सोमवार को चीन और अमेरिका के नेताओं की शिखर वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई. हालांकि दोनों पक्षों ने संबंध सुधारने की बात कही, पर संकेत कुछ और कह रह हैं.
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अमेरिका और चीन के नेताओं की बातचीत के बाद ना तो कोई नतीजे घोषित किए गए, ना भविष्य में मिलने की कोई रूपरेखा बताई गई. दोनों पक्षों ने कहा कि संबंध सुधारने के लिए सामने वाले को कुछ राहतें देनी होंगी. इस बैठक से बस यही संकेत मिला कि दोनों महाशक्तियों के संबंध इस वक्त बेहद सर्द हो चुके हैं.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उप विदेश मंत्री वेंडी शरमन की उत्तरी चीन के तटीय शहर तियानजिन का दौरा और वहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात दोनों ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता को कुछ नरमी देने का एक मौका था, ताकि यह प्रतिद्वंद्विता किसी विवाद में तब्दील ना हो जाए.
लेकिन बैठकों के बाद जिस तरह के सख्त बयान दोनों तरफ से आए हैं, वे अलास्का में मार्च में हुई बैठक के बाद जैसे ही हैं, जबकि राष्ट्रपति जो बाइडेन के सत्ता संभालने के बाद हुई दोनों देशों के नेताओं की पहली मुलाकात के बाद एक दूसरे की आलोचनाएं ही सुनाई दी थीं.
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पहले तुम, पहले तुम
वैसे, अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि बंद दरवाजों में हुई बैठकें तुलानत्मक रूप से ज्यादा सौहार्दपूर्ण रहीं. और तियानजिन के बाद वैसा रूखापन भी नहीं दिखा, जैसा कि अलास्का में दिखा था, लेकिन दोनों ही पक्ष एक साथ आगे बढ़ने के लिए कोई राह नहीं चुन पाए हैं.
शरमन ने चीन पर कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के उलट चलने के आरोप लगाए. इनमें चीन का हांग कांग में दमन, शिनजियांग में उइगुर और अन्य अल्पसंख्य समुदायों को यातना, तिब्बत में मानवाधिकारों का हनन और मीडिया की आजादी पर हमले जैसे मुद्दे शामिल हैं.
अमेरिका सरकार के एक अधिकारी ने पत्रकारों से कहा, "मेरे ख्याल से यह कहना गलत होगा कि अमेरिका किसी भी तरह से चीन का सहयोग पाने के जुगाड़ में है. यह चीन को फैसला करना है कि वे अगला कदम बढ़ाने के लिए कितने तैयार हैं.”
उधर चीनी पक्ष ने गेंद अमेरिका के पाले में होने की बात कही. अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों का हवाला देते हुए वहां के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, "जहां तक अंतरराष्ट्रीय नियमों के सम्मान की बात है तो दोबारा अमेरिका को सोचना है.”
समझ का फर्क है
अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड में एशिया विशेषज्ञ बोनी ग्लासर कहती हैं कि दोनों पक्षों के लिए किसी तरह का संवाद बनाए रखना बहुत जरूरी है लेकिन तिनजियान के बाद न तो कोई सहमति बनी है ना ही भविष्य को लेकर कुछ तय हुआ.
तस्वीरों मेंः 100 की हुई चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी
चीन पर शासन करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी सौ साल की हो गई है. 28 जून 2021 को पार्टी की सौवीं वर्षगांठ मनाई गई. देखिए, समारोह की तस्वीरें और जानिए सीसीपी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें.
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आधुनिक चीन की संस्थापक
चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) आधुनिक चीन की संस्थापक है. 1949 में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में पार्टी ने राष्ट्रवादियों को हराकर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की थी.
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सीसीपी की स्थापना
सीसीपी की स्थापना 1921 में रूसी क्रांति से प्रभावित होकर की गई थी. 1949 में पार्टी के सदस्यों की संख्या 45 लाख थी.
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सदस्यों की संख्या
पिछले साल के आखिर में सीसीपी के सदस्यों की संख्या नौ करोड़ 19 लाख से कुछ ज्यादा थी. 2019 के मुकाबले इसमें 1.46 प्रतिशत की बढ़त हुई थी. चीन की कुल आबादी का लगभग साढ़े छह फीसदी लोग ही पार्टी के सदस्य हैं. आंकड़े स्टैटिस्टा वेबसाइट ने प्रकाशित किए थे.
