वनतारा को अदालत ने क्लीन चिट तो दे दी लेकिन यूरोप और ब्राजील के अधिकारियों ने कहा है कि वनतारा पर खास नजर रखेंगे.
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साल 2019 में द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने चमकीले नीले रंग के तोतों को विलुप्त घोषित कर दिए था. लेकिन ब्राजील के जंगलों में रहने वाले ये विलुप्त तोते फिर 2023 में भारत में कैसे आ पहुंचे? इसी सवाल ने आज एशिया के सबसे अमीर परिवार, अंबानी को शक के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है. और इस मामले में अब सिर्फ भारत नहीं बल्कि जर्मनी और ब्राजील भी शामिल हो गए हैं.
स्पिक्स मैकॉ तोते क्या होते हैं?
स्पिक्स मैकॉ तोता एक बेहद दुर्लभ और सुंदर पक्षी है. इसका रंग हल्का और गहरा नीला होता है, इसलिए इसे "नीला तोता" भी कहा जाता है. यह तोता दक्षिण अमेरिका के ब्राजील के जंगलों में पाया जाता था.
स्पिक्स मैकॉ अपनी खास प्रणय क्रियाओं और सामाजिक व्यवहार के लिए जाना जाता है. नर और मादा एक-दूसरे के साथ खास तरह के नृत्य जैसे हावभाव करते हैं और जीवनभर के लिए साथ रहते हैं. जानवरों की दुनिया में ऐसा कम ही देखने को मिलता है.
तो क्या जिराफ भी विलुप्त हो जाएगा!
पीले-भूरे चकत्तों से भरी चमकीली त्वचा और लंबी गर्दन वाला जिराफ दुनिया का सबसे लंबा जीव है. जिन जीवों को संरक्षण की जरूरत है, उनका नाम याद करिए तो शायद आप भी जिराफ को नहीं गिनेंगे. जबकि इसकी आबादी लगातार घट रही है.
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जी फॉर जिराफ
जिराफ से हमारी पहचान बचपन जितनी पुरानी है. अंग्रेजी वर्णमाला सीखते हुए हमें सिखाया जाता है, जी फॉर जिराफ. एक शाकाहारी जीव, जिसका पसंदीदा खाना है अकेशिया के पत्ते. इस प्रजाति के पौधे उष्णकटिबंधीय और कटिबंधीय इलाकों में पाए जाते हैं. जिराफ भी इसी आबोहवा का जीव है. अफ्रीका के करीब 21 देश हैं, जो जिराफ का कुदरती घर माने जाते हैं. इसकी कई प्रजातियां और उपप्रजातियां हैं.
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इतनी ऊंचाई तक कैसे पहुंचती है जिराफ की जीभ
अकेशिया के पौधों का आकार अनूठा होता है. इसका ऊपरी हिस्सा ऐसा दिखता है मानो किसी ने छाता तान दिया हो. अपनी लंबी गर्दन के सहारे जिराफ की जीभ बड़े आराम से इसके ऊपरी हिस्सों तक पहुंच जाती है. जिराफ की तो जीभ भी बड़ी लंबी होती है. इसका आकार 18 इंच तक हो सकता है. यानी, सामान्य आकार की लगभग तीन पेंसिलों जितना लंबा. वहीं, हमारी-आपकी (वयस्क) जीभ की औसत लंबाई 3.1 (महिलाएं) से 3.3 इंच (पुरुष) ही होती है.
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अभी जीभ का वर्णन खत्म नहीं हुआ
जिराफ की जीभ 'प्रिहेंसिबल' होती है, यानी ऐसी लपलपाने वाली जिसकी मदद से उसे चीजों को पकड़ने या अपनी ओर खींचने में मदद मिलती है. जैसे कि हाथी की सूंड. अपनी इस खास जीभ की मदद से ऊंचाई की टहनियों पर लगे पत्ते अपनी तरफ खींच लेता है. वो कांटों के बीच से पत्ते चुनकर खा लेता है, बिना अपनी जीभ घायल किए. इसमें खास तरह की एक गोंदनुमा परत भी होती है, जो जीभ को सुरक्षित रखने में मदद करती है.
