अदालत तय करेगी भारतीय महिलाओं के धार्मिक अधिकारों की दिशा
१० अप्रैल २०२६
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला विवाद समेत कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है. इसने धर्म और संविधान के बीच बहस को फिर तेज कर दिया है. मामला सिर्फ महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश तक सीमित नहीं है. यह तय होगा कि अदालतें धार्मिक परंपराओं में कितना दखल दे सकती हैं.
क्या पीरियड लीव महिलाओं के लिए भेदभाव का नया कारण बन सकती है?
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संवैधानिक बेंच ने इस मामले पर 7 अप्रैल को सुनवाई शुरू की. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सरकार का पक्ष रख रहे हैं. केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का समर्थन किया है.
सरकार की दलील के मुताबिक, धार्मिक आस्था और परंपराओं के मामलों में अदालतों को सीमित दखल देना चाहिए. जज कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं. अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद के पास है. जबकि, अदालत खुद को पूरी तरह बाहर रखने के पक्ष में नहीं है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि संसद का फैसला अंतिम नहीं होता. कोर्ट संविधान के आधार पर जांच कर सकता है. इस दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा, "मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को महीने में तीन दिन 'अछूत' और चौथे दिन अचानक 'शुद्ध' नहीं माना जा सकता. संविधान का नियम हर दिन एक समान होना चाहिए."
क्यों हो रही है सुनवाई?
अदालत सबरीमाला विवाद पर कोई फैसला नहीं सुना रही. सुनवाई का दायरा केवल संविधान के अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार) और अनुछेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) की व्याख्या तक सीमित है. लेकिन इसकी जड़ 2018 के एक फैसले से जुड़ी है.
साल 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई. मान्यता के मुताबिक, भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना गया है.
साल 2006 में इस प्रथा को याचिका के जरिए चुनौती दी गई. सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया और मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटा दी. जस्टिस इंदु मल्होत्रा फैसले में एकमात्र न्यायाधीश थीं, जिन्होंने विरोध किया था.
अदालती फैसले के खिलाफ राज्य में कई जगह हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए. इसके बावजूद 2 जनवरी 2019 को पहली बार दो महिलाओं बिंदु अम्मिनी और कनकदुर्गा ने पुलिस सुरक्षा के साथ मंदिर में प्रवेश किया. इस मामले में तुरंत कई रिव्यू पेटिशन दाखिल की गईं. सुप्रीम कोर्ट ने 'मौलिक अधिकार' बनाम 'धार्मिक परंपरा' जैसे बड़े संवैधानिक सवाल उठाए, जिसकी स्पष्टता की जरुरत लगी. इसमें अन्य धर्मों की महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सवाल भी जोड़े गए.
इसके जवाब के लिए 2020 में तत्कालीन चीफ जस्टिस एस. ए. बोबडे ने नौ जजों की संविधान पीठ बनाई. 7 अप्रैल से इसकी सुनवाई फिर शुरू हुई है. रिव्यू पिटीशन्स का नतीजा इस बेंच के फैसले पर निर्भर करेगा. मामला सबरीमाला से जुड़ा है, लेकिन इसके साथ मस्जिद और दरगाह में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अगियारी में अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना (एफजीएम) जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
'सरकार को संविधान के बजाए परंपराओं की फिक्र'
डीडब्ल्यू हिन्दी ने बिंदु अम्मिनी से बात की. वह मानती हैं कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है. लेकिन इस मामले में ऐसा लगता है कि वह संविधान की जगह धार्मिक परंपराओं की चिंता कर रहे हैं.
बिंदु बताती हैं, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिलाओं की गरिमा को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई जा रही. सबरीमाला में प्रवेश करने के बाद मुझपर कई बार हमला हुआ. लेकिन केरल सरकार ने इसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. मुझे 2023 में केरल छोड़कर दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा. न बीजेपी, न कांग्रेस और न ही वाम दल, किसी ने भी महिलाओं का साथ नहीं दिया. सभी सिर्फ भक्तों का वोट पाना चाहते हैं."
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की वैधता पर सवाल उठाए
'श्री अयप्पा धर्म सेना' के अध्यक्ष और हिंदू ऐक्टिविस्ट राहुल ईश्वर के दादा सबरीमाला मंदिर में पुजारी रहे हैं. वह शुरुआत से इस फैसले के खिलाफ हैं. उन्होंने तर्क दिया कि मंदिर में किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होता. डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में राहुल ने कहा, "हम सिर्फ आयु से जुड़ा एक नियम लागू करने की बात कर रहे हैं. भगवान अयप्पा को 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' के रूप में पूजा जाता है. इसलिए कम उम्र की महिलाओं की मंदिर में एंट्री नहीं है. लेकिन वामपंथी, उदारवादी और नारीवादी समूह इसे गलत तरीके से समझते हैं."
उन्होंने आगे जोर दिया कि अदालतें धर्म में दखल दे सकती हैं, पर केवल एक सीमा तक. सती प्रथा या बलि जैसी कुप्रथाओं को रोका जाना चाहिए. राहुल कहते हैं, "अदालतों को तर्क करने और सवाल उठाने का अधिकार है. लेकिन इस मामले में अंतिम फैसला पुजारियों को ही लेने का अधिकार होना चाहिए."
