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योग करती महिलाओं की पेंटिंग पर अश्लीलता, ये कैसी मानसिकता?

१४ जनवरी २०२६

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में एक सार्वजनिक दीवार पर योगमुद्रा में महिलाओं की पेंटिंग पर अश्लील निशान बनाए गए. इस घटना पर काफी रोष है. सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की बेरोकटोक पहुंच पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

ग्वालियर शहर में सड़क किनारे एक दीवार पर बनी पेंटिंग योगाभ्यास करती महिला आकृति को दर्शाते हुए
ग्वालियर में जिस जगह यह घटना हुई, वहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा था. इस वजह से आशंका है कि पेंटिंग बिगाड़ने वालों की शायद कभी पहचान नहीं हो पाएगीतस्वीर: Aashi Kushwaha

भारत के ग्वालियर शहर में दीवारों पर महिलाओं की योग करते हुए 'ब्लैक सिलुएट' शैली में वॉल पेंटिंग बनाई गई. इसे स्मार्ट सिटी पहल के तहत योग के प्रति जागरूक करने के लिए बनाया गया था. पेंटिंग में महिलाओं को अलग-अलग योग मुद्राओं में दिखाया गया. कुछ अज्ञात लोगों ने पेंटिंग को जानबूझकर खराब कर दिया. खासतौर पर महिलाओं के जननांगों के आसपास खरोंचा गया. 

ये वॉल पेंटिंग्स, योगाभ्यास के लिए लोगों को जागरूक करने की मंशा से बनवाई गई थींतस्वीर: Gwalior Municipal Corporation

"अब एक महिला की पेंटिंग भी सुरक्षित नहीं है?"

नए साल के पहले दिन, ग्वालियर की रहने वालीं आशी कुशवाह की इनपर नजर गई और उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. पोस्ट में उन्होंने लिखा, "मैं इस सड़क से रोज गुजरती हूं. इन पेंटिंग्स को देखकर मुझे गुस्सा आता है. ग्वालियर को स्मार्ट सिटी कहा जाता है, लेकिन लोगों की सोच कब स्मार्ट होगी? यह कोई मामूली घटना नहीं है और लोगों की गंदी मानसिकता को दिखाता है. यह शर्मनाक और बेहद निराशाजनक है कि अब एक महिला की पेंटिंग भी सुरक्षित नहीं है."

महिलाओं के साथ अपराध की राजधानी भी है दिल्ली

आशी 11वीं कक्षा की छात्रा हैं. वीडियो अपलोड करने से पहले वह संकोच कर रही थीं. उन्हें ट्रोल किए जाने या फिर प्रशासन की ओर से कोई अनचाही कार्रवाई का अंदेशा था. डीडब्ल्यू से बातचीत में आशी ने बताया कि ये पेंटिंग्स ग्वालियर के नदी गेट इलाके में बनी थीं. 1 जनवरी को अपनी दोस्त के साथ घूमते हुए आशी ने इसे नोटिस किया. उन्हें दुख है कि महिलाओं को पेंटिंग में भी सामान की तरह देखा जा रहा है.

आशी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पेंटिंग में योग करती हुई महिलाओं का चेहरा, बाल या त्वचा नहीं दिख रही है. ना ही उन्होंने छोटे कपड़े पहने हैं. मैंने पहली बार देखा कि एक पेंटिंग को इस तरह से बिगाड़ा गया. लोग इसके आगे से गुजर रहे थे, लेकिन किसी ने आपत्ति नहीं जताई. मैं कंटेंट क्रिएटर भी हूं. मुझे लगा यह मेरे शहर में हुआ है और इसका वीडियो बनाना ही चाहिए."

पब्किल स्पेस में बराबरी मांगती महिलाओं का संघर्ष

जिस जगह की यह घटना है, वहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा था. इस वजह से पेंटिंग बिगाड़ने वालों की शायद कभी पहचान नहीं हो पाएगी.

