नीदरलैंड्स की बिजली पैदा करने वाली सड़कों की बात विज्ञान की परिकथा जैसी लग सकती है. लेकिन यह सच है कि नीदरलैंड्स में साइकिल के रास्ते से सौर बिजली बनाई जा रही है.
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यह बात विज्ञान की परिकथा जैसी लग सकती है लेकिन नीदरलैंड्स में साइकिल के रास्ते से सौर बिजली बनाई जा रही है. ये देखने में किसी भी सामान्य बाइक लेन जैसी ही है, लेकिन क्रोमेनी की ये साइकिल लेन कुछ अलग है. ये दुनिया की पहली लेन है जिसके नीचे सोलर सेल हैं.
सोलर रोड प्रोजेक्ट के स्टेन डे विट जैसे आविष्कारक इस पर काम कर रहे हैं कि सड़कें सूरज की रोशनी से बिजली बना सकें. वह बताते हैं, "नीदरलैंड्स में हमारे पास छतों पर जितनी जगह है उससे कहीं ज्यादा रोड का इलाका है. इसलिए अगर हम पीवी सोलर तकनीक को रोड के साथ जोड़ पाते हैं तो हम अतिरिक्त जगह का इस्तेमाल किए बिना और पर्यावरण को छेड़े बिना सौर बिजली पैदा करने की अपार संभावना बना सकते हैं, उन सड़कों का इस्तेमाल कर जो हमारे पास मौजूद हैं.
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रेगिस्तान से फूटा ऊर्जा का झरना
मोरक्को के रेगिस्तान में बनने वाले दुनिया के सबसे बड़े केंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्र का पहला चरण शुरु हो गया. अब तक अपनी जरूरत की लगभग सारी ऊर्जा बाहर से आयात करने वाला देश मोरक्को भविष्य में आत्मनिर्भर हो जाएगा.
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घर घर में बिजली
इस सोलर प्लांट को साल 2018 तक पूरा करने की योजना है. इसे बनाने वाले विश्व बैंक और मोरक्को सोलर एनर्जी एजेंसी (मासेन) का मानना है कि यह प्रोजेक्ट मोरक्को के 11 लाख घरों के लिए पर्याप्त ऊर्जा पैदा कर सकेगा.
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विशाल सहारा मरूस्थल
इस अफ्रीकी देश के रेगिस्तान में स्थापित सोलर संयत्र से मिलने वाली सोलर ऊर्जा से शुरुआत में करीब 6,50,000 स्थानीय लोगों की जरूरत पूरी की जा सकेगी. यह भोर से लेकर शाम को सूरज ढलने के तीन घंटे बाद तक इतने लोगों के काम की ऊर्जा दे सकता है.
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राजधानी जितना बड़ा
इसके सौर पैनल लगभग उतने क्षेत्र में फैले हैं जितनी बड़ी मोरक्को की राजधानी राबात है. नूर-1 नामके इस प्रोजेक्ट के पहले सेक्शन से 160 मेगावॉट की ऊर्जा पैदा हो रही है और इसकी अधिकतम क्षमता 580 मेगावॉट तक जाएगी. इससे मोरक्को अपने भारी कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी लाएगा.
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ग्रीन डेजर्ट
केंद्रित सौर संयत्र सामान्य फोटोवोल्टेइक सोलर से इस मायने में अलग होता है कि इसमें शीशों के खास विन्यास से सूरज की ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा पैनलों पर डाली जाती है. इस गर्मी से पैनल का एक द्रव्य गर्म होता है और फिर भाप पैदा होती है. इस भाप से जनरेटर चलता है और बिजली मिलती है.
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सीएसपी का होगा बोलबाला
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने बताया है कि 2050 तक दुनिया की कुल बिजली का करीब 11 फीसदी ऐसे ही केंद्रित सौर ऊर्जा पैनलों यानि सीएसपी से आएगा. इस रास्ते पर आगे बढ़कर अफ्रीका और मध्यपूर्व आने वाले समय के सबसे बड़े पावरहाउस बन सकते हैं.
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नवंबर में यूएन सम्मेलन
उत्तर अफ्रीका का देश मोरक्को 2010 तक ही अपनी जरूरत की 42 प्रतिशत ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से हासिल करना चाहती है. इसका एक तिहाई हिस्सा सोलर, विंड और हाइड्रोपावर स्रोतों से होगा. इसी साल नवंबर में अगली संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन बैठक मोरक्को में होने वाली है.
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बहुत दूरगामी असर
कुल 3.9 अरब डॉलर के निवेश से बने उआरजाजाटे सोलर कॉम्प्लेक्स में जर्मन निवेश बैंक के एक अरब डॉलर भी लगे हैं. यूरोपीय निवेश बैंक ने इसमें करीब 60 करोड़ डॉलर और विश्व बैंक ने 40 करोड़ डॉलर का निवेश किया है. भविष्य में यहां पैदा हुई ऊर्जा को यूरोप भेजने की भी योजना है.
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नीदरलैंड्स की ये लेन 70 मीटर लंबी है और इसे बनाने में वैज्ञानिकों को दो साल लगे. रोड की सतह की तीन परतें हैं. कंक्रीट, सोलर सेल और सबसे ऊपर ग्लास. रास्ते पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी को सोलर सेल सोख लेते हैं और उसे बिजली में बदल देते हैं. रास्ते से कुछ ही दूर स्मार्ट बॉक्स रखा गया है है. यहां देखा जा सकता है कि सोलर सेल कितनी बिजली पैदा कर रहे हैं. 2014 में बनाए जाने के बाद से यहां से 10,000 किलोवाट बिजली पैदा हुई है जो तीन घरों की साल भर के बिजली के बराबर है.
