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राजनीतिब्रिटेन

ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला

२१ जून २०२६

ठीक 10 साल पहले ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने के लिए वोट किया था. लेकिन एक दशक बाद आज देश आर्थिक सुस्ती, व्यापारिक अड़चनों और प्रवासियों के मुद्दे से जूझ रहा है.

प्रदर्शन करता हुआ एक शख्स
ब्रेक्सिट की मुख्य वजह यूरोपीय संघ से नाराजगी और 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट था. अलग होने के समर्थकों का दावा था कि अकेले रहने पर ब्रिटेन फिर से मजबूत होगा और अपने घरेलू मुद्दों पर ध्यान दे सकेगा.तस्वीर: picture alliance/dpa/SOPA/ ZUMA Press Wire

23 जून 2016 को हुए इस ऐतिहासिक फैसले को 'ब्रेक्जिट' नाम दिया गया. तब 52 प्रतिशत यानी करीब 1.7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में वोट किया था. भले ही जीत का अंतर मामूली था, लेकिन इस फैसले ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को सबसे बड़ा झटका दिया. हालांकि, इस अलगाव की कागजी कार्रवाई को पूरा होने में भी करीब पांच साल का लंबा वक्त लग गया.

ब्रेक्जिट की मुख्य वजह यूरोपीय संघ से नाराजगी और 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट था. अलग होने के समर्थकों का दावा था कि अकेले रहने पर ब्रिटेन फिर से मजबूत होगा और अपने घरेलू मुद्दों पर ध्यान दे सकेगा. वहीं, विरोधियों ने चेतावनी दी थी कि इससे देश को भारी आर्थिक नुकसान होगा और दुनिया में उसकी साख कमजोर होगी. आज 10 साल बाद, ब्रिटेन वहीं खड़ा है जो विरोधियों ने आशंका जताई थी.

कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने ब्रेक्जिट के सपने को और बिगाड़ दिया हैतस्वीर: Phil Noble/REUTERS

अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ा अलगाव

ब्रेक्जिट समर्थकों ने सपना दिखाया था कि यूरोपीय संघ से बाहर निकलकर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था नए आयाम छुएगी. लेकिन कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और हाल ही में अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है.

ब्रिटेन के कारोबारियों को अब यूरोपीय देशों के साथ व्यापार करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि 27 देशों का यह समूह आज भी ब्रिटेन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. हालांकि, ब्रिटिश सामानों पर कोई टैक्स (टैरिफ) नहीं लगाया गया है, लेकिन कस्टम के कागजी काम, बॉर्डर सर्टिफिकेट और वीजा पाबंदियों जैसी गैर-टैरिफ अड़चनों ने व्यापार को बेहद मुश्किल बना दिया है. अमेरिका के साथ जिस बड़े व्यापार समझौते का वादा ब्रेक्जिट समर्थकों ने किया था, वह भी अब तक नहीं हो पाया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहता तो आज उसकी अर्थव्यवस्था 4 से 8 प्रतिशत बड़ी होती. इसका मतलब होता कि लोगों का जीवनस्तर बेहतर होता और पब्लिक सर्विसेज, खासकर नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) को अरबों पाउंड मिलते. ब्रेक्सिट के प्रचार के दौरान लाल रंग की बस पर यह वादा चमकाया गया था कि अलग होने से एनएचएस को हर हफ्ते 35 करोड़ पाउंड (करीब 46.8 करोड़ डॉलर) अतिरिक्त मिलेंगे.

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर जोनाथन पोर्ट्स कहते हैं, "ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पहले के मुकाबले छोटा कर दिया है. इसका असर किसी अचानक आए संकट की तरह नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और उत्पादकता पर धीरे-धीरे और लगातार पड़ने वाले बोझ के रूप में दिख रहा है."

इसके उलट, ब्रेक्जिट समर्थकों का कहना है कि इतने बड़े फैसले का नतीजा शॉर्ट-टर्म में नहीं देखा जा सकता और प्रवासियों पर नियंत्रण जैसे बड़े अधिकारों के बदले शुरुआती आर्थिक नुकसान के लिए देश तैयार था.