लोकेंद्र सिंह ने आपत्तिजनक निशानों को काले रंग से ढक दियातस्वीर: Lokendra Singh

दो कंटेंट क्रिएटरों ने की पहल

संबंधित वीडियो के सामने आते ही कई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर उस जगह पहुंचे. कई वीडियोज में इसका मजाक उड़ाया गया. राह चलते लोग भी इन पेंटिंग्स का वीडियो बनाने के लिए रुक रहे थे. इस बीच, लोकेंद्र सिंह ने इन पेंटिंग्स को ठीक करने का प्रयास किया. उन्होंने काले रंग के पेंट से आपत्तिजनक निशानों को ढक दिया.

क्या महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा नींद की जरूरत है?

कंटेंट क्रिएटर लोकेंद्र पिछले दो साल से ग्वालियर में रह रहे हैं. वह 'केतु' नाम से सोशल मीडिया पर पॉपुलर हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से बताया, "बतौर पुरुष मुझे यह देखकर बुरा लगा. मेरा फर्ज था कि मैं पेंटिंग को ठीक करूं. नदी गेट से लगभग 300 मीटर दूर एक और ऐसी ही वॉल पेंटिंग थी, उसपर भी खरोंचें थीं. मैंने उन्हें भी कवर किया. नगर निगम से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उनका तुरंत कोई जवाब नहीं आया."

लोकेंद्र का वीडियो वायरल होते ही अधिकारियों ने कार्रवाई की. ग्वालियर नगर निगम प्रशासन ने एक टीम भेजकर सभी पेंटिंग्स को सफेद रंग से ढक दिया. इसके बाद 11 जनवरी को नई पेंटिंग बनाने के लिए एक जेन-जी स्ट्रीट वॉल पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. 

ग्वालियर नगर निगम के प्रवक्ता उमेश गुप्ता ने वॉल पेंटिंग को नुकसान पहुंचाने के पीछे 'असामाजिक तत्वों' को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "उस जगह सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा था इसलिए अपराधी को खोजना मुश्किल है. हालांकि, आईईसी (सूचना, शिक्षा और संचार) नोडल अधिकारी इसकी जांच कर रहे हैं. हम जल्द सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाएंगे."

ग्वालियर नगर निगम प्रशासन ने एक टीम भेजकर सभी पेंटिंग्स को सफेद रंग से ढक दियातस्वीर: Gwalior Municipal Corporation

महिलाओं की गरिमा और स्वतंत्रता पर वाइटवॉश?

इस मामले पर प्रशासन ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, उससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या पेंटिंग्स पर केवल वाइटवॉश कर देना ही काफी है? लोकेंद्र और आशी का मानना है कि इस तरह के कदम से कुछ वक्त के लिए पेंटिंग को छुपाया जा सकता है, लेकिन मानसिकता का बदलना ज्यादा जरुरी है. सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने ग्वालियर की इस घटना को निंदनीय और शर्मनाक बताया है.

सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने डीडब्ल्यू से बातचीत में रेखांकित किया कि महिलाएं पहले ही सड़कों पर सुरक्षित नहीं हैं, और अब उनकी पेंटिंग्स को भी खतरा है. वह कहती हैं कि सीसीटीवी फुटेज न होने के कारण गिरफ्तारी नहीं हो पाएगी, ऐसी सोच रखने वाले लोग अब भी खुलेआम घूम रहे होंगे जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरा है.

अंजलि चौहान, नारीवादी शोधकर्ता और लेखक हैं. उनका मानना है कि ग्वालियर में हुई घटना केवल दीवार या पेंटिंग खराब करने का मामला नहीं है, बल्कि प्रतीकात्मक हिंसा हैतस्वीर: Anjali Chauhan

"यह सिर्फ पेंटिंग खराब करना नहीं, प्रतीकात्मक हिंसा है"

महिला सुरक्षा कार्यकर्ता ध्यान दिला रहे हैं कि ग्वालियर में जो हुआ, वह लैंगिक उत्पीड़न है और रेप कल्चर को बढ़ावा देता है. इसे देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. जैसा कि नारीवादी शोधकर्ता और लेखक अंजलि चौहान बताती हैं कि यह सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने और अपमानित करने का एक शर्मनाक तरीका है. 