विट कहते हैं कि भविष्य में हम बिजली के उत्पादन और उसके उपयोग के बीच बेहतर संपर्क बनाना चाहते हैं. उनकी कोशिश है कि सोलर सड़कों को इस कदर आधुनिक बनाया जाए कि भविष्य में इन सड़कों से गुजरने वाली कारों और साइकिलों को सड़क पर ही चार्ज भी किया जा सकेगा. लेकिन सामान्य सड़कों में सोलर सेल के इस्तेमाल के लिए उन्हें साइकिल और स्कूटर के मुकाबले ज्यादा भारी वजन सहने लायक बनाना होगा. क्रोमेनी से 70 किलोमीटर दूर डेल्फ्ट की टीएनओ लैब में इस तरह की चुनौतियों का मुकाबला करने पर काम चल रहा है. सीनियर इंजीनियर स्टैन क्लेर्क्स और उनकी टीम सड़क की सतह को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं. स्टैन क्लेर्क्स बताते हैं, "हमारी मुख्य चुनौती थी कि ऐसी परत बनाएं जिस पर गाड़ियां सुरक्षित ड्राइव कर सकें. ये टायर को घर्षण भी दें और जितना संभव हो रोशनी गुजरने दें. इसलिए हमें ऐसा कुछ बनाना था जो पारदर्शी हो, मजबूत हो और इसमें घर्षण भी हो. सोलर रोड बनाते समय यह सबसे बड़ी चुनौती थी."
तस्वीरों में, सौर ऊर्जा से पकवान
सौर ऊर्जा से पकवान
भारत में सौर ऊर्जा का उपयोग निजी से औद्योगिक स्तर पर आराम से किया जा सकता है. साल में अधिकतर समय धूप खिली रहती है. इसका फायदा उठाने वाले अब कई राज्य हैं.
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आश्रम में सुबह
मुनि सेवा आश्रम में बीमार, बूढ़े और अपाहिज बच्चों की देख रेख की जाती है. आश्रम में वैकल्पिक तरीके से खेती होती है और इसकी अपनी बेकरी भी है. यह आश्रम लगातार सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ा रहा है. देखें यहां http://www.greenashram.org/
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सूरज की मदद
स्वामी विवेकानंद हाईस्कूल में बच्चों का खाना सौर ऊर्जा की मदद से बनाया जाता है.
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हर दिन काम
विवेकानंद हाइस्कूल में सौर ऊर्जा की मदद से पूरा खाना बनता है चाहे, रोटी हो या दाल चावल. बच्चे भी हर दिन कुकिंग, सफाई और बेकिंग में मदद करते हैं.
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देख रेख
स्कूल के होस्टल में रहने वाले बच्चे वहां के फोटोवोल्टाइक सिस्टम की देख रेख और साफ सफाई करते हैं. हफ्ते में दो बार होने वाली इस सफाई से छात्रों को वैकल्पिक ऊर्जा के बारे में जानकारी भी मिलती है.
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कंपनी
गाढिया सोलर नाम की कंपनी वालसाड नाम के शहर में है. कंपनी का दावा है कि वह दुनिया के सबसे बड़े सोलर किचन बनाती है और अपने ग्राहकों को 'कंप्लीट सोलर एनर्जी सॉल्यूशन' दे सकती है.
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हाथ से
गाढिया सोलर के कर्मचारी हर ग्लास को पेंट करते रहे हैं. इन प्लेट्स को साथ में मिलाया जाता है और फिर सोलर डिश बनाई जाती है.
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सोलर पार्क
इन सौर तश्तरियों को शेफलर पैराबोलिक मिरर कहा जाता है. मुनी सेवा आश्रम में लगे सौर प्लांट पर दो लाख बारह हजार रुपये का खर्च आया. इससे पास के कैलाश अस्पताल को बिजली मिलती है. सिर्फ 100 आइने उतनी ऊर्जा दे सकते हैं जितनी हजार किलोग्राम लकड़ी देती है.
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कौतूहल
सोलर कूकर घरों में इस्तेमाल किया जा सकने वाला उपकरण है. यह कैसे काम करता है इसे देखने पूरा गांव इकट्ठा हुआ है.
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रोड का घर्षण मापते समय वैज्ञानिक यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि समतल सतह के कारण रोशनी का नुकसान न हो. वह ये भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि रोड ट्रकों और कारों का वजन सह सकें. क्लेर्क्स बताते हैं कि सोलर सेल बहुत ही पतला होता है, वह आसानी से टूट सकता है. इसलिए यह पता करना जरूरी है कि दस बार या सौ बार नहीं बल्कि लाखों और करोड़ों बार उस पर ड्राइव करने का क्या असर होता है.
वैज्ञानिकों का मकसद दो साल के अंदर सामान्य सड़क पर बेहतर सिस्टम बनाना है. एक सोलर नेटवर्क जो नीदरलैंड्स और उसके बाहर भी लागू हो सके. यह सौर ऊर्जा के इस्तेमाल का स्थानीय समाधान होगा.