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सदस्यता
पार्टी की सदस्यता हासिल करना आसान नहीं है. इसकी एक सख्त चयन प्रक्रिया है और हर आठ आवेदकों में से एक को ही सफलता मिलती है. यह प्रक्रिया लगभग डेढ़ साल चलती है.
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कैसे हैं इसके सदस्य
सीसीपी के सदस्यों में साढ़े चार करोड़ से ज्यादा के पास जूनियर कॉलेज डिग्री है. करीब एक करोड़ 87 लाख सदस्य सेवानिवृत्त हो चुके नागरिक हैं. 2019 के आंकड़े देखें तो सदस्यों में 28 प्रतिशत किसान, मजदूर और मछुआरे थे.
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महिलाओं की संख्या
पिछले कुछ सालों में सीसीपी में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. 2010 में पार्टी की 22.5 फीसदी सदस्य महिलाएं थीं जो 2019 में बढ़कर 28 फीसदी हो गईं. 2019 में सदस्यता लेने वालों में 42 फीसदी संख्या महिलाओं की थी.
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पार्टी पर दाग
पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक पार्टी में 18 प्रतिशत सदस्यों का सरकार पर भरोसा नहीं था. 2020 में छह लाख 19 हजार सीसीपी सदस्यों पर भ्रष्टाचार के मुकदमे दर्ज थे. 2010 में एक रिपोर्ट आई थी जिसके मुताबिक उस साल 32 हजार लोगों ने पार्टी छोड़ दी थी.
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सम्मेलन
हर पांच साल में सीसीपी का एक सम्मेलन होता है जिसमें नेतृत्व का चुनाव होता है. इसी दौरान सदस्य सेंट्रल कमेटी चुनते हैं, जिसमें लगभग 370 सदस्य होते हैं. इसके अलावा, मंत्री और अन्य वरिष्ठ पदों पर भी लोगों का चुनाव होता है.
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सात के हाथ में ताकत
सेंट्रल कमेटी के सदस्य पोलित ब्यूरो का चुनाव करते हैं, जिसमें 25 सदस्य होते हैं. ये 25 लोग मिलकर एक स्थायी समिति का चुनाव करते हैं. फिलहाल इस समिति में सात लोग हैं, जिन्हें सत्ता का केंद्र माना जाता है. इसमें पांच से नौ लोग तक रहे हैं.
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महासचिव
सबसे ऊपर महासचिव होता है जो राष्ट्रपति बनता है. 2012 में हू जिन ताओ से यह पद शी जिन पिंग ने लिया था. बाद में संविधान में बदलाव कर राष्ट्रपति पद की समयसीमा ही खत्म कर दी गई और अब शी जिन पिंग जब तक चाहें, इस पद पर रह सकते हैं.
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ग्लासर कहती हैं, "इससे अमेरिका और उसके सहयोगी तो असहज ही होंगे. वे अमेरिका और चीन के संबंधों में ज्यादा स्थिरता की उम्मीद कर रहे हैं.” ग्लोसर कहती हैं कि अगर दोनों ही पक्ष इस उम्मीद में बैठे रहेंगे कि सामने वाला पहले झुके तो फिर दोनों निराश ही होंगे.
ऐसी संभावना जताई जा रही है कि अक्टूबर में होने वाली जी20 की बैठक के दौरान जो बाइडेन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिल सकते हैं. वैसे, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी कहती हैं कि तिनजियान में इस बारे में कोई बात नहीं हुई लेकिन आने वाले समय में कभी न कभी संवाद का मौका जरूर आएगा.
अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट में फेलो एरिक सेयर्स कहते हैं कि दोनों ही पक्ष फिलहाल कूटनीति संवाद को लेकर एकमत नहीं दिखते. सेयर्स कहते हैं, "तिनजियान में जो नजर आया वो ये था कि कूटनीतिक संवाद की अहमियत और भूमिका को लेकर दोनों पक्षों की समझ अभी एक दूसरे से बहुत अलग है.”
वीके/एए (रॉयटर्स)
देखिएः ऐसे देश जिनके एक से ज्यादा नाम
कई लोगों के दो नाम होते हैं: घर का या पुकारने वाला नाम और एक औपचारिक नाम. लेकिन लोगों के अलावा कई देशों के भी एक से ज्यादा नाम हैं, जैसे भारत को हिंदुस्तान या इंडिया कहते हैं. देखिए ऐसे ही कुछ देशों की फेहरिस्त.
