बच्चों का अंगूठा चूसना या फिर नाखून चबाना मां बाप को कभी पसंद नहीं आता. उन्हें डर रहता है कि बच्चा बीमार हो जाएगा. लेकिन अमेरिका में हुई एक रिसर्च की मानें तो ऐसा करने वाले बच्चे ज्यादा सेहतमंद रहते हैं.
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हम यह नहीं कह रहे कि सेहत बनानी हो तो अंगूठा चूसने लगो या फिर नाखून चबाने लगो. लेकिन जिन बच्चों में इस तरह की आदतें होती हैं, उनका शरीर बीमारियों से लड़ने में ज्यादा सक्षम हो जाता है. नाखून की गंदगी शरीर में जाती है और इम्यून सिस्टम बैक्टीरिया इत्यादि से लड़ने लगता है. इस तरह बचपन से ही शरीर को कई तरह के रोगाणुओं से लड़ने की आदत पड़ जाती है. इन बच्चों को फायदा यह होता है कि शरीर कई तरह की एलर्जी से बच जाता है.
इंसानों में कई तरह की एलर्जियां देखी गयी हैं. किसी को पोलन यानी पराग से एलर्जी होती है, तो किसी को मसालों से. ऐसे लोगों के शरीर में जब सांस के साथ पराग के कण या फिर मसाले जाते हैं, तो वे छींकने लगते हैं. कुछ लोगों को एलर्जी का असर त्वचा पर देखने को मिलता है.
अपने बच्चों से प्यार है तो अभी रोकें
सोडा पीने में बच्चों का मजा तो आता है. पर आपको सख्ती बरतनी ही होगी. ये लजीज, मीठे और तरोताजा कर देने वाले ड्रिंक्स बच्चों को क्या नुकसान पहुंचा सकते हैं, माता-पिता के लिए उन्हें जानना फायदेमंद होगा.
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लत लग जाती है
सोडा ड्रिंक्स की फितरत अफीम या गांजे जैसी ही होती है. इसकी लत लग जाती है. इसका असर मस्तिष्क पर वैसा ही होता है, जैसा नशीली दवाओं का.
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कोई पोषक तत्व नहीं
सोडा ड्रिंक्स में एक भी ऐसी चीज नहीं होती जो सेहत को जरा सा भी फायदा पहुंचाती हो. हां, नुकसानदायक चीजों की भरमार है. जैसे इसे पीने से भूख मरती है.
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मस्तिष्क को सीधा नुकसान
किशोरावस्था तक मस्तिष्क का विकास जारी रहता है. लेकिन सोडा पीने से ब्रेन में ऐसे केमिकल्स बनते हैं जो उसकी वृद्धि को रोकते हैं.
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हड्डियों को नुकसान
सोडा पीने से हड्डियां भुरती हैं. उनका कैल्शियम खत्म होता है. सोडा पीने वाले बच्चे चूंकि दूध कम पीते हैं इसलिए कैल्शियम सप्लाई भी नहीं हो पाती.
मानसिक नुकसान
सोडा ड्रिंक्स बच्चों के व्यवहार को नुकसान पहुंचाते हैं. कैफीन, चीनी या कृत्रिम रंग ब्लड शुगर को बढ़ावा देते हैं. ऐसे बच्चे ज्यादा आक्रामक होते हैं.
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दांतों को नुकसान
सोडा ड्रिंक्स बच्चों के दांतों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं. उनमें साइट्रिक एसिड और फॉसफोरस होता है जो दांतों पर चढ़े इनेमल को खुरच देता है.
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डायबिटीज
एक प्रयोग हुआ. चूहों को वे स्वीटनर दिए गए जो डाइट सोडा में होते हैं. चूहों में टाइप 2 डायबिटीज के लक्षण पाए गए. 12 आउंस सोडा रोज पीने से डायबिटीज होने का खतरा 22 फीसदी बढ़ता है.
