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फैलते BRICS की एकजुटता की परीक्षा

समीरात्मज मिश्र
९ सितम्बर २०२६

12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन में 11 देश जुटेंगे. चीन ने समूह के लिए POWER फॉर्मूला दिया है, लेकिन अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच साझा एजेंडा बनाना बड़ी चुनौती है.

ब्रिक्स 2026 का लोगो
तस्वीर: Reuters

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले BRICS (ब्रिक्स) शिखर सम्मेलन से पहले भारत में चीन के राजदूत जू फेइहोंग ने इस समूह के भविष्य को लेकर एक फॉर्मूला पेश किया है. अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने BRICS के लिए POWER का विचार रखा है. इसमें पी का मतलब प्रिंसिपल, ओ का ओपननेस, वाई का विन-विन, ई का इंजन और आर का रिस्पॉसिबिलिटी है.

चीनी राजदूत के मुताबिक BRICS को साझा सिद्धांतों, खुलेपन, पारस्परिक लाभ, आर्थिक विकास और जिम्मेदारी के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए. लेकिन 11 अलग-अलग देशों के हितों वाले इस समूह के सामने सवाल यही है कि क्या ये पांच सिद्धांत BRICS की साझा दिशा बन सकते हैं?

BRICS अब उस शुरुआती BRIC अवधारणा से काफी आगे निकल चुका है, जिसका जिक्र पहली बार 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने किया था. उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को BRIC नाम दिया था.

अब इस समूह में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी जुड़ गए हैं. यानी ब्रिक्स का भौगोलिक विस्तार हुआ है और इसके साथ इसकी आर्थिक और राजनीतिक क्षमता भी बढ़ी है. लेकिन विस्तार के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है, जितने ज्यादा देश, उतने ज्यादा हित और उतने ही मुश्किल समझौते.

ब्रिक्स सम्मलेन के लिए नई दिल्ली में तैयारियांतस्वीर: Qamar Sibtain/IANS

BRICS का विस्तार और चुनौतियां

वैश्विक मामलों के जानकार और इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) के सीनियर फेलो डॉक्टर फजर रहमान सिद्दीकी कहते हैं कि "किसी भी वैश्विक समूह में जैसे-जैसे ज्यादा देश आते हैं तो वहां आंतरिक स्तर पर भी समूह बनने लगते हैं, एक-दूसरे के साझा हित प्रभावी होने लगते हैं. ऐसे में मुख्य मुद्दे कमजोर से होने लगते हैं. दूसरा, कम देशों के बीच समन्वय बनाना आसान है. एससीओ में देखिए किसी प्रस्ताव को पास कराना कितना मुश्किल हो गया. ब्रिक्स में भी ऐसी बातें हो रही हैं. इसके अलावा, विभिन्न देशों के आपसी संबंधों का असर भी समूह में होगा. इससे आम सहमति नहीं बन पाती. हर देश चाहता है कि अपने मुद्दों का ग्लोबलाइजेशन करे.”

डीडब्ल्यू से बातचीत में डॉक्टर फजर रहमान कहते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ है. आंतरिक समूह बनना स्वाभाविक है क्योंकि मिस्र, चीन के खिलाफ जा नहीं सकता. उसी तरह अमेरिका को लेकर चीन का जो रुख है, दूसरे देशों का रुख उससे अलग है.

BRICS के सदस्य देशों के आर्थिक और रणनीतिक हितों में अंतर

BRICS की सबसे बड़ी खासियत ही उसकी विविधता है. इसमें चीन और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं. रूस है, जिसकी पश्चिमी देशों के साथ टकराव की अपनी पृष्ठभूमि है. ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं.

दूसरी तरफ ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं, जिनकी पश्चिम एशिया में अपनी अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं. इसके अलावा मिस्र और इथियोपिया अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि इंडोनेशिया के शामिल होने से दक्षिण-पूर्व एशिया की भूमिका भी बढ़ी है. इसलिए BRICS को किसी एक राजनीतिक या वैचारिक खेमे के रूप में देखना आसान नहीं है.

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जहां तक भारत की बात है, तो उसके अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध हैं और वह क्वाड का सदस्य है. चीन के अपने वैश्विक और क्षेत्रीय मंच हैं. ब्राजील G20 में सक्रिय है. खाड़ी के देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध बनाए हुए हैं.

यानी BRICS के भीतर सहयोग के क्षेत्र जरूर हैं, लेकिन सदस्य देशों की विदेश नीति पूरी तरह एक जैसी नहीं है. यही वजह है कि BRICS का विस्तार उसकी ताकत भी है और उसकी परीक्षा भी.

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ईरान और UAE के मतभेद ने BRICS की साझा विदेश नीति की मुश्किल उजागर की

इस चुनौती का सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम एशिया है. BRICS के 11 सदस्य देशों में ईरान और यूएई दोनों शामिल हैं, लेकिन क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर दोनों के हित और नजरिये अलग रहे हैं.

नई दिल्ली में सम्मेलन से पहले BRICS के शेरपाओं की बैठक में इसी मुद्दे पर साझा भाषा तैयार करने की कोशिश की जा रही है. खासतौर पर पश्चिम एशिया के युद्ध और फलीस्तीन के मुद्दे पर दिल्ली घोषणापत्र में किस तरह की भाषा इस्तेमाल की जाए, इस पर मतभेदों को दूर करने की कोशिश हुई है.

यह चिंता सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है. इसी साल मई में नई दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सदस्य देशों के मतभेद इतने गहरे रहे कि संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका और भारत को सिर्फ चेयर का बयान जारी करना पड़ा.