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भूटान
भारत के करीबी पड़ोसी भूटान के लोग अपने देश को स्थानीय भाषा में द्रुक युल कहते हैं.
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चीन
एक उभरती विश्व महाशक्ति का नाम दुनिया के लिए चीन या चाइना है, लेकिन चीनी भाषा में उसका नाम चुंगकुओ है.
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मादलीव
हिंद महासागर में द्वीपों पर बसा मादलीव दक्षिण एशिया का सबसे छोटा देश है. उसे स्थानीय धीवेही भाषा में धीवेही राजे कहते हैं.
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मिस्र
दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में से एक की जन्मस्थली का नाम अंग्रेजी में ईजिप्ट है. लेकिन स्थानीय अरबी भाषा में उसे मिस्र कहते हैं.
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जर्मनी
जब भी दमदार मशीनों, शानदारों कारों और टेक्नोलॉजी की बात आती है तो सबकी जुबान पर जर्मनी का नाम होता है. लेकिन जर्मन में उसे डॉयचलांड कहते हैं.
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पोलैंड
जर्मनी के पड़ोसी पोलैंड का नाम स्थानीय पोलिश भाषा में पोल्स्का है. 3.85 करोड़ की आबादी के साथ यह यूरोपीय संघ में पांचवा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है.
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स्विट्जरलैंड
स्विट्जरलैंड का नाम वहां बोली जाने वाली चारों भाषाओं फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन और रोमांश में अलग है. इसे क्रमशः सुइस, श्वात्स, स्वीजेरा और स्वीजरा कहते हैं.
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ऑस्ट्रिया
यूरोपीय देश ऑस्ट्रिया भी उन देशों में शामिल है जिनके दो नाम हैं. स्थानीय जर्मन भाषा में उसे ओएस्ट्रेराइश कहते हैं.
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ग्रीस
दुनिया भर के सैलानियों का पसंदीदा ठिकाना ग्रीस अब शरणार्थी और आर्थिक संकट की वजह से सुर्खियों में रहता है. ग्रीक भाषा में उसका नाम हेलास है.
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अल्बानिया
पूर्वी यूरोप के इस छोटे से देश को स्थानीय अल्बानियाई भाषा में श्कीपेरिया कहते हैं.
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नॉर्वे
दुनिया के सबसे खुश और समृद्ध देशों में शुमार होने वाले नॉर्वे को स्थानीय नॉर्वेजियन भाषा में नॉर्गे कहते हैं.
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स्वीडन
यूरोपीय देश स्वीडन का नाम भी स्थानीय भाषा में थोड़ा सा अलग है. स्वीडिश लोग अपने देश को स्वेरिगे के नाम से पुकारते हैं.
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लिथुआनिया
उत्तरी यूरोप में स्थित लिथुआनिया को स्थानीय लिथुआनियन भाषा में लीतुवा कहते हैं. इसकी सीमाएं पोलैंड, बेलारूस और रूस के कालिनिनग्राद इलाके से लगती हैं.
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इस्टोनिया
उत्तरी यूरोप में बाल्टिक सागर के पूर्वी तट पर बसा है इस्टोनिया, जिसे स्थानीय इस्टोनियाई भाषा में एस्ती कहते हैं.
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क्रोएशिया
यूरोप का यह देश अपने सुंदर तटों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है. क्रोएशिया का नाम स्थानीय भाषा में हृवात्स्का है.
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रूस
हम जिसे अंग्रेजी में रशिया और हिंदी में रूस से नाम से जानते हैं, उसे रूसी भाषा में रोसिया कहा जाता है.
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जॉर्जिया
रूस से टकराव की वजह से कई बार सुर्खियों रहे जॉर्जिया को स्थानीय जॉर्जियन भाषा में साकआर्तवेलो कहते हैं.
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अर्मेनिया
अर्मेनिया की सीमाएं ईरान, तुर्की, अजरबैजान और जॉर्जिया से मिलती है. इस देश का नाम स्थानीय अर्मेनियाई भाषा में हायास्तान है.
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ट्यूनिशिया
2011 की अरब क्रांति की जन्मस्थली के तौर पर दुनिया ट्यूनिशिया का नाम जानती है. लेकिन उसे स्थानीय अरबी भाषा में तुनेस कहते हैं.
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उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया
दुनिया के सबसे अलग थलग देशों में शामिल उत्तर कोरिया को स्थानीय लोग चोसोन कहते हैं. इसी तरह दक्षिण कोरिया को कोरियन भाषा में हांगुक कहते हैं.