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गांव की फुटबॉल एकेडमी ने बदला बांग्लादेशी महिलाओं का जीवन

जॉन डुएर्डेन
२५ अगस्त २०२५

बांग्लादेश के एक सुदूर गांव में मौजूद फुटबॉल एकेडमी ने कई लड़कियों को मैदान के अंदर और बाहर चुनौतियों से पार पाने में मदद की है. इसकी वजह से कई महिलाओं की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी है.

जुलाई 2025 में एशिया कप क्वालिफायर मैच में म्यांमार (दाएं) के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करने वाली बांग्लादेशी फुटबॉलर (बाएं)
जुलाई 2025 में एशिया कप क्वालिफायर मैच में म्यांमार (दाएं) के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करने वाली बांग्लादेशी फुटबॉलर (बाएं) तस्वीर: Myo Kyaw Soe/Xinhua/IMAGO

करीब 17.4 करोड़ की आबादी वाले बांग्लादेश ने अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में आमतौर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. हालांकि, अब यह देश महिला फुटबॉल में धूम मचाने लगा है. जुलाई में, सीनियर टीम ने पहली बार 2026 एशियाई कप के लिए क्वालीफाई किया. इसी महीने, अंडर-20 टीम भी पहली बार अपनी कॉन्टिनेंटल चैंपियनशिप तक पहुंची.

इस सफलता का श्रेय, देश के सुदूर उत्तरी भाग में स्थित रंगातुंगी यूनाइटेड वीमेन फुटबॉल एकेडमी को भी जाता है. इसकी स्थापना 2014 में एक व्यक्ति ने की थी, जिनका नाम मोहम्मद ताजुल इस्लाम है. वे कोई धनी व्यवसायी नहीं, बल्कि एक पूर्व शिक्षक और किसान हैं जो समाज की भलाई के बारे में सोचते हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "एकेडमी शुरू करने से पहले, वहां कुछ भी नहीं था. मुझे फुटबॉल बहुत पसंद है. मैं लड़कियों को मौका देना चाहता था, क्योंकि मुझे लगा कि बांग्लादेश में महिला फुटबॉल बहुत आगे जा सकता है.”

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अब ताजुल इस्लाम की बातें सच होती दिख रही हैं. एशियाई कप के लिए क्वालीफाई करने वाली दोनों टीमों में से हर एक टीम में एकेडमी की तीन-तीन खिलाड़ी शामिल थीं. उन्होंने कहा, "हमने अलग-अलग आयु वर्ग में बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व करने के लिए कई खिलाड़ियों को भेजा है. हमें उन सभी पर बहुत गर्व है.”

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मोसम्मत सागोरिका एकेडमी की सबसे लोकप्रिय खिलाड़ियों में से एक हैं. 17 वर्षीय इस खिलाड़ी ने एशियाई कप क्वालिफायर के दौरान अंडर-20 टीम के लिए चार गोल किए थे और वह एक अनुभवी सीनियर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी हैं. यह स्ट्राइकर दक्षिण एशिया की सबसे लोकप्रिय युवा खिलाड़ियों में से एक हैं. पिछले साल क्षेत्रीय चैंपियनशिप में उन्हें टूर्नामेंट का सबसे मूल्यवान खिलाड़ी भी चुना गया था, जब उन्होंने टॉप स्कोरर का खिताब भी जीता था.

सागोरिका ने डीडब्ल्यू को बताया, "मेरा सपना हमेशा से फुटबॉलर बनने का था, लेकिन हमारे सामाजिक और धार्मिक माहौल के कारण मेरे माता-पिता इसके लिए राजी नहीं थे.” उन्होंने आगे बताया कि शुरुआत में उनका परिवार चाहता था कि वह जल्द से जल्द नौकरी करके पैसे कमाएं.

ताजुल इस्लाम कहते हैं कि उनके लिए हमेशा से सबसे बड़ी चुनौती कम आय वाले परिवारों को यह समझाने की रही है कि लड़कियां फुटबॉल खेल सकती हैं. उन्होंने कहा, "लड़कियां इस खेल के प्रति बहुत दिलचस्पी दिखाती थीं. हालांकि, मुझे पता था कि मुझे उनके माता-पिता से बात करनी होगी. उन्हें यह दिखाना होगा कि फुटबॉल खेलना उनकी बेटियों के लिए अच्छी बात हो सकती है. एक बार जब उन्होंने हमारा साथ दिया, तो फिर वे खुलकर साथ देने लगे.”

सागोरिका के साथ भी यही हुआ. वह बताती हैं, "जब मैंने एकेडमी में दाखिला लिया, तो मेरे माता-पिता ने मुझसे कहा कि अगर मैं पढ़ाई करती रहूंगी, तो ही मैं ये खेल-कूद जारी रख सकती हूं. शुरुआत में मेरे पिता ने मुझे फुटबॉल खेलने की अनुमति नहीं दी, लेकिन बाद में उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया और मैंने उनसे वादा किया कि मैं एक दिन बड़ी खिलाड़ी बनूंगी.”

