तुर्की के मशहूर शहद में भयंकर मिलावट, भारत में क्या हाल?
२२ फ़रवरी २०२५
शहद एक कमाल के टीमवर्क का कुदरती हासिल है. नन्ही मधुमक्खियां जी-तोड़ मेहनत से शहद बनाती हैं. कई इंसान भी मेहनत करके शहद बना रहे हैं, लेकिन नकली. इस काम में तुर्की काफी नाम कर रहा है.
तस्वीर: Foodcollection/picture alliance
विज्ञापन
मोटामाटी यूं समझिए कि करीब एक दर्जन कामगार मधुमक्खियां समूची जिंदगी मेहनत करती हैं, तब जाकर बनता है एक चम्मच शहद! सच में ही, कड़ी मेहनत का मीठा फल.
कुदरती शहद विशुद्ध कुदरती होता है. उसमें किसी तरह का एडिटिव नहीं होता. मधुमक्खी के छत्तों से निकाले गए शहद की सफाई की जाती है, ताकि उसमें मोम या कोई गंदगी ना रहे. स्टैटिस्टा के मुताबिक, चीन प्राकृतिक शहद का सबसे बड़ा उत्पादक है. साल 2023 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा प्रॉड्यूसर है तुर्की.
मधुमक्खी का मतलब बस शहद नहीं है. ये नन्हे जीव शायद कुदरत की सबसे अहम और मेहनती किसान हैं. कुदरत की इस अद्भुत आर्किटेक्ट के पास एक बेजोड़ हथियार भी है, जो उन्हें हमलावरों से बचाता है और जीने में भी बड़ा काम आता है.
तस्वीर: Robin Loznak/Zumapress/picture alliance
गजब है कुदरत की लीला
एक कीड़ा होता है, हॉर्नेट. ये ततैया के परिवार का सदस्य है. ये हॉर्नेट मधुमक्खियों का शिकार करते हैं. इनका झुंड कुछ ही घंटों में मधुमक्खी के पूरे मुहल्ले को खत्म कर सकता है. लेकिन कुदरत भी कमाल है! जीवों के विकासक्रम में एशियाई मधुमक्खियों ने हॉर्नेट शिकारियों से निपटने की एक अनोखी तरकीब विकसित की. इस रणनीति में उनका हथियार बनती हैं दो चीजें: पहली, एकता. दूसरा हथियार, भनभनाहट.
तस्वीर: Robin Loznak/ZUMA Wire/picture alliance
मधुमक्खियों का सीक्रेट हथियार
अकेली मधुमक्खी, हॉर्नेट से नहीं निपट सकती. ना खुद को बचा सकती है. ऐसे में छत्ते की पूरी कॉलोनी "संगठन में शक्ति है" की राह चलती है. सारी मधुमक्खियां हॉर्नेट के शरीर से चिपककर गोलाकार सा बना लेती हैं.
तस्वीर: Tomasz Wojtasik/dpa/picture alliance
तापमान नियंत्रित करने की काबिलियत
गोलाकार रचना में साथ जुड़कर सारी मधुमक्खियां भनभनाना शुरू करती हैं. ये कंपन इतनी तेजी से होता है कि उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगता है.
तस्वीर: Tayfun Coakun/AA/picture alliance
शिकार खुद यहां शिकार हो गया
चूंकि कंपन की ये प्रक्रिया समवेत होती है, तो मधुमक्खियों का बनाया वह गोला एक किस्म का अवन बन जाता है. इसके केंद्र में तापमान 45 से 46 डिग्री तक पहुंच जाता है और शिकार करने आया हॉर्नेट, खुद ही शिकार बन जाता है. हालांकि इस रणनीति में मधुमक्खियों के कुछ अपने सैनिक भी अपनी जान गंवाते हैं. लेकिन, उनका झुंड और छत्ता बच जाता है.