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मोटापा
3 से 5 साल के बच्चों पर एक स्टडी की गई तो पता चला कि सोडा ड्रिंक्स पीने से मोटापे का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. डाइट सोडा भी उतना ही खतरनाक है.
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हृदय रोग
एक बोतल सोडा रोज पीने से हृदय रोगों का खतरा 61 फीसदी बढ़ जाता है. बचपन में ही सोडे की शुरुआत हो जाए तो बुढ़ापे से पहले ही कई बीमारियां घेर लेंगी.
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पाचन को नुकसान
सोडा पीने से बहुत पेशाब आता है. इससे डिहाइड्रेशन होती है. खासकर तब जब आप पानी के बदले ही सोडा पीने लगें. बच्चों को पानी पिलाएं, दूध पिलाएं. सोडे से बचाएं.
मिसाल के तौर पर मूंगफली खाने पर कुछ लोगों की त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं. कई लोगों की त्वचा में पस पड़ जाती है. एलर्जी के और भी कई रूप हो सकते हैं. किसी खास तरह के परफ्यूम के कारण सांस लेने में दिक्कत आ सकती है.
आपको किस किस चीज से एलर्जी है, इसके लिए जरूरी नहीं कि आप अपनी आदतों पर ध्यान दें. डॉक्टर एक एलर्जी टेस्ट कर के आपको इस बारे में बता सकते हैं. इस टेस्ट के लिए दोनों बाहों पर निशान बनाए जाते हैं. हर निशान पर एलर्जी पैदा करने वाले तत्व की एक एक बूंद रखी जाती है और फिर वहां सुई चुभाई जाती है. इस तरह वह तत्व शरीर में चला जाता है लेकिन बेहद कम मात्रा में. कुछ देर इन तत्वों को असर करने दिया जाता है और फिर देखा जाता है कि त्वचा पर कहां कहां बदलाव हुआ और किस तरह का.
दिमाग खराब करने वाली चीजें
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हम पर लगातार बुरा असर डाल रही हैं लेकिन इनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. जानिए, कौन कौन सी चीजें आपका दिमाग "खराब" कर रही हैं.
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कीटनाशक
खेतों में छिड़का जाने वाला कीटनाशक ना केवल कीड़ों को मारता है, बल्कि आपके दिमाग में मौजूद कुछ अहम कणों को भी. इससे पारकिन्सन होने का खतरा बढ़ जाता है. खास कर गर्भवती महिलाओं में देखा गया है कि कीटनाशक के कारण शिशु का दिमाग ठीक से विकास नहीं कर पाता. इसलिए फल सब्जियां अच्छी तरह धो कर खाएं.
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पीबीडीई
आपको इसकी खबर भी नहीं होती लेकिन यह एक ऐसा रसायन है जो फर्नीचर, कपड़ों समेत घर की कई चीजों में मौजूद होता है. जिस चीज पर इसकी कोटिंग लगी होती है, वह आसानी से आग नहीं पकड़ती. यह हवा में मिल जाता है और सांस के साथ हमारे शरीर में पहुंच जाता है, जहां यह दिमाग और पूरे नर्वस सिस्टम पर असर करता है.
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धुआं
गाड़ियों से निकलने वाला धुआं हो, लकड़ी या कोयले की आग का धुआं या फिर सिगरेट का, इन सब में पीएएच यानी पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन होते हैं. रिर्सच से पता चला है कि जिन बच्चों के शरीर में इनकी मात्रा अधिक होती है, उनका आईक्यू सामान्य से कम होता है. ये बच्चे पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाते और इन्हें डिप्रेशन का भी खतरा होता है.
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सीसा
पेंट, पानी की पाइप, केबल, बच्चों के खिलौने, इन सबमें सीसा हो सकता है. गर्भवती महिलाओं को इससे सबसे ज्यादा खतरा होता है क्योंकि यह उनकी हड्डियों में जमा हो जाता है. इससे गर्भ में ही शिशु के दिमाग का विकास भी रुक जाता है.
