फेसबुक पर डले इस क्लिप को अब तक करीब दो लाख बार देखा जा चुका है. तन्मय भट्ट ने इसे पोस्ट करते हुए लिखा है, "जाहिर है इस पर कई नफरत भरी प्रतिक्रयाएं आएंगी लेकिन मैं थक गया हूं यह देखते देखते कि लोग कैसे फेमिनिज्म को एक बुरे शब्द में बदल रहे हैं." वीडियो में तन्मय कह रहे हैं कि एक "फेमिनिस्ट" होने के लिए आपके पास कोई एजेंडा होने की जरूरत नहीं है, बल्कि अगर आप इतना मानते हैं कि महिलाओं को पुरुषों के समान ही अधिकार मिलने चाहिए, तो यह आपको फेमिनिस्ट कहलाने के लिए काफी है.
इसलिए जो लोग खुद को फेमिनिस्ट नहीं मानते और फिर भी हकों की बात करते हैं, वे दरअसल जानते ही नहीं हैं कि वे फेमिनिस्ट हैं.
कुछ लोगों को तन्मय की बातें पसंद नहीं आई हैं. कोई महज वीडियो के नीचे कमेंट कर के, तो कोई लंबे लंबे ब्लॉग लिख कर अपनी नाराजगी जता रहा है. लोग समझाना चाह रहे हैं कि वे खुद को 'फेमिनिस्ट' कहलाना पसंद क्यों नहीं करते.
आपको क्या लगता है, क्या नारीवादी होने की आड़ में गलत दलीलें भी दी जाती हैं? क्या 'फेमिनिज्म' शब्द किसी राजनैतिक सोच रखने जैसा हो गया है? अपनी राय हमसे साझा करें, नीचे दी गयी जगह में.
विज्ञापनों का मकसद सामान बेचना होता है. इसके लिए खरीदार को टार्गेट किया जाता है. कभी महिलाएं खुद टार्गेट होती हैं, तो कभी उनकी वजह से पुरुष कोई खास सामान खरीदने को प्रेरित होते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/S. Senविज्ञापन तैयार करने वालों का काम होता है अधिकतम असर पैदा करना. इसके लिए हर तरीका जायज माना जाता है. अधिकतम असर का मतलब है असर की गहराई और गहनता.
तस्वीर: Colourboxविज्ञापनों में महिलाओं की छवि जर्मनी सहित पूरी दुनिया में पिछले दशकों में काफी बदली है. जर्मनी में पहले महिलाओं को घर गृहस्थी चलाने वाली पोशाक में दिखाया जाता था.
तस्वीर: picture-alliance/dpaबाजार में कामयाबी सेक्स से संबंधित प्रचार के जरिए मिलती है, अब इसके सबूत हैं. इसलिए विज्ञापनों में उसका इस्तेमाल पहले से कहीं ज्यादा हो रहा है.
तस्वीर: picture alliance/dpaसमाज में महिलाओं की भूमिका बदलने के साथ विज्ञापनों में उनकी छवि भी बदली है. आधुनिक विज्ञापनों में महिलाओं को सेक्स सिंबल के रूप में दिखाया जाता है.
तस्वीर: Getty Images/A. Burtonदुनिया भर में समाज में महिलाओं की भूमिका बदलने के साथ विज्ञापनों में उनको दिखाए जाने का तरीका भी बदला है. लेकिन पूरी दुनिया में विज्ञापनों में उनका इस्तेमाल जारी है.
तस्वीर: DW/N. Velickovicअभी भी करियर बनाने वाली महिलाएं ज्यादातर जगहों पर एक छोटा सा वर्ग है. इसलिए पश्चिमी देशों में भी उन्हें विज्ञापनों में कम ही दिखाया जाता है. विज्ञापनों में भेदभाव बड़ी समस्या है.
तस्वीर: picture-alliance / dpaमीडिया में दिखने वाली तस्वीरें समाज का प्रतिबिंब नहीं होती. फिल्मों या टेलिविजन पर दिखाई जाने वाली महिलाएं आम जिंदगी में दिखने वाली महिलाओं से अलग दिखती हैं.
तस्वीर: DWविज्ञापनों में अक्सर महिलाओं के शरीर के इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं. और दुनिया में हर कहीं इनका अलग अलग तरीके से विरोध भी हो रहा है.
तस्वीर: DW/H. Mund