तस्वीर: Amir Cohen/REUTERS
बड़े काम की चीज है एकता
स्तनधारी जीवों में आमतौर पर शरीर का तापमान दुरुस्त रखने की क्षमता होती है. जैसे हम इंसान. धूप-गर्मी में हमारा शरीर पसीना बहाता है, जिससे तापमान नियंत्रित करने में मदद मिलती है. लेकिन कीड़ों में ये क्षमता नहीं होती. ऐसे में मधुमक्खियां अपने झुंड को ताकत बनाती हैं और एक तरह का "सुपरऑर्गेनिजम" बन जाती हैं.
तस्वीर: Kim Honh-Ji/REUTERS
शानदार आर्किटेक्ट
हम भी चाहते हैं ना कि घर का तापमान सुहाना रहे. बाहर गर्मी हो, तो घर ठंडा रहे. बाहर ठंड हो, तो घर में गुनगुनी गर्माहट हो. इसके लिए कई देशों में घर की दीवारों को इंसूलेटेड बनाया जाता है. मधुमक्खियां भी कमाल की आर्किटेक्ट हैं. वो अपना छत्ता बखूबी इंसुलेट कर लेती हैं.
तस्वीर: Zhang Zhiwei/Zoonar/picture alliance
सावधानी से चुनती हैं घर बनाने की जगह
बच्चों की अच्छी तरह परवरिश के लिए उन्हें छत्ते में 33 से 36 डिग्री सेल्सियस का आदर्श तापमान चाहिए होता है. ऐसे में मधुमक्खियां बहुत देख-परखकर, सावधानी से घर बनाने की जगह चुनती हैं. आपने देखा होगा, उनका छत्ता किसी-न-किसी चीज की छांव में होता है. जैसे, किसी चट्टान के छांव वाले हिस्से में. या मोटी टहनी की छाया. या पेड़ की टहनियों-पत्तों की ओट.
तस्वीर: Kim Hong-Ji/REUTERS
कुदरती सीमेंट
मधुमक्खियां पौधों के रस, मोम और थूक जैसे अपने स्त्राव को मिलाकर एक चिपचिपी गोंदनुमा चीज प्रोपोलिस बनाती हैं. इसे वो छत्ता बनाते हुए परत की तरह इस्तेमाल करती हैं. इसकी मदद से छत्ते के अनचाहे छेदों को भरती हैं.
तस्वीर: Beliane
प्रोपोलिस एक, फायदे अनेक
प्रोपोलिस में फ्लेवोनॉइड्स नाम का एक सुरक्षात्मक तत्व भी होता है, जिसमें एंटीऑक्सिडेंट गुण होते हैं. यह फंगस, बैक्टीरिया और नमी जैसी चीजों को बढ़ने से रोकता है. ये सारी चीजें छत्ते के भीतर आदर्श तापमान बनाए रखने में मददगार हैं. और इनके अलावा गर्माहट की जरूरत होने पर मधुमक्खियां एक-दूसरे से चिपककर खुद को, अपने साथियों और बच्चों को जरूरी गर्माहट भी देती हैं.
तस्वीर: Nick Adams/The Herald/picture alliance
मधुमक्खियों के पास हीटर और एसी, दोनों है
छत्ते का ये प्राकृतिक इंसूलेशन, मधुमक्खियों का घरेलू हीटिंग सिस्टम है. जरूरत पड़ने पर वह खुद ही छत्ते का एयर कंडीशनर भी बना लेती हैं. जब बाहर लू के थपेड़े चलते हैं, तो मधुमक्खियां छत्ते को ठंडा रखने के लिए पानी जमा करती हैं. वो पानी की बूंदों को पूरे छत्ते में छितरा देती हैं और अपने पंख हिलाकर इसके छेदों से हवा फैलाती हैं. सोचिए, क्या अद्भुत जीव हैं ना मधुमक्खियां! कितनी काबिल, कितनी हुनरमंद!
तस्वीर: Ali Kaifee/DW
10 तस्वीरें1 | 10
तुर्की में मिलावटी और नकली शहद की समस्या
स्टैटिस्टा के अनुसार, 2023 में चीन ने 4,63,500 मीट्रिक टन से ज्यादा शहद का उत्पादन किया. तुर्की में इसका सालाना उत्पादन 1,15,000 टन रहा. विशाल मात्रा में उत्पादन के कारण शहद के वैश्विक बाजार में तुर्की बड़ा खिलाड़ी है, लेकिन अब वहां से आ रहे शहद की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ रही है.