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गजब की पाचन शक्ति
क्लीवलैंड जूलॉजिकल सोसायटी के मुताबिक, जिराफ की जीभ किसी भी अन्य जानवर से ज्यादा मजबूत होती है. जिराफ खूब पेटू जीव है. उसे बहुत भूख लगती है और वो ज्यादातर वक्त खाता-पीता ही नजर आता है. नेशनल जिओग्रैफिक के मुताबिक, एक जिराफ दिनभर में 45 किलो तक पत्तियां और टहनियां खा सकता है. काफी अच्छा मेटाबॉलिजम है ना!
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तेज धावक
इंसानों में छह फुट खासा लंबा माना जाता है ना! नैशनल जियोग्रैफिक सोसायटी के मुताबिक, इतने तो जिराफ के पांव ही होते हैं. लंबे पैरों से कुलांचे भरता हुआ वो करीब 56 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है.
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कद के फायदे भी, नुकसान भी
लंबे कद के कारण वो खतरे को दूर से देख सकता है. हालांकि, कद का एक नुकसान यह है कि उसे छोटे स्रोतों से पानी पीने में दिक्कत आती है, अपने पैर छितराकर बैठना पड़ता है. ऐसे में कई बार बड़े जीव हमला भी कर सकते हैं. वैसे उसे रोज पानी की जरूरत नहीं पड़ती. शरीर में तरल की ज्यादातर जरूरत पत्तियों से पूरी हो जाती है.
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सबके पास अपने-अपने खास 'चकत्ते'
हम इंसानों के फिंगर प्रिंट की तरह सभी जिराफ के अपने-अपने चकत्तों का खास पैटर्न होता है. ये बड़े सामाजिक जीव माने जाते हैं और आमतौर पर शांति से रहते हैं. इनके सोने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प है. आमतौर पर ये खड़े-खड़े सोते हैं. बमुश्किल ही कभी लेटते हैं. यहां तक कि मादा जिराफ भी खड़े-खड़े ही बच्चे को जन्म देती है.
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थोड़ा सा सोकर ही काम चल जाता है
सैन डिएगो चिड़ियाघर की वेबसाइट पर मिला कि जिराफ को लंबी नींद की जरूरत ही नहीं पड़ती. वो दिनभर में पांच मिनट से आधे घंटे तक की नींद लेते हैं. सोते समय कोई उनपर हमला ना कर दे, इसलिए झुंड का कोई एक सदस्य जागकर बाकियों की रखवाली करता है.
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क्या जिराफ की आबादी फल-फूल रही है?
जिराफ की संख्या तेजी से घट रही है. वन्यजीवन और जलवायु संकट से जुड़े विषयों पर काम करनी वाली संस्था 'नैचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल' के मुताबिक, जिराफ गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं. बीते तीन दशकों में उनकी आबादी करीब 40 प्रतिशत कम हो गई है.
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मंडरा रहा है विलुप्त होने का खतरा
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में इन्हें "वलनरेबल" श्रेणी में रखा गया है. यानी, उनके विलुप्त होने का जोखिम है. अनुमान है कि कुदरती परिवेश में इनकी संख्या बस 117,000 बची है. इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल के मुताबिक, 2016 से पहले ये सबसे कम चिंता वाले जीवों की श्रेणी में थे. सिकुड़ता प्राकृतिक आवास और पोचिंग इनके लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो रहे हैं.
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इंसानों से है खतरा
नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के मुताबिक, जिराफ को उसकी त्वचा, मस्तिष्क और बोन मैरो जैसी चीजों के लिए पोच किया जा रहा है. तंजानिया, जहां का वह राष्ट्रीय जीव है, वहां कई लोग मानते हैं कि जिराफ के अंगों से एचआईवी-एड्स का इलाज हो सकता है. कई समुदायों में मांस के लिए भी उनका शिकार किया जाता है.
