जर्मनी में हुए एक अध्ययन ने से पता चला है कि सिर पर स्कार्फ पहनने वाली या फिर तुर्क नामों वाली महिलाओं को नौकरी के इंटरव्यू के लिए बहुत ही कम बुलाया जाता है.
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स्टडी बताती है कि कोई महिला तुर्क हो और स्कार्फ भी पहनती हो तो उसे इंटरव्यू के लिए कॉल किए जाने की संभावना सिर्फ 4.2 प्रतिशत है. यह अध्ययन मंगलवार को जर्मन संस्था ‘इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ लेबर' ने प्रकाशित किया है. इसके मुताबिक जब मुस्लिम महिलाएं नौकरी के लिए आवेदन करती हैं तो उन्हें बहुत भेदभाव झेलना पड़ता है- भले ही उनके पास वे योग्यताएं हों जो नौकरी के लिए जरूरी हैं.
रिपोर्ट के लेखक डोरिस वाइकजेलबाउमर ने जर्मनी के अलग अलग शहरों में नौकरी के लिए डेढ़ हजार फर्जी आवेदन भेजे. इनमें एक फर्जी नाम था ‘सांद्रा बाउर' जो एक आम जर्मन नाम है और आवेदन के साथ काली बालों की एक गोरी महिला की तस्वीर लगाई गई. दूसरे आवेदन में भी वही फोटो लगाई गई लेकिन वहां नाम ‘मेरयेम ओजतुर्क' रखा गया जो सुनने में तुर्क लगता है.
तीसरे आवदेन में भी वही तुर्क नाम इस्तेमाल किया गया, फोटो भी उसी महिला की थी लेकिन इसमें उसे स्कार्फ पहने दिखाया गया था. किसी भी एप्लिकेशन में आवेदक का धर्म नहीं लिखा गया था. लेकिन आवेदनों पर जिस तरह के जवाब मिले उससे भेदभाव साफ हो जाता है.
आगे बढ़ने से पहले, मिलिए ईरान की उड़नपरी से
ईरानी अंतरिक्ष यात्री अनुशेह अंसारी दुनिया की पहली महिला स्पेस टूरिस्ट थीं. तब वह 40 साल की थीं. आज वह ईरानी लड़कियों की आदर्श मानी जाती हैं.
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40 ईरानी अंतरिक्ष यात्री अनुशेह अंसारी दुनिया की पहली महिला स्पेस टूरिस्ट थीं.
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अनुशेह 10 साल पहले इन्हीं दिनों (8 सितंबर 2006) स्पेस में गई थीं.
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स्पेसक्राफ्ट ने कजाखस्तान के बाकीनूर स्पेस स्टेशन से उड़ान भरी थी.
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अनुशेह ने अमेरिकी लेखक होमर हाइकम के साथ 'माई ड्रीम अनुशेह' किताब लिखी है.
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वह अमेरिका में टेलिकॉम कंपनी टीटीई की संस्थापक भी हैं.
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अपनी किताब में अनुशेह लिखती हैं: स्पेस में देखा, लड़ना कितना फिजूल है.
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इस दौरान उनके साथ दो रूसी कोस्मोनॉट्स भी थे.
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अनुशेह अंसारी कुल 9 दिन इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रही थीं.
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जब अनुशेह कजाखस्तान में उतरीं तो उनके पति उन्हें लेने आए थे.
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अब 50 की हो गईं अनुशेह 16 की थीं जब उनका परिवार अमेरिका में बसा.
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पक्का तो नहीं पता लेकिन खबरें हैं कि अनुशेह की यात्रा पर दो करोड़ डॉलर खर्च हुए.
