चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड में हुआ. 1827 में उन्होंने कैम्ब्रिज के क्राइस्ट कॉलेज में पढ़ाई शुरू की. वनस्पति विज्ञान के उनके प्रोफेसर जॉन स्टीवंस हेन्सलो ने पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं में उनकी रुचि को देखा. उन्होंने ही युवा चार्ल्स को एचएमएस बीगल नाम के जहाज पर जाने के लिए कहा.
यह जहाज दूर दराज जगहों पर जा कर वहां की पारिस्थितिकी पर शोध करने जा रहा था. चार्ल्स डार्विन की उम्र उस वक्त 22 साल थी और उनके पिता इस यात्रा के सख्त खिलाफ थे. इसके बावजूद उन्होंने जहाज पर जाने का फैसला किया और 1831 से 1836 तक पांच सालों के लिए यात्रा पर रहे.
15 सितंबर 1835 को प्रशांत महासागर में गालापागोस द्वीप दिखाई दिए. ये द्वीपों का एक ऐसा समूह है जो ज्वालामुखी के कारण बने हैं. 17 सितंबर को जहाज इस समूह के चैथम नाम के द्वीप पर पहुंचा. यहां उतरते ही डार्विन ने वहां मौजूद पौधों पर ध्यान दिया. अधिकतर उन्हें कैक्टस ही दिखाई दिए.
यहां कछुए करते हैं इंसानों का स्वागत
स्पेन के नाविक पहली बार 1535 में गालापागोस द्वीपों पर पहुंचे थे. इंसान इस सुंदर इलाके के वन्यजीवन के लिए खतरा रहे हैं, लेकिन अब संरक्षण की कोशिशें रंग ला रही हैं. यहां सैलानी भी आ रहे हैं और इस द्वीप को खतरा भी नहीं है.
तस्वीर: Imago/Xinhua/DPNGयह तस्वीर दिखाती है कि गालापागोस कैसे अस्तित्व में आया. लगभग 50 लाख साल पहले धरती की कोख से निकलने वाले लावा ने ठंडा होकर इस द्वीप का आकार लिया. दक्षिण अमेरिका में इक्वाडोर के तट से लगभग एक हजार किलोमीटर दूर समंदर में ये द्वीप हैं.
तस्वीर: APइंसानी बस्ती से इतनी दूर होने के कारण इन द्वीपों पर पेड़ पौधे और जीव जंतुओं बिना दखल के पलते और बढ़ते रहे हैं. इसलिए इस इलाके में कई दुर्लभ प्रजातियां हैं. कई जीव तो ऐसे हैं जो बाकी दुनिया में कहीं और नहीं मिलते.
तस्वीर: DW/M. Marekयहां मिलने वाले अद्भुत जीवों में पानी में रहने वाली यह छिपकली भी शामिल है. यह दुनिया की अकेली छिपकली है जिसकी जिंदगी समंदर के पानी में बीतती है. यह काई खाती है और नौ मीटर गहराई तक गोता लगा सकती है. लेकिन इसे इंसानी गतिवधियों से खतरा है और उनके साथ आने वाले सूअर, कुत्तों और बिल्लियों से भी, जो कई बार इसके अंडे चट कर जाते हैं.
तस्वीर: picture alliance/blickwinkel/McPHOTOये लाल केंकड़े भी सिर्फ इसी द्वीप पर मिलते हैं. ये केंकड़े समुद्री छिपकली से मिलने वाले पिस्सुओं को खाते हैं. इससे दोनों का फायदा होता है, छिपकली का भी और इन केंकड़ों का भी.
तस्वीर: DW/M. Marekफ्रिगेटबर्ड कहे जाने वाले इन परिंदों को प्रजनन के लिए ऐसे दूरदराज के द्वीप बहुत पसंद आते हैं. यहां ये हजारों की संख्या में प्रजनन करते हैं. ये पक्षी एक समय में हजारों किलोमीटर की उड़ान भर सकते हैं.
