जूलियान असांज मामले में ब्रिटेन में जज ने अमेरिका की प्रत्यर्पण की मांग ठुकरा दी. जज ने कहा, असांज की मानसिक स्थिति को देखते हुए इसे "उत्पीड़न" माना जाएगा.
तस्वीर: Reuters/P. Nicholls
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अमेरिका ने ब्रिटेन से मांग की थी कि असांज को अमेरिका के हवाले किया जाए, ताकि वहां उन पर मुकदमा चल सके. दोषी साबित होने पर असांज को अमेरिका में 175 साल तक की सजा हो सकती है. लेकिन ब्रिटिश जज ने इस मांग के खिलाफ फैसला देते हुए कहा है कि असांज की मानसिक स्थिति देखते हुए ऐसा करना उनका उत्पीड़न करना होगा. उन्होंने कहा, "अमेरिका ने कार्यवाई की जो प्रक्रिया बताई है, उसे देखते हुए मुझे यकीन है कि मिस्टर असांज को आत्महत्या की कोशिश से नहीं रोका जा सकेगा और इस वजह से मैंने फैसला किया है कि मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह उत्पीड़न होगा."
ब्रिटिश अदालत में सुनवाई के दौरान असांज का चित्र तस्वीर: Reuters/Julia Quenzler
यूं हुई विकीलीक्स की शुरुआत
विकीलीक्स नाम से वेबसाइट 2006 में रजिस्टर की गई थी लेकिन इस पर काम 2007 में शुरू हुआ. इसके संस्थापक जूलियान असांज का दावा था कि वे सेंसरशिप के खिलाफ काम कर रहे हैं और अपने सूत्रों को सुरक्षित रखते हुए वे सरकारों की गुप्त जानकारियों को जनता के सामने लेकर आएंगे. अमेरिकी जेल ग्वांतानामो बे से जुड़े दस्तावेज लीक करके असांज दुनिया की नजरों में आए. लेकिन 2010 में उन्होंने तहलका मचा दिया जब दुनिया भर के अखबारों के साथ मिल कर उन्होंने सरकारों और नेताओं से जुड़ी गुप्त जानकारी सार्वजनिक की.
विकीलीक्स ने द न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्डियन, डेय श्पीगल, ले मोंडे और एल पाएस जैसे अखबारों के साथ मिलकर काम किया और एक करोड़ से ज्यादा दस्तावेज लीक किए. इनमें अमेरिका से लेकर यूरोप, चीन, अफ्रीका और मध्य पूर्व तक की सरकारों से जुड़े डॉक्यूमेंट शामिल थे. लेकिन वक्त के साथ साथ विकीलीक्स ने अपना सारा ध्यान अमेरिका पर केंद्रित कर दिया. इस वजह से अमेरिका असांज पर रूस के साथ मिले होने का आरोप लगाने लगा लेकिन जूलियान असांज ने हमेशा इससे इनकार किया.
जुलाई 2016 में विकीलीक्स ने ऐसे कई ईमेल लीक किए जो दिखाते थे कि अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर बर्नी सैंडर्स की जगह हिलेरी क्लिंटन को तवज्जो दे रही थी. इसके बाद पार्टी के कई वरिष्ठ सदस्यों को इस्तीफा भी देना पड़ा था.
जूलियान असांज: हीरो या विलन?
पिछले एक दशक में विकीलीक्स कई विवादों में घिरा रहा लेकिन इसका सबसे बड़ा विवाद खुद असांज के इर्दगिर्द ही रहा. असांज पर एक के बाद एक बलात्कार और उत्पीड़न के मामले दर्ज होने लगे. असांज के समर्थकों ने इसे उन्हें फंसाए जाने की साजिश बताया, तो आलोचकों ने उन्हें अपने फायदे के लिए हेरफेर करने वाला व्यक्ति कहा. इन मामलों के चलते कहीं उन्हें अपने देश स्वीडन ना भेज दिया जाए, इस डर से वह 2012 से 2019 तक लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में रहे. वैसे मई 2017 में ही स्वीडन ने उनके खिलाफ जांच बंद कर दी थी लेकिन असांज ने दूतावास में शरण जारी रखी. 2019 में जब इक्वाडोर में सरकार बदली तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. तब से वह ब्रिटेन की उच्च सुरक्षा वाली बेलमार्श जेल में हैं. 2020 में इस जेल में कोरोना के कुछ मामले भी सामने आए थे.
यहां असांज को बिलकुल अकेले रखा गया है जिस कारण उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती बताई जा रही है. उनके दोस्तों का कहना है कि वह अपनी जान लेने की कोशिश भी कर चुके हैं. ब्रिटिश जज ने भी इसी बात का हवाला देते हुए असांज को अमेरिका के हवाले ना करने का फैसला सुनाया है.
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के मुताबिक 2020 में पूरी दुनिया में कम से कम 42 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गए. जानिए किस किस देश में पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरा है.