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पारा
हालांकि कई जगहों पर पारे के इस्तेमाल पर रोक है लेकिन घर में मौजूद कई चीजों में पारा होता है जैसे कि बल्ब, बैटरी और कई बार तो ब्लीचिंग क्रीम में भी. यह रक्त कोशिकाओं में जमा हो जाता है और दिमाग तक पर्याप्त खून को पहुंचने नहीं देता. अत्यधिक पारे से लकवा भी हो सकता है और मीनामाटा नाम का दिमागी रोग भी.
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पीसीबी
पॉली क्लोरीनेटेड बायफिनायल का इस्तेमाल इलेक्ट्रिकल उपकरणों में होता है. हालांकि इसके खतरों को देखते हुए पिछले कुछ सालों में पीसीबी के इस्तेमाल में कमी आई है. यह तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर डालता है जिससे इंसान पागल भी हो सकता है. इसके अलावा यह कैंसर का भी कारक है.
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दिमाग के लिए अच्छा
इन चीजों से दूर रह कर आप अपने दिमाग को बचा सकते हैं. पर साथ ही जरूरी है कि आप अच्छा खाएं और कुछ ऐसे खेल खेलें जो दिमाग को तेज करते हैं.
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अमेरिका में हुई रिसर्च में भी यही तरीका अपनाया गया. 1,037 लोगों पर ये टेस्ट किए गए- पहली बार जब वे 13 साल के थे और दूसरी बार जब वे 32 के हुए. इसके अलावा पांच, सात, नौ और ग्यारह की उम्र में उनके अंगूठा चूसने और नाखून चबाने की आदतों को भी रिकॉर्ड किया गया. शोध में पाया गया कि जिन लोगों को बचपन में दोनों में से कोई भी आदत नहीं थी, उनमें से 49 फीसदी को किसी ना किसी चीज की एलर्जी जरूर थी. जिन्हें दोनों में से कोई एक आदत थी, उनमें से 38 फीसदी के साथ ऐसा था और जिन्हें दोनों ही आदतें थीं, उनमें से सिर्फ 31 फीसदी को ही एलर्जी थी. जब 13 साल की उम्र में उन पर टेस्ट किए गए तब भी यही नतीजे मिले और बाद में 32 साल पर भी.
हालांकि दमे जैसी बीमारियों पर इसका कोई असर नहीं देखा गया. शोध में कहा गया है, "हम यह नहीं कह रहे हैं कि बच्चों को ऐसी आदतों के लिए प्रेरित करना चाहिए" लेकिन इतना तो साफ है कि जो बच्चे थोड़ी बहुत गंदगी में खेल कूद कर बड़े होते हैं, उनका शरीर बीमारियों से बेहतर रूप से लड़ पाता है.
सेक्स से एलर्जी
सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन यह सच है. कई महिलाओं को अपने पार्टनर के शुक्राणुओं से एलर्जी होती है. पुरुषों को भी अपने ही स्पर्म से एलर्जी हो सकती है. जानकारी का अभाव इसे जानलेवा बनाता है.
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शर्म और अज्ञान
भारत में हर साल लाखों शादियां होती हैं और शादी के बाद कई महिलाओं और कुछ पुरुषों की तबियत खराब रहने लगती है. शर्म के चलते और जानकारी के अभाव में ज्यादातर मामलों में गलत इलाज होता है. झाड़ फूंक का भी सहारा लिया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे ही मामले दुनिया भर में होते हैं, और कई के लिए एलर्जी जिम्मेदार होती है.
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क्या है स्पर्म एलर्जी
बॉन मेडिकल कॉलेज के डेर्माटोलॉजिस्ट और एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, "हर बार सेक्स के बाद कुछ महिलाओं की तबियत खराब हो जाती है. उनके जननांगों में सूजन हो जाती है या खुजली होने लगती है." 35 फीसदी मामलों में इसके लिए शुक्राणुओं से होने वाली एलर्जी जिम्मेदार होती है.
