पिग्मी हॉग्स कहलाने वाले विश्व के सबसे छोटे और दुर्लभ सूअर की किस्म को भी एक वायरस के कारण लॉकडाउन में रखना पड़ रहा है. इसे कोरोना वायरस नहीं बल्कि अफ्रीकी स्वाइन फ्लू वायरस से खतरा है.
भारत में अफ्रीकी स्वाइन फ्लू बुखार के संक्रमण के पहले मामले के सामने आने के कारण पिग्मी सूअरों के साथ ऐसा किया गया है. इस बीमारी का ना कोई इलाज है और ना ही कोई टीका बना है. अफ्रीकी स्वाइन फ्लू एक बहुत ही ज्यादा संक्रामक बीमारी है जिसमें जान जाने का खतरा बहुत ज्यादा होता है. असम के सरकारी पशुपालन विभाग के एक अधिकारी प्रदीप गोगोई बताते हैं कि इस वायरस ने अब तक करीब 16,000 पालतू सूअरों की जान ले ली है.
अब वायरस का खतरा इन शर्मीले केवल 10-इंच लंबे पिग्मी हॉग्स तक पहुंच गया है. इस प्रजाति का प्राकृतिक आवास तो बहुत पहले ही छिन गया था और सन 1960 के दशक में इन्हें लुप्त मान लिया गया था. लेकिन हाल के दशकों में एक कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम और कई अन्य संरक्षण प्रयासों के तहत सूअरों की इस खास स्पीशीज को वापस लाया जा सका है. फिलहाल ऐसे 300 पिग्मी हॉग्स हैं जिन्हें असम के अलग अलग हिस्सों में रखा गया है. अब वायरस के चलते अभी भी खतरे में पड़ी इस किस्म के फिर से खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है.
भारत में कितना खतरा
भारत में अफ्रीकी स्वाइन फ्लू के मामले की पुष्टि 18 मई को हुई थी. इसके बाद से ही ब्रीडिंग सेंटरों को एक तरह से लॉकडाउन में रखा जाने लगा और कई सावधानियां बरती जाने लगीं. इस बारे में बताते हुए पिग्मी हॉग संरक्षण कार्यक्रम के प्रमुख पराग डेका कहते हैं, "यह बहुत डरावना है. इससे पूरी की पूरी आबादी मिट सकती है.'' पिग्मी हॉग्स को बचाने वाला यह कार्यक्रम भारतीय प्रशासन, स्थानीय गैर-लाभकारी संस्था अरण्यक और ब्रिटेन की संस्था डरेल वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट मिल कर चलाते हैं.
पिग्मी हॉग सूअर केवल 300 के आसपास ही बचे हैं.तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/Parag Deka/Durrell Wildlife Conservation Trust
यह वायरस सूअरों के बीच सीधे संपर्क, संक्रमित मीट या संक्रमित चीजों से फैलता है. ब्रिटेन के पियरब्राइट इंस्टीट्यूट में इस वायरस पर रिसर्च करने वाली लिंडा डिक्सन ने बताया कि इसकी अब तक कोई वैक्सीन नहीं बनी है और पहला टीका आने में कम से कम दो से तीन साल का वक्त लग जाएगा. डिक्सन बताती हैं कि फिलहाल सच यह है कि जिस भी सूअर को यह वायरस लगा उसका मरना तय है यानि ये जंगली या पालतू किसी भी सूअर की पूरी पूरी आबादी मिटा सकता है.
कैसा है पिग्मी हॉग्स का लॉकडाउन
असम में राजधानी गुवाहाटी और एक अन्य जगह नामेरी में स्थित ब्रीडिंग सेंटर में 82 पिग्मी सूअर रख गए हैं. यहां इन्हें सुरक्षित रखने के लिए दो समानांतर सुरक्षा बाड़ें खड़ी की गई हैं. आम लोगों को इन्हें देखने जाने की अनुमति नहीं है और इन केंद्रों पर कार तक पार्क नहीं की जा सकती. इनकी देखभाल करने वाले जो स्टाफ के सदस्य कैंपस के बाहर रहते हैं उन्हें भी आने के बाद अपने जूते बाहर छोड़ने होते हैं, फिर स्नान करना होता है, हाथ पैर धोकर, पैरों को एंटी-वायरल तरल में डुबोने के बाद नए जूते पहन कर ही वे अंदर जा सकते हैं.
पिग्मी हॉग उन गिने चुने स्तनधारी जीवों में आते हैं जो अपने और परिवार के रहने के लिए सूखी घास के शानदार घोंसले बनाते हैं. ऐसा करने वाली ये सूअरों की एकलौती प्रजाति है. इस इलाके में जंगली भालुओं में अफ्रीकी स्वाइन फ्लू का संक्रमण पहुंचने के कारण पिग्मी के केयरटेकर्स काफी चिंता में हैं. ऊपर से विश्व भर में कोरोना वायरस की महामारी के कारण इनकी फंडिंग में भी काफी गिरावट आई है.
