बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी चुनावों में अकेले उतरकर शिवसेना ने जो दांव खेला था उसका फायदा उसे हुआ है. भाजपा के प्रदर्शन में भी जबरदस्त सुधार आया है लेकिन शिवसेना के साथ अहंकार की लड़ाई में उसे कड़ी टक्कर मिली है.
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पिछले दो दशकों से बीएमसी में काबिज शिवसेना और भाजपा ने इस बार अलग-अलग चुनाव लड़ा और दोनों ही पार्टियों को इसका फायदा मिला है. शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी है लेकिन वह अकेले बहुमत पाने की स्थिति में नहीं है. चुनाव में मिली सफलता शिवसेना के लिए आत्मसम्मान की वापसी की तरह है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हीं के आक्रामक अंदाज में चुनौती देने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की साख भी इस जीत के साथ बढ़ेगी.
झटपटाहट से मुक्ति
राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से ही महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन दरकने लगा था लेकिन मजबूरी के चलते इन दोनों दलों का साथ केंद्र और राज्य की सरकार में बना हुआ है. मोदी के लगातार बढ़ते कद के कारण गठबंधन में शिवसेना की धमक कमजोर होती जा रही थी. शिवसेना की झटपटाहट और बेचैनी को कई बार महसूस किया गया है. कुछ मौकों पर शिवसेना ने अपने इस दर्द को सार्वजानिक भी किया. अब जबकि बीएमसी चुनावों में शिवसेना ने अपनी ताकत का अहसास करा दिया है, भाजपा, राज्य या केंद्र में शिवसेना की अधिक उपेक्षा नहीं कर सकती.
देखिए मोदी सरकार की 10 उपलब्धियां
दो साल किसी नई सरकार के कामकाज को मापने के लिए ज्यादा नहीं होते. सवा अरब लोगों के लिए बनने वाली योजनाओं के नतीजे दिखने में समय लगता है. लेकिन दो साल में मोदी सरकार की कामयाबी की एक झलक हैं ये 10 बड़ी उपलब्धियां.
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अमेरिका से संबंध
यूपीए-2 के समय भारत और अमेरिका के संबंधों में तनाव आने लगा था. मोदी सरकार के आने के बाद भारत-अमेरिका संबंध बेहतर हुए हैं. दोनों देश लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज एंड मेमोरैंडम समझौता करने पर राजी हुए हैं. यह समझौता अमेरिका अपने सैन्य सहयोगियों से ही करता है.
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चाबहार समझौता
मई 2016 में चाबहार समझौता करके ईरान के साथ संबंधों में भारत सरकार ने बड़ी पहल की है. मनमोहन सरकार के समय दोनों देशों के संबंध खराब हो रहे थे. नरेंद्र मोदी ने उन्हें सुधारा है. चाबहार समझौता इसलिए भी अहम है कि अफगानिस्तान से संबंधों के लिए अब भारत पाकिस्तान पर निर्भर नहीं रहेगा.
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मुद्रास्फीति और जीडीपी
बढ़ती मुद्रास्फीति यूपीए सरकार के ताबूत में आखिरी कील साबित हुई थी. नई सरकार आने के बाद से महंगाई लगातार गिर रही है और 5 फीसदी से कम के स्तर पर जा चुकी है. भारतीय अर्थव्यवस्था के भी 7.4 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान पूरी दुनिया को चौंकाए हुए है.
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विदेशी निवेश
2015 में विदेशी निवेश के मामले में भारत ने चीन समेत बाकी सभी देशों को पीछे छोड़ दिया. 2015 की पहली छमाही में ही चीन से तीन अरब डॉलर ज्यादा और अमेरिका से 4 अरब डॉलर ज्यादा का निवेश भारत में हुआ. मोदी की विदेश यात्राओं पर की गई मेहनत रंग लाती दिख रही है.
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रिसर्च पर जोर
भारत सरकार साइंटिफिक रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए कई नए प्रोग्राम लाई है. लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशन वेव ऑब्जर्वेटरी इस ओर एक बड़ी उपलब्धि है. ग्रैविटेशनल वेव रिसर्च के मामले में यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का संस्थान होगा, जैसा भारत में फिलहाल कोई नहीं है.