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ब्राजील के जंगलों में इनकी संख्या लगातार कम होती गई क्योंकि इनके रहने की जगह नष्ट हो रही थी और इनका शिकार भी किया जाता था. इसी कारण सन 2000 के बाद से ये जंगलों से लगभग गायब हो गए और साल 2019 में इन्हें "जंगलों से विलुप्त” घोषित कर दिया गया.
फिलहाल स्पिक्स मैकॉ तोते सिर्फ संरक्षण केंद्रों और प्रजनन प्रोग्रामों में पाए जाते हैं. इन्हें दोबारा ब्राजील के जंगलों में बसाने की कोशिशें की जा रही हैं. लेकिन अब खबरें हैं कि ऐसे 26 तोते भारत पहुंच गए हैं. और वो भी गुजरात के जामनगर में बने वनतारा नाम के एक विशाल पशु अभयारण्य में.
क्या है वनतारा?
वनतारा एक विशाल पशु अभयारण्य है जो 3,500 एकड़ में फैला है और इसे मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी चलाते हैं. यह एशिया के सबसे अमीर कारोबारी परिवार अंबानी परिवार की परोपकारी शाखा का हिस्सा है. वहां करीब 2,000 अलग अलग प्रजातियों के जानवर रहते हैं.
एक जांच रिपोर्ट में सामने आया कि साल 2022 से अब तक वनतारा ने 40 देशों से हजारों दुर्लभ और विदेशी जीव मंगवाए हैं. आंकड़े चौंकाने वाले हैं. यहां हजारों सांप, हजार से अधिक कछुए, 200 से ज्यादा बाघ, सैकड़ों चीते और जिराफ, साथ ही चिंपांजी और गैंडे लाए गए हैं. इनके अलावा गिरगिट, छिपकलियां और कई दुर्लभ पक्षी भी मौजूद हैं. इन सबकी कुल कीमत नौ करोड़ अमेरिकी डॉलर के करीब बताई गई है.
ब्राजील के जंगलों में इनकी संख्या लगातार कम होती गई क्योंकि इनके रहने की जगह नष्ट हो रही थी और इनका शिकार भी किया जाता था.तस्वीर: Patrick Pleul/EPA/picture alliance
वनतारा का कहना है कि ये सौदे किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं किए गए. उनके प्रवक्ता ने कहा, "ये जानवरों का व्यावसायिक लेनदेन नहीं है. वनतारा में किसी भी जानवर को लाने के लिए कभी कोई व्यावसायिक भुगतान नहीं किया गया है.”
शक के घेरे में वनतारा
इतनी बड़ी संख्या में विलुप्त और दुर्लभ प्रजातियों का आयात सवाल खड़े करता है. अगस्त 2025 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जांच हो कि वनतारा के ये सौदे भारतीय कानून और अंतरराष्ट्रीय संधि सीआईटीईएस यानी लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार संबंधी समझौते के नियमों के तहत सही हैं या नहीं. जांच के बाद अदालत ने बताया कि उन्हें इसमें कोई गड़बड़ या कानून का उल्लंघन नजर नहीं आया है. लेकिन यूरोप और ब्राजील के अधिकारी अब भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं.
तोता कैसे कर लेता है आवाज की नकल
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असल विवाद उन्हीं नीले तोतों को लेकर है. ये पक्षी जर्मनी की एक संस्था एसीटीपी से वनतारा पहुंचे. ब्राजील का आरोप है कि उनकी अनुमति के बिना यह स्थानांतरण हुआ. ब्राजील की सरकारी संस्था चिको मेंडेस संस्थान ने साफ कहा, "वनतारा चिड़ियाघर अभी तक स्पिक्स मैकॉ जनसंख्या प्रबंधन कार्यक्रम से नहीं जुड़ा है. यह इस प्रजाति के संरक्षण प्रयास में किसी भी संस्था की आधिकारिक भागीदारी की मूल शर्त है.”