डब्ल्यूएचओ ने 2018 में ऐसी 15 बीमारियों की सूची तैयार की थी जो महामारी की शक्ल ले सकती हैं. "मैनेजिंग एपिडेमिक" नाम से डब्ल्यूएचओ की सलाह को एक किताब की शक्ल भी दी गई. 21वीं सदी इनमें से कई बीमारियों को देख चुकी है.
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इबोला
कोविड-19 की तरह यह भी एक वायरस से फैलता है और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोग बीमार हो जाते हैं. इबोला के अधिकतर मामले अफ्रीका के गरीब इलाकों में देखे गए हैं.
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लस्सा बुखार
यह बुखार चूहों के कारण फैलता है. चूहों के मल या मूत्र के संपर्क में आने से इंसान बीमार हो सकता है. बीमार व्यक्ति के शारीरिक द्रव से यह दूसरों में फैल सकता है. बच्चों पर इसका ज्यादा बुरा असर होता है.
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सीसीएचएफ
क्रीमियन कॉन्गो हेमोरहेजिक फीवर उन परजीवियों के काटने से होता है जो इंसानों, जानवरों या पक्षियों के शरीर पर रह कर उनका खून चूस कर जीते हैं. यह बीमारी भी इंसानों से इंसानों में फैलती है. मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है.
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पीला बुखार
अर्बन येलो फीवर पीले बुखार की सबसे खतरनाक किस्म है. इस बीमारी का टीका विकसित किया जा चुका है. इस लिहाज से इसका खतरा बाकी बीमारियों की तुलना में कम है.
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जीका
जीका का बुखार एडीस मच्छर के काटने से होता है. यह मच्छर दिन में काटता है. गर्भवती महिलाओं में जीका होने से मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा होता है. इसका कोई टीका उपलब्ध नहीं है.
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चिकनगुनिया
यह बीमारी भी एडीस मच्छर के काटने से ही फैलती है. रिहाइशी इलाकों में इसके फैलने का खतरा ज्यादा होता है. इस बीमारी के लक्षण डेंगू जैसे होते हैं. भारत में हर साल इसके कई मामले सामने आते हैं.
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जानवरों से फैलने वाले फ्लू
इसमें एवियन और स्वाइन फ्लू शामिल हैं. 2009 में स्वाइन फ्लू को वैश्विक महामारी (पैंडेमिक) घोषित किया गया था. यह दुनिया भर में फैला था लेकिन कोरोना वायरस की तुलना में काफी कम मामले सामने आए थे.
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मौसमी फ्लू
यह हर साल मौसम बदलने के साथ होने वाला फ्लू है. यह वायरस के कारण होता है और इसकी दो किस्में होती हैं: ए और बी. बड़ी उम्र के लोगों को इससे बचने के लिए सालाना टीका लेने के लिए कहा जाता है.
अगर किसी ऐसे वायरस के कारण फ्लू होता है जिसके खिलाफ लोगों के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता का विकास नहीं हो पाता है तो वह वैश्विक महामारी की शक्ल ले सकता है. और बीमारी को समझने और टीका विकसित करने में काफी समय लग सकता है.
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मर्स
मिडल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम एक तरह के कोरोना वायरस के कारण होता है. यह बीमारी ऊंटों के कारण फैलती है. 2012 से 2015 के बीच यह बीमारी 24 देशों में फैली और 400 लोगों की जान गई.
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हैजा
साफ सफाई की कमी और गंदे पानी से हैजा फैलता है. इसमें बुखार नहीं होता. मरीज का पेट खराब होता है, दस्त के कारण कमजोरी होती है और कुछ मामलों में तो कुछ घंटों में ही जान चली जाती है.
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मंकी पॉक्स
यह उसी किस्म के वायरस के कारण फैलता है जिससे चेचक होता है. अपने नाम से विपरीत यह बंदरों से नहीं, चूहों के कारण फैलता है. जानवरों से इंसानों में पहुंचने के बाद इंसानों के बीच संक्रमण फैलने लगता है.
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प्लेग
यह छोटे जानवरों में मिलने वाले बैक्टीरिया से फैलता है. ज्यादातर चूहे इसके लिए जिम्मेदार होते हैं. प्लेग की सबसे आम किस्म है ब्यूबोनिक प्लेग जो इंसान से इंसान में नहीं फैलता है.
इस बीमारी के बारे में कम जानकारी के कारण अकसर डॉक्टर इसे पहचानने में गलती करते हैं. अगर वक्त रहते ही सही एंटीबायोटिक दिए जाएं तो इलाज मुमकिन है.
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मेनिंगनाइटिस
मेनिंगोकोकल मेनिंगनाइटिस दिमाग पर असर करता है. इस बीमारी का मृत्यु दर 50 प्रतिशत है. एंटीबायोटिक दे कर इसे रोका ना जाए तो यह दूसरों में भी फैल सकती है.