बाधाओं को तोड़ने की कोशिश

माता-पिता की अनुमति मिलने के बाद भी, समाज में ऐसे कई लोग थे जिन्हें लड़कियों का फुटबॉल खेलना या शॉर्ट्स पहनना पसंद नहीं था. 1971 में पाकिस्तान से आजाद हुए इस देश में पारंपरिक रूप से महिला खेलों को प्राथमिकता नहीं दी गई. जनवरी में, देश के उत्तर-पश्चिमी शहर जॉयपुरहाट में इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक फुटबॉल मैदान को नुकसान पहुंचाया था और दो महिला फुटबॉल मैच नहीं होने दिए थे. इस मामले पर ताजुल इस्लाम कहते हैं, "यह एक रूढ़िवादी समाज है. हमारा देश मुस्लिम-प्रधान है. कुछ लोग नहीं चाहते थे कि महिलाएं फुटबॉल खेलें. यह एक बड़ी बाधा रही है.”

इसलिए, ताजुल इस्लाम को लगा कि बड़े स्तर पर समर्थन जुटाना जरूरी है. उन्होंने कहा, "हम स्थानीय राजनेताओं, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के पास गए. उन्होंने भी एकेडमी का साथ दिया.”

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इलाके की अन्य लड़कियों के साथ एक क्लब का हिस्सा होने से खिलाड़ियों के लिए फुटबॉल खेलना आसान हो गया. सागोरिका ने आगे बताया, "मुझे लगता है कि एकेडमी से हमें सामाजिक सुरक्षा मिलती है. यहां एक अच्छे कोच हैं जो हमें फुटबॉल के बारे में सिखाते हैं. एकेडमी में हमें खेल से जुड़ा हर सामान मिल जाता है. यहां हमारी सेहत और पढ़ाई का भी ध्यान रखा जाता है. यह एकेडमी पहले से ही एशियाई फुटबॉल के सितारे तैयार कर रही है और मुझे इस पर गर्व है.”

असल चुनौतियां

एशियाई स्तर पर सफलता मिलने के बाद फुटबॉल को लेकर स्थानीय स्तर पर भी नजरिया बदला है. जब सागोरिका ने 2024 में भारत के खिलाफ मैच खेला, तो घरेलू मीडिया ने बताया कि उनके गांव के लोगों ने एक प्रोजेक्टर लगाकर साथ मिलकर मैच देखा और उनके माता-पिता स्टेडियम आए. जबकि, गांव के यही लोग पहले महिला फुटबॉल को पसंद नहीं करते थे. महिलाओं को फुटबॉल खेलते हुए नहीं देखना चाहते थे.

मैच में आखिरी मिनट में गोल करने वाली सागोरिका ने कहा, "हाफटाइम के समय, किसी ने मुझे बताया कि मेरे माता-पिता आ गए हैं. मैं दौड़कर उनके पास गई. मुझे बहुत खुशी हुई कि मेरे माता-पिता मुझे देखने इतनी दूर आए. मैंने अपने माता-पिता को दिखा दिया कि मैं यह कर सकती हूं.”

इस तरह की बड़ी सफलता मिलने के बावजूद, एकेडमी को चलाना एक चुनौती है, क्योंकि अक्सर पैसों की तंगी होती रहती है. ताजुल इस्लाम ने कहा, "कुछ लोगों ने थोड़ी-बहुत मदद की है, लेकिन मैंने अपनी सारी पूंजी लगा दी है. रंगातुंगी एकेडमी बांग्लादेश में लोकप्रिय है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने मेरी मदद नहीं की.” उन्हें उम्मीद है कि राष्ट्रीय स्तर पर हाल में मिली बड़ी सफलता के बाद, महिला फुटबॉल के क्षेत्र में बांग्लादेश की बड़ी पहचान बनाने के लिए, सार्वजनिक और निजी स्तर पर ज्यादा सहयोग मिलेगा.

ताजुल इस्लाम कहते हैं, "हमारे पास जरूरत के मुताबिक जिम के सामान और फुटबॉल नहीं हैं. अभी सब कुछ बहुत साधारण है. हमें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमारा लक्ष्य बहुत बड़ा है. मैं मुश्किलों से हार नहीं मानता. मैं हमेशा लड़कियों को वह सब कुछ देने की कोशिश करता हूं जो उन्हें चाहिए.”

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महिला खिलाड़ियों को मिल रही मदद

महिला खिलाड़ी अब फुटबॉल से कमाई भी करने लगी हैं. फेडरेशन ने 30 से ज्यादा खिलाड़ियों को कॉन्ट्रैक्ट दिए हैं, जिनमें हर महीने लगभग 125 से 350 यूरो (146 से 408 डॉलर) तक की सैलरी मिल रही है. कुछ खिलाड़ी विदेशों में भी खेलने लगी हैं. हाल की टीम की 10 खिलाड़ी भूटान के क्लबों से जुड़ी हैं. महिला खिलाड़ियों का सपना है कि वे 2027 में ब्राजील में होने वाले वर्ल्ड कप में खेलें. इस वर्ल्ड कप में पहली बार 32 टीमें खेलेंगी. हालांकि, उनका लक्ष्य है कि अगले 10 सालों में वे वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर लें.

सागोरिका कहती हैं, "हमारा समर्पण हमें हमारी मंजिल तक पहुंचाएगा, क्योंकि हम पूरी मेहनत कर रहे हैं. अगर हमें वैज्ञानिक और लॉजिस्टिक सहायता मिलती है, तो मुझे यकीन है कि बांग्लादेश की महिलाएं भी विश्व कप में खेलेंगी.”

जब भी ऐसा होगा, ताजुल इस्लाम, उनके माता-पिता, पड़ोसी और पूरा बांग्लादेश उन्हें खेलते हुए देख रहा होगा.

जॉन डुएर्डेन John Duerden
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