 बच्चों से नीचे चली जाए.
तस्वीर: Marko Djurica/REUTERS
यूक्रेन में 'रीप्लेसमेंट लेवल' क्या है?
इस आंकड़े को 'रीप्लेसमेंट लेवल' कहते हैं. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर बढ़ते हुए किसी आबादी को जाने वाले लोगों की भरपाई के लिए इतनी संख्या में बच्चों की जरूरत पड़ती है. श्पीगल ने एक डेमोग्राफर के हवाले से बताया कि यूक्रेन में यह जन्मदर एक से नीचे चली गई है.
तस्वीर: Jose Colon/Anadolu/picture alliance
बस जन्म ही कम नहीं, मौतों की दर भी बहुत ज्यादा है
'वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू' के मुताबिक, 2020-2025 के बीच दुनिया के जिन 10 देशों में मृत्युदर सबसे ज्यादा पाई गई, उनमें यूक्रेन दूसरे नंबर पर है. प्रति 1,000 लोगों पर यह दर 15.2 है. ऊंची मृत्युदर जनसंख्या संकट को और विकट बना रही है. 2051 तक जनसंख्या कम होकर ढाई करोड़ तक पहुंच सकती है.
तस्वीर: Hanna Sokolova-Stekh/DW
लोगों की जिंदगी छोटी हो रही है
सरकारी आकलन के मुताबिक, यूक्रेन में पुरुषों की औसत जीवन अवधि युद्ध से पहले 65.2 साल थी. साल 2024 तक यह घटकर 57.3 रह गई है. महिलाओं के मामले में आंकड़ा युद्ध से पहले 74.4 था, अब 70.9 रह गया है.
तस्वीर: Anatolii Stepanov/SIPA/picture alliance
कामगारों की भारी कमी होगी
युद्ध के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए यूक्रेन को काम करने वाले लाखों हाथों की जरूरत होगी. इतना ही नहीं बल्कि रूस कहीं फिर हमला ना कर दे, इन आशंकाओं के कारण देश की सुरक्षा के लिए भी लोग चाहिए. अनुमान है कि अगले एक दशक में यूक्रेन के पास करीब 45 लाख कामगारों की कमी हो सकती है.
तस्वीर: Evgeniy Maloletka/AP/picture alliance
युद्ध ना होता, तो जिंदगी कितनी अलग हो सकती थी
होश्चा के टाउन हॉल के रास्ते में कई सैनिकों की तस्वीरें हैं. ये वो लोग हैं, जो युद्ध में मारे गए. कई बार कोई तस्वीरों पर फूल चढ़ाता, अपने आंसू पोंछता दिख जाता है. यूक्रेन के पास लड़ने वालों की कमी है. (सांकेतिक तस्वीर)
तस्वीर: Nadine Schmidt
लड़ने की उम्र क्या है?
अनिवार्य सैन्य सेवा की न्यूनतम उम्र 27 थी, जिसे पिछले साल घटाकर 25 कर दिया गया. तब भी कमी बनी हुई है. जंग छिड़ने के बाद 18 से 60 आयुवर्ग के पुरुषों के देश से बाहर जाने पर पाबंदी थी. पिछले अगस्त में यह आयुसीमा बढ़ाकर 22 कर दी गई. अब कई परिवार 18 साल का होने से पहले ही अपने बेटों को देश से बाहर भेज देते हैं.
तस्वीर: DW
खाली गांव, वीरान घर
होश्चा के आसपास बसे गांव खाली हो रहे हैं और वहां रहने वाले होश्चा आ रहे हैं. वजह ये कि उन गांवों में स्कूल, क्लिनिक और जरूरी सेवाएं बंद हो रही हैं. डलबी गांव होश्चा से बस 10 ही किलोमीटर दूर है. वहां बहुत सारे घर अब खाली पड़े हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
तस्वीर: Anatolii Stepanov/REUTERS
लड़ने गए, लौटकर नहीं आए
डलबी की एक निवासी ओकसाना ने बताया कि गांव में 200 से भी कम लोग बचे हैं, और इतने छोटे गांव से भी नौ पुरुष युद्ध में लड़ने गए हैं. इन पुरुषों में एक ओकसाना के पति भी हैं. वह मोर्चे पर गए थे और जुलाई से ही उनकी कोई खबर नहीं. (फाइल फोटो)
तस्वीर: Daniel Carde/ZUMA Wire/IMAGO
भविष्य का डर
अब ओकसाना को डर है कि उनके दो वयस्क हो चुके बेटों को भी सेना में जाना होगा. वह कहती हैं, "अगर उनको भी ले जाया गया, तो? उनके बिना मैं क्या करूंगी?" भविष्य की अनिश्चितता के कारण लोग परिवार शुरू करने से हिचक रहे हैं. वॉर्ड प्रमुख इन्ना अनटोनियुक बताती हैं कि यहां आने वाली करीब एक तिहाई महिलाओं के पति सेना में हैं, उनमें से कुछ मर चुके हैं या लापता हैं.