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‘सांद्रा बाउर' के आवदेनों पर इंटरव्यू कॉल की दर 18.8 प्रतिशत थी, बिना स्कार्फ वाली ‘मेरयेम ओजतुर्क' के लिए 13.5 प्रतिशत और स्कार्फ वाली के लिए सिर्फ 4.2 प्रतिशत कॉल. जर्मनी में अक्सर नौकरी के आवेदन के लिए फोटो भी भेजना होता है. जर्मनी में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. इसके अलावा पिछले साल जर्मनी में दस लाख से ज्यादा प्रवासी आए हैं. कई जगहों पर जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की प्रवासी नीति का विरोध भी हो रहा है और राजनीतिक पंडित ‘ऑल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड' जैसी पार्टियों के उभार को इसी से जोड़ कर देखते हैं.
जानिए, औरतों के 8 राज
औरतें मर्दों से बेहतर कैसे हैं? आइए, आपको बताते हैं वे 8 राज की बातें जो उन्हें मर्दों से बेहतर बनाती हैं.
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ज्यादा जीती हैं
महिलाएं ज्यादा जीती हैं. इसकी एक सबसे बड़ी वजह है हृदय रोगों के लिए उनकी प्रतिरोध क्षमता. उन्हें हृदय रोग 70-80 की उम्र में होते हैं जबकि पुरुषों का दिल 50-60 में ही टें बोलने लगता है.
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ज्यादा सहनशक्ति
कई अध्ययन यह साबित कर चुके हैं कि महिलाओं में दर्द सहने की क्षमता पुरुषों से ज्यादा होती है. साइकॉलजिस्ट क्लिफर्ड लजारस कहते हैं कि वे खुद को प्रसव के दर्द के लिए तैयार कर रही होती हैं.
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तनाव सहने में माहिर
वेस्टर्न ओंतारियो यूनिवर्सिटी में लंबे अध्ययनों से यह पता चला कि महिलाएं तनाव को बर्दाश्त करने में ज्यादा सक्षम होती हैं. उनका मस्तिष्क ऑक्सिटोसिन ज्यादा पैदा करता है. यही हारमोन हमें शांत रखता है.
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याददाश्त गजब की
ब्रिटेन की ऐस्टन यूनिवर्सिटी में एक रिसर्च से पता चला कि महिलाओं की याददाश्त पुरुषों से बेहतर होती है और उम्र के साथ दोनों की क्षमताओं का अंतर बढ़ता जाता है.
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ज्यादा स्मार्ट
इंटेलिजेंस एक्सपर्ट जेम्स फ्लिन के मुताबिक यूरोप, अमेरिका, कनाडा और न्यूजीलैंड की महिलाओं ने पुरुषों को इंटेलिजेंस टेस्ट में हरा दिया है. महिलाओं का मस्तिष्क ज्यादा तेजी से विकसित होता है.
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कॉलेज में ज्यादा सफल
जॉर्जिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक साझी स्टडी में पता चला कि लड़कियां साइंस को ज्यादा अच्छे से समझ सकती हैं. पुरुषों की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई अधूरी छोड़ने की संभावनाएं भी ज्यादा होती हैं.
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रास्ते पहचानने में माहिर
प्रोफेसर डाएन हाल्पर कहते हैं कि महिलाएं निशान और संकेत याद रखने में बेहतर होती हैं इसलिए उन्हें रास्ते याद रहते हैं. वे खोई चीजें भी जल्दी खोज सकती हैं.
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पाई-पाई का हिसाब
हिसाब-किताब में महिलाएं बेहतर होती हैं. बार्कलेज वेल्थ ऐंड लेडबरी रिसर्च की स्टडी में पता चला कि निवेश में महिलाओं ने बेहतर नतीजे दिए क्योंकि पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन बनता है जो उन्हें गैरजरूरी रिस्क लेने को उकसाता है.
वाइकजेलबाउमर कहते हैं, “मुसलमान (प्रवासी) समाज में महिलाओं का दर्जा निचला समझे जाने को लेकर पश्चिम में इन दिनों बहस गर्म है. लेकिन इस बात पर बहुत ही कम चर्चा हो रही है कि पश्चिमी बहुसंख्यक आबादी मुसलमान महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव कर रही है.”