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एलर्जी के लक्षण
ज्यादातर महिलाओं में स्पर्म एलर्जी के लक्षण और भी गंभीर होते हैं. सेक्स के बाद उनके पूरे शरीर में सिलसिलेवार तरीके से रिएक्शन होने लगता है. बार बार टॉयलेट जाना, कमजोरी महसूस करना और बदन में खुजली जैसी समस्याएं सामने आती हैं. ज्यादा एलर्जिक रिक्शन होने पर तो सांस लेने में मुश्किल भी होने लगती है.
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प्राणघातक लक्षण
एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, एलर्जी अगर इससे भी ज्यादा गंभीर हो तो "इससे शरीर और दिमाग को सदमा पहुंच सकता है जिसके चलते रोगी चक्कर खाकर गिर सकता है, मौत भी हो सकती है." यह खतरा खाने या श्वास संबंधी एलर्जी में भी सामने आता है.
बहुत कम जानकारी
स्पर्म एलर्जी की खोज 1958 में हॉलैंड के एक डॉक्टर ने की. लेकिन कई दशक गुजरने के बाद भी लोग इसके बारे में करीब करीब अंजान हैं. सेक्स को लेकर बात करने में शर्मिंदगी की आदत ने हालात और बदत्तर किये हैं.
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खुद के शुक्राणु से एलर्जी
इस एलर्जी का शिकार सिर्फ महिलाएं नहीं होती हैं. पुरुषों को भी अपने ही शुक्राणुओं से एलर्जी हो सकती है. आम तौर पर शुक्राणु निकलने के बाद अगर पुरुष के जननांगों में खुजली या जलन रहे, पेशाब करने में असुविधा हो सकती है.
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वीर्य की जटिल संरचना
शुक्राणुओं में कई तत्वों का जटिल मिश्रण होता है. वीर्य में शरीर के अपने प्रोटीन और प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) शामिल होते हैं. म्यूनिख के एलर्जी विशेषज्ञ श्टेफान वाइडिंग्नर और मिषेल कोह्न ने 2005 में इससे जुड़ा शोध प्रकाशित किया.
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अंडकोष में छुपी एलर्जी
प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) असल में पुरुष के अंडकोष में पाया जाना वाला प्रोटीन है. प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए भी खून में पीएसए की मात्रा नापी जाती है. पीएसए, वीर्य को तरल और चिकना बनाने का काम करता है ताकि वह शुक्राणुओं को मादा के जननांग में भीतर तक फेंककर अंडाणुओं से मिला सके.
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अलग अलग तरह के मामले
डॉक्टरों के मुताबिक कुछ मामलों यह भी देखा गया है कि पार्टनर के साथ पहली बार संबंध बनाने के बाद कोई बड़ी समस्या नहीं हुई. लेकिन कई बार सेक्स करने के बाद एलर्जी के गंभीर लक्षण सामने आने लगे. हालांकि पहले एक दो बार संबंध बनाने के बाद कुछ समस्याएं होना आम है, क्योंकि दो शरीर नए नए संपर्क में आ रहे हैं. लेकिन अगर यह समस्या बनी रहे तो कुछ गड़बड़ है.
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बेहद जरूरी है सावधानी
ब्राजील के मामले का जिक्र करते हुए बॉन मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ आलां कहते हैं, "पार्टनर को पता था कि उसकी गर्लफ्रेंड को मूंगफली से एलर्जी है, इसलिए उसने टूथपेस्ट से दांत साफ किए और हाथ भी धोए. लेकिन इसके बावजूद एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वीर्य के जरिए महिला के शरीर में पहुंच गए." जननांगों के आस पास की त्वचा लाल हो गई, उसमें जलन होने लगी.