विज्ञापन
तुर्की से निर्यात होने वाले शहद के सबसे बड़े खरीदार अमेरिका और जर्मनी हैं. हालांकि, इस शहद में बड़ी मात्रा मिलावटी होने की आशंका है. खबरों के मुताबिक, तुर्की से आ रहे शहद में चाशनी समेत कई सामग्रियों की मिलावट की जा रही है. पुलिस ने हालिया महीनों में बड़ी मात्रा में मिलावटी शहद जब्त किया है, जिसकी कीमत करीब ढाई करोड़ यूरो बताई जा रही है.
ऑस्ट्रेलियन हनी बी इंडस्ट्री काउंसिल के मुताबिक, 300 मक्खियां तीन हफ्तों तक मेहनत करती हैं, तब जाकर 450 ग्राम शहद बनता हैतस्वीर: Harun Ozalp/Anadolu/picture alliance
आमतौर पर शहद में इन चीजों की मिलावट
इससे पहले भी तुर्की की स्थानीय मीडिया में मिलावटी शहद की खबरें आती रही हैं. मसलन, नवंबर 2024 में 'तुर्कीये टुडे' ने एक खबर में बताया कि कृषि और बागवानी मंत्रालय ने अपनी जांच में दो चिर-परिचित ब्रैंडों के शहद में मिलावट और नकल पाई. कई उत्पादक और ब्रैंड नकली-मिलावटी शहद बेचने के दोषी पाए गए हैं.
'तुर्कीये टुडे' ने अपनी खबर में बताया कि तुर्की में लंबे समय से नकली शहद की दिक्कत रही है. इसके मद्देनजर मंत्रालय की ओर से बढ़ाई गई सतर्कता और जांच से पता चला कि कंपनियां असली शहद की नकल के लिए गलत व भ्रामक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करती हैं. नकली या मिलावटी शहद सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.
नकली और मिलावटी शहद आमतौर पर अपने रूप, रंग और स्वाद में कुदरती शहद जैसे होते हैं. इनमें शुगर/फ्रूक्टोज/कॉर्न सिरप, कृत्रिम रंग-फ्लेवर मिला दिया जाता है. ऐसे मिलावटी उत्पादों को कानूनन शहद के तौर पर नहीं बेचा जा सकता है.
शहद बनाने वाली मक्खियां फूलों पर बैठती हैं. इससे उन्हें मीठा रस (नेक्टर) और पोलेन मिलता हैतस्वीर: Mariia Voloshina/Zoonar/picture alliance
मिलावट से हो सकता है अंतरराष्ट्रीय बाजार में नुकसान
तुर्की में शहद के साथ हो रही मिलावट या फिर नकली शहद उत्पादन के बड़ा रूप लेने के कारण कुदरती शहद बेचने वाले उत्पादक भी परेशान हैं. उनकी चिंता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तुर्की से आने वाले शहद की साख पर असर पड़ रहा है.
तुर्की में भी लोगों को बाजार में नकली-मिलावटी शहद की सेंधमारी से आगाह करने की कोशिश की जा रही है. इसके तहत स्थानीय मीडिया के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थान भी लोगों को नकली शहद की पहचान के तरीके बता रहे हैं. मसलन, इस्तांबुल स्थित येदितेपे यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर एक लेख में बताया गया, "तुर्की के फूड सेक्टर में नकली-मिलावटी खाद्य सामग्रियां बड़ी समस्या हैं, इनमें शहद भी शामिल है."
लेख में नकली या मिलावटी शहद से सेहत को होने वाले नुकसान के प्रति भी आगाह किया गया है. साथ ही, यह भी सलाह दी गई है कि नकली और असली इतने एक जैसे होते हैं कि देखकर या सूंघकर पहचान नहीं की जा सकती. ऐसे में लैब में गुणवत्ता की जांच करवाना बेहतर तरीका है.