तस्वीर: Thomas Peter/REUTERS
"आंखों में आंसू थे, जब वह गया"
टाउन काउंसिल की उप-प्रमुख ताबेकोवा आपबीती बताती हैं, "जब मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूं, उसके कुछ ही दिन बाद मेरे पति को सेना में भेज दिया गया. बच्चे के जन्म पर घर आने की छुट्टी दी गई. जब वो गए, तो उनकी आंखों में आंसू थे."
तस्वीर: Thomas Peter/REUTERS
बच्चे बनेंगे भविष्य की उम्मीद!
ताबेकोवा का मानना है कि बच्चे भविष्य की उम्मीद दे सकते हैं. वह बताती हैं, "मैं कई पत्नियों को जानती हूं, जिनके पति लड़ रहे हैं. कई महिलाओं को जानती हूं, जिनके पति अब दुर्भाग्य से हमारे साथ नहीं. उनमें से कुछ के लिए उनके बच्चे खुशी का एक पल हैं, उम्मीद ना हारने की एक वजह हैं." तस्वीर में नजर आ रही हैं होश्चा जनरल हॉस्पिटल के मैटरनिटी वॉर्ड की प्रमुख डॉक्टर इन्ना अंतोनियुक.
तस्वीर: Thomas Peter/REUTERS
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डीडब्ल्यू से बात करने वाले विशेषज्ञों की मानें, तो रूस का भारत को चुनना कोई संयोग नहीं है. राजन कुमार, दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रूस विशेषज्ञ हैं. उनके मुताबिक, रूस की योजना प्रवासी श्रमिकों को भारतीय रुपये में भुगतान करने की हो सकती है. वह मुद्रा, जो उसे भारत के साथ तेल की बिक्री से हासिल हो रहा है.
भारत और रूस के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 60 अरब यूरो का है. जबकि, रूस द्वारा भारत से आयात महज पांच अरब डॉलर का ही है. इसकी वजह से रूस के पास भारतीय रुपये जमा होते ही जा रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि रूस इन रुपयों का इस्तेमाल करना चाहता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, रूस में असल कमी सड़क साफ करने वाले या अकुशल श्रमिकों की नहीं, बल्कि कुशल पेशेवरों की हैतस्वीर: Alexandr Piragis/SNA/IMAGO
लगातार घटती आबादी रूस पर असर डाल रही है
रूसी संघीय सांख्यिकी सेवा के अनुसार, 2024 में रूस में लगभग 22 लाख श्रमिकों की कमी थी. रूसी विज्ञान अकादमी से जुड़े विशेषज्ञों ने 2023 में यह आंकड़ा 48 लाख तक आंका था. कामगारों की कमी उद्योग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और आईटी जैसे अहम क्षेत्रों में साफतौर पर महसूस की जा रही है. हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़े पूरी तरह सटीक नहीं हैं केवल अनुमान हैं.
अर्थशास्त्री याकोवलेव के मुताबिक, रूस भारतीय श्रमिकों को केवल इसलिए नहीं बुला रहा क्योंकि युद्ध ने हालात बिगाड़ दिए हैं. बल्कि, देश में काम करने वालों की संख्या लंबे समय से घटती जा रही है. इस पक्ष पर लिप्सीटस ने कहा, "युद्ध, पलायन और सैन्य लामबंदी इस कमी में एक भूमिका जरूर निभाते हैं. लेकिन ये सभी कारण लंबे समय से चली आ रही एक समस्या, यानी लगातार घटती आबादी को और गहरा कर देते हैं."
कौन छोड़ेगा डोनबास, पुतिन या जेलेंस्की?
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उनके मुताबिक, "20 से 50 लाख कामगारों की कमी से जुड़े सभी अनुमान ऐसी अर्थव्यवस्था के आधार पर लगाए गए थे, जो अपनी क्षमता से अधिक जूझ रही है. हालांकि, अब हालात बदल रहे हैं और मंदी की शुरुआत हो रही है. कंपनियां काम के घंटे घटा रही हैं और इस साल बड़े पैमाने पर छंटनी की भी आशंका है."
भारत के विशेषज्ञ भी कामगारों की पहल को लेकर सतर्क हैं. नई दिल्ली के 'नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी' की प्रोफेसर लेखा चक्रवर्ती ने चेतावनी दी कि युद्ध की वजह से रूस में श्रमिकों की मांग विकृत और अस्थिर है. उनके अनुसार, "युद्ध के बाद हालात सामान्य होने या फिर संघर्ष के और बढ़ने पर मजदूरी तेजी से घट सकती है, छंटनी हो सकती है और घर लौटने में अड़चन आ सकती है. पर्याप्त सुरक्षा न होने के कारण वे विदेश में फंस सकते हैं."