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वन रैंक वन पेंशन
भारत सरकार ने दशकों से लटके पड़े वन रैंक वन पेंशन के मुद्दे को सुलझा कर बड़ी कामयाबी हासिल की है. एक मार्च 2016 को इसकी पहली किश्त भी जारी हो चुकी है. सैनिकों की बहुत पुरानी मांग पूरी होने से उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई.
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रीअल एस्टेट बिल
भारत में निजी बिल्डरों के कामों को नियमित करके उन्हें एक कानून के तहत लाने के मामले में मोदी सरकार ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है. यह मुद्दा देश के उन करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है जो निजी बिल्डरों के बनाए फ्लैट्स खरीद रहे हैं. इस बिल से उन्हें राहत मिली है.
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सौर ऊर्जा में बड़ी कामयाबी
यूपीए सरकार ने 2020 तक देश की सौर ऊर्जा क्षमता 20 हजार मेगावाट करने का लक्ष्य तय किया था जिसे मोदी सरकार ने आते ही एक लाख मेगावाट कर दिया. लोगों ने कहा कि बहुत ज्यादा है लेकिन 2014-15 में लक्ष्य से डेढ़ गुना हासिल करके सरकार ने जता दिया कि वह कितनी गंभीर है.
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एलपीजी सब्सिडी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के ऐसे लोगों से एलपीजी सब्सिडी छोड़ने का अनुरोध किया जो महंगी रसोई गैस खरीद सकते हैं. उनका कहना था कि इससे गरीब लोगों को एलपीजी उपलब्ध कराई जा सकेगी. अब तक करीब एक करोड़ लोग सब्सिडी छोड़ चुके हैं. ग्रामीण गरीबों को रसोई गैस कनेक्शन दिए जा रहे हैं.
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यमन संकट में पहल
यमन में गृह युद्ध होने पर काफी भारतीय वहां फंस गए थे. विदेश मंत्रालय ने तेजी से कदम उठाते हुए विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह को वहां भेजा. वह 168 भारतीयों को लेकर स्वदेश लौटे. इसे भारत की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा गया.
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गुजरात और गोवा पर भी नज़र
क्षेत्रीय पार्टी होने के बावजूद शिवसेना स्वयं को भाजपा से ज्यादा हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी मानती है. केंद्र सरकार में साथ होने के बावजूद मोदी सरकार के कई बड़े फैसलों पर सवाल उठाने वाली शिवसेना ने अपनी स्वतंत्रता और आक्रामकता को बनाये रखा है. राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर बोलने वाली शिवसेना अब गुजरात और गोवा में भाजपा को आँखे दिखा सकती है. गोवा विधानसभा चुनाव में वह भाजपा विरोधी खेमे में थी और अब उसकी नज़र गुजरात पर है. इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को अपना चेहरा बनाकर वहां भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकती है.
‘मोदी आभामंडल' को खतरा
मुंबई और दिल्ली देश के दो ऐसे शहर हैं जो किसी ना किसी कारण से राष्ट्रीय मीडिया में रहते हैं. यहाँ होने वाली हर छोटी बड़ी घटनाओं का राजनीति पर असर पड़ता है. राजनीतिक नेताओं के प्रति धारणा बनाने और खंडित करने का काम भी इन दो शहरों से होता है. देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी अरविन्द केजरीवाल की सरकार है. वह और उनकी पार्टी ‘मोदी आभामंडल' को नुकसान पहुँचाने का कोई मौका नहीं गंवाती. अब देश की आर्थिक राजधानी में भी ‘मोदी आभामंडल' को चुनौती देने वाले उद्धव ठाकरे की बादशाहत कायम होने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में लोगों की धारणा पर असर पड़ सकता है.
जानिए कहां कहां चूके मोदी
पहले दो साल में मोदी सरकार ने जमकर सुर्खियां बटोरी हैं. लेकिन ये सुर्खियां विवादों की वजह से ज्यादा रहीं. गिनती में तो ये विवाद बहुत ज्यादा हैं, लेकिन अभी जिक्र 10 सबसे बड़े विवादों का.
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आईआईटी में संस्कृत
इसी साल अप्रैल में शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में कहा कि आईआईटी से संस्कृत पढ़ाने को कहा गया है. इस प्रस्ताव का देशभर में विरोध हुआ. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि एचआरडी मिनिस्ट्री का नाम बदलकर हिंदू राष्ट्र डेवलपमेंट मिनिस्ट्री कर दिया जाना चाहिए.
