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शिक्षाभारत

आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों में कैसे रुकेंगी आत्महत्याएं

२१ सितम्बर २०२६

आईआईटी बॉम्बे में बीते सप्ताह एक छात्र की आत्महत्या ने देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में बढ़ती ऐसी घटनाओं को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है. ऐसे मामलों को कैसे रोका जा सकता है.

Indien Mumbai 2023 | Indian Institute of Technology Bombay
तस्वीर: IANS

ऐसे बढ़ते मामलों से साफ है कि देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और बार-बार होने के बावजूद ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है.  आईआईटी बॉम्बे में दूसरे वर्ष में पढ़ने वाला एक छात्र परीक्षा में कथित रूप से चैट-जीपीटी के जरिए सवालों के जवाब पाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन वह पकड़ा गया. हालांकि, संस्थान के मुताबिक इसके लिए उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का भरोसा दिया गया था.

इसके बावजूद उसने उसी रात अपने हॉस्टल में आत्महत्या कर ली. इस घटना के खिलाफ संस्थान के छात्र लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्होंने संस्थान के समक्ष 18-सूत्री मांगें रखी हैं. इनमें इस घटना की पारदर्शी और स्वतंत्र आंतरिक जांच के अलावा कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों की पूरी समीक्षा की मांग शामिल है. लेकिन जाति के आधार पर कथित उत्पीड़न के आरोपों ने इस घटना को नया रंग दे दिया है.

एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज हुआ मामला

छात्र के माता-पिता ने पुलिस में एक प्रोफेसर समेत कुछ लोगों के खिलाफ जातिगत टिप्पणी के जरिए उसे परेशान करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई है. ऐसे आरोप तो पहले भी सामने आते रहे हैं. लेकिन यह पहली घटना है जिसमें छात्र के परिजनों ने पुलिस में इसकी लिखित शिकायत की है. छात्र के परिवार ने उसे सबके सामने बेइज्जत करने, पढ़ाई को लेकर बुरी तरह डराने-धमकाने और जाति के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है.

आईआईटी बॉम्बे में छात्रों के धरने-प्रदर्शन के दौरान पुलिस तैनात करनी पड़ीतस्वीर: ANI/IMAGO

पिता की शिकायत के आधार पर मुंबई पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की है. इस मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए मुंबई पुलिस ने इसे क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है. संस्थान के छात्रों के एक समूह का आरोप है कि संस्थान के अधिकारियों ने उस छात्र साहिल वाकोडे को एक साल के लिए निलंबित करने की धमकी दी थी. इसकी वजह से उसे हॉस्टल छोड़कर कैंपस के बाहर रहना पड़ सकता था.

दूसरी ओर आईआईटी बॉम्बे की फैकल्टी फोरम ने छात्र की मौत पर संवेदना जताने के बावजूद परीक्षक और आरोपी प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के प्रति समर्थन जताया है. फोरम ने अपने बयान में कहा है कि परीक्षा के दौरान छात्र के पास बिना इजाजत के स्मार्टफोन होने और उसके इस्तेमाल का पता चलने पर डूला संस्थान के नियमों का पालन कर रहे थे.

माफी मांग कर प्रोफेसर को निलंबित किया

इस बीच छात्रों के लगातार धरने-प्रदर्शन के बीच आईआईटी बॉम्बे ने उस छात्र साहिल वोकाडे की मौत के बाद जारी किए गए बयान के लिए सोमवार को माफी मांगी है. इसके अलावा अधिकारियों ने इस घटना के सिलसिले में उत्पीड़न के आरोपी प्रोफेसर को निलंबित कर दिया है. सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में संस्थान ने लिखा है, "साहिल की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के हालात के बारे में हमारे पिछले बयान में की गई सभी टिप्पणियों के लिए हम माफी मांगते हैं."

पोस्ट में कहा गया है कि साहिल की मौत की जांच चल रही है और उसकी मौत से पहले घटे घटनाक्रम का ब्योरा सार्वजनिक करना उचित नहीं था. साहिल की मौत के बाद संस्थान के अधिकारियों ने एक बयान जारी कर कहा था कि वह शुक्रवार को अपना मोबाइल फोन लेकर परीक्षा हाल में गया था. उसने चैटजीपीटी खोला और पूरा प्रश्न-पत्र उस पर अपलोड कर दिया. उसके बाद उससे मिले जवाबों के आधार पर अपने उत्तर लिखने लगा. इस दौरान हॉल के इंचार्ज प्रोफेसर ने उसे पकड़ लिया. इसके बाद, विभाग के प्रमुख ने उससे बात की. बयान में कहा गया था कि प्रोफेसरों ने उस छात्र को भरोसा दिलाया था कि इस घटना का उसके करियर पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

लगातार बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं

देश का शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थान कहे जाने आईआईटी बंबई में इस साल किसी छात्र की आत्महत्या की यह तीसरी घटना है. इससे पहले फरवरी और जुलाई में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं. देश के दूसरे शीर्ष संस्थान भी इससे अछूते नहीं है. बीते महीने आईआईटी दिल्ली में ऋषिकेश कुमार नामक एक छात्र ने भी आत्महत्या कर ली थी. उसके बाद परिसर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था. छात्र के परिजनों के आरोपों के बाद संस्थान को एक पांच-सदस्यीय जांच समिति का गठन करना पड़ा था.