हिंदू महिलाओं को भी मिले बराबर अधिकार
कोर्ट के फैसले के बाद साल 2016 में मुस्लिम महिलाओं को हाजी अली दरगाह में प्रवेश की अनुमति मिली. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक नूरजहां साफिया नियाज ने डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में बताया, "हमने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 का सहारा लिया ताकि अपने (महिलाओं) धार्मिक विश्वास की रक्षा कर सकें. हाजी अली का फैसला अदालतों के लिए भी एक उदाहरण बना और महिलाओं के पक्ष में निर्णय देने की राह आसान हुई. अदालत कानून को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक महिलाओं के लिए अलग-अलग तरीके से लागू नहीं कर सकता. यह सभी धर्मों की महिलाओं के लिए समान होना चाहिए."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा बिना रस्मों के हिंदू शादी वैध नहीं
कासिम रसूल, इलियास ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. वह बताते हैं कि इस्लाम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से नहीं रोकता, लेकिन उनके लिए मस्जिद के अंदर अलग कमरा या मंजिल जैसी विशेष व्यवस्था होनी चाहिए. उदाहरण देते हुए वह समझाते हैं, "दिल्ली की जामा मस्जिद में महिलाएं नमाज के साथ कार्यक्रमों में भी शामिल होती हैं. जिन मस्जिदों में ऐसी सुविधा उपलब्ध है, वहां महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है. हम महिलाओं के लिए उचित स्थान सुनिश्चित करने की अपील उन मस्जिदों से भी करते हैं, जहां यह व्यवस्था नहीं है."
वह अदालत में चल रही सुनवाई को लेकर कहते हैं, "धर्म के लिए क्या 'जरूरी' है और क्या नहीं, यह निर्णय अदालत नहीं कर सकती. यह अधिकार संबंधित धर्म के विद्वानों को होना चाहिए."
विचारधारा नहीं तय कर सकती महिलाओं के मुद्दों की दिशा
सुप्रीम कोर्ट में वकील शशांक सिंह बताते हैं कि भारतीय संविधान को किसी एक लिंग के दृष्टिकोण से नहीं बनाया गया है. यह हर व्यक्ति को धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है. सबरीमाला के मामले पर वह कहते हैं, "गुरुद्वारे में सिर ढकना, मंदिर के बाहर चप्पल उतारना धर्म से जुड़े नियम हैं. ये परंपराएं नहीं. कानून समय के साथ बदलता और आगे बढ़ता है. अनुच्छेद 25 को अनुच्छेद 14 के साथ पढ़ना जरूरी है. यह सभी को समानता का अधिकार देता है. महिलाओं का मंदिर में प्रवेश प्रतिबंधित करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इसलिए उन्हें धार्मिक स्थलों में प्रवेश से रोकने का कोई ठोस कारण नहीं बनता."
शशांक ने बेंच की संरचना पर ध्यान दिलाया, "न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पीरियड लीव के मामले में कहा था कि अनिवार्य छुट्टी देने से युवा महिलाओं को पुरुष सहकर्मियों के बराबर महसूस नहीं होगा और यह महिलाओं के करियर में प्रगति के लिए नुकसानदायक हो सकता है."
वह आगे कहते हैं कि यह मुद्दा अब राजनीतिक बन चुका है, सुनवाई केरल चुनावों के आसपास शुरू हुई. शशांक कहते हैं, "अल्पसंख्यक धर्मों के मामलों में सरकार पर्सनल लॉ बदलने के लिए जल्दी तैयार दिखती है. जैसा शाह बानो और तीन तलाक मामले में देखने को मिला. लेकिन हिंदू बहुसंख्यक से जुड़े मामलों में उसका रुख अलग नजर आता है."
क्या अदालत धर्म में दखल दे सकती है?
मध्यप्रदेश (इंदौर बेंच) हाई कोर्ट में कार्यरत अधिवक्ता प्रत्युष मिश्रा इसके जवाब में कहते हैं कि यह बहुत ही बारीक और जटिल सवाल है. अलग-अलग हाई कोर्ट ने माना कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार अगर लड़की लगभग 15 साल (बालिग) की हो जाती है, तो वह शादी कर सकती है. लेकिन दूसरी तरफ, पॉक्सो कानून कहता है कि 18 साल से कम उम्र में यौन संबंध अपराध की श्रेणी में आता है.
ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कानून के तहत हिंदू और मुस्लिम लड़कियों की शादी की उम्र अलग-अलग मानी जा सकती है? क्या यह समानता के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है और ऐसे मामलों में अदालत की भूमिका क्या होनी चाहिए?
प्रत्युष बताते हैं, "अदालत के पास यह अधिकार होता है कि अगर कोई स्पष्ट कानून नहीं है, या कोई धार्मिक प्रथा संविधान के मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाती है, तो वह लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश दे सकती है. इन्हें मानना जरूरी होता है क्योंकि यह अदालत का आदेश है. महिलाओं की सुरक्षा के मामले में विशाखा दिशानिर्देश दिए गए थे, जिन्हें कानून की तरह ही लागू किया गया."
हालांकि, संसद इसे बदल सकती है. प्रत्युष कहते हैं, "सबरीमाला मामले में भी केंद्र सरकार चाहती तो फैसले को कानून बनाकर पलट सकती थी. लेकिन ऐसा करना कुछ हद तक न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का अनादर करना होता. प्रतिक्रिया शाह बानो मामले की तरह ही हो सकती थी. इसी कारण सरकार को लगा कि इस मुद्दे पर अदालत का रुख लेना ही सही रहेगा."