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प्रधानमंत्री की डिग्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीए और एमए की डिग्रियों को लेकर देश में जमकर विवाद हुआ. प्रधानमंत्री की शिक्षा पर एक आरटीआई का जवाब न मिलने से यह विवाद शुरू हुआ. आम आदमी पार्टी का दावा है कि उनकी डिग्री फर्जी है. अरुण जेटली और अमित शाह को सामने आकर सफाई देनी पड़ी.
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उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन
9 कांग्रेसी विधायकों के बागी होने पर इसी साल मार्च में केंद्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया. हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार के इस फैसले को गलत करार दिया. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बहुमत साबित करके फिर से सरकार बना ली.
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कन्हैया विवाद
फरवरी 2016 में जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष कन्हैया को राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया. इसके विरोध में देशभर में प्रदर्शन शुरू हो गए. दो और छात्रों को गिरफ्तार किया गया. शिक्षा मंत्री ने दखल देने से इनकार कर दिया. बाद में तीनों छात्र जमानत पर रिहा हुए.
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हैदराबाद यूनिवर्सिटी विवाद
शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी की पांच चिट्ठियों के बाद दलित छात्रों पर हैदराबाद यूनिवर्सिटी ने कार्रवाई की और पांच छात्रों को सस्पेंड कर दिया. उनमें से एक रोहित वेमुला ने खुदकुशी कर ली. दलित स्कॉलर वेमुला की मौत ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला छेड़ दिया.
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अरुणाचल संकट
बीते साल दिसंबर में अरुणाचल की कांग्रेस सरकार से कुछ बागी विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिर गई. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राज्यपाल की मदद से केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को अस्थिर किया. बाद में बागी विधायकों ने बीजेपी की मदद से सरकार बना ली.
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असहिष्णुता और सम्मान वापसी
देश में बढ़ती असहिष्णुता का आरोप लगाकर देश के कई जानेमाने लेखकों, कलाकारों, कवियों, वैज्ञानिकों और फिल्मकारों ने अपने-अपने सम्मान लौटा दिए. जिसके बाद देश में ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि बंटवारा स्पष्ट नजर आने लगा.
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ललित मोदी के संबंध
केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भगोड़े ललित मोदी की मदद करने की बात सामने आने के बाद केंद्र सरकार विवादों में घिर गई. सुषमा स्वराज ने कहा कि उन्होंने मानवीय आधार पर मदद की. इसके बाद कई हफ्तों तक संसद ठप रही.
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गोमांस पर बैन
बीते साल हरियाणा और महाराष्ट्र में गोहत्या को लेकर कड़े कानूनों के लागू होने का काफी विरोध हुआ. यहां तक कि यह मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित रहा. बीजेपी के कई नेताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों के भी बयान आए.
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10 लाख का सूट
बीते साल जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान उनसे मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सूट पहना उस पर उनका नाम लिखा था. ऐसे आरोप लगे कि यह सूट 10 लाख रुपये में बना है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और सूट-बूट की सरकार कहकर तीखे बाण चलाए.
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व्यावहारिक होगी साझेदारी
बीएमसी चुनावों के नतीजे भाजपा और शिवसेना के रिश्तों के लिए ‘शक्ति संतुलन' का काम करेगा. इन चुनावों में सफलता के बावजूद शिवसेना को पता है कि राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा में उसकी ज़मीन खिसक रही है. शिवसेना के लिए केंद्र और राज्य की सत्ता को छोड़ना आसान नहीं है. इसलिए इन दोनों सरकारों की आलोचना करते समय उसे उदारता दिखानी पड़ेगी. वहीँ भाजपा को शिवसेना जैसी जनाधार वाली पार्टियों की जरूरत अभी भी है. शिवसेना से दुश्मनी भाजपा के ‘मोदी आभामंडल' को नुकसान पहुंचा सकती है. कम से कम भाजपा इस जोखिम को उठाना नहीं चाहेगी.
दोनों ही दल वैचारिक रूप से करीब हैं, और बरसों साथ रहने का उन्हें अनुभव भी है. बीएमसी चुनाव के दौरान कटुता को भूलकर दोनों दल फिर साथ आ सकते हैं. हो सकता है कि चुनाव परिणाम से सबक लेते हुए दोनों ही पार्टी एक दूसरे के प्रति अधिक ज़िम्मेदार, उदार और व्यावहारिक बन जायें.