शहद स्वादिष्ट होता है ना! बस ऐसे ही खा लो, या किसी रेसिपी में डालो, इसे इस्तेमाल करने के कितने तरीके हैं. लेकिन शहद बनता कैसे है? मतलब ये तो पता है कि मधुमक्खियां शहद बनाती हैं, लेकिन वो इसे कैसे और क्यों बनाती हैं?
तस्वीर: Kim Hong-Ji/REUTERS
कैसे बनता है शहद
मधुमक्खियों को फूल से दो तरह का खाना मिलता है. पहला, नेक्टर यानी फूलों का रस, जिसे मधुमक्खियां फूल के बीच के हिस्से से जमा करती हैं. दूसरी चीज है पोलन, यानी परागकण जो कि प्रोटीन से भरपूर होता है. इससे मधुमक्खी के बच्चों को पोषण मिलता है और वो फलते-फूलते हैं. शहद बनाने के लिए एक और जरूरी चीज है पानी.
तस्वीर: Amir Cohen/REUTERS
बंटी हुई हैं जिम्मेदारियां
एक छत्ते में रहने वाली मधुमक्खियों की जिम्मेदारियां बंटी होती हैं. कोई पोलन जमा करती है, कोई रस, तो कोई पानी. मधुमक्खियां यूं ही किसी फूल पर नहीं बैठती हैं. वो देखभाल कर सावधानी से फूल चुनती हैं. फिर फूल पर बैठकर अपनी जीभ से उसका रस चूसती हैं और उसे अपने पेट की "शहद वाली पेटी" में जमा करती हैं. यह "हनी स्टमक" पेट के खाना पहुंचने वाले हिस्से से अलग होता है.
तस्वीर: Robin Loznak/Zumapress/picture alliance
संगठन में शक्ति है
अपने एक चक्कर में मधुमक्खी करीब 50 से 100 फूलों पर बैठती है. जब रस जमा करने वाली पेट की थैली भर जाती है, तो वह छत्ते में लौटती है और वहां मौजूद शहद बनाने वाली कामगार मधुमक्खियों के मुंह में मुंह सटाकर उन्हें रस देती है.
तस्वीर: Kim Honh-Ji/REUTERS
हजारों कामगारों की मेहनत का फल
कामगार मधुमक्खियां उस रस को बड़ी देर चबाती हैं. एक मुंह से दूसरे मुंह होकर गुजरते हुए रस में नमी का स्तर बहुत घट जाता है और वह गाढ़ा हो जाता है. यही गाढ़ा तरल शहद कहलाता है. हालांकि इतने पर काम पूरा नहीं होता. मधुमक्खियां उस गाढ़े रस को अपने छत्ते के छेदों में जमा करती हैं. इस रस में थोड़ी नमी अब भी बची होती है.
तस्वीर: A. Wälder/PantherMedia/IMAGO
मोम का क्या काम है
बची हुई नमी को सुखाने के लिए मधुमक्खियां अपने पंख हिलाती हैं. इससे निकली हवा रस को और ज्यादा सुखाती है, वो ज्यादा गाढ़ा और चिपचिपा बन जाता है. हनीकोंब डिजाइन वाले छत्ते की खास बनावट भी इसमें मदद करता है. अब शहद बनकर तैयार हो गया. ये शहद छत्ते के छेद से रिसकर बाहर ना गिर जाए, इस वास्ते मधुमक्खियां मोम भी बनाती हैं. वो हर छेद में मोम का लेप लगाकर उसे सील करती हैं. इसके कारण शहद गंदा भी नहीं होता.
तस्वीर: Photoshot /picture alliance
रस पर निर्भर करता है रंग और स्वाद
सारे शहद का रंग एक सा नहीं होता. कोई गाढ़ा, कोई हल्के रंग का होता है. मधुमक्खी ने किस रस से शहद बनाया है, इसपर रंग और स्वाद दोनों निर्भर करते हैं. शहद जितना गाढ़ा होता है, उससे कहीं ज्यादा गाढ़ी मेहनत से मधुमक्खियां इसे बनाती हैं. कम से कम आठ मधुमक्खियां अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करती हैं, तब जाकर एक चम्मच शहद तैयार होता है.