उनका कहना है कि ना तो भारत इस कार्यक्रम का हिस्सा है और ना ही एसीटीपी को ब्राजील ने यह अधिकार दिया कि वह इन तोतों को भारत भेजे. वहीं वनतारा का जवाब है, "तोतों का स्थानांतरण पूरी तरह कानूनी था. यह गैर व्यावसायिक था और एसीटीपी के साथ संरक्षण प्रजनन व्यवस्था के तहत किया गया था.”
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जर्मन संस्था पर भी सवाल
जर्मनी ने 2023 में इन तोतों को भारत भेजने की अनुमति "सद्भावना" में दी थी. लेकिन बाद में जब ब्राजील से बात की गई तो उन्होंने उसकी इजाजत नहीं दी. ब्राजील ने यह भी बताया कि पिछली बार भी उनसे बगैर पूछे यह स्थानांतरण हुआ था. अब यह मामला अदालतों में है और सीआईटीईएस की अगली बैठक में फिर से उठने वाला है. इस बीच यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में भारत और वनतारा को होने वाले किसी भी निर्यात पर खास नजर रखी जाएगी.
लेकिन वनतारा की कहानी सिर्फ विवादों तक सीमित नहीं है. यह अंबानी परिवार की चमक दमक का भी हिस्सा बन चुका है. अनंत अंबानी की सगाई और शादी से जुड़े कार्यक्रमों में इवांका ट्रंप से लेकर मार्क जकरबर्ग तक शामिल थे. खुद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2025 में यहां आकर शेर के बच्चों के साथ खेला, गैंडे और हाथियों को खाना देने वाले वीडियो भी खूब चर्चा में रहे और एक तस्वीर में तो मोदी ने इसी विवादित तोते को अपने हाथ पर बैठा रखा है.
मोटरबाइक मैकेनिक से मैकॉ ट्रेनर बनने तक का सफर
दक्षिण जकार्ता के अल्बी अलबार रामली कभी मोटरसाइकिल मैकेनिक थे, लेकिन आज उनकी पहचान रंग-बिरंगे मैकॉ तोतों से है. यह कहानी है इंसान और परिंदों के बीच बने उस अनोखे रिश्ते की, जो रंगों, सपनों और जुनून की उड़ान भर रही है.
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रंगों से सजी दोस्ती
इंडोनेशिया में दक्षिण जकार्ता के अल्बी अलबार रामली के दोनों हाथों पर बैठे चमकदार पंखों वाले मैकॉ तोते मानिए उनके जिगरी दोस्त हैं. उनकी पूछें शरीर को छूती हैं. इंसान और पंछी, ये दो अलग दुनिया भले ही हों, लेकिन रामली ने कभी शायद उन्हें जानवर माना ही नहीं.
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परिंदों संग सफर
शनिवार की सुबह, मोटरबाइक पर निकलते रामली और उनके पीछे लकड़ी के डब्बे में बैठे हैं उनके छह मैकॉ. मंजिल है एक खाली मैदान, जहां परिंदे आजादी से उड़ेंगे… और वापस आना भी सीखेंगे. वापस लौटना, यही तो बड़ी बात है.
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क्या होते हैं मैकॉ तोते?
मैकॉ तोते दुनिया के सबसे बड़े और सबसे खूबसूरत तोतों में गिने जाते हैं. ये मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिका और मध्य अमेरिका के जंगलों में पाए जाते हैं.
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मैकॉ तोतों की खासियत
मैकॉ बेहद अक्लमंद और सामाजिक पक्षी हैं. ये इंसानों की आवाज की नकल कर सकते हैं और कुछ शब्द बोल भी लेते हैं. अगर प्यार और ध्यान से पाले जाएं तो ये अपने मालिक से गहरा रिश्ता बना लेते हैं, जो शायद रामली के साथ भी हुआ.