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भ्रम में डालने वाले लक्षण
वीर्य से होने वाली एलर्जी बहुत ही जटिल और भ्रम पैदा करने वाली भी होती है. आलां कहते हैं, "रोगियों ने ऐसे लक्षण भी बताए हैं जो एलर्जी से बिल्कुल भी मेल नहीं खाते. जैसे सिरदर्द, थकान, फ्लू जैसे लक्षण और ये वीर्य के संपर्क में आने के बाद दो दिन से लेकर हफ्ते भर तक बने रहते हैं."
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शर्म ने बिगाड़े हालात
इस पर बहुत ज्यादा शोध भी नहीं हुआ है क्योंकि महिलाएं डॉक्टर के सामने भी खुलकर बात करने में शर्माती हैं. दूसरी ओर डॉक्टर भी अक्सर इस रोग को पकड़ने के बजाए इनफेक्शन की दवा दे देते हैं.
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एलर्जी पहचानने के तरीके
स्किन एलर्जी टेस्ट, पीओआईएस में एलर्जिक रिक्शन टेस्ट के जरिये इसका पता लगाया जा सकता है. इन टेस्टों में पता चला है कि कई पुरुषों को अपने ही वीर्य के प्रोटीन से एलर्जी होती है. वैसे भी बार बार सर्दी, जुकाम, सांस आदि की परेशानी होने पर भी एलर्जी टेस्ट करवाना चाहिए. हमें पता होना चाहिए कि हमारा शरीर क्या खाने या क्या सूंघने से गड़बड़ाता है.
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एलर्जी विशेषज्ञ की अहमियत
विशेषज्ञों की सलाह है कि अगर सेक्स के बाद आपकी या आपके पाटर्नर की तबियत गड़बड़ाती है तो एलर्जी एक्सपर्ट से मिलें. सावधानी के लिए कंडोम का इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि यह भी 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है.
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स्पर्म एलर्जी से कैसे बचें
एलर्जिक रिएक्शन के बावजूद बच्चा चाहने वाले जो़ड़ों के पास तीन विकल्प हैं. आलां कहते हैं, अगर पूरे बदन के बजाए एक ही जगह पर एलर्जिक लक्षण हों तो "वे एलर्जिक रिक्शन कम करने वाले एंटीहिस्टेमाइंस ले सकते हैं. यह एलर्जिक रिएक्शन को कम करेगा."
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सावधानी ही सुरक्षा
दूसरा विकल्प है: कम से कम तीन दिन के अंतराल में सेक्स करना. शुरुआत में सेक्स के दौरान पार्टनर के जननांगों में कम से कम वीर्य छोड़ना. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर तीन दिन नहीं रुके तो एलर्जी भड़केगी और अगर तीन दिन से ज्यादा देर कर दी तो एलर्जी टॉलरेंस पावर नष्ट हो जाएगी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक इलाज के जरिये ऐसा करना ज्यादा सरल और सुरक्षित है.
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लैब का रास्ता
संतान की चाह रखने वाले जोडो़ं के लिए तीसरा विकल्प है: लैब फर्टिलिटी के जरिये. इस प्रक्रिया में वीर्य से पीएसए निकाल दिया जाता है और फिर शुक्राणुओं को महिला के अंडाणु में डाला जाता है.
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पानी फायदेमंद
जब कभी जननांगों, पेट और गुर्दों में एलर्जिक रिएक्शन या फिर इनफेक्शन सा लगे, तो खूब पानी पीजिए. पानी शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को मूत्र के साथ बाहर कर देता है. जिन पुरुषों को प्रोस्टेट की समस्या हो, वे ऐसा न करें.
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साफ रहो, सुखी रहो
अच्छी सेहत में साफ सफाई बड़ी भूमिका निभाती है और यह बात सेक्स पर भी लागू होती है. शारीरिक संबंध बनाने से पहले, मुंह, हाथों और जननांगों की अच्छे से सफाई करना कई समस्याओं से बचा सकता है. सेक्स के बाद भी इनकी सफाई होनी चाहिए. बेहतर तो है कि नहाकर अंतवस्त्र भी बदले जाएं.