प्रवासियों के मुद्दे पर बढ़ता गुस्सा

ब्रेक्जिट के जरिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच 'फ्री मूवमेंट' (बिना वीजा आवाजाही) तो खत्म हो गई, लेकिन सीमाओं को सुरक्षित करने के मोर्चे पर मिले जुले नतीजे रहे हैं. यूरोपीय देशों से आने वाले प्रवासियों की संख्या में तो भारी कमी आई है, लेकिन गैर-यूरोपीय देशों से आने वाले लोगों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. इसकी वजह पिछली कंजर्वेटिव सरकार द्वारा वीजा नियमों में किए गए बदलाव थे, ताकि बुजुर्गों की देखभाल जैसे क्षेत्रों के लिए जरूरी कामगारों की कमी को पूरा किया जा सके.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहता तो आज उसकी अर्थव्यवस्था 4 से 8 प्रतिशत बड़ी होतीतस्वीर: Susannah Ireland/REUTERS

हालांकि, अब सरकार इस पर नियंत्रण पाती दिख रही है. नेट माइग्रेशन (आने और जाने वाले लोगों का अंतर) साल 2023 के 9 लाख से घटकर पिछले साल 1,71,000 पर आ गया है. इस गिरावट के बावजूद, देश में अवैध रूप से आने वाले प्रवासियों को लेकर गुस्सा चरम पर है. अफगानिस्तान और सूडान जैसे युद्धग्रस्त इलाकों से लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों के जरिए ब्रिटिश तटों पर पहुंच रहे हैं.

साल 2022 में इन नावों से 46,000 और पिछले साल 41,000 लोग ब्रिटेन आए. सरकारी खर्च पर इन्हें होटलों में ठहराए जाने को लेकर जनता में इतना गुस्सा है कि कुछ जगहों पर भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किए और होटलों में आग लगाने की कोशिश भी की.

जनता को हो रहा है पछतावा

ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है. 14 साल तक सत्ता में रहने के बाद कंजर्वेटिव पार्टी को 2024 में हार का सामना करना पड़ा. मौजूदा लेबर पार्टी की सरकार भी जनता को प्रभावित नहीं कर पाई है और प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के जल्द ही इस्तीफे की खबरें आ रही हैं. इस बीच, धुर दक्षिणपंथी नाइजेल फारेज की अगुवाई वाली 'रिफॉर्म यूके' पार्टी को लगातार जनसमर्थन मिल रहा है, जो पिछले एक साल से ओपिनियन पोल्स में सबसे आगे चल रही है.

इसके साथ ही, देश में यह भावना मजबूत हो रही है कि ब्रेक्जिट पूरी तरह फेल रहा है. इप्सोस के दो हालिया सर्वेक्षणों में शामिल 52 प्रतिशत लोग फिर से यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहते हैं, जबकि सिर्फ 33 प्रतिशत इसके खिलाफ हैं. वहीं, 48 प्रतिशत लोगों का मानना है कि ब्रेक्जिट के नतीजे उम्मीद से बदतर रहे हैं और सिर्फ 9 प्रतिशत इसे उम्मीद से बेहतर मानते हैं. 48 प्रतिशत लोग आज ही यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए एक और जनमत संग्रह का समर्थन करते हैं.

ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है. 14 साल तक सत्ता में रहने के बाद कंजर्वेटिव पार्टी को 2024 में हार का सामना करना पड़ातस्वीर: Federico Gambarini/dpa/picture-alliance

दोबारा जुड़ने की राह नहीं आसान

इस माहौल के बीच, 2024 में चुनी गई लेबर सरकार फूंक फूंक कर कदम रख रही है. उसने साफ कर दिया है कि वह ब्रेक्जिट के फैसले को पलटने या यूरोपीय संघ के सिंगल मार्केट में वापस जाने का कोई इरादा नहीं रखती. प्रधानमंत्री स्टार्मर का पूरा ध्यान सिर्फ व्यापार को आसान बनाने और रिश्तों को सुधारने पर है, जिसके लिए वह अगले महीने यूरोपीय संघ के साथ एक समिट भी करने वाले हैं.

वहीं, प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे एंडी बर्नहैम ने गुरुवार को एक विशेष चुनाव में जीत हासिल की है. उन्होंने उस सीट पर रिफॉर्म पार्टी को हराया है जिसने ब्रेक्जिट का भारी समर्थन किया था. चुनाव प्रचार के दौरान यूरोपीय संघ में दोबारा शामिल होने के मुद्दे पर एंडी बर्नहैम ने कहा, "मैं यूके के दोबारा यूरोपीय संघ में शामिल होने का प्रस्ताव नहीं दे रहा हूं. मैं जनमत संग्रह में किए गए फैसले का सम्मान करता हूं. अगर हम उस वोट का सम्मान नहीं करते हैं, तो लोकतंत्र को मजबूत करने के बारे में मेरी कही हर बात का कोई मतलब नहीं रह जाएगा."

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