तस्वीर: DW/M. Marekये विशाल कछुए दुनिया में दो ही जगह मिलते हैं. एक गालापागोस पर और दूसरे हिंद महासागर में अलदाबरा द्वीपों पर. ये कछुए सौ से भी ज्यादा साल तक जीवित रह सकते हैं.
तस्वीर: DW/M. Marek16वीं सदी में गालापागोस पर इन कछुओं की तादाद ढाई लाख हुआ करती थी, जिनकी संख्या शिकार के कारण 1970 के दशक में घटकर सिर्फ तीन हजार रह गई. अब संरक्षण के बाद इनकी तादाद लगभग बीस हजार हो गई है.
तस्वीर: Imago/Xinhua/DPNGहर साल लाखों सैलानी गालापागोस जाते हैं. लेकिन इस बात के लिए खास कदम उठाए जा रहे हैं कि सैलानियों के कारण इस इलाके की जीव विविधता पर कम से कम असर पड़े. यहां आने वाले लोग अपने साथ खाने की चीजें नहीं ला सकते और न ही उन्हें जीव जंतुओं को छूने की अनुमति है. गालापागोस के ज्यादातर जीवों को इंसानों से कोई डर नहीं होता.
तस्वीर: DW/M. Marekगालापागोस के ये सी लाइंस बहुत ही मस्त रहने वाले जीव हैं और इसीलिए सैलानियों के पसंदीदा जानवर हैं. इन्हें भी इंसानों से ज्यादा डर नहीं लगता है. लेकिन जब ये पानी में होती हैं तो इन्हें बहुत ध्यान रखना पड़ता है, वरना वो शार्क या फिर किलर व्हेल का भोजन बन सकते हैं.
तस्वीर: DW/M. Marek शुरू में कोई जानवर भी नहीं दिखे लेकिन धीरे धीरे समझ आया कि द्वीप पर कुछ रास्ते बने हुए हैं, जो पानी की ओर जाते हैं. ये रास्ते कछुओं ने बनाए थे, जो यहां बड़ी संख्या में थे. आज भी गालापागोस में विशाल कछुए मिलते हैं, जिनका वजन 100 किलो तक होता है. इन कछुओं ने डार्विन के शोध में बड़ी भूमिका निभाई.
अगले कुछ हफ्तों में डार्विन अपनी टीम के साथ गालापागोस के बाकी द्वीपों पर भी पहुंचे. हर द्वीप से उन्होंने पौधों, पक्षियों और जानवरों के सैंपल लिए. उन्होंने देखा कि भले ही द्वीप एक दूसरे के बहुत करीब थे, फिर भी हर द्वीप पर अलग किस्म के जानवर और पक्षी रह रहे थे.
मिसाल के तौर पर एक द्वीप पर विशाल छिपकलियां थीं जो और किसी भी द्वीप पर नहीं दिखीं. साथ ही यहां मिलने वाले जीवों का आकर सामान्य से काफी बड़ा था. 20 अक्टूबर 1835 को आखिरकार नमूने लेकर जहाज गालापागोस से रवाना हो गया.
बाद में यहीं से जमा की गई जानकारी के आधार पर चार्ल्स डार्विन ने क्रमिक विकास का सिद्धांत रचा. 1859 में उन्होंने इसके बारे में अपनी किताब "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज" में लिखा, जिसे विज्ञान जगत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है.
ऐसा है गालापागोस द्वीप
1831 में चार्ल्स डार्विन समुद्री यात्रा कर प्रशांत महासागर के गालापागोस द्वीपों पर पहुंचे. यहां से वह कई पौधों और जानवरों के सैम्पल्स अपने साथ ले गए. आज भी यह द्वीप जीव विज्ञानियों के लिए दिलचस्प हैं..
तस्वीर: James Frankhamलोनसम जॉर्ज नाम के इस कछुए की 8 जुलाई 2012 को मृत्यु हो गई. यह पिंटा आइलैंड जायंट टॉरटॉइज प्रजाति का आखिरी कछुआ था. माना जाता है कि इस कछुए ने कई दशक लातिन अमेरिका के पास गालापागोस आरकीपेलागो द्वीप पर अकेले गुजारे जिस कारण वह उदास हो गया. इसीलिए उसका नाम लोनसम जॉर्ज रखा गया.