तस्वीर: Picture-alliance/AA/Z. H. Chowdhury
हर साल मारे जाते हैं कई पत्रकार
आईएफजे के अनुसार हर साल कम से कम 40 पत्रकार और मीडियाकर्मी अपने काम की वजह से मारे जाते हैं. संस्था का कहना है कि पिछले तीन दशकों में पूरी दुनिया में 2,658 पत्रकार मारे गए हैं. यह तस्वीर है 2018 में मारे गए सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी की.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/L. Pitarakis
सबसे खतरनाक देश
आईएफजे हर साल पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देशों की सूची बनाता है. पिछले पांच सालों में लगातार चौथी बार मेक्सिको इस सूची में सबसे ऊपर है. वहां 2020 में 13 पत्रकार मारे गए. तस्वीर में मेक्सिको के चियुदाद हुआरेज में एक पुलिसकर्मी उस स्थान पर पहरा दे रहा है जहां 29 अक्टूबर 2020 को मल्टीमेडिओस चैनल सिक्स के न्यूज एंकर आर्तुरो आल्बा को अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी.
तस्वीर: Jose Luis Gonzalez/REUTERS
पाकिस्तान भी पीछे नहीं
सूची में दूसरे नंबर पर है पाकिस्तान. वहां 2020 में पांच पत्रकारों के मारे जाने की जानकारी मिली. तस्वीर में अहमद उमर सईद शेख है जिसे अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के लिए मौत की सजा दी गई थी. अप्रैल 2020 में पाकिस्तान की एक अदालत ने शेख की मौत की सजा को पलट दिया.
तस्वीर: AFP/A. Quereshi
भारत में भी स्थिति चिंताजनक
भारत भी पकिस्तान से ज्यादा पीछे नहीं है. 2020 में भारत में कम से कम तीन पत्रकारों के मारे जाने की सूचना मिली. इतने ही पत्रकार अफगानिस्तान, इराक और नाइजीरिया में भी मारे गए. तस्वीर बेंगलुरु में 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में आयोजित किए गए एक प्रदर्शन की है.
तस्वीर: Imago/Hindustan Times
घट रहा है चलन
आईएफजे का कहना है कि यह आंकड़े लगभग वहीं हैं जहां ये 30 साल पहले थे, जब संस्था ने इन आंकड़ों को इकठ्ठा करना शुरू किया था. संस्था का कहना है कि पत्रकारों के मारे जाने का चलन घट रहा है, लेकिन ये तस्वीर अफगानिस्तान की है जहां 10, 2020 दिसंबर को मारी गई पत्रकार मलालाई मैवान्द के ताबूत के पास लोग प्रार्थना कर रहे हैं.
तस्वीर: Parwiz/REUTERS
सिर्फ आंकड़े नहीं
आईएफजे के महासचिव एंथोनी बैलैंगर ने कहा कि ये "सिर्फ आंकड़े नहीं हैं...ये हमारे दोस्त और सहकर्मी हैं जिन्होंने बतौर पत्रकार अपने काम के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और उसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाई." उन्होंने कहा कि संस्था सिर्फ इन पत्रकारों को याद ही नहीं रखेगी बल्कि एक एक मामले का पीछा करेगी और सरकारों और कानूनी एजेंसियों पर दबाव बनाती रहेगी ताकि उनके हत्यारों को सजा हो सके.
तस्वीर: Borralho Ndomba/DW
मौत ही नहीं, जेल भी है खतरा
150 देशों में 600,000 सदस्यों वाला आईएफजे उन पत्रकारों की भी खबर रखता है जिन्हें जेल में डाल दिया गया है. अधिकतर मामलों में सरकारों ने खुद को बचाने के लिए बिना स्पष्ट आरोपों के इन पत्रकारों को गिरफ्तार किया है. इस समय पूरी दुनिया में कम से कम 235 पत्रकार अपने काम से जुड़े मामलों की वजह से जेल में हैं.
आईएफजे के अध्यक्ष युनेस मजाहेद ने कहा है कि यह सारे तथ्य सरकारों द्वारा किए जाने वाले उनकी शक्ति के उस दुरूपयोग पर रोशनी डालते हैं जो वो अपनी जवाबदेही से बचने के लिए करती हैं. उन्होंने कहा, "इतनी बड़ी संख्या में हमारे सहकर्मियों का जेल में होना हमें याद दिलाता है कि दुनिया भर में जनहित में सत्य को खोज निकालने के लिए पत्रकारों को क्या कीमत चुकानी पड़ती है."
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महामारी में विशेष भूमिका
जिम्मेदार पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की अहमियत कोरोना वायरस महामारी के इस युग में विशेष रूप से महसूस की गई है. यूनेस्को की डायरेक्टर जनरल ऑड्री अजूले ने कहा है कि पत्रकार ना सिर्फ महामारी के दौरान आवश्यक जानकारी लोगों तक पहुंचा रहे हैं, वो हर तरह के सच को झूठ से अलग करने में हमारी मदद भी कर रहे हैं.