भारत: गूगल के डेटा सेंटर का विरोध क्यों कर रहे लोग
२३ सितम्बर २०२६
आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में गूगल का डेटा सेंटर बनाया जा रहा है. यह डेटा सेंटर अब केवल एक औद्योगिक परियोजना भर नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण, भूमि आवंटन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े तमाम प्रश्नों का केंद्र बन गया है. इसे लेकर हो रहे विवाद के केंद्र में विशाखापट्टनम और उत्तरी आंध्र प्रदेश के तटवर्ती क्षेत्र में प्रस्तावित हाइपरस्केल एआई डेटा सेंटर परियोजनाएं हैं. इनमें गूगल और अदाणी समूह से जुड़ी निवेश योजनाएं शामिल हैं.
राज्य सरकार और आंध्र प्रदेश इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन (एपीआईआईसी) का दावा है कि प्रस्तावित 1000 मेगावाट डेटा सेंटर राज्य के आईटी क्षेत्र के लिए "गेम चेंजर" साबित हो सकता है. सरकार के अनुसार इससे 87,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आएगा, डिजिटल बुनियादी ढांचा मजबूत होगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे. आधिकारिक हलफनामे में विशाखापट्टनम को भविष्य के "एआई सिटी" के रूप में विकसित करने की संभावना भी जताई गई है.
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सड़कों पर उतरे नागरिक और पर्यावरण समूह
हालांकि, इन परियोजनाओं का विरोध करने वाले नागरिक समूहों और सामाजिक संगठनों की चिंताएं अलग हैं. 'स्टॉप वाइजाग डेटा सेंटर्स' अभियान का कहना है कि इतने बड़े डेटा सेंटरों के लिए भारी मात्रा में पानी, बिजली और भूमि की आवश्यकता होगी. इससे स्थानीय पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ सकता है. यह अभियान संसाधनों के उपयोग और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर आवाज उठाता है.
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू भूमि आवंटन से जुड़ा है. एपीआईआईसी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में दलील दी है कि 160 एकड़ से अधिक भूमि का आवंटन सार्वजनिक हित में किया गया और इसके लिए नीलामी आवश्यक नहीं थी. दूसरी ओर, जनहित याचिका दायर करने वालों का आरोप है कि भूमि आवंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और इससे सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचा.
सोशल मीडिया पर सिमटती असहमति की आवाज
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि परियोजना के लिए इस्तेमाल की जा रही भूमि सिंहाचलम देवस्थानम से संबंधित है और उसे अदालत की अनुमति के बिना लीज पर नहीं दिया जा सकता. याचिकाकर्ताओं ने पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों और लीज की अवधि को लेकर भी सवाल उठाए हैं. इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सरकार से लीज की अवधि और दूसरे पहलुओं पर जवाब भी मांगा है.
इसी बीच विवाद ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों की बहस को भी तेज कर दिया है. 19 सितंबर को 'स्टॉप वाइजाग डेटा सेंटर्स' अभियान का इंस्टाग्राम अकाउंट भारत में सीमित कर दिया गया. अभियान का कहना है कि उसे मेटा की ओर से बताया गया कि यह कार्रवाई भारत के सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत कानूनी शर्तों के आधार पर की गई है. इससे पहले भी अभियान की नौ पोस्टों पर प्रतिबंध लगाए जा चुके थे.
ह्यूमन राइट्स फोरम (एचआरएफ) ने इस कार्रवाई की तीखी आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि डेटा सेंटर परियोजनाओं की आलोचना करने वाली सामग्री को व्यवस्थित रूप से सीमित किया जा रहा है. संगठन का दावा है कि उसके खुद के कुछ पोस्ट और एनवायरनमेंटल रिपोर्टिंग कलेक्टिव की एक खोजी रिपोर्ट भी इंस्टाग्राम पर प्रतिबंधों का सामना कर चुकी है. एचआरएफ ने मेटा से अकाउंट बहाल करने और यह सार्वजनिक करने की मांग की है कि प्रतिबंध किस प्राधिकरण के अनुरोध पर लगाया गया.
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'स्टॉप वाइजाग डेटा सेंटर्स' अभियान का इंस्टाग्राम अकाउंट 11,800 से अधिक फॉलोअर्स के साथ 56 लाख से ज्यादा व्यूज हासिल कर चुका है. यह पेज नियमित रूप से एआई डेटा सेंटर परियोजनाओं को लेकर नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंताओं को सामने लाता रहा है.
बीते कुछ सप्ताहों में विशाखापट्टनम में कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं. सोशल मीडिया पर जारी तस्वीरों और वीडियो में बच्चों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को "हम लोग डेटा नहीं पी सकते” जैसे संदेश वाले बैनर लेकर मार्च करते देखा गया. कुछ प्रदर्शनकारियों ने गूगल के लोगो पर हथकड़ी के चित्र बनाकर भी विरोध दर्ज कराया.
ग्रीन विशाखा एनजीओ के संस्थापक राजा राम मोहन रॉय ने एक सभा में कहा कि विकास लोगों की आजीविका की कीमत पर नहीं होना चाहिए. उन्होंने शहर में पानी की मांग और सप्लाई के बीच बढ़ते अंतर का हवाला देते हुए चिंता जताई कि सरकार ने परियोजना को 20 वर्षों तक निश्चित रूप से पानी की सप्लाई का भरोसा दिया है, जबकि स्थानीय लोग पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रहे हैं.
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अभियान समूह ने आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के उस दावे की भी आलोचना की कि राज्य सरकार चिंतित नागरिकों के साथ संवाद के लिए खुली है. समूह ने अपनी वेबसाइट पर जारी बयान में कहा, "अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री के सार्वजनिक बहस का स्वागत करने और लोगों की चिंताओं का समाधान करने के दावे पूरी तरह खोखले हैं. आलोचनात्मक आवाजों को दबाना कभी भी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता."
नारा लोकेश ने 19 अगस्त को विधानसभा में कहा कि डेटा सेंटर के पानी और पर्यावरण को लेकर गलत जानकारी फैलाई जा रही है. उन्होंने कहा कि डेटा सेंटर के लिए पानी शहर के लोगों के हिस्से से नहीं लिया जाएगा. इसके लिए पोलावरम परियोजना से मिलने वाले औद्योगिक कोटे का पानी इस्तेमाल होगा.
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वहीं गूगल का कहना है कि कि परियोजना सभी लागू कानूनों के अनुरूप विकसित की जाएगी. कंपनी का दावा है कि वह स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए उन्नत एयर-कूलिंग तकनीक अपनाएगी, जिससे पानी पर निर्भरता कम होगी. परियोजना के विकास में गौतम अदाणी के नेतृत्व वाला अदाणी समूह साझेदार है, जो इस डेटा सेंटर परिसर का निर्माण करेगा. अनुमान है कि इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 1.88 लाख रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच डेटा सेंटर निवेश तेजी से बढ़ रहे हैं. लेकिन विशाखापट्टनम का मामला यह संकेत देता है कि बड़े तकनीकी निवेशों को अब रोजगार और आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता व स्थानीय संसाधनों पर उनके प्रभाव को लेकर भी कठोर सार्वजनिक जांच का सामना करना पड़ सकता है.