दिल्ली से ज्यादा मुंबई सुरक्षित लगता है महिलाओं को

अंजलि डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहती हैं, "ऐसे कृत्य एक डरावना संदेश देते हैं. महिलाएं अपने सपनों को दबाएं और सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देना कम कर दें. यह एक तरह की चेतावनी है कि सार्वजनिक स्थान हमारे लिए सुरक्षित नहीं हैं और हमारी मौजूदगी को दंडित किया जा सकता है. यह सिर्फ दीवार या पेंटिंग खराब करना नहीं है. यह प्रतीकात्मक हिंसा है."

निदा अंसारी मांग करती हैं कि महिलाओं को केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और आजादी से चलने-फिरने का अधिकार मिलना चाहिएतस्वीर: Nida Ansari

निदा अंसारी, सेंटर फॉर इक्विटी एंड इंक्लूजन में कम्युनिकेशन मैनेजर हैं. इस मुद्दे पर डीडब्ल्यू से बात करते हुए निदा ने कहा कि ग्वालियर जैसी घटनाएं महिलाओं के शरीर को वस्तु बनाकर पेश करती हैं. महिलाओं पर और कड़ी निगरानी रखी जाती है और इसे अक्सर 'सुरक्षा' के नाम पर सही ठहरा दिया जाता है.

निदा अंसारी बताती हैं, "इन घटनाओं के डर से महिलाएं सड़क, पार्क, सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक जीवन से दूर रहती हैं. वे अपने घरों तक सीमित हो जाती हैं. महिलाओं को सुरक्षा की नहीं बल्कि समानता, सम्मान और स्वतंत्र रूप से चलने-फिरने का अधिकार चाहिए. यह हमारे संविधान में हर नागरिक को मिलता है."

महिलाओं के लिए डर का दूसरा नाम, नाइट ड्यूटी

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पहले भी होती रही हैं ऐसी घटनाएं, सिर्फ भारत नहीं और भी देशों में

महिलाओं की तस्वीरों और पेंटिंग्स को निशाना बनाना कोई नई बात नहीं है. पिछले साल जर्मनी में महिलाओं की कांस्य मूर्तियों के स्तन का रंग उतर गया, क्योंकि लोग उन्हें बार-बार छूते और रगड़ते थे. जर्मन महिला अधिकार संस्था 'टेर डेस फेम' ने इसका विरोध किया था.

साल 2025 में ही अमेरिका के ह्यूस्टन में एक दीवार पर बनी महिलाओं की पेंटिंग या म्यूरल पर 'स्लट' लिखा मिला. यह म्यूरल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए बनाया गया था. इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में लैंगिक हिंसा की शिकार महिलाओं की याद में बनाई गई वॉल पेंटिंग पर 'वॉर ऑन मेन' लिखा मिला.

बेल्जियम में सामने आया कई महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार का मामला

कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं, जहां महिला संगठन और नारीवादियों ने पब्लिक आर्ट में महिलाओं के "ऑब्जेक्टिफिकेशन" का विरोध किया है. साल 2018 में लंदन में ऑस्ट्रियाई कलाकार एगोन शीआ की न्यूड महिलाओं वाली पेंटिंग्स को सार्वजनिक पोस्टर्स के रूप में लगाने पर नारीवादी समूहों ने आपत्ति जताई थी. इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के यौन प्रदर्शन के तौर पर देखा गया.

वहीं, साल 2024 में महिला कार्यकर्ताओं के एक समूह ने फ्रांसीसी कलाकार गुस्ताव कूर्बे की एक पेंटिंग पर स्प्रे से 'मीटू' लिख दिया था. इस पेंटिंग में एक महिला के जननांग (वजाइना) को दर्शाया गया था.

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