रामली 33 साल के मोटरबाइक मैकेनिक थे. लेकिन सोशल मीडिया पर उन्होंने कुछ वीडियो देखीं जहां परिंदे खुले आसमान में उड़कर भी अपने मालिक के पास लौट आते थे. बस वहीं से उनका यह जुनून जागा. वह अपनी नौकरी छोड़ तोतों को इसी तरह ट्रेन करने का सपना देखने लगे.
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पैसे की कमी ने मुश्किलें खड़ी कीं
2018 में रामली ने छोटे तोतों को ट्रेन करने से शुरुआत की थी. रामली हमेशा से खूबसूरत मैकॉ को पालने, उनकी देखरेख करने और उन्हें ट्रेन करने का सपना देखते थे. लेकिन पैसों की कमी की वजह से वो पूरा नहीं हो पा रहा था.
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पहला साथी, जोरो
नीला और सुनहरा जोरो, रामली का पहला मैकॉ साथी बना. दरअसल 2020 में इन विदेशी पक्षियों के एक मालिक ने उन पर भरोसा करके उन्हें एक मैकॉ (जोरो) दे दिया. जोरो सिर्फ एक परिंदा नहीं, बल्कि उनका दोस्त और प्रेरणा है.
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सीटी का जादू
रामली की सीटी बजते ही पंछी पंख फैलाकर उड़ जाते हैं. और आसमान में इंद्रधनुष के बगैर भी रंग बिखर जाते हैं. तीन मिनट में सब वापस लौट आते हैं, जैसे बच्चे जब अपने घर की ओर लौटते हैं.
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परिंदों का स्कूल
आज रामली के पास 18 मैकॉ हैं. हर एक का नाम है, हर एक की अलग पहचान. उनका घर अब एक छोटे-से स्कूल जैसा है, जहां हर दिन नई क्लास, नई उड़ान होती है.
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देखभाल में मोहब्बत
सुबह का खाना, हफ्ते में दो बार पिंजरे साफ करना, और पंखों को संवारना. ये सब रामली के लिए काम नहीं बल्कि इन शानदार तोतों के लिए उनकी मोहब्बत है. और जाहिर है, तोते भी उन्हें अपना मानते हैं, तभी वो खुले आकाश में उड़कर वापस रमली के पास आ जाते हैं.
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प्रतियोगिताओं की चमक
रामली अपने दोस्तों संग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं. लेकिन जीतने से ज्यादा खुशी होती है ये दिखाने में कि रोज की मेहनत ने परिंदों को कितना निखार दिया है. ये उनके लिए गर्व की बात है.
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प्यार और गर्व की उड़ान
रामली कहते हैं, "ये पंछी इंसानों जैसे हैं, कुछ जल्दी सीख लेते हैं, कुछ धीरे.” उनके लिए ये केवल परिंदे नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा हैं. हर उड़ान में उन्हें उन्हें अहसास होता है कि मकाओ के साथ उड़ते-उड़ते, उन्होंने कहीं ना कहीं अपने सपनों को भी एक ऊंची उड़ान दे दी है.
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अब क्या है स्थिति?
सुप्रीम कोर्ट की जांच ने फिलहाल वनतारा को ‘क्लीन चिट' दे दी है. लेकिन ब्राजील का कहना है कि भारत को अभी भी स्पिक्स मैकॉ संरक्षण कार्यक्रम से आधिकारिक तौर पर जुड़ना होगा. रॉयटर्स के अनुसार, अंबानी परिवार ब्राजील में अधिकारियों से बातचीत कर रहा है.
इतना तय है कि यह पक्षी, जो कभी विलुप्त घोषित हो चुका था, अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति, कानून और अरबों रुपये के साम्राज्य की कहानी का हिस्सा बन चुका है.