डॉक्टर फजर रहमान कहते हैं, "ग्लोबल साउथ या थर्ड वर्ल्ड के देश ऐसे किसी भी संगठन में चाहे वो एससीओ हो या ब्रिक्स हो, शामिल होने को तैयार रहते हैं जो मौजूदा सिस्टम से अलग हो यानी जिसमें अमेरिका का प्रभुत्व ना हो. लेकिन संख्या बढ़ने के साथ चुनौतियां बढ़ना स्वाभाविक है. और इन देशों के आपसी हित भी टकराते हैं.”

मई 2026 में नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठकतस्वीर: Naveen Sharma/ANI

BRICS पश्चिमी व्यवस्था का विकल्प है या वैश्विक दक्षिण का अलग मंच?

ब्रिक्स को अक्सर अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जाता है. खासकर चीन और रूस ब्रिक्स को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने वाले मंच के रूप में देखते हैं, लेकिन भारत और ब्राजील की प्राथमिकताएं कुछ अलग हैं. वे BRICS को आर्थिक सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के मंच के तौर पर ज्यादा देखते हैं.

यही अंतर ब्रिक्स के भविष्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. यदि ब्रिक्स को पश्चिम के खिलाफ एक राजनीतिक गठबंधन बनाया जाता है, तो उसके भीतर मौजूद मतभेद और ज्यादा स्पष्ट हो सकते हैं.

लेकिन अगर इसे वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच आर्थिक सहयोग, व्यापार, विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के मंच के रूप में विकसित किया जाता है, तो अलग-अलग विदेश नीतियों वाले देश भी साथ काम कर सकते हैं. भारत की प्राथमिकता भी BRICS को किसी एक देश के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन बनाने की बजाय आर्थिक सहयोग, विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के मंच के रूप में मजबूत करने की रही है.

डॉलर से दूरी पर भी BRICS देशों के बीच पूरी सहमति नहीं

ब्रिक्स की चर्चा में एक और बड़ा मुद्दा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का है. समूह के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर बातचीत होती रही है, लेकिन यहां भी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं.

रूस लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहा है, भारत के लिए भी किसी एक साझा मुद्रा की तुलना में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के जरिए व्यापार करना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है. लेकिन जानकारों के मुताबिक, यह इतना आसान भी नहीं है.

डॉक्टर रहमान कहते हैं, "डिडॉलराइजेशन या डॉलर पर निर्भरता में कमी बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है लेकिन आसान नहीं है. वैश्विक राजनीति में अमेरिका की अभी भी जो स्थिति है, उसे चैलेंज करना इतना आसान नहीं है. अमेरिका इतनी आसानी से डॉलर को चैलेंज करने भी नहीं देगा. अमेरिका अभी भले ही चौतरफा घिरा दिख रहा है लेकिन डॉलर जिस तरह से वैश्विक मुद्रा बन चुका है, उसे रिप्लेस करना आसान नहीं है. दूसरी बात, डिडॉलराइजेशन को लेकर संदेश जो ग्लोबल साउथ की ओर से दिया जा रहा है तो अमेरिका की तरफ से भी उसकी प्रतिक्रिया आ रही है.”

भारत की अध्यक्षता में BRICS के सामने आर्थिक सहयोग और वैश्विक सुधार का एजेंडा

भारत की अध्यक्षता में BRICS सम्मेलन में व्यापार, वित्त, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है. भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने का भी मौका भी है.

भारत एक तरफ चीन और रूस के साथ BRICS और SCO जैसे मंचों पर काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी महत्व देता है. इसलिए भारत की कोशिश ब्रिक्स को किसी एक देश या किसी एक शक्ति के खिलाफ खड़ा करने की बजाय उसे अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था के मंच के रूप में पेश करने की हो सकती है.

यही वजह है कि सम्मेलन में अमेरिका की आलोचना से ज्यादा वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की भागीदारी और आर्थिक सहयोग पर जोर दिए जाने की संभावना है. 

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चीन के साथ व्यापार और तकनीक का सवाल भी भारत के लिए अहम

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी महत्वपूर्ण हो सकती है. दोनों देशों के रिश्तों में हाल के समय में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन व्यापार और तकनीक से जुड़े सवाल अभी भी मौजूद हैं.

भारत, चीन से तकनीकी सामान और महत्वपूर्ण औद्योगिक उपकरणों के आयात में आ रही कुछ अड़चनों का मुद्दा उठा सकता है. इनमें हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट यानी HVDC तकनीक से जुड़े उपकरण और दूसरे महत्वपूर्ण औद्योगिक सामान शामिल हैं.

इसलिए नई दिल्ली में BRICS का बड़ा वैश्विक एजेंडा और भारत-चीन के बीच व्यावहारिक आर्थिक बातचीत एक साथ चल सकते हैं. इसका एक सकारात्मक संदेश यह भी है कि ब्रिक्स के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों साथ चल सकते हैं.

ब्रिक्स की असली ताकत अब उसके सदस्य देशों की संख्या में नहीं, बल्कि इस बात में होगी कि ये देश अपने मतभेदों के बावजूद कितनी साझा कार्रवाई कर पाते हैं. नई दिल्ली का सम्मेलन इसी सवाल की परीक्षा है.

चीनी राजदूत ने BRICS के लिए जो POWER फॉर्मूला सुझाया है, वह BRICS का कोई आधिकारिक साझा सिद्धांत नहीं है, लेकिन सवाल यह है क्या यह 11 देशों की साझा सोच बन पाएगा?

और यही तय करेगा कि ब्रिक्स सिर्फ बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतिबिंब बनेगा या उसे बदलने की ताकत भी हासिल करेगा.

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