तस्वीर: Alan Weaving/Mary Evans/picture alliance
शहद क्यों बनाती है मधुमक्खी
शहद, मधुमक्खियों का खाना भी है और उनके घर का हीटर भी. आप तो जानते ही हैं कि मधुमक्खियां कितना काम करती हैं. उड़ने और लगातार पंख हिलाने के लिए उनको ऊर्जा चाहिए. यही शहद उन्हें एनर्जी देता है. और यही शहद और मोम की परत सर्दियों में उनके छत्ते को गर्मी भी देती है.
तस्वीर: Georges Gobet/AFP/Getty Images
हमें कैसे मिलता है शहद
मधुमक्खी नाप-तौल कर शहद नहीं बनाती कि हमारे कुनबे को इतने ग्राम की जरूरत है, तो इतना ही बनाएंगे. वो अपनी जरूरत से ज्यादा शहद बनाती हैं. मधुमक्खी पालने वाले इसी अतिरिक्त शहद को निकालते हैं.
तस्वीर: Ali Kaifee/DW
8 तस्वीरें1 | 8
भारत भी शहद का बड़ा बाजार, मिलावट यहां भी समस्या
हालांकि, नकली या मिलावटी शहद बनाना केवल तुर्की तक सीमित नहीं है. भारत, सबसे ज्यादा शहद उत्पादन करने वाले शीर्ष के पांच देशों में है. देश में एक 'नेशनल बी बोर्ड' भी है, जिसका गठन साल 2000 में किया गया था.
इसके गठन का मकसद मधुमक्खीपालन में वैज्ञानिक पद्धतियों को बढ़ावा देना, पोलिनेशन के माध्यम से फसलों का उत्पादन बढ़ाना और मधुमक्खीपालकों व किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए शहद उत्पादन में वृद्धि करना है. कृषि मंत्रालय के मुताबिक, भारत में जितने शहद का उत्पादन होता है, उसका करीब 50 फीसदी हिस्सा निर्यात किया जाता है. अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, बांग्लादेश और कनाडा इसके बड़े बाजारों में हैं.
राजधानी नई दिल्ली स्थित एक संगठन 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट' (सीएसई) ने साल 2020 में अपनी एक जांच के आधार पर बताया कि देश में शहद बेचने वाले कई ब्रैंड प्यूरिटी टेस्ट में फेल हुए. सीएसई के मुताबिक, यह भी पाया गया कि कई कंपनियां चीन से सिंथेटिक सिरप मंगवाकर शहद में मिलावट कर रही हैं.
शहद निकालने का सदियों पुराना तरीका
03:04
This browser does not support the video element.
'डाउन टू अर्थ' पर छपी इसकी एक खबर के मुताबिक, सीएसई ने शहद बेचने वाले 13 भारतीय ब्रैंड्स के 22 नमूनों की जांच की. पहले भारत की ही एक लैब में इनकी जांच की गई. फिर और विस्तृत जांच के लिए नमूनों को जर्मनी भेजा गया. जांच से पता चला कि नमूनों में 77 फीसदी से ज्यादा मात्रा शहद की नहीं थी, बल्कि शुगर सिरप की मिलावट थी. 22 में से केवल पांच नमूने ही मिलावट रहित मिले.
अंतरराष्ट्रीय तौर पर शहद की मान्य परिभाषा कहती है कि यह "वो प्राकृतिक मीठा तत्व है, जिसका उत्पादन शहद बनाने वाली मक्खियां पौधों के नेक्टर या पौधों के जीवित हिस्सों से होने वाले रिसाव या पौधों के जीवित हिस्सों को चूसने वाले कीड़ों से होने वाले स्राव से करती हैं." इसे मधुमक्खियां इकट्ठा करती हैं, सुखाती हैं, जमा करती हैं और पकने के लिए इसे अपने छत्ते में जमा करती हैं. अगर शहद में चीनी या ऐसे पदार्थों की मिलावट है, तो वो शहद नहीं है.