आईआईटी कानपुर में बीते दो साल में आठ छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में भी बीते महीने 15 दिनों के भीतर दो छात्रों की मौत हो गई थी. इस महीने की पहली तारीख को आईआईटी मंडी में पीएचडी करने वाले एक छात्र का शव बरामद किया गया था.

आईआईटी खड़गपुर में भी इस साल अब तक कम से कम चार छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. सबसे ताजा मामला राजस्थान के छात्र अंकित शर्मा का है. बीते महीने कथित रूप से चौथी मंजिल से नीचे गिरने के कारण उसकी मौत हो गई थी. इससे पहले वर्ष 2025 में वहां सात मौतें हुई थी. उनमें से पांच में आत्महत्या की पुष्टि हुई थी.

यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर संस्थान ने ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाए थे. उनमें प्रशासनिक के अलावा ढांचागत सुधार और छात्रों की काउंसलिंग के उपाय शामिल थे.

पहले भी लगते रहे हैं आरोप

छात्रों के तमाम संगठनों के अलावा कई विशेषज्ञ भी शीर्ष संस्थानों में बढ़ती इन घटनाओं के लिए पढ़ाई के भारी दबाव और जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव को जिम्मेदार ठहराते हैं. आईआईटी खड़गपुर के एक पूर्व छात्र नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "संस्थान में आरक्षण के जरिए प्रवेश पाने वाले छात्रों को हेय निगाहों से देखा जाता था और उनके खिलाफ टिप्पणी करने में सहपाठियो से लेकर प्रोफेसरों तक कोई पीछे नहीं रहता था."

सरकारी आंकड़े भी ऐसे आरोपों का समर्थन करते हैं. वर्ष 2014 से 2021 के बीच देश के शीर्ष संस्थानों में आत्महत्या करने वाले छात्रों में से 68 यानी करीब 55 फीसदी निचले तबके के थे.

राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों को ध्यान में रखें तो छात्रों की बढ़ती आत्महत्याएं राष्ट्रीय चिंता का विषय बनती जा रही हैं. इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या कर ली. उस साल होने वाली कुल आत्महत्याओं में से 8.5 फीसदी छात्रों ने की थी. छात्रों की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षा में फेल होना थी. वर्ष 2023 में ऐसे 13,892 मामले थे और 2014 में 8,068. इससे साफ है कि बीते एक दशक में ऐसी घटनाओं में करीब 80 फीसदी वृद्धि हुई है.

कैसे लगेगा ऐसी घटनाओं पर अंकुश?

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ काउंसलिंग के जरिए ऐसी घटनाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. कोलकाता के एक कालेज में प्रोफेसर रंजन भादुड़ी डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ऐसे संस्थानों में खासकर आरक्षण के जरिए प्रवेश पाने वाले छात्रों के साथ अक्सर जातिगत भेदभाव और टिप्पणियों के आरोप सामने आते रहे हैं. ऐसा करने वालों में वहां पढ़ाने वाले भी शामिल होते हैं. इसके लिए जागरुकता अभियान चलाना जरूरी है."

उनका कहना था कि आईआईटी बंबई की घटना के बाद लगे आरोपों से पता चलता है कि वहां भी छात्रों को जातिगत चश्मे से देखा जाता था. इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही सामने आएगा. लेकिन इस मामले ने पहली बार ऐसे छात्रों के प्रति पनपती मानसिकता को सामने ला दिया है.

कोलकाता के एक शीर्ष इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर रहीं डा. कमला भट्टाचार्य (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहती हैं, "जातिगत आधार पर भेदभाव के आरोप नए नहीं हैं. यह हमेशा रहा है. ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए प्रोफेसरों और सामान्य वर्ग के छात्रों की मानसिकता में बदलाव जरूरी है. इसके लिए जागरुकता अभियान चलाने के साथ ही जातिगत टिप्पणी के दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान बनाया जाना चाहिए."

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं होने तक ऐसी घटनाएं जारी रहेंगी. हर बार ऐसी किसी घटना के बाद कुछ दिनों तक शोर होता है. लेकिन उसके बाद सब कुछ जस का तस हो जाता है.

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