तस्वीर: James Frankhamवैज्ञानिकों का मानना है कि अकेले और उदास रहने के कारण जॉर्ज संबंध बनाना नहीं सीख पाया. जॉर्ज को लम्बे समय तक दो मादा कछुओं के साथ रखा गया. करीब एक दशक बाद उसने एक मादा से संबंध बनाए जिससे तेरह अंडे पैदा हुए, लेकिन उन अंडों से बच्चे पैदा नहीं हो सके.
तस्वीर: James Frankhamगालापागोस यानी स्पैनिश भाषा में कछुए. 1535 में जब स्पेन के नाविक यहां आए तो कछुओं के कारण ही द्वीप को यह नाम दे दिया. इंसानों के यहां आने के बाद हालात बदल गए. 17वीं शताब्दी से मांस के लिए इनका शिकार किया जाता रहा है. अब इनके लुप्त होने का खतरा बना हुआ है.
तस्वीर: James Frankhamयहां पहुंच सके. इस इलाके का तेज तापमान इस लावा छिपकली जैसे जीवों के लिए अनुकूल है. ऐसी छिपकलियां खुद को गर्मी से बचाने के लिए जब अपने दो पैर ऊपर उठाती हैं तो ऐसा लगता है जैसे नाच रही हों.
तस्वीर: James Frankhamमरीन इगुआना नाम की ये छिपकलियां दिखने में भले ही खतरनाक लगें, लेकिन ये केवल समुद्री शैवाल ही खाती है. माना जाता है कि इस इलाके में ऐसी लाखों छिपकलियां हैं. लेकिन कछुओं की ही तरह इंसानी गतिविधियों से इन पर भी लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है.
तस्वीर: James Frankhamइस इलाके में फ्रिगेट बर्ड भी पाए जाते हैं. नर पक्षी मादा का ध्यान खींचने के लिए अपनी गर्दन के नीचे लाल रंग की थैली को फुला लेते हैं, वे पंख फड़फाड़ते हैं और गाते भी हैं.
तस्वीर: James Frankhamएक समय था जब यहां परभक्षी बहुत ही कम हुआ करते थे. इसलिए वन्य जीवन को कोई बड़ा खतरा नहीं था. लेकिन इंसानों के यहां आने से ऐसे जीव भी आए हैं जो इस इलाके के हैं ही नहीं. चूहे अब कछुयों के अंडे खा जाते हैं. पक्षियों को भी अपने खाने का सही इंतजाम करना पड़ता है.
तस्वीर: James Frankhamगुलाबी रंग के खूबसूरत फ्लेमिंगो इस द्वीप की शान बढ़ाते हैं. हर साल ये हजारों पर्यटकों का ध्यान इन द्वीपों की ओर खींचते हैं. ये समुद्री पौधे और झींगे खाते हैं. झीगों से ही इन्हें यह रंग भी मिलता है.
तस्वीर: James Frankhamइस विशाल कछुए को अपना खाना मिल गया है. अधिकतर बकरियां पौधे और घास खा जाती हैं, वह भी जड़ से. इसलिए कछुओं के लिए ठीक से कुछ बचता ही नहीं है. ये जायंट टॉरटोइज सबसे लम्बे समय तक जिंदा रह सकते हैं. अनुकूल परिस्थितियों में ये सौ साल से भी ज्यदा जी सकते हैं.
तस्वीर: James Frankhamकछुओं को लुप्त होने वाले जीवों की सूची में रखा गया है. चार्ल्स डार्विन फाउंडेशन के शुरू किए एक कार्यक्रम के तहत कछुओं की संख्या को बढ़ाने में मदद मिली है. 1974 में कछुओं की संख्या केवल तीन हजार थी. अब वह बीस हजार से अधिक हो चुकी